"News Paper Taazi Khabar" by Akhilesh Srivastava 'Chaman' is a touching Hindi children's story that highlights the values of hard work, kindness, friendship, and compassion. Through Amar's inspiring journey, the story teaches that true character is defined by humanity, not by wealth or social status.
News Paper Taazi Khabar
बालमन की सच्ची संवेदनाओं, मित्रता, परिश्रम और मानवीय मूल्यों को स्पर्श करती अखिलेश श्रीवास्तव 'चमन' की कहानी "न्यूज पेपर ताज़ी खबर" हमें सिखाती है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके काम या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके संस्कार, मेहनत और उदार हृदय से होती है। यह प्रेरक संदेश से भरपूर कहानी बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी समान रूप से पठनीय और विचारोत्तेजक है।
बच्चों के लिए प्रेरणादायक हिंदी बाल कहानी
न्यूज पेपर ताजी खबर
कक्षा में उसके घुसते ही पीछे से आवाजें आनी शुरू हो गयीं-‘न्यूज पेपर ताजी खबर...न्यूज पेपर ताजी खबर।’ इन आवाजों पर ध्यान दिए बगैर वह चुपचाप आ कर अपनी सीट पर बैठ गया। इतने में पीछे से फिर आवाज आयी-‘हरी मटर लाल टमाटर---हरी मटर लाल टमाटर।’ लेकिन उसने ऐसा प्रदर्शित किया जैसे कुछ सुना ही न हो।बस्ते से कापी निकाल कर वह अपना होमवर्क पूरा करने लगा।
“अरे बच्चों ! तुम लोग शोर कर रहे हो...? देखते नहीं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी अपना होम वर्क पूरा कर रहे हैं।’’ अमोल ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा।
“डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नहीं ये तो साक्षात विवेकानन्द जी हैं।’’ अपूर्व ने कहा और सारे लड़के एक साथ हॅंस पड़े। उसको सुना-सुना कर इस तरह की फिकरेबाजी तब तक चलती रही जब तक कि क्लास में टीचर नहीं आ गए।
उसका वास्तविक नाम अमरनाथ है लेकिन कक्षा के लड़के उसे ‘न्यूज पेपर ताजी खबर’ या ‘हरी मटर लाल टमाटर’ कह कर चिढ़ाते हैं। उसका यह नाम अमोल ने रखा था। कक्षा के लड़के अमोल की शह पर ही उसको चिढ़ाया करते थे । लेकिन उनकी बातों को वह एक कान से सुनता और दूसरे कान से निकाल देता था।
अमरनाथ अपनी मॉं पिताजी और छोटी बहन के साथ शास्त्रीनगर में नाले के किनारे बनी झोपड़पट्टी में रहता है। उसके पिताजी ठेले पर सब्जी बेचते हैं। वे खूब सवेरे मण्ड़ी जाते हैं। वहॉं से थोक के भाव में सब्जियॉं खरीदते हैं। और सारे दिन मुहल्ले-मुहल्ले घूम कर बेचते हैं। उसकी मॉं शास्त्रीनगर कालोनी में चार-पॉंच लोगों के घरों में बरतन धोने और झाड़ू-पोछा का काम करती है।
अमरनाथ के मॉं-बाप की इच्छा थी कि वह पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बने। इसलिए वे अमरनाथ के थोड़ा बड़ा होते ही उसे स्कूल भेजने लगे थे। अमरनाथ पढ़ने में बहुत मेधावी और मेहनती था। उसकी मेहनत के बल पर ही उसका एड़मिशन शहर के एक अच्छे विद्यालय में हो गया था और फीस भी माफ हो गयी थी। अपनी पढ़ाई के खर्चों के लिए अमरनथ सुबह-सुबह अखबार बॉंटने का काम करता था। सवरे वह अपने पिताजी के साथ ही घर से निकलता था। उसके पिताजी सब्जी मण्ड़ी जाते थे और वह रेलवे स्टेशन। स्टेशन पर अखबार के एजेन्ट से अखबार का बण्ड़ल ले कर वह शास्त्री नगर तथा आसपास के मुहल्लों में बॉंटता हुआ वापस घर आ जाता था।
अमोल अमरनाथ के साथ ही पढ़ता था और उसकी झोपड़ी के बगल वाली कालोनी शास्त्रीनगर में रहता था। अमरनाथ की माँ अमोल के घर में भी बरतन धोने और झाड़ू-पोछा का काम करती थी। अमरनाथ उसके घर में अखबार पहुंचाता था। अमोल के पापा एक सरकारी अधिकारी थे। अमोल को हर प्रकार की सुविधायें प्राप्त थीं। लेकिन उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। हर समय वह कोई न कोई शरारत करने में लगा रहता था। परीक्षा में खराब अंक आने पर अमोल के पापा उसे ड़ॉंटते तो अमरनाथ का उदाहरण देते थे। वे कहते-‘‘अमोल ! तुम्हें शर्म नहीं आती। एक सब्जी बेचने वाले का बेटा इतनी मेहनत से पढ़ाई करता है। बगैर किसी सुविधा के इतने अच्छे अंक ले आता है। और यहॉं सारी सुविधायें होने के बावजूद तुम्हारे इतने कम अंक आते हैं।’’
पापा द्वारा बात-बात में अमरनाथ का उदाहरण देने के कारण अमोल को अमरनाथ से चिढ़ हो गयी थी। वह हर समय अमरनाथ को परेशान करने और नीचा दिखाने का मौका तलाशता रहता था। कक्षा के सभी लड़कों को उसने बता दिया था कि अमरनाथ अखबार बॉंटता है। उसकी मॉं दूसरों के घर जूठे बरतन माँझती है। और उसके पिताजी ठेले पर सब्जी बेचते हैं। उसने ही अमरनाथ को ‘न्यूज पेपर ताजी खबर’ तथा ‘हरी मटर लाल टमाटर’ कह कर चिढ़ाना शुरू किया था। फिर उसकी देखा देखी कक्षा के अन्य लड़के भी उसे चिढ़ाने लगे थे।
जैसे-जैसे वार्षिक परीक्षा निकट आती जा रही थी कक्षा में पढ़ाई जोर पकड़ती जा रही थी। उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन अमरनाथ को यह देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि उस दिन उसे किसी ने चिढ़ाया नहीं। किसी ने भी न्यूज पेपर ताजी खबर अथवा हरी मटर लाल टमाटर की आवाज नहीं लगायी। ध्यान से देखने पर पता चला कि उस दिन अमोल कक्षा में अनुपस्थित था। फिर दूसरे दिन तीसरे दिन और चौथे दिन भी अमोल कक्षा में नहीं आया तो अमरनाथ को थोड़ी चिन्ता हुयी। चौथे दिन विद्यालय से लौटने के बाद उसने अपनी मॉं से पूछा-‘‘अम्मा ! क्या बात है अमोल आजकल विद्यालय नहीं आ रहा है ?’’
“अमोल कौन.....? क्या तुम श्रीवास्तव जी के बेटे की बात कर रहे हो ? वह बेचारा तो कई दिनों से बुखार में पड़ा है। शायद मलेरिया हो गया है उसको।’’ अमरनाथ की मॉं ने बताया।
अमोल की बीमारी की खबर सुन कर अमरनाथ को बहुत दुःख हुआ। अगले दिन सवेरे जब अखबार बॉंटने शास्त्रीनगर कालोनी में गया तो अमोल के घर में अखबार फेंकने के बाद उसने ड़रते-ड़रते बाहर लगी घंटी बजा दी। कुछ ही देर में अमोल के पापा दरवाजा खोल कर बाहर आ गए।
“अंकल जी नमस्ते । मैं आपके घर में काम करने वाली दाई का बेटा अमरनाथ हूँ। मैं अमोल के साथ पढ़ता हूँ। कल मेरी अम्मा बता रही थीं कि अमोल की तबियत ठीक नहीं है।’’ अमोल के पापा को देखते ही अमरनाथ ने कहा।
“हॉं बेटा! अमोल को मलेरिया हो गया है। उसे पूरी तरह से ठीक होने में काफी समय लग जाएगा।’’
“अंकल जी....क्या मैं अमोल से मिल सकता हूँ ?’’ अमरनाथ ने ड़रते-ड़रते पूछा।
“हॉं....हॉं..क्यों नहीं। आ जाओ।’’ अमोल के पापा ने कहा और अमरनाथ को अपने साथ अमोल के कमरे में ले गए। अमोल लिहाफ ओढ़े चुपचाप लेटा हुआ था। एकाएक अमरनाथ को आया देख कर वह इतना खुश हुआ कि उसकी ऑंखों से ऑंसू निकल पड़े। वह पिछले पॉंच दिनों से बिस्तर में पड़ा था लेकिन इतने दिनों में उसका कोई भी दोस्त उसका हालचाल लेने नहीं आया था। अमरनाथ पहला सहपाठी था जो उसे देखने के लिए आया था।
“कहो अमोल....कैसी तबियत है तुम्हारी ?” अमरनाथ ने पूछा।
“भगवान मुझे मेरी शरारतों की सजा दे रहा है अमर। कक्षा में हर समय जो तुमको बेवजह परेशान किया करता था उसी की सजा मिल रही है मुझे।’’ अमोल ने रोआँसा हो कर उत्तर दिया।
“अरे नहीं अमोल ! ऐसी बात क्यों कर रहे हो। तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे।’’ अमरनाथ उसे सांत्वना दिया।
“अमर लगता है मेरा यह साल खराब हो जाएगा।’’
“ऐसा क्यों सोचते हो अमोल। अभी तो वार्षिक परीक्षा में दो महीने से भी अधिक समय शेष है। तब तक तो तुम अच्छे हो ही जाओगे।’’
“ड़ाक्टर का कहना है कि पूरी तरह से ठीक होने में मुझे कम से कम पन्द्रह-बीस दिन लग जायेंगे। इस बीच कक्षा में जो चीजें पढ़ा दी जायेंगी वह सब भला कैसे पूरा कर पाऊॅंगा मैं ?”
“मित्र ! पहले तुम ठीक हो जाओ फिर कक्षा और पढ़ाई के बारे में सोचना।’’ अमरनाथ ने कहा और लौट आया।
अमोल से मिल कर लौटने के बाद अमरनाथ सारे दिन उसके ही बारे में सोचता रहा। उसे दुःख हो रहा था कि बीमारी के कारण अमोल का एक साल खराब होने जा रहा था। वह अमोल की सहायता कैसे करे इस बारे में सोचने लगा। सोचते-सोचते उसे ध्यान आया कि वह जिस एजेण्ट के यहॉं से अखबार ले आता है वह महीने के अंत में बिल बनाते समय दो कागजों के बीच में कार्बन रख लेता है जिससे बिल की दो प्रतियॉं तैयार हो जाती हैं। इस बात का ध्यान आते ही उसे समस्या का समाधान मिल गया।
अमरनाथ अगले दिन अखबार लेने गया तो एजेण्ट से कुछ पुराने कार्बन मॉंग लाया। उस दिन से कक्षा में कुछ भी लिखने से पहले वह अपनी कापी के दो पन्नों के बीच में कार्बन रख लेता था और कलम को दबा कर लिखता था ताकि दूसरे पन्ने पर लिखावट साफ-साफ उतर जाये। शाम को विद्यालय से लौटने के बाद वह कार्बन वाला पन्ना अपनी कापी से फाड़ कर अमोल को दे आता था। इस प्रकार कक्षा में रोज पढ़ाई जाने वाली सामग्री अमोल को घर बैठे ही मिलने लगी थी। अपने बिस्तर में लेटे-लेटे अमोल अमरनाथ द्वारा दिए पन्नों को पढ़ता रहता था। अगर कोई चीज उसकी समझ में नहीं आती तो शाम के समय अमरनाथ के आने पर उससे पूछ लेता था। इस प्रकार अमोल का समय भी आराम से कट जाता था और उसकी पढ़ाई भी हो जाती थी। अमरनाथ के इस सूझबूझ भरे कार्य से न सिर्फ अमोल बल्कि उसकी मम्मी और पापा भी बहुत खुश थे।
वार्षिक परीक्षा से पहले अमोल की तबियत ठीक हो गयी। उसने अमरनाथ द्वारा दिए गए कागजों को सिल कर कापी बना ली और उसी के सहारे परीक्षा की तैयारी करने लगा। परीक्षा से कुछ समय पहले एक दिन अमोल ने अमरनाथ के सामने प्रस्ताव रखा-‘‘अमर ! ऐसा न करो कि तुम रात में पढ़ने के लिए मेरे घर आ जाया करो। मुझको तुमसे मदद मिल जायेगी।’’
अमोल का यह प्रस्ताव अमरनाथ के लिए भी फायदे का था क्यों कि उसकी झोपड़ी में न तो बिजली थी और न ही उसके पढ़ने के लिए कोई अलग कमरा। एक ही कमरे में परिवार के सभी सदस्यों के रहने के कारण उसकी पढ़ाई में बहुत व्यवधान होता था। अमोल के प्रस्ताव को उसने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। अब रोज रात को वह अमोल के घर आ जाता था और देर रात तक वे दोनों साथ-साथ पढ़ाई किया करते थे। वार्षिक परीक्षा का परिणाम आया तो इस बार अमोल के हर बार से अच्छे अंक आए थे।
- अखिलेश श्रीवास्तव चमन
निष्कर्ष; "न्यूज पेपर ताज़ी खबर" केवल एक बाल कहानी नहीं, बल्कि सहानुभूति, मित्रता, परिश्रम और क्षमा का जीवन-पाठ है। यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि सच्चा चरित्र दूसरों का सम्मान करने और कठिन समय में साथ निभाने से बनता है।
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