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असग़र वजाहत की कहानी - मुक्ति

Story Mukti by Asgar Wajahat


 'मुक्ति’ – असग़र वजाहत
    
 असग़र वज़ाहत की और एक कहानी ‘मुक्ति’ है। उनकी कहानियों में सांप्रदायिकता संबंधी विचारों के भिन्न तेवर दिखाई देते हैं। उनकी ‘जख्म’, ‘मुक्ति’, ‘पहचान’ जैसी कहानियां सांप्रदायिक राजनीति, उसके स्त्रोत, उसके असली चेहरे उसके अंतर्विरोध इत्यादि पर अपने ढंग से आक्रमण करती है।“ ‘पहचान’,’मुक्ति’, ‘गुरु-चेला संवाद’ जैसी कहानियाँ सांप्रदायिकता के ‘उपयोगी’ पक्ष को व्यक्त करती हैं। यानी जो लोग सांप्रदायिकता के पक्ष में है, वे उसी पर चलते हैं, जीते हैं, मोटा तगड़ा बन जाते हैं।“ उनकी महत्त्वपूर्ण कहानी ‘मुक्ति’ है।

     वस्तुतः ‘मुक्ति’ की चादर शराफत की चादर है जिसे लेने की हिम्मत कोई नहीं करता यहाँ तक कि सैनिक भी नहीं। वह आदमी नहीं बनना चाहते हैं किंतु यह ‘शराफत’ ही है जो आतंकवाद की ‘बाप’ है। जिसे ओढ़कर कुशल-मंगल की स्थितियाँ आ सकती है और कहानी का शिष्य उसे हर किसी को देना चाहता है। लेखक कहता है कि “हर किसी ने शराफत की चादर छोड़ दी है” इसीलिए देश, समाज, व्यक्ति को बदहाल होना पड़ रहा है। सांप्रदायिकता आने से बेजार होना पड़ रहा है किंतु यह चादर जैसे ही ‘सत्यमेव जयते’ पर परदा डालती है, वैसे ही विस्फोट होता है। सत्य, सत्य होता है। वह स्वयं चीखता हुआ प्रकट होता है। उसमें वह ताकत होती है। तब शिष्य का मन भी प्रसन्न होता है। चेला कहता है “आप सब सुरक्षित हैं। मैं अपनी चादर न ही सरकार पर डालना चाहता हूँ न विपक्ष पर। मैं तो हाथ जोड़कर आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि मेरी सहायता करें।“ का विचार कहानी द्वारा व्यक्त होती हैं।

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