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Vibhajan Ki Kahaniyan: विभाजन की दारुण स्थिति एवं हिंदी कहानियाँ

Vibhajan Ki Kahaniyan

विभाजन की दारुण स्थिति एवं हिंदी कहानियाँ

  विभाजन है ही एक सुलगता दस्तावेज जिसकी एक व्याख्या या एक विश्लेषण सम्भव नहीं है। विभाजन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक क्षेत्र की बड़ी घटना है, इस घटाने से व्यापक फलक पर लोग प्रभावित हुए, जिसके कारण वे लेखनी उठाने के लिए विवश हो गए। साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक चिंताओं को उजागर करता हैं, विभाजन ऐसी समस्या है जिसका समाधान आज तक नहीं निकल पाया, विभाजन की त्रासदी और त्रासदी के दौरान होने वाली घटनाओं को अपनी कहानियों के माध्यम से हृदयस्पर्शी और हॄदयभेदक वर्णन किए हैं।

  विभाजन का अर्थ है ‘बाँटना’। विभाजन के परिणाम दुखांत होते है, विभाजन से अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। भारत का विभाजन तो ऐसी दुर्घटना है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता, आज भी उसे स्मरण करने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि लोगों ने कैसे-कैसे दुःखों का सामना किया।

 अतः कह जा सकता है कि इतिहास में कई ऐसी त्रासदियां भी घटित होती है जो कभी पुरानी नहीं पड़ती, जो बीत जाने पर भी अपने आपको दोहराती है। भारत विभाजन ऐसा ही स्थायी विषाद है - “सदियों से अर्जित एक राष्ट्र का जज्बा, सांस्कृतिक एकता, जातीयता, मानवीय संबंध साम्प्रदायिक आग की लपटों में जलकर राख हो गए थे। इतना बड़ा नर-संहार, संभव है, पहले कभी हुआ हो, मगर परस्पर मिल-जुलकर रहने वाली एक ही संस्कृति, जातीयता और राष्ट्रीयता में पली-ढली, समान भाषाएँ बोलने वाली, एक-से कौमी धागों में बँधी जातियों का देशान्तरण-हिंदूओं, मुसलमानों और सिखों का, साम्प्रदायिक आग की लपटों में झुलसते हुए स्वदेश-त्याग, विश्व-इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना है। इतने बड़े पैमाने पर, इस तरह की ट्रेजडी, विश्व में पहले कभी घटित नहीं हुई थी। इस एक घटना ने भारतीय राष्ट्रीयता, समाज, राजनीति और संस्कृति के स्वरूप को जितना प्रभावित किया उतना शायद ही किसी अन्य घटना ने किया हो।“1 भारत के विभाजन को भयावह और दुःखान्त घटना के रूप में याद किया जाता है। भारत देश का विभाजन साम्प्रदायिक आधार पर हुआ था, इसलिए सम्प्रदाय के आधार पर भारत और पाक (Pak) दोनों की ही जनसंख्या की अदला-बदली का इतिहास का अभूतपूर्व दौर चला।

 विभाजन दौरान होने वाली हत्याओं, लूट, अग्निकांड, अपहरण, बलात्कार और उसके उपरांत की समस्याएं जैसे विस्थापन, शरणार्थी, पुनर्वास की समस्या, शिविरों की समस्याएं आदि भयंकर परिणाम हमारे सामने आते है। दरअसल, विभाजन एक दुर्घटना नहीं था, यह एक मानवीय त्रासदी थी जिसने लाखों लोगों को भावना और विचार के धरातलों पर ही नहीं, मनोवैज्ञानिक, मानसिक और आत्मिक स्तरों पर भी प्रभावित किया, उन्हें बेघर और विस्थापित कर दिया, उनकी मूल चेतना को छिन्न-भिन्न कर दिया। इसलिए विभाजन का परिणाम हमेशा दुःख पूर्वक एवं कष्ट प्रदान करने वाले होते है। देश विभाजन के कारण ही हिंदू-मुस्लिमों में भेदभाव की भावना पैदा हुई। देश विभाजन के परिणाम स्वरूप ही लोगों में रोजगार की समस्या, पुनर्वास की समस्याओं ने जन्म लिया जो आगे चलकर देश के लिए हानिकारक रही। देश विभाजन मानव मूल्यों का विघटन कर दिया जिसके परिणामस्वरूप मानव और समाज में अलगाववादी प्रवृत्तियों का भयंकर रूप से विकास हुआ है, परिणामस्वरूप समाज धर्म, भाषा, जाती, वर्ण और क्षेत्रीयता के आधार पर कई हिस्सों में बांटा जा रहा है।

 भारत के विभाजन को भयावह और दुखद घटना के रूप में याद किया जाता है। भारत का विभाजन साम्प्रदायिक आधार पर हुआ था, इसलिए भारत और पाकिस्तान दोनों की ही जनसंख्या की अदल-बदली का इतिहास का अभूतपूर्व दौर चला। बंगाल और पंजाब आधे हिंदुस्तान व आधे पाकिस्तान के हिस्से आये, इसलिए जनसंख्या विभाजन की सबसे भयंकर मार बंगाल और पंजाब को साहनी पड़ी। नफरत इस कद्र हो चुकी थी कि बंगाल व पंजाब में अपने स्थानों की अदला-बदली करते हुए लाखों अमानवीय तरीके से मौत के घाट उतार दिए गए। पाशविक अत्याचार हुए, जिससे मानवता का सिर लज्जा से झुक गया।

 देश के विभाजन ने लोगों की मनोवृत्तियों को बदल दिया था। जनता के मानव मूल्य गिर चुके थे, क्योंकि सभी दिशाओं से जब मानवीय मूल्यों की हत्या होने लगी थी। जीवन में जो कुछ भी अच्छा, पावन एवं श्रेष्ठ है भस्म होने लगा था, अब अधिकतर लोगों की आँखों में भय, संदेह, क्रूरता उभर ने लगते है तब मानवीय मन की असहायता, जीवन प्रियता, मोह आदि दर्शन होने लगते हैं। सभी समुदाय एक-दूसरे से हिंसा करने लगे थे –“इक्के-दुक्के लोगों द्वारा अचानक छुरे बाजी, आग और बम फेंककर भाग जाने जैसी वारदातों को रोकने में पुलिस ज्यादा कुछ नहीं कह सकी।“2 नैतिक मूल्यों का विघटन आम जनता में ही नहीं बल्कि पुलिस कर्मचारियों में भी देखने को मिलता था, वे भी अपने कार्यों से विमुख हो गये थे। देश विभाजन ने मानव जीवन पर गहरा संकट पैदा किया। इससे मानव के सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवन में असुरक्षा एवं दहशत का वातावरण छा गया; साथ ही साथ बदला और घृणा की भावना को बढ़ावा मिला।

 विभाजन है ही एक सुलगता दस्तावेज जिसकी एक व्याख्या या एक विश्लेषण सम्भव नहीं है। विभाजन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक क्षेत्र की बड़ी घटना है, इस घटाने से व्यापक फलक पर लोग प्रभावित हुए, जिसके कारण वे लेखनी उठाने के लिए विवश हो गए। साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक चिंताओं को उजागर करता हैं, विभाजन ऐसी समस्या है जिसका समाधान आज तक नहीं निकल पाया, विभाजन की त्रासदी और त्रासदी के दौरान होने वाली घटनाओं को अपनी कहानियों के माध्यम से हृदयस्पर्शी और हॄदयभेदक वर्णन किए हैं।

विभाजन संबंधी प्रमुख कहानियाँ : शरणदाता, बदला, सिक्का बदल गया, अमृतसर आ गया, मास्टर साहब, जलवा, मेरी माँ कहाँ?, मलबे का मालिक, टेबल लैंप, पानी और पुल, अंतिम इच्छा आदि।

शरणदाता :- शरणदाता अज्ञेय द्वारा लिखित कहानी है, यह कहानी विभाजन कालीन दंगों की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी है। इस कहानी के दो खण्ड है, पहले खण्ड में व्यक्ति की विवशता को दर्शाया गया है तथा दूसरे खण्ड में व्यक्ति की बर्बरता का चित्रण है, किस प्रकार इंसान, इंसान न रहकर एक समूह में विभक्त हो जाता है तथा अमानवीय कृत्य करने लगता है इसका चित्रण इस कहानी में किया गया है।

 बदला :- अज्ञेय द्वारा लिखित विभाजन संबंधी कहानियों में ‘बदला’ मानवीय दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण कहानी है। ‘बदला’ में अज्ञेय ने विभाजन के तुरंत बाद हुए साम्प्रदायिक दंगों से उत्पन्न विषम परिस्थितियों का चित्रण किया है। विभाजन के कारण उत्पन्न ग्रंथियों तथा मानसिक विकृतियों को यह कहानी दर्शाती है। इस कहानी में अज्ञेय सिक्ख तथा उसके लड़के के माध्यम से मानव के आदर्श स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं, अज्ञेय दर्शाते हैं कि क्रूर तम परिस्थितियों में भी किस प्रकार सिक्ख ने मानवीय मूल्यों की रक्षा की। वह बुराई का बदला बुराई से नहीं बल्कि अच्छाई से देने के पक्षपाती हैं।

 सिक्का बदल गया :- ‘सिक्का बदल गया’ कहानी कृष्णा सोबती द्वारा लिखित है, कृष्णा सोबती ने विभाजन से सम्बंधित कई कहानियाँ लिखी है जिसमें ‘सिक्का बदल गया’ कहानी महत्वपूर्ण है, लेखिका ने इस कहानी में संकेतों के माध्यम से विस्थापित व्यक्ति की पीड़ा को दिखाया है, सदियों से साथ रह रहे व्यक्तियों में विभाजन किस प्रकार से साम्प्रदायिक भावनाएं भर देता है के मनोविज्ञान को सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ा है। साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को सीधे नहीं उठाया। विभाजन के पश्चात दो नव स्वतंत्र राष्ट्र जब अस्तित्व में आ जाता हैं तो सर्व प्रमुख समस्या आबादी के अदला-बदली के रूप में सामने आती है, बहुसंख्यक वर्ग का अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बचे हिंदूओं को कैम्प में पहुँचाने की प्रक्रिया को यह कहानी समेटे हुए हैं।

 अमृतसर आ गया :- भीष्म साहनी की कहानी ‘अमृतसर आ गया’ परिस्थितिवश उत्पन्न हुई क्रूर मानसिकता की कहानी है। विभाजन के पूर्व जो लोग परस्पर सौहार्द के साथ रहते थे, विभाजन की खबर सुनते ही उनके वार्तालाप तथा क्रिया कलाप में अविश्वसनीय परिवर्तन आ जाता है, साम्प्रदायिकता हावी हो जाती है, व्यक्ति, व्यक्ति न रहकर सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने लगता है। भीष्म साहनी ने अपनी कहानियों को यथार्थ के विभिन्न स्तरों पर प्रस्तुत किया है, कुंठा, घुटन, संत्रास तथा रिश्तों में उत्पन्न बिखराव इनकी कहानियों के मुख्य स्वर हैं।

 मास्टर साहब :- विभाजन कालीन दंगे को आधार बनाकर चन्द्रगुप्त विद्यालंकार द्वारा यह कहानी लिखी गयी है, हिंसा तथा प्रतिहिंसा के पीछे छिपे मानवता को इस कहानी में दर्शाया गया है, परिस्थिति वश हिंसक बने व्यक्ति के अन्दर भी करुणा का स्थान होता है।

 जलवा :- फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां विभाजन के पश्चात होने वाले भ्रष्टाचार तथा राजनीतिक छल का फर्दाफ़ाश करती हैं जिनमें ‘जलवा’ प्रमुख है। सन् १९६६ में यह कहानी सामने आती है, इस कहानी में एक अलग प्रकार की साम्प्रदायिक समस्या को प्रस्तुत किया गया है। कहानी का कथानक सन् १९३० से विभाजन के पश्चात तक के समय को समेटे हुए है। इस कहानी में दर्शाया गया है कि विभाजन के पश्चात बिहार की राजनीति पूरी तरह से स्वार्थ सिद्धि में लुप्त हो गयी थी। जो मुस्लिम नेता आजादी के पूर्व साम्प्रदायिकता से दूर रह कर राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़े हुए थे, आजादी के बाद उन्हें पूर्णतः उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। ‘जलवा’ की फ़ातिमादि इसी उपेक्षा का शिकार हुयी थी।

मलबे के मालिक :- यह कहानी ‘मोहन राकेश’ द्वारा लिखी गयी है। इस कहानी का कथानक विभाजन के साढ़े सात साल बाद के काल खंड को दर्शाता है। मोहन राकेश ने विभाजन कालीन घटनाओं का विस्तार से वर्णन नहीं बल्कि संकेतों के माध्यम से कथ्य को स्पष्ट किया है। कहानी के अंतर्गत विभाजन के दूरगामी परिणाम को दर्शाया गया है। विभाजन के फैसले के कारण न चाहते हुए भी मजबूरी में हिन्दू तथा मुसलमानों को अपना बसा-बसाया घर-बार छोड़कर जाना पड़ा था, उन्हें अपने देश, घर, गली, मुहल्ले की याद आती थी। उन्हें विश्वास था कि उनके घर उसी तरह आज भी सुरक्षित होंगे और लोगों में आज भी वही आत्मीयता होगी। प्रस्तुत कहानी इन्हीं संबंधों का ताना-बाना है।

 टेबल लैंड :- उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ द्वारा लिखित कहानी ‘टेबल लैंड’ विभाजन के एक वर्ष बाद सन् १९४८ में प्रकाश में आयी है। इस कहानी में दिखाया गया है कि विभाजन कालीन परिवेश में मनुष्य की मानसिकता विषाक्त भले ही हो गयी थी लेकिन उसका प्रभाव स्थायी नहीं था, स्थितियों की सत्यता का ज्ञान होने पर मनुष्य की पहचान सिर्फ मनुष्य के रूप में की जाती है न कि हिन्दू या मुसलमान। ‘टेबल लैंड’ का अर्थ है ‘पहाड़ के ऊपर का समतल मैदान’। ‘अश्क’ ने कहानी के विषय में लिखा – “वास्तव में टेबल लैंड साम्प्रदायिक भावनाओं की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों के मध्य मानवता की उस समतल भावना का प्रतीक है, जिसका उद्रेक अनायास ही उस यक्ष्मा के मारे कृशकाय बुजुर्ग की दुःख गाथा को सुनकर दीनानाथ के हृदय में हो उठता है।“3

 अंतिम इच्छा :- बदी उज्जमा ने अपने कहानी तथा उपन्यासों में विभाजन की निरर्थकता को बार-बार चित्रित किया है, उनके अनुसार लीगी गतिविधियाँ सिर्फ एक उन्माद थी, उनकी कोई राजनीतिक सार्थकता नहीं थी, विभाजन की मांग तथा लीगी की अनैतिक गतिविधियों को प्रश्रय देने वाले लोगों को भी बाद में अपने फैसले पर पछताना ही पड़ा है। बदी उज्जमा की कहानी ‘अंतिम इच्छा’ विभाजन के पूर्व तथा विभाजन के पश्चात के एक लंबे काल खंड को समेटे हुए हैं। कहानी ‘गया’ में रहनेवाले ‘कमाल’ नामक एक मुस्लिम व्यक्ति की है जिसे भारत छोड़कर ‘कराची’ जाने के अपने फैसले पर जीवन के अंतिम सांस तक पछताना पड़ता है।

 मेरी माँ कहाँ? :- कृष्णा सोबती की विभाजन से सम्बंधित एक और कहानी ‘मेरी माँ कहाँ? साम्प्रदायिकता और क्रूरता के बीच दबी हुयी मानवीयता का चित्रण करती है। यह कहानी एक तरफ तो विभाजन के फलस्वरूप उत्पन्न हुए धार्मिक उन्माद को प्रस्तुत करती है तो दूसरी तरफ परिवेश के कारण बने हिंसक व्यक्ति में छिपी मानवता को उद्घाटित करती है।

  विभाजन की समस्याओं पर लिखी अन्य प्रमुख कहानियों में सआदत हसन मंटो की ‘टोबा टेक सिंह’, कृश्न चन्दर की ‘पेशावर एक्सप्रेस’, उपेन्द्रनाथ अश्क की ‘चारा काटने वाली मशीन’, राजिन्दर सिंह बेदी की ‘लाजवन्ती’, नासिरा शर्मा की ‘सरहद के इस पर’, अज्ञेय की ‘लेटर बॉक्स’, ‘नारंगियॉ’, बदी उज्जमा की ‘परदेसी’, यशपाल की ‘कानून’, ‘खुदा और खुदा की लड़ाई’, अमृत राय की ‘व्यथा का सरगम’, चतुरसेन शास्त्री की ‘लम्बग्रीव’, स्वयंप्रकाश का ‘पार्टिशन’, देवेंद्र इस्सार की ‘मुक्ति’, विष्णु प्रभाकर की ‘मैं जिन्दा रहूँगा’ ‘मेरा वतन’ आदि का नाम लिया जा सकता है। इस प्रकार कहानियों में विभाजन की अभिव्यक्ति महज़ एक घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक जलते-सुलगते अलात-चक्र के रूप में हुई है जो लगातार घूम रही है।

डॉ. मुल्ला आदम अली

संदर्भ:-

1. नरेन्द्र मोहन- विभाजन की त्रासदी भारतीय कथादृष्टि – पृ.१३

2. अनिता इंदिरा सिंह – भारत का विभाजन – पृ.८०

3. उपेन्द्रनाथ अश्क – सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ – पृ.४८

4. नरेंद्र मोहन – भारत विभाजन: हिंदी श्रेष्ठ कहानियां

5. विद्यालंकार चंद्रगुप्त – मेरी प्रिय कहानियाँ

6. नरेंद्र मोहन – भारतीय भाषाओं की कहानियां

7. महिलाबादी, जोश – भारत विभाजन अभिशाप था

8. गोविंद मिश्र – स्थितियाँ रेखांकित

9. सिंह, ओमप्रकश – प्रेमचंदोत्तर कथा साहित्य और साम्प्रदायिक समस्याएं

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