“Jyotika’s Presence of Mind” is an inspiring Hindi children’s story by Vimla Rastogi. Through Jyotika’s quick thinking and Navni’s habit of watching too much TV, the story gives children a simple and meaningful lesson about presence of mind, responsibility, and balanced screen time.
Jyotika’s Presence of Mind | Inspirational Hindi Story for Kids
विमला रस्तोगी की बाल कहानी ‘ज्योतिका की सूझ-बूझ’ बच्चों को मनोरंजन के साथ एक महत्वपूर्ण सीख भी देती है। कहानी में ज्योतिका अपनी समझदारी और तत्परता से उस समय समस्या का समाधान करती है, जब परिवार मुश्किल में पड़ जाता है। वहीं नवनी के माध्यम से अत्यधिक टीवी देखने की आदत और उसके प्रभाव को सहज ढंग से प्रस्तुत किया गया है। सरल भाषा, रोचक प्रसंग और बालमन के अनुरूप कथानक इस कहानी को बच्चों के लिए उपयोगी और प्रेरक बनाते हैं।
बच्चों को सीख देने वाली प्रेरक कहानी
ज्योतिका की सूझ-बूझ
नवनिता व ज्योतिका दोनों बहनें हैं। घर में दोनों को नवनी व ज्योति ही बोलते हैं। ज्योति 9 वर्ष की है और नवनी सात वर्ष की। नवनी को टी.वी. देखने का बहुत शौक है। कहने को छोटी है पर टी.वी. में, मोबाइल में खूब मन लगता है। सब चैनल बदल लेती है। मोबाइल पर गेम खेल लेती है। स्कूल से आते ही टी.वी. देखने बैठ जाती है। टी.वी. देखते हुए खाना खाती है। मम्मी इतना समझाती हैं पर उसकी समझ में नहीं आता।
बड़ी बहन ज्योति स्कूल से आकर कपड़े बदलती, डायनिंग टेबल पर बैठ खाना खाती, स्कूल की बातें माँ को बताती।
एक दिन माँ ने नवनी से पूछा- ”आज क्या होमवर्क मिला है स्कूल से?“
नवनी ने सुना ही नहीं, वह टी.वी. देखने लगी। माँ ने डाँटते हुए कहा- “नवनी मैं तुमसे पूछ रही हूँ।“
“ओह माँ, जब करूँगी तो दिखा दूँगी।“ नवनी ने कहा।
“तुमसे तो पूछना ही बेकार है, तेरा सारा ध्यान टी.वी. में लगा रहता है।“ माँ ने झुंझलाकर कहा और अपने काम में लग गई।
शाम के समय ज्योति पार्क में चली जाती कुछ देर को, पर नवनी पास में अपनी सहेली मिनी के घर चली जाती, बातें भी करेगी टी.वी. भी देखेगी।
एक दिन ज्योति के पापा को किसी काम से बम्बई जाना था, माँ ने उनकी अटैची लगा दी, पर कुछ सामान बाजार से लाना रह गया। माँ पापा दोनों बाजार जा रहे हैं, ज्योति को भी अपने लिए कुछ लाना था, वह भी उनके साथ जाने को तैयार हो गई। नवनी ने कहा “मैं घर पर हूँ आप सब बाजार होकर आओ।”
“ठीक है, तुम अंदर से दरवाजा बंद करलो। किसी अजनबी को दरवाजा मत खोल देना।“
“मैं सब जानती हूँ माँ।“ कहकर नवनी ने दरवाजा बंद किया और झट से दीवान पर जाकर बैठ गई उसका पूरा ध्यान टी. वी. देखने में था।
माँ पापा को बाजार से लौटने में कुछ देर हो गई। आकर घंटी बजाई पर नवनी ने दरवाजा नहीं खोला- दरवाजे में एक जगह लोहे की बारीक सरियों से जाली बनी थी, झाँक कर देखा, टी. वी. तेज आवाज में चल रहा है, नवनी गहरी नींद में सो रही है। मोबाइल दूसरे कमरे में पड़ा है।
मम्मी पापा ने इतना दरवाजा खटखटाया आवाजें दीं, नवनी नहीं उठी, इधर पापा की चिंता बढ़ रही थी, उनका बम्बई जाना बहुत जरूरी था। अगर नवनी नहीं जगी तो ट्रेन छूट जाएगी। पापा माँ पर नाराज होने लगे “तुमने नवनी को सिर पर चढ़ा रखा है तुम्हारे लाड़ ने उसे बिगाड़ दिया है। इतना टी. वी. देखना क्या अच्छा है?“
“अब मैं उसे सख्ती से समझाऊँगी, मुझे भी आपके जाने की चिंता हो रही है।“
मां पापा की परेशानी देखकर ज्योति भी परेशान हो रही थी, वह अपने हाथों को रगड़ते हुए कुछ सोच रही थी। पापा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मम्मी भी असहाय सी लग रही थीं दरवाजे को हाथ से पीट रही थी, सामने वाले फ्लैट की आंटी भी बाहर आ गईं। मम्मी ने उन्हें सारी बात बताई। उसी समय ज्योति को एक उपाय सूझा- उसने पड़ोस वाली आंटी से पूछा- “आंटी आपका पाइप कहाँ रखा है?“
“बालकनी में नल के पास।“
ज्योति भागकर आंटी के घर में गई। पाइप उठाया, उसे उनकी रसोई के नल में लगाया, (इस फ्लैट में रसोई दरवाजे से ही लगी हुई थी) पाइप का एक सिरा पकड़ती हुई अपने घर के दरवाजे तक आई, पाइप काफी लम्बा था। ज्योति ने बारीक सरियों से बनी जाली में पाइप डाला उसे आगे को सरकाया अपनी दो उँगलियाँ भी जाली में से निकाली जो पाइप को पकड़ रही थी, फिर मम्मी से बोली- “मम्मी आप आंटी की रसोई में जाकर नल खोलकर आओ।“
मम्मी जैसे ही नल खोलकर आईं, पाइप से तेज धार में पानी निकलने लगा। ज्योति ने अपनी उँगली से पाइप को घुमाकर बौछार नवनी के मुँह की तरफ कर दी।
मुंह पर पानी पड़ते ही नवनी अचकचा कर उठी आंखें मलीं- ‘‘नवनी जल्दी से दरवाजा खोल-’’ लगभग चीखकर बोली ज्योति। नवनी ने दरवाजा खोला- ‘‘कैसे घोड़े बेचकर सो गई तू। तेरे पापा को जाने में देर हो रही है।’’ मम्मी तेज स्वर में बोली ज्योति भागकर नल बंद करके आई।
‘‘इसका टी.वी देखना बंद करो।’’ पापा ने इतना कहा और अपनी अटैची में कुछ पेपर रखे, टैक्सी कॉल की, फटाफट कपड़े बदलकर तैयार हो गए।
‘‘आज ज्योति की सूझ-बूझ काम आ गई वरना मेरी ट्रेन छूट जाती।’’ पापा का इतना कहते ही टैक्सी भी आ गई।
‘‘सॉरी पापा’’ नवनी ने सिर झुकाकर पापा से माफी मांगी।
‘‘अब मैं ज्यादा टी.वी. नहीं देखूंगी।’’ कहते कहते नवनी रो पड़ी। ज्योति ने उसे सम्भाला, पापा को ‘‘हैप्पी जर्नी’’ कहा।
‘‘अरे नवनी आ, पहले अपने कपड़े बदल भीग गए हैं।’’ ज्योति नवनी को कमरे में लेकर आई फिर कपड़े बदलने के लिए दिए।
‘‘सॉरी दीदी’’ नवनी ने फिर कहा।
‘‘अच्छा ठीक है आगे से ध्यान रखना’’ ज्योति ने कहा तब तक मम्मी अदरक वाली चाय व नाश्ता ले आईं।
- विमला रस्तोगी
निष्कर्ष: ‘ज्योतिका की सूझ-बूझ’ बच्चों को सिखाती है कि संकट के समय घबराने के बजाय शांत रहकर समझदारी से समाधान खोजना चाहिए। साथ ही, कहानी संतुलित दिनचर्या और टीवी देखने की आदत पर नियंत्रण का सहज संदेश देती है।
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