सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय : Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Agyeya'

Dr. Mulla Adam Ali
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Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Agyeya'

Sachchidananda Hirananda Vatsyayan

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय जी का जन्म सन् 7 मार्च 1911 ई. को 'देवरिया' जनपद के 'कुशिनगर' नामक स्थान पर हुआ था। छायावादोत्तर हिन्दी कविता को नए अर्थ देने वालों में अज्ञेय का अप्रितम स्थान है। प्रयोगवाद तथा नई कविता के प्रवर्तक और प्रतिष्ठापक के रूप में उनका विशेष महत्व है। युग के मानसिक परिवर्तनों के सन्दर्भ में रचनाशीलता को आत्मसात करते हुए इस कवि का व्यक्तित्व पूर्णतः भारतीय रहा है। उनकी रचनाशीलता का समुचित परिवेश सांस्कृतिक गरिमा पर आधारित है। यह अज्ञेय की संवेदनशीलता और गहरी प्रतिबद्धता का अनुभव कराता रहता है।

अज्ञेय जी के पिता पुरातत्वविद् पं. हीरानन्द शास्त्री थे। अज्ञेय की बाल्यावस्था अपने विद्वान पिता के साथ कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीती। उन्होंने अधिकांश शिक्षा मद्रास से अर्जित की। उनकी आरंभिक शिक्षा संस्कृत में हुई। बाद में उन्होंने फ़ारसी और अंग्रेजी का अध्ययन किया। बी.एससी. करने के उपरान्त एम.ए. (अंग्रेजी) की पढ़ाई के समय ही अज्ञेय जी क्रान्तिकारी आन्दोलन में सहभागी बनकर सन् 1930 ई. में गिरफ्तार हुए एवं चार वर्ष तक जेल में रहे। उसके पश्चात दो वर्ष तक अज्ञात रहे। अज्ञेय जी ने भिन्न क्षेत्रों में भी कार्य किया। इन्होंने मेरठ के "किसान आन्दोलन" में सक्रिय भाग लिया। सन् 1943 से 1946 ई. तक सेना में भरती होकर उन्होंने एक सैनिक का जीवन व्यतीत किया। कुछ समय तक ये अमेरिका में भारतीय साहित्य और संस्कृति के अध्यापक रहे। जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा- अनुशीलन विभाग के निदेशक रहे। यायावरी प्रवृति होने के कारण इन्होंने अनेक बार अनेक देशों का भ्रमण किया।

प्रयोगवाद प्रवर्तन : हिन्दी के युग पुरुष अज्ञेय की आधुनिक हिन्दी साहित्य को खासतौर से नये हिन्दी साहित्य को बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। हिन्दी के छायावाद के बाद की कविता जिसे नई कविता कहा जाता है वे जनक माने जाते है। अज्ञेय जी ने हिन्दी कविता के "प्रयोगवाद" नामक आंदोलन को सन् 1943 में "तारसप्तक" दूसरा सप्तक (1951 ई.) और तीसरा सप्तक (1956 ई.) के द्वारा नये कवियों को एक मंच दिया। अज्ञेय जी ने केवल नवीन विचारधारा को लेकर चले बल्कि नूतन काव्य धारा के अन्वेषी उनके कवियों को हिन्दी पाठकों के सम्मुख लाकर खड़ा कर देने का गुरुत्तर कार्य भी उन्हीं के द्वारा सम्पन्न किया गया । सैनिक 'विशाल भारत' बिजली, अंग्रेजी त्रैमासिक पत्रिका वाक का इन्होंने संपादन किया। 'प्रतीक' नाम की पत्रिका निकालकर अज्ञेय जी ने हिन्दी में नई रचनाशीलता को प्रतिष्ठित किया। हिन्दी के रचनाकारों को प्रेरित करते रहे, इसीलिए उन्हें हिन्दी नवलेखन का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व माना जाता है। अज्ञेय जी ने कई महत्वपूर्ण पत्रों के सम्पादन का कार्य किया, जिसने "प्रतीक और नया प्रतीक" जैसे साहित्यिक पत्र है दूसरी ओर 'दिनमान' और 'नवभारत टाइम्स' जैसे समाचार और विचार प्रधान राजनीतिक पत्र भी है। पत्रकारिता के लोगों का मानना है कि अज्ञेय जी के सम्पादन में 'दिनमान' के आदर्श और अत्यन्त गंभीर साप्ताहिक था। 4 अप्रैल 1987 को हिन्दी के इस महापुरुष की मृत्यु हुई, अब अज्ञेय हमारे बीच नही है। मगर उनकी "स्मृति चित्र" उसी तरह सजीव है। वैसे लेखक मरता नही अपनी कृतियों में यशः शरीर के माध्यम से हमारे बीच जीवित रहता है। अज्ञेय जी की तमाम कृतियाँ तथा उनकी कई कविताएँ हिन्दी साहित्य की धरोहर है।

काव्य कृतियाँ : नूतन प्रयोगवादी युग का उद्घोष करने वाले कुशल कवि अज्ञेय का सबसे पहला काव्य संग्रह भंगदूत सन् 1933 ई. में प्रकाशित हुआ था। सन् 1942 ई. में अज्ञेय की दूसरी कविता संग्रह 'चिन्ता' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। सन् 1945 ई. में अज्ञेय की तीसरी कविता-संग्रह "इत्यालम्" नाम से प्रकाशित हुआ था। सन् 1949 ई. अज्ञेय का चौथा काव्य संग्रह 'हरी घास पर क्षण भर' प्रकाशित हुआ था। सन् 1945 ई. अज्ञेय का पाँचवा कविता-संग्रह 'बावरा अहेरी' प्रकाशित किया गया था। सन् 1957 ई. में इस महत्वपूर्ण कविता का छठा-काव्य संग्रह 'इन्द्रधनु रौदे हुये' प्रकाशित हुआ था। सन् 1959 ई. में अज्ञेय का "अरी ओ करुणा प्रभामय" नामक सातवाँ काव्य-संग्रह "आँगन के चार द्वार" प्रकाशित हुआ। सन् 1967 ई. में अज्ञेय का नौवाँ काव्य-संग्रह "कितनी नावो में कितनी बार" शीर्षक से छपा। सन् 1969 ई. में "क्योंकि मैं उसे जानता हूँ" शीर्षक से अज्ञेय का दसवाँ कविता संग्रह प्रकाशित हुआ।

सन् 1970 ई. में इस कवि का ग्यारहवाँ काव्य- संग्रह "सागर मुद्रा" सन् 1973 में अज्ञेय का बारहवां कविता संग्रह "पहले मैं सन्नाटा बनता हूँ" प्रकाशित हुआ । अज्ञेय की काव्य-संग्रह "कितनी नावों में कितनी बार" को ज्ञानपीठ का पुरस्कार प्राप्त हुआ।

सन् 1977 ई. में तेरहवाँ काव्य-संग्रह "महावृक्ष के नीचे" तथा सन् 1981 ई. में "नदी के वाँक पर छाया" शीर्षक से प्रकाशित हुआ।

इन काव्य-संग्रहों के अतिरिक्त अज्ञेय का सन् 1965 ई. में पूर्वा (इत्यालम और हरिघास पर क्षण भर) सन् 1965 में ही "सुनहले शैवाल" (चित्रालंकृत संकलन) तथा सन् 1946 ई. में अंग्रेजी की पुस्तक "प्रिजन डेज एण्ड अदर पोएम्स" (जेल के दिन तथा अन्य कविताएँ) नाम से प्रकाशित हुई। "सदीनारा" नाम से भाग-1 तथा 2 अज्ञेय का सम्पूर्ण काव्य-संग्रह का प्रकाशन भी हुआ है।

- श्री राजपाल

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