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सांप्रदायिकता का बदलता चेहरा और हिंदी उपन्यास

The Changing Face of Communalism and Hindi Novels

सांप्रदायिकता का बदलता चेहरा और हिंदी उपन्यास

“सांप्रदायिकता संक्रामक रोग है। जब एक जाति, भयानक रूप से साम्प्रदायिक हो उठती है, तब दूसरी जाति भी अपने अस्तित्व ध्यान करने लगती है और उसके भाव भी शुद्ध नहीं रह जाते।" – रामधारी सिंह दिनकर

 स्वतंत्रता पश्चात देश में आये हुए परिवर्तनों के कारण अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा नैतिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं। परिवर्तनों के कारण परिवेश के साथ-साथ व्यक्ति का आचरण, व्यवहार, विकास तथा मानसिकता भी प्रभावित हुआ। फलस्वरूप इनके एक समूह का उदय हुआ, जिसने उपन्यास के नए आयामों को देना प्रारंभ किया, क्योंकि उपन्यास साहित्य आम जनता की भाषा से जुड़ा हुआ है। उपन्यास भारतीय समाज के स्वत्व की खोज एवं पहचान के व्यापक राष्ट्रीय अभियान का संपर्क रखता है। इसी कारण सामाजिक व राजनीतिक जीवन का प्रभाव उपन्यासों में अधिक है।

 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अवलोकन से यह प्रतीत होता है कि जहाँ एक ओर मानव और समाज में अलगाववादी प्रवृत्तियों का भयंकर रूप से विकास हुआ है वही धार्मिक कट्टरता भी बढ़ी है। ज्ञान विज्ञान के उन्नत चरम सीमा पर पहुँचकर भी मानव में संकीर्णता, स्वार्थ तथा भोगवादी प्रवृत्ति और दृष्टि व्यापक होती रही है, परिणामस्वरूप जो भारतीय समाज में धर्म, भाषा, जाति, वर्ण और क्षेत्रीयता इत्यादि के आधार पर समाज कई हिस्सों में बाँटा हुआ था, वह खाई बढ़ती जा रही हैं। अलगाववादी प्रवृत्ति के चलते हमने देश, समाज और परिवार तक को टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित एवं खण्डित कर संतोष की साँस नही ली है। अपितु अपनी संकीर्ण मानसिकता और कट्टर धार्मिकता के कारण देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक कर मानवता को लज्जित किया है। अतः आज भारतीय समाज में व्याप्त कट्टरता और संकीर्णता तथा अलगाववादी प्रवृत्ति की विडंबनाओं को और आये दिन उसे झेलते जनमानस के कष्टों तथा उनके कारक तत्त्वों को समझना आवश्यक हो जाता है।

सांप्रदायिकता : अर्थ और बदलता चेहरा:

 आपसी मत भिन्नता को सम्मान देने के बजाय विरोधाभास का उत्पन्न होना, अथवा ऐसी परिस्थितियों का उत्पन्न होना जिससे व्यक्ति किसी अन्य धर्म के विरोध में अपना व्यक्तित्व प्रस्तुत करें, साम्प्रदायिकता कहलाता है। जब एक सम्प्रदाय के हित दूसरे सम्प्रदाय से टकराते है तो साम्प्रदायिकता का उदय होता है, यह एक उग्र विचारधारा है जिससे दूसरे सम्प्रदाय की आलोचना की जाती है, एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को अपने विकास में बाधक मान लेता है।

 अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है, क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते है। परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को माननेवालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-अलग होने लगती है। यह अलगाव कई आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटने का कारण बनता है।

Webster's Dictionary में Communalism की परिभाषा इस प्रकार दी गई है। “A theory of system of government in which communes or local communities have virtual autonomy within a federated state”। जिसका अर्थ है “सरकारी व्यवस्था का एक ऐसा सिद्धांत जिसमें सम्प्रदाय या स्थानीय समुदायों को राज्य चलाने की स्वायत्तता मिली हुई हो।

 सम्प्रदाय को परिभाषित करते हुए डॉ.यशवंत विष्ट कहते है – “साम्प्रदायिकता कोई मूर्त रूप व स्थूल रूप नहीं है। यह एक भावना है जो बाद में मूर्त रूप व स्थूल रूप को जन्म देती है, मूल रूप से साम्प्रदायिकता में अपने सम्प्रदाय के विरुद्ध मौलिक सिद्धांत ही सन्निहित रहते है। कालांतर में शनैः शनैः अन्य दूषित भावनाओं के सम्मिश्रण से उसमें संकुचित भावनाएं बढ़ती जाती हैं। फलतः एक दिन वे पवित्र भावनाएं अत्यंत विषैली बन जाती है जिससे साम्प्रदायिकता शब्द बहुत कलंकित और कलुषित बन जाता है।“ यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि किस तरह साम्प्रदायिकता शब्द अपने अर्थ बदल लेता है। यह सही भी है। संभव है आज साम्प्रदायिकता शब्द जिस घृणित अर्थ की अभिव्यक्ति करता है, पहले वैसा अर्थ न देता हो।

 रामधारी सिंह दिनकर अपने ग्रंथ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखते है—“साम्प्रदायिकता संक्रामक रोग है। जब एक जाति, भयानक रूप से साम्प्रदायिक हो उठती है, तब दूसरी जाति भी अपने अस्तित्व का ध्यान करने लगती है और उसके भाव शुद्ध नहीं रह जाते।“

 इस तरह हमारे समाज में जब एक समुदाय के व्यक्ति सम्प्रदाय हो उठते हैं तो दूसरे सम्प्रदाय भी उनकी देखा-देखी साम्प्रदायिकता की चपेट में आ जाता है, फलस्वरूप सृष्टि होती है भयंकर दंगों की जिसमें सुंदर समाज की हरी-भरी बगिया झुलस जाती है। खिले-अधखिले फूल अंगारों में झुलसकर दम तोड़ देते है। संवेदनाएं मर जाती है, नैतिक मूल्य दफन हो जाते है।

 चूंकि साम्प्रदायिकता का केंद्र या आधार धर्म होता है, इसी वजह से एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म का कट्टर विरोधी बन जाता है और धर्म का समूल नाश करने की भावना से न केवल विरोधी धर्म व्यक्तियों की हत्या करता है, उनके मकान-दुकान लूटता है बल्कि उनके धार्मिक स्थानों की भी अवमानना करता है। धर्म चूंकि मानव हृदय से संबंध रखता है और धार्मिक स्थान लोगों की धार्मिक भावना या श्रद्धा के केंद्र होते है, इसी कारण किसी धर्मनिवेश से संबद्ध व्यक्ति के प्रति अपने क्रोध का प्रदर्शन करने हेतु अन्य धर्मावलम्बी उसके स्थानों को नुकसान पहुँचाते हैं।

 सांप्रदायिकता और हिंदी उपन्यास:

साम्प्रदायिकता हमारे देश की एक समस्या है जिससे देश केवल अतीत में पीड़ित हुआ है बल्कि आज भी देश में जब-जब साम्प्रदायिकता उभर आती है। यहाँ साम्प्रदायिकता के उभरने का अर्थ यह है कि देशवासियों की सोच में कही न कही साम्प्रदायिकता का बीज छुपा रहता है जो रह-रह कर दंगों के रूप में उभर कर सामने आता है। साम्प्रदायिकता ने देश-विभाजन के पहले या तुरंत बाद ही देश को गहरे जख्म नही दिए बल्कि आज भी साम्प्रदायिकता का भयंकर दानव जब विष-वमन करता है तो हजारों, लाखों लोग इसकी चपेट में आकर, अपनी सुध-बुध खोकर, उन्मादग्रस्त स्थिति का शिकार होकर अपने ही जैसे मनुष्यों को मारते है या स्वयं नरपशुओं के हाथों मौत के घाट उतर जाते है। चूंकि साम्प्रदायिकता की समस्या हमारे समाज और राजनीति की प्रमुख समस्या है और देश का साहित्य समाज प्रतिबिम्ब ही नहीं होता बल्कि उसे गतिशील भी करता है और उसका मार्गदर्शन भी करता है, इसी कारण भारतीय जनमानस साम्प्रदायिकता के झटकों से पीड़ित हुआ तो उसकी कराह भारतीय साहित्य में भी गूंजी। साहित्य ने साम्प्रदायिकता से पीड़ित भारतीय समाज का यथार्थ और मार्मिक चित्र ही पाठकों के सामने नही रखा, बल्कि साम्प्रदायिकता के कारणों की पड़ताल करते हुए, साम्प्रदायिक ताकतों की भर्त्सना भी की और साम्प्रदायिक सद्भाव की ज्योति जलाकर हताशा और भयत्रस्त भारतवासियों के मन में आशा भी पैदा की तथा उन्हें नव जीवन दिया। हिंदी कथा-साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा। हिंदी कथा-साहित्य में साम्प्रदायिकता का चित्रण पहले भी हुआ और अब तक इसके कारणों की खोज और निवारण के उपाय हिंदी साहित्य में होते रहते हैं।

 साम्प्रदायिकता पर लिखने वाले साहित्यकारों में प्रेमचंद का स्थान प्रमुख था। उन्होंने अपने उपन्यासों में हिन्दू-मुस्लिम एकता एवं भाईचारे के भाव को प्रतिबिंबित किया है। आजादी के पहले से ही इनकी कलम इस रास्ते पर चल रही थी। इनका पहला उपन्यास ‘सेवासदन’ आजादी से पहले लिखा हुआ था। ‘सेवासदन’ की समस्या मध्य वर्ग से संबंधित थी। इसमें आर्थिक समस्या के कारण सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और अन्य समस्याएँ उभर कर आती हैं, क्योंकि सभी समस्याओं का मूल अर्थ है। आज जिस तरह राजनीतिक स्वार्थ के लिए धर्म का उपयोग किया जा रहा है, उसी धर्म का उपयोग राजनीतिक स्वार्थ के लिए उस जमाने भी किया जाता था। यह उपन्यास इसी तरह की बातें इंगित करता है।

 यशपाल कृत झूठा-सच दो खण्डों में- ‘वतन और देश’, ‘देश का भविष्य’- में कुल १२०० पृष्ठों पर प्रकाशित है। ‘झूठा-सच’ उपन्यास में यशपाल ने देश-विभाजन के पीछे की राजनीति का पर्दाफाश किया है तथा सत्ता-प्राप्ति के लिए अपनाये गए हथकंडों को उजागर किया है। यशपाल साम्प्रदायिकता को विशुद्ध राजनीतिक समस्या मानते है- राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के लिए अभिजात वर्ग द्वारा पैदा की गई एक समस्या, जिसका धर्म से कोई संबंध नही, वरन् धर्म जिसमें हथियार के रूप में प्रयुक्त होता है। देश-विभाजन के पीछे की हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति का पर्दाफाश करके ही वे संतुष्ट नही हो जाते, वरन् उसके संभाव्य दुष्परिणामों का भी चित्रण करते है - देश विभाजन जिनमें एक है। उपन्यास में विभाजन की पूर्व की स्थिति, विभाजन के समय की लूटमार, मारधाड़, बलात्कार, शरणार्थियों एवं पुनर्वास की समस्याओं और मानव-मूल्यों का ह्रास देखा जा सकता है।

 भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के कालजयी साहित्यकार है। उनका उपन्यास ‘तामस’ एक कालजयी उपन्यास है। भीष्म साहनी ‘तमस’ लिखकर यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय जनमानस के मस्तिष्क पर अभी भी साम्प्रदायिकता जहर छाया हुआ है। भीष्म साहनी ने इस समस्या का बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया है। प्रसिद्ध आलोचक वीरेन्द्र मोहन ने लिखा है, “यह है साम्प्रदायिकता का जहर जिसमें सामान्य जन तबाह होता है।“ ‘तमस’ में देश-विभाजन से पूर्व हुए साम्प्रदायिक दंगों व उन्हें प्रेरित करनेवाली साम्प्रदायिक राजनीति का चित्रण हुआ है।

 राही मासूम राजा का उपन्यास ‘आधा गाँव’ उत्तरप्रदेश के एक गाँव गंगौली के वातावरण पर आधारित है। राही मासूम राजा ने गंगौली नामक अंचल विशेष की पूरी समस्याओं का चित्रण अपने उपन्यास में किया है और ये समस्याएँ है पाकिस्तान बनने की घोषणा से बदलती हुई मानसिक स्थिति, लोगों की बदलती हुई सोच और साम्प्रदायिकता का जहर गंगौली के भोले मासूम लोगों के मन में फैलाती साम्प्रदायिक ताकतें।

  शिवप्रसाद सिंह के ‘अलग-अलग वैतरणी’ में भी देश विभाजन और साम्प्रदायिकता की विडंबना चित्रित हुई हैं। इसके अतिरिक्त स्वतंत्रोत्तर भारत की स्थिति भी स्पष्ट हुई है।

 मृदुला गर्ग के ‘मिलजुल मन’ में भी यूरोप की मंदी, भारत-विभाजन की त्रासदी, मुस्लिम समुदाय के प्रति संदेहास्पदता, भारत-चीन युद्ध, विस्थापन का दर्द को देखा गया है।

 मृदुला गर्ग का ‘अनित्या’ उपन्यास भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लड़े जाने वाले अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन और क्रांतिकारी आंदोलन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। विभाजन पूर्व और विभाजनोत्तर सामाजिक, राज नैतिक समस्याओं का स्पष्ट चित्रण मिलता है।

 तस्लीमा नसरीन कृत ‘लज्जा’, अब्दुल हुसैन कृत ‘उदास नस्लें’, ऐनी आपा कृत ‘आग का दरिया’, प्रियंवद कृत ‘वे यहां कैद है’, भगवान सिंह कृत ‘उन्माद’, मनमोहन सहगल कृत ‘कश्मीर की कसक’ आदि उपन्यास भी प्रमुख हैं, जो बार-बार मानव मन को झकझोर कर सचेत करने का प्रयास करते है।

 नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘जिन्दा मुहावरे’ यह उपन्यास १९९३ में प्रकाशित हुआ। नासिरा शर्मा ने इस उपन्यास में मुसलमानों की मानसिकता एवं पीड़ा का चित्रण किया है।

 कमलेश्वर का उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता निर्माण के सच की ऐतिहासिक शिनाख्त- जो घटित होता है, उन सबको हम जानते है किंतु जो घटित हो चुका होता है, उसे जानना, समझना, उसको सही ढंग से विवेचन-विश्लेषण करना बड़ा मुश्किल होता है। कमलेश्वर का बहुचर्चित एवं प्रसिद्ध उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ कुछ ऐसा ही है जो यथार्थ के समय की पहचान को लेकर लिखा गया है।

उपसंहार:

 प्रामाणिक दस्तावेजों की भांति साहित्य विभाजन और दंगों के कुपरिणामों पर प्रकाश डालते हैं, किन्तु मनुष्य शिक्षा का पाठ न पढ़ कर आज भी साम्प्रदायिकता का नाच तैयार करने के पीछे नही रहता। एक आम आदमी का कर्तव्य है कि जागे और षड्यंत्रों का शिकार न हो कर एकता, प्रेम और शांति का दामन थामे। उपन्यासकारों ने हिंसा और नरसंहार के दौर में जीवित जिस मानवता का चित्रण अपने साहित्य में किया है उस मानवता का सर्वत्र विजय हो। जिन कारणों और स्थितियों की गोद में साम्प्रदायिकता रूपी शिशु पनप कर भयंकर नरपशु में परिवर्तन होता है उन्हें जान समझकर आम आदमी उन स्थितियों को दूर करने का प्रयत्न करें तभी यह शोध पत्र सार्थक होगा।

डॉ. मुल्ला आदम अली

संदर्भ:

1. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर

2. वेबस्टर्स न्यू वर्ल्ड डिक्शनरी

3. साम्प्रदायिकता: एक चुनौती और चेतना – विष्ट यशवंत

4. हिंदी साहित्य में वर्णित साम्प्रदायिकता का स्वरूप – दत्तात्रेय मुरुमकर

5. साम्प्रदायिकता और हिंदी उपन्यास – शिवकुमार मिश्र

6. जन विकल्प – अंक-६

7. तमस – भीष्म साहनी

8. आधा गाँव – राजा राही मासूम

9. झूठा-सच - यशपाल

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