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जरा याद उन्हें भी कर लो : महेन्द्र भीष्म

जरा याद उन्हें भी कर लो
महेन्द्र भीष्म

    15 अगस्त 1947 को हमारा भारतवर्ष अंग्रेजों की लंबी दासता से मुक्त हुआ, परन्तु एक त्रासदी पूर्ण विभाजन के दंश के बाद। अखंड भारत के विभाजन के बाद भारतवर्ष तीन हिस्सों में बंट गया। अक्षत सनातन संस्कृति, सामयिक स्थितियोंवश भौगोलिक रूप से सिकुड़ गई। एक बार पुनः हमें सिकुड़ना पड़ा कभी अफगानिस्तान से लेकर सुदूर म्यांमार तक अखंड भारत एक था। पन्द्रह अगस्त, 1947 में पश्चमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान के रूप में एक बड़ा हिस्सा हमसे अलग हो गया। पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा बांग्लादेश के नाम से नया देश सृजित हुआ। अगर हम गहराई से जाएं तो पाएंगे देश विभाजन के असली कारण क्या थे?

          अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए पर गहरी साजिश और देश विभाजन के बाद की पीढ़ियों को विभाजन की टीस सदैव सालती रहेगी।

    यद्यपि यह आजादी हमें एक लंबे संघर्ष के बाद मिली है। जिसे हमें न केवल बनाये रखनी है अपितु भारत वर्ष की अखंडता स्थिति को बहाल करने के प्रयासों को तेज करना है। कोई भी प्रयास अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है। इसके लिए हमें स्वयं में सुधार लाते हुए मन, वचन व कर्म से प्राप्त आजादी को अक्षुण्ण रखते हुए अखण्ड भारत की संकल्पना को बल देते रहना चाहिए। बर्लिन की दीवार गिर सकती है तो हम पुनः एक अखण्ड भारत के वासी हो सकते हैं।

  स्वतन्त्रता के बाद भी बहुत समय तक आजादी के अनेक रणबांकुरे को भुलाया जाता रहा है। वह जो स्वतंत्रता की नींव के पत्थर बने आज उन्हें भी याद करने का दिन है। विभाजन में लाखों निर्दोष को प्राण गंवाने पड़े। विभाजन के बाद अल्पसंख्यक हुए नागरिकों की स्थिति पाकिस्तान में देखिए बांग्लादेश में देखिए। उन दोनों देशो में अल्पसंख्यकों की स्थिति बद से बदतर हो गई है। वहां के अल्पसंख्यकों को अपने ही देश में अपनी ही जन्मभूमि में असुरक्षित रहना पड़ रहा है और वे अपनी वास्तविक संख्या से कम से कमतर होते चले गए और होते जा रहे हैं। इसके अलग हमारे भारतवर्ष में अल्पसंख्यकों की स्थिति विश्व में किसी भी अल्पसंख्यकों की स्थिति से कई गुना बेहतर है।

          परस्पर सौहार्द प्रेम और एकता के दिवस के रूप में हम स्वतंत्रता दिवस को मनाएं और राष्ट्रहित सर्वोपरि की भावना से कार्य करें। हमें यह ध्यान रखना होगा की स्वतंत्रता को पाने में हमारे कितने देशवासियो ने अपने प्राण निछावर किए, फांसी के फंदे पर लटके। ऐसे अमर शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने देना है। यह वर्ष विजयदिवस (सोलह दिसम्बर) की पचांसवीं वर्षगांठ का वर्ष भी है। हमे उन्हें भी याद करना है जो युद्धभूमि में लापता हुए और लौटकर घर वापस नहीं आये।

( इस आलेख के लेखक 1971 भारत पाक युद्ध पर आधारित चर्चित उपन्यास जय हिंद की सेना के लेखक हैं।)
महेंद्र भीष्म
लखनऊ
मो. 8004905043

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