हिंदी कथा साहित्य में देश विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता : देश विभाजन की त्रासदी और वीभत्सता से साक्षात्कार

हिंदी कथा साहित्य में देश विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता : देश विभाजन की त्रासदी और वीभत्सता से साक्षात्कार

देश विभाजन की त्रासदी और वीभत्सता से साक्षात्कार
(हिंदी कथा साहित्य में देश विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता भूमिका से)

 मनुष्य स्वतंत्र जन्मा होने पर भी दया मैत्री करुणा सद्भाव आदि मानवीय गुणों के कारण अनेक बंधनों में बना रहता है और इस सृष्टि की सर्वोत्तम कृति कहलाता है। पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने के लिए उसे समाज पर निर्भर रहना पड़ता है।

 मनुष्य की सामाजिक स्तर पर निर्भरता जितनी बढ़ती चली जाती है सामाजिक जीवन उतना ही जटिल होता चला जाता है जिसके कारण श्रम विभाजन होने लगता है। अधिक सुखमय जीवन जीने की लालसा दूसरों के श्रम पर अधिकार की सोच को जन्म देती है जिससे वर्ग भेद उत्पन्न होता है फलतः मनुष्य स्वार्थी, लालची, अहंकारी होता चला जाता है। कहा भी गया है-

 लोभः प्रतिष्ठा पापस्य प्रसूतिर्लोभ एव च ।

 द्वेषक्रोधादिजनको लोभः पापस्य कारणम् ।।

लोभ पाप का आधार और लोभ ही पाप को जन्म देने वाला है। लोभ- ईष्या, क्रोध आदि का जन्मदाता है।

 यहीं से अलगाव की नींव पड़ती है और इस अलगाव की अनेकानेक दुष्परिणाम हमें देखने को मिलते हैं। इतिहास साक्षी है कि इसकी सबसे बड़ी क्षति हमें देश विभाजन के रूप में देखने को मिली। मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति सत्ता लोलुपता के कारण जो राजनीतिक खेल हुआ वह विभाजन के रूप में हमारे सामने आया। दरअसल यह विभाजन एक दुर्घटना नहीं था बल्कि एक मानवीय त्रासदी थी जिसने लाखों लोगों को भावनाओं और विचारों के धरातल पर ही नहीं मनोवैज्ञानिक, मानसिक और आत्मिक स्तर पर भी प्रभावित किया। यह घटना या कहा जाए दुर्घटना राजनीतिक क्षेत्र या किसी वर्ग विशेष तक ही सीमित नहीं रही लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी उनकी सभ्यता और संस्कृति उनके वर्तमान और भविष्य से जुड़ गई। यह त्रासदी आज भी मानव को अंदर तक झकझोर कर रख देती है या यूँ कहा जाए कि हिंदुस्तान के मानस में विभाजन आज भी जीवंत तौर पर मौजूद है जो कि नई-नई शक्लों के रूप में घटित होता रहता हैं।

 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र तो हो गया लेकिन अंग्रेजों की नीति फूट डालो शासन करो आज भी हमारा पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि दूषित मानसिकता वाले लोग सांप्रदायिकता के नाम पर वैमनस्य का भाव फैलाकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने में आज भी कामयाब हो रहे हैं। ऐसा करते समय उन दुराचारियों को देश विभाजन की आग में जलता हुआ मानव नजर ही नहीं आता जिसने विभाजन की त्रासदी का बड़ा मोल लूटपाट, बलात्कार, बेरोजगारी, शोषण, पुनर्वास की समस्या, शरणार्थी समस्या, पारिवारिक विघटन, गरीबी, आर्थिक असमानता के रूप में चुकाया। यह त्रासदी यदि यहीं रुक जाती तो भी कम होता लेकिन इस त्रासदी में लोगों को अपनी बहुमूल्य धरोहर अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति से भी हाथ धोना पड़ा।

साहित्य को समाज का दर्पण और पथ प्रदर्शक माना जाता है। हिंदी कथा साहित्य में विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता दर्शाने वाली अनेक कहानियाँ देखने को मिलती हैं जो विभाजन की वीभत्सता से हमारा साक्षात्कार कराती हैं।

विभाजन के दौर को स्वयं यशपाल जी ने अपनी आँखों के आगे घटित होते देखा और इसी कारण उसे अपने साहित्य का विषय बनाया। यशपाल का उपन्यास 'झूठा सच' एक विस्तृत फलक पर लिखा गया उपन्यास । इसमें सांप्रदायिकता का चित्रण बड़े विस्तृत और यथार्थ ढंग से करने के साथ-साथ उसके कारणों की पड़ताल करते हुए यशपाल ने देश-विभाजन को उसका जिम्मेदार माना है और पूँजीपतियों तथा अंग्रेजों पर इस समस्या को जन्म देने का आरोप लगाया है।

स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले भीष्म साहनी जी गहन मानवीय संवेदना के सशक्त हस्ताक्षर थे। भीष्म जी ने भारत के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ का चित्रण अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया। भीष्म जी अपने जीवन में घटित घटनाओं, संघर्षों का यथार्थ चित्र अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। ‘बसंती', 'झरोखे', 'तमस' उपन्यासों में उन्होंने आर्थिक विषमता और उसके दुखद परिणामों को बड़ी मार्मिकता व्यक्त किया है।

'अमृतसर आ गया' भी भीष्म साहनी द्वारा लिखित ऐसी ही कहानी है। जिसमें भारत विभाजन के परिदृश्य को चित्रित किया गया है। कहानी का मूल स्वर विभाजन के दौरान विकसित हुए सांप्रदायिक तनाव को उद्घाटित करना है। गाड़ी झेलम स्टेशन से निकलकर अमृतसर तक पहुँचने में हुई छोटी-छोटी और महत्वपूर्ण घटनाएँ कहानी के केंद्र में है।

राही मासूम रजा ने 'आधा गाँव', 'दिल एक सादा कागज', 'ओस की बूँद' उपन्यास लिखे। 'ओस की बूँद' उपन्यास में विभाजन के उपरांत उन मुसलमानों की मनोदशा का चित्रण किया है जो अपने ही देश में बेगानियत का शिकार बन गए। इस उपन्यास में लेखक ने सन् 1932 के बाद के गाजीपुर गाँव को कथा के केंद्र में रखा है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र 'वजीर हसन' और 'हयातुल्ला अंसारी' हैं। पाकिस्तान के निर्माण में इनका बहुत योगदान है। पाकिस्तान बन जाने के बाद ये पात्र सोचते हैं कि पाकिस्तान तो बहुत दूर है उन्हें तो नेहरू के भारत में रहना है, इसी कारण बहुत लोग कांग्रेस से जुड़ जाते हैं।

दूसरे पात्र वजीर हसन को भी पाकिस्तान बन जाने का बहुत दुख है क्योंकि उसका बेटा अली बाकर है जो अपनी पत्नी और पुत्री को छोड़कर नए मुल्क में चला जाता है। वजीर हसन पाकिस्तान नहीं जाता, वह मानता है कि पाकिस्तान बनवाना उसकी गलती है। इस उपन्यास की कथा हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता पर रची गई है।

विभूति नारायण राय सुप्रसिद्ध कथाकार हैं। इनके सभी उपन्यास एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। 'घर' में संबंधों के विखंडन की त्रासदी है तो किस्सा लोकतंत्र' राजनीति में अपराध का घालमेल रेखांकित करता है। 'शहर में कर्फ्यू' में सांप्रदायिकता की समस्या को लेकर गंभीर विमर्श खड़ा करने की कोशिश की गई है। आजादी मिलने के साथ ही जो सांप्रदायिक दंगे भड़के वह तब से लेकर आज पूरे समाज में फैले हुए हैं। हिंसा का वह दौर अभी भी खत्म नहीं हुआ। विभाजन और सांप्रदायिकता की समस्या ही इस उपन्यास का मूल कथ्य है। सांप्रदायिकता, जातिवाद, आतंकवाद और अलगाववाद जैसी समस्याएँ 'कितने पाकिस्तान' के कथानक का प्रमुख आधार बनकर उभरी हैं।

विभाजन की पृष्ठभूमि पर कृष्णा सोबती का लिखा हुआ उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' है। इस उपन्यास में कृष्णा सोबती जी के अपने अनुभव दर्ज हैं। उपन्यास की शुरुआत दो लक्ष्यों में से होती है जो विभाजन के पहले और बाद के हिंदुस्तान को दिखाते हैं। कृष्णा सोबती इस उपन्यास में अपने माध्यम से लाखों लोगों की उस पीड़ा को व्यक्त करती हैं जो एक आजाद देश बनने की खुशी में अपना घर, अपनी विरासत, अपनी जमीन, अपनी जिंदगी, अपना मान, अपना सम्मान खोने पर मिली है।

देश विभाजन से संबंधित कृष्णा सोबती की कहानियों में सबसे चर्चित एवं प्रसिद्ध है 'सिक्का बदल गया। इस कहानी में विभाजन से उत्पन्न दारुण परिस्थितियों के साथ मानवीय संबंधों और मूल्यों में आए विघटन का वर्णन है। 'मलबे का मालिक' मोहन राकेश द्वारा लिखी गयी कहानी है। इस कहानी का कथानक विभाजन के साढ़े सात साल बाद के कालखंड को दर्शाता है। मोहन राकेश ने विभाजन-कालीन घटनाओं का विस्तार से वर्णन नहीं किया बल्कि संकेतों के माध्यम से कथ्य को स्पष्ट किया है। कहानी के अंतर्गत विभाजन के दूरगामी परिणाम को दर्शाया गया है। विभाजन के फैसले के कारण न चाहते हुए भी मजबूरी में हिन्दू तथा मुसलमानों को घर-बार छोड़कर जाना पड़ा था, उन्हें अपने देश, घर, गली, मुहल्ले की याद आती थी। उन्हें विश्वास था कि उनके घर उसी तरह आज भी सुरक्षित होंगे, लोगों में आज भी वही आत्मीयता होगी। 'मलवे का मालिक' कहानी इन्हीं संबंधों का ताना-बाना है।

 नासिरा शर्मा जी का कहानी संग्रह 'सबीना के चालीस चोर' भारत में स्वतंत्रता के बाद जो परिवर्तन हुआ है उससे प्रेरित है। यह कहानी समकालीन सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक एवं आर्थिक परिवेश को बड़ी सभ्यता के साथ व्यंजित करती है।

 अज्ञेय जी की शरणदाता, मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई, लेटर बॉक्स, विष्णु प्रभाकर जी की मेरा बेटा, अगम अथाह, असगर वजाहत जी की मुक्ति, गुरु-चेला संवाद, महीप सिंह जी की पानी और पुल, स्वयं प्रकाश जी की पार्टिशन और चित्रा मुदगल जी की लपेटें... विभाजन की त्रासदी को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियाँ हैं।

 विभाजन और सांप्रदायिकता की समस्या हमारे जीवन में लंबे समय से आज तक जहर घोलने का काम कर रही है। हालांकि साहित्यकारों ने लेखनी के माध्यम से सचेत करने का भरसक प्रयास किया तथापि सत्ता लोलुप लोगों के कारण यह समस्या हमारा आज भी पीछा नहीं छोड़ रही है।

डॉ. मुल्ला आदम अली ने इस विषय को अपने शोध का विषय बनाया वह प्रशंसा के पात्र हैं। इसकी एक अहम वजह यह भी है कि इतिहास के पन्नों से वर्तमान समय तक यह समस्या जस की तस बरकरार है फिर भी शोधकर्त्ताओं का इस ओर ध्यान ही नहीं गया। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए पहले भी जनता को सांप्रदायिकता की अग्नि में झोंक दिया जाता था और आज भी स्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं है। आशा की जानी चाहिए कि ऐसे विषम वातावरण में उनका यह शोध ग्रंथ समाज को एक नई दिशा प्रदान करने में सफल हो और देश की आम जनता इस आग में झुलसने से बच सके।

डॉ. प्रीति कौशिक
विभागाध्यक्ष हिन्दी,
के.एम. जी. डिग्री कॉलेज,
पिलखुआ, गाज़ियाबाद

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