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साम्प्रदायिकता का घिनौना चेहरा

Communalism: साम्प्रदायिकता का घिनौना चेहरा

   आज 21 वीं सदी के एक दशकोपरांत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अवलोकन से यह प्रतीत होता है कि जहाँ एक ओर मानव और समाज में अलगाववादी प्रवृत्तियों का भयंकर रूप से विकास हुआ है वहीं धार्मिक कट्टरता भी बढ़ी है। ज्ञान विज्ञान के उन्नत चरम पर पहुंचकर भी मानव में संकीर्णता, स्वार्थ तथा भोगवादी प्रवृत्ति और दृष्टि व्यापक होती रही है, परिणाम स्वरूप जो भारतीय समाज में धर्म, भाषा, जाती, वर्ण और क्षेत्रीयता इत्यादि के आधार पर समाज कई हिस्सों में बांटा हुआ था, वह खाई बढ़ती जा रही है। अलगाववादी प्रवृत्ति के चलते हमने देश, समाज और परिवार तक टुकडों-टुकडों में विभाजित एवं खंडित कर संतोष की साँस नहीं ली है। अपितु अपनी संकीर्ण मानसिकता और कट्टर धार्मिकता के कारण देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक कर मानवता को लज्जित किया है।

साम्प्रदायिकता - एक विकार :

  रामधारी सिंह दिनकर अपने ग्रंथ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखते है- “साम्प्रदायिकता एक संक्रामक रोग है। जब एक जाति भयानक रूप से साम्प्रदायिक हो उठती है, तब दूसरी जाति भी अपने अस्तित्व का ध्यान करने लगती है और उसके भाव भी शुद्ध नही रह जाते।“

  साम्प्रदायिकता क्या है? साम्प्रदायिकता शब्द की उत्पत्ति ‘सम्प्रदाय’ शब्द से हुई। ‘ज्ञान शब्द कोश’ के अनुसार सम्प्रदाय शब्द की परिभाषा ‘विशेष धार्मिक मत अथवा किसी मत के अनुयायियों का समूह।

सम्प्रदाय किसी प्रकार की धार्मिक कट्टरता की ओर इंगित नही करता लेकिन इस सम्प्रदाय शब्द से बना ‘सम्प्रदायवाद‘ अपने अर्थ में एक विशेष धार्मिक कट्टरता की गूंज पैदा करता है। ‘ज्ञान शब्द कोश’ में सम्प्रदायवाद की परिभाषा इस प्रकार दी गई है ‘केवल अपने सम्प्रदाय को ही विशेष महत्त्व देना और अन्य सम्प्रदाय वालों से द्वेष करना।“

  राम पुनियानी और शरदशर्मा ने साम्प्रदायिकता अर्थ इस तरह लिखते है- “साम्प्रदायिकता एक ऐसी विचारधारा है जिसके अनुसार एक धर्म से ताल्लुक रखने वाले सभी लोगों के सामान्य, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक हित समान होते हैं और ये हित दूसरे धर्म से जुड़े लोगों के हित से अलग होते है”।

  सामाजिक क्षेत्र में साम्प्रदायिकता को ख़ान-पान, पूजा-पाठ, जाती-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानकर तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्मों को निकृष्ट समझना, उनके प्रति नफरत, द्वेष-भाव पालना और फैलाना है।

  भारत जैसे अत्यंत जटिल सामाजिक संरचना वाले, विविध धर्म और सम्प्रदायों वाले देश के लिए साम्प्रदायिकता, साम्प्रदायिक मनोवृत्ति, साम्प्रदायिक टकराव या बड़े स्तर का साम्प्रदायिक संघर्ष, हिंसा या रक्तपात कोई बात नही है। वर्तमान राजनीतिक वातावरण ने इस समस्या को और अधिक फैलाने तथा जटिल होने के अवसर प्रदान किये है। आज देश के अहिष्णुतापूर्ण वातावरण में साम्प्रदायिकता जैसे ज्वालान्त विषय पर बात करना ख़तरे से खाली नहीं है किन्तु सजग सामाजिक के नाते भारत के समस्त बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों, कलाकारों, भाषाविदों, वैज्ञानिकों, मीडियाकर्मियों और प्रगतिशील मानसिकता रखनेवालों को मुक्ति बोध की शब्दावली में कहे तो- “उठाने होंगे अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे और तोड़ने होंगे मठ और गढ़।“

  “भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या को केवल हिंदू-मुस्लिम के प्रश्न के रूप में नही देखा जा सकता, इसको हिंदू-मुस्लिम धर्मों का विरोध मानना भी ठीक नहीं। साम्प्रदायिकता का आधार राजनीतिक अधिक और धार्मिक कम है। इन दो धर्मों के अतिरिक्त इस त्रिभुज में एक तीसरा पक्ष भी था, अंग्रेजों ने हिंदू और मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच अपने आपको स्थापित कर एक साम्प्रदायिक त्रिभुज खड़ी कर दी थी।“ अंग्रेज न मुसलमानों के मित्र थे न हिंदूओं के। वे तो सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हिमायती मित्र थे जो “बाँटो और राज्य करों” में विश्वास रखते थे। भारत के विभिन्न धर्मों का एक साथ न होना ही उनकी राजनीतिक स्थिति के लिए ठीक था। ब्रिटिश साहित्यकारों ने यहाँ बाँटो और राज करो नीति लगाना चाहते थे, उन्होंने इतिहास को साम्प्रदायिकता रंग दिया और राजाओं के सभी कार्यों को धर्म के नाम पर प्रस्तुत किया गया।

  साहित्य और इतिहास का संबंध अटूट है। इतिहासकार एक ओर अगली पीढ़ियों के लिए इतिहास संजोये रखता है, तो दूसरी ओर साहित्यकार इतिहास में संवेदनाएं ढूंढता है। साम्प्रदायिकता समस्या पर हिंदी साहित्यकारों ने समय-समय पर लेखनी चला कर पाठकों को इस तथ्य से अवगत कराया है कि इस घटना से भारत की मिली-जुली संस्कृतियों को कितनी ठेस पहुँची है, हमें यह जानना बहुत अवश्य है कि वे कौन से परिस्थितियों है जिससे साम्प्रदायिकता का विषवृक्ष पल्लवित हुआ। साम्प्रदायिकता के उद्भव और विकास के लिए साहित्यकारों ने किन स्थितियों को कारण भूत मानते है और इनकी भयावहता का चित्रण करने में वे कहाँ तक सफल हो पाए, विभाजन के विषय को लेकर कमलेश्वर ‘कितने पाकिस्तान’, यशपाल कृत ‘झूठा-सच’ दो खण्डों में –‘वतन और देश’, ‘देश का भविष्य’, प्रियंवदा कृत ‘वे यहां कैद है’, भीष्मसाहनी ‘तमस’, तस्लीमा नसरीन कृत ‘लज्जा’, राही मासूम राजा कृत ‘आधा गाँव’, मृदुला गर्ग ‘अनित्या’, आदि साहित्य विशेषकर कथा-साहित्य का विवेचन करते हुए तत्कालीन राजनीति और इतिहास की पड़ताल करनी पड़ती है। साम्प्रदायिकता को विश्लेषण करनेवाली कहानियों के रूप में हमने मोहन राकेश की ‘मलबे का मालिक’, भीष्म साहनी की ‘अमृतसर आ गया’, प्रदीप पन्त की ‘रामपुर-रहीमपुर’, चतुरसेन शास्त्री की ‘रजील’, कृष्ण सोबती की ‘सिक्का बदल गया’, विष्णु प्रभाकर की ‘मेरा वतन’, ‘मैं जिन्दा हुँ’, अमृत राय की ‘व्यथा का सरगम’, ‘कीचड़’, महीप सिंह की ‘पानी और पुल’, आदि जैसे साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ उल्लेखनीय है।

निष्कर्ष:

  संकीर्ण मानसिकता और कट्टर धार्मिकता के कारण देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक कर मानवता को लज्जित किया है। साम्प्रदायिकता मानवता के नाम पर कलंक है। साम्प्रदायिकता का भयंकर रूप साहित्य से समझकर आम आदमी उन स्थितियों को दूर करने का प्रयास करना है।

डॉ. मुल्ला आदम अली

संदर्भ:

1. ‘जन विकल्प’ (अंक-6) – प्रो.राम प्रकाश – पृ 38

2. ‘ज्ञान शब्द कोश – श्री वास्तव मुकुन्दीलाल – पृ 718

3. ‘साम्प्रदायिकता’- A Graphic Account – राम पुनियानी एवं शरदशर्मा

4. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ - दिनकर – पृ 715

5. ‘हिन्दी-साहित्य में वर्णित साम्प्रदायिकता का स्वरूप – दत्तात्रेय मुरुमकर – पृ 48

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