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हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता पर आधारित उपन्यास : ओस की बूँद


हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता पर आधारित उपन्यास : ओस की बूँद - 
Oos Ki Boond by Rahi Masoom Raza

      ‘ओस की बूँद’ उपन्यास मैं राही मासूम रजा ने विभाजन के उपरांत उन मुसलमानों की मनोदशा का चित्रण किया है जो अपने ही देश में बेगानियत का शिकार बन गए। इस उपन्यास में लेखक ने सन् 1932 के बाद के गाजीपुर गांव को कथा के केंद्र में रखा है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र ‘वजीर हसन’ और ‘हयातुल्ला अंसारी’ है। पाकिस्तान के निर्माण में इनका बहुत योगदान है। पाकिस्तान बन जाने के बाद यह पात्र सोचते हैं कि पाकिस्तान तो बहुत दूर है उन्हें तो नेहरू के भारत में रहना है। इसी कारण बहुत लोग कांग्रेस से जुड़ जाते हैं।

   हयातुल्ला अंसारी मुस्लिम लीग के सदस्य थे। उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वजीर हसन को भी पाकिस्तान बन जाने का बहुत दुख है। उसका बेटा अलीबाकर है जो अपनी पत्नी और पुत्री को छोड़कर नए मुल्क में चला जाता है। वजीर हसन पाकिस्तान नहीं जाता, वह मानता है कि पाकिस्तान बनवाना उसकी गलती है।

    इस उपन्यास की कथा हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता पर रची गई है। ‘वहशत अंसारी’ वकील है जो कि ‘शहला का मुकदमा’ इसलिए नहीं लड़ते की तमाम हिंदू मेरे विरोधी हो जाएंगे और उनका मुकद्दमा मेरे पास नहीं आएगा। जबकि वकील ‘शिव नारायण सिंह’ शहला केस इसलिए लेते हैं कि मुस्लिम लोगों के मुक़द्दमे उनके पास आ जाएंगे। राही उपन्यास में कई जगह सांप्रदायिक दंगों की बात करते हैं। इन दंगों के पीछे केवल स्वार्थी राजनेता लोगों का हाथ है।

डॉ. मुल्ला आदम अली

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