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Agyeya : अज्ञेय की कहानियाँ


1. लेटर बॉक्स 2. रमंते तत्र देवताः 3. नारंगियाँ

लेटर बॉक्स’ : अज्ञेय की कहानी ‘लेटर बॉक्स’ है। अज्ञेय की कहानियों का रचना सैनिक-काल के जीवन से नाभि-नाल जुड़ा है। इसलिए खूब अपने को मथकर अज्ञेय ने माना है कि एक बार फिर ये कहानियां आहत संवेदना की और मानव मूल्यों के आग्रह की कहानियां है। विभाजन से उत्पन्न समस्याओं की प्रश्नाकूलताओं से यह अज्ञेय जूझ रहे है।

     अज्ञेय की इसी मनोदशा का विस्फोट है उनकी ‘लेटर बॉक्स’ कहानी। शेखपुरे के शरणार्थी किशोर रोशन की कहानी। जिसके पिता बिछुड़ गए है। माँ चल बसी है। शरणार्थी कैम्प में रोशन प्रस्तुत है। सभी लोगों की तरह लेटर-बॉक्स में चिट्टी डालने का अरमान, किंतु चिट्टी में पता लिखने के लिए कोई पता नहीं। रोशन कहता है बाबू जी को ज्ञात है उसे नहीं। भोला रोशन इस कहानी का विषय है- जिसमें वह बिना पाते के भी चिट्टी पिता तक पहुंचा सकता है। रोशन की लेटर बॉक्स के पास की छवि भूलने के विरुद्ध है। दर्द से भरा भारत-विभाजन के समय का यह एक यथार्थ है।

'रमंते तत्र देवताः : ‘रमंते तत्र देवताः’ अज्ञेय की कहानी में हिन्दू-मुसलमान विभाजन जैसे विभ्राट में अमानवीयता हद तक उपजाती है। कलकत्ता नगर के कौमी दंगों में फंसी एक हिन्दू नारी को बचाकर उसके घर पहुँचाया जाता है। लेकिन पति ठहरा शंकालु, पवित्रतावादी; बोला, ‘तुम रात को क्या जाने कहां रही ही। सबेरे यहां आते समय शरम नहीं आई।‘ उसे ललकार कर पति ने दरवाजा बंद कर लिया। लेकिन दबाव बड़ा तो माँ गया, घर में रख लिया। इस महिला को बचाते है- सरदार विशन सिंह।

     उनका सोचना है कि यदि वह हिन्दू अपना धर्म-परिवर्तन कर मुसलमान हो जाये तो ऐसा मुसलमान जनेगी जो सौ-सौ हिन्दुओं को मारने की कसम खायेगा। इस तरह यह कहानी हिन्दू-पुरुष चिंतन पर व्यंग-प्रधान थप्पड़ है।

‘नारंगियाँ’ :   अज्ञेय की कहानी ‘नारंगियाँ’ अभावग्रस्त परिवेश में भी मानवीय संवेदनाओं को बरकरार रखने के लिए प्रयत्नरत शरणार्थियों की जिंदगी से हमारा सीधा साक्षात्कार कराती है। कहानी में हरसू, परसू सरीखे पात्रों के माध्यम से शरणार्थियों की उदारता को उभारने का प्रयास भी किया गया है। रिफ्यूजी मोहल्ले के बाहर हरसू की नारंगियों की दुकान देखकर मोहल्ले वाले दंग रह जाते हैं। क्योंकि “जब से हरसू और परसू दोनों भाई अचानक आकर मोहल्ले के सिरे की पुरानी दीवार की एक मेहराब के नीचे घर बनाकर जम गए थे, तब से किसी ने उनको काम करते हुए या काम की तलाश भी करते हुए कभी नहीं देखा था। रिफ्यूजी दूसरे मोहल्लों की तरह इस मोहल्ले में भी अनेकों आए थे, लेकिन सभी बहुत जल्द इस कोशिश में जुट गए थे कि वे ‘शरणार्थी’ न रहकर ‘पुरुषार्थी’ कहलाने के अधिकारी हो जाएँ। सभी ने कुछ-न-कुछ जुगत कर ली थी या गुजर-बसर का कोई वसीला निकाल लिया था। लेकिन हरसू और परसू ज्यों-के-ज्यों बने हुए थे।“ परसू दुकान के कुछ दूर पुलिया पर बैठकर अवज्ञा से हरसू और उसकी दुकान की ओर देखता रहता है। दुकान के पास दो-चार बच्चे इकट्ठा हो जाते हैं। हरसू एक छोटी लड़की को दो नारंगियाँ मुफ्त में दे देता है। नारंगियों के आसपास बच्चों के झुंड फिर एकत्रित हो जाते हैं। उनके अगुआ की मुट्ठी में इकन्नी है। इकन्नी और नारंगी के लेन-दें के बाद वह बच्चा विजय से भरा हृदय और नारंगी से भरी मुट्ठी लिए हुए नारंगी छीलकर अकेले खाने लगते है। तो बच्चों की निगाहें दुकान से हटकर अगुआ के हाथों की नारंगी पर अटक जाती है। यह दृश्य देखकर परसू अगुआ से नारंगियाँ साथियों के साथ बाँटकर खाने की सलाह देता है। लेकिन वह मना करता है।

     बच्चों की बेबसी देखकर परसू का हृदय पिघल जाता है। वह हरसू से बाकी बच्चों को भी नारंगी देने को कहता है। यह सुनकर हरसू अचकचाकर अपने भाई की ओर देखता है और धनाभाव की ओर संकेत करते हुए अपनी मजबूरी का खुलासा करता है “कहां से दे दूं सब को? फिर तू ही कहता है कि दुकान कैसे चलेगी और कल को माल कहां से खरीद कर लाऊंगा।“ तब परसू उनसे पूछता है “अबे, बस, यही है तेरा रिफ्यूजी का जिगरा? अबे, जानता नहीं, हम सब लोग पीछे बड़ी-बड़ी जायदादें छोड़कर आए हैं। और देखना नहीं, यहां भी कितनों ने फिर जायदादें खड़ी कर ली है? तू ही बता, पहली बार नारंगी खरीदने को पैसा कहां से आया था।“ इसके बाद वह अपनी फटी जेब से अठन्नी निकालकर हरसू की ओर फेंकता है। हरसू चुपचाप छः नारंगियाँ उठाकर बच्चों को बांट देता है। इसके बाद एक टुअन्नी परसों की ओर बढ़ाता है। तब परसू कहता है-

    “...आगे भी तो ऐसे बच्चे आएंगे- उन्हें दे देना। नहीं तो दुकान तेरी कैसे चलेगी? लोग भी क्या कहेंगे कि रिफ्यूजी बच्चा दुकान करने लगा तो दिल-आत्मा भी बेचकर खा गया।“ इसके साथ ही वह हरसू का हौसला बढ़ाने का प्रयत्न भी करता है। परसू का मानना है कि दिल बढ़ाने से कोई नहीं मरता, उसके सिकुड़ने से ही सब मर जाते हैं। नारंगियाँ शीर्षक कहानी शरणार्थियों के जीवन संघर्ष और पुनर्वास के लिए उनके संगठित प्रयत्न को भी उजागर करती है।

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