Sabeena Ke Chaalees Chor by Nasira Sharma: सबीना के चालीस चोर

Dr. Mulla Adam Ali
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Sabeena Ke Chaalees Chor Story by Nasira Sharma

Sabeena Ke Chaalees Chor Story by Nasira Sharma

सबीना के चालीस चोर : नासिरा शर्मा

              नासिरा शर्मा द्वारा लिखी गई कहानी ‘सबीना के चालीस चोर’ है। दादा-दादी की किस्सगोई वाली कहानियाँ सबीना जैसे छोटे बच्चे के मन में फैली शंकाओं, डर की मानसिकता को बड़े भोलापन से व्यक्त करती है। जो कहानियाँ उन्हें सुनाई गई, वे भी चोर और डर की ही हैं और समकालीन माहौल भी उसी प्रकार का है। यही कारण है कि ‘सबीना के चालीस चोर’ कहानी आज के वास्तविक परिवेशगत यथार्थ को व्यक्त करती है। जो कहानियाँ मन बहलाव के लिए कही गयीं वे आज सच्चाई का रूप लेकर बच्चों के मन में उतर चुकी हैं डर के रूप में। इसीलिए जनगणवालों ने सकीना के घर पर डाले नम्बर को ‘चोर ने डाले नम्बर’ कहकर सबीना पोंछ देती है। ऐसे समय जावेद साहब, शाहरुख का नयी पीढ़ी पर का भरोसा भी कहाँ तक इस वातावरण में सुधार लायेगा, कहा नहीं जा सकता। क्योंकि आजादी के समय के लोगों को यही लग रहा था कि, तीस-चालीस साल बाद सांप्रदायिकता के बादल छंट जायेंगे किंतु ऐसा हुआ नहीं। माहौल अधिक विषाक्त होता गया है।

     कहानी समकालीन सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक एवं आर्थिक परिवेश को बड़ी सघनता के साथ व्यंजित करती है।

     दंगे अब किसी एक गाँव—शहर तक सीमित नहीं रहे है। सभी जगह एक-सा माहौल बन गया है। सभी शहर, सभी राज्य उसकी चपेट में आये है। “फसाद जंगल की आग की तरह एक शहर से दूसरी शहर में फैल रहा था।“ रंगास्वामी कहता है “हमारा हैदराबाद ऐसा नहीं था।“ जवाब में मिश्राजी कहते, “कौन-सा शहर पहले ऐसा था, मगर धीरे-धीरे करके सब अपनी शक्ल बदलते चले गए। मेरठ, बिजनौर, लखनऊ।“ घोष बाबू कहते है “यह सब यू.पी. पॉलिटिक्स है। हमारा बंगाल इससे दूर है।“ सुरजीत सिंह कहते है “सँभल के भद्र पुरूष। यह घमंड साउथ वालों को भी था, मगर देखिए क्या हाल हो गया वहाँ! मेघालय, पंजाब और कश्मीर, गुजरात, काठियावाड़ कहाँ आग नहीं लगी और किसके घर नहीं जले? सभी घायल और जख्मी हैं मगर अपनी-अपनी जमीन पर अपने-अपने घर और मोहल्लों में। दुःख तो यही है।“

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     सांप्रदायिक ताकतें बरसों से देश भर में विष फैला रही है। कई आदमी टूट चुके हैं पर यह ‘जहन्नुमी सफर कहीं खत्म नहीं’ हो रहा। सकीना के अब्बू शब्बीर साहब कहते हैं, “गुनाहों का कफ्फारा तो हमें अदा करना है बेटी। यही जहन्नुमी सफर खत्म नहीं होगा। जिस शहर में भी हम रहेंगे, वहां यही सब भोगना पड़ेगा। फासद हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा। सन् सैंतालीस के बाद से यही देखना-भोगता आ रहा हूँ।“

     सांप्रदायिकता के माहौल को दूर करने के प्रयास भी देश विभाजन के बाद से निरंतर होते रहे हैं। इनसे लड़ने की ताकत इंसानों में रही है। जैसे फासद ‘बँटवारे’ के बाद से हमारा पीछा करते आ रहा है वैसे ही, “हमारी हिफ़ाज़त के लिए कोई-न-कोई खड़ा हो जाता है। दिल छोटा न क,रो अभी इंसानियत हमारे बीच मरी नहीं है।“

     सबीना का मन फासद, डर से ऊब चुका है। वह इसके विरुद्ध दो-दो हाथ करने के लिए अपना मन बना लेती है किंतु हिफाजत से रहना है तो शाहरुख का अपना तर्क है- “भूलने और माफ करने की आदत डालो, इसी में अमन है।“ या रंगास्वामी कहता है- “पहचान की निशानियाँ जिस तरह एक दूसरे से घुल मिल रही है उसमें दंगाइयों का भी मुश्किल आन पड़ेगी कि मरने वाला कहीं अपना धर्म भाई तो नहीं है”... या मिश्राजी कहते हैं, “नाम भी मिल-झूला रखो यार जैसा राम-रहीम जोनफ सिंह, स्वामी।“

     इनके मन में यह भावना है कि कहीं-ना-कहीं ये व्यावहारिक, मानसिक बदलाव सांप्रदायिकता को किनारे कर देंगे। या शाहरुख, शब्बीर साहब का नई पीढ़ी पर का भरोसा की सांप्रदायिकता को ये पीढ़ियां अपने तर्क, समझ के बल पर निपटा लेंगी।

     आजादी के बाद शैक्षिक परिवेश भी धूम-धूसरित रहा है। नासिरा ने इस बात को व्यक्त किया है, “शिक्षा हमारे बीच सही ढंग से फैलती तो यह अनपढ़ जनता हमारी तरह धोखा न खाती और अपना अच्छा-बुरा समझती।“ रंगास्वामी बोला।

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     “शिक्षित वर्ग धोखा भी दे रहा है यह मत भूलिए।“ मिश्राजी तड़पे। “भले ही एक पढ़ा-लिखा समूह उन्हें धोखा दे रहा है, तो भी यदि शिक्षित ज्यादा होते तो आज हमारी Shakti भी अधिक होती।“ रंगास्वामी बोले।

     “मुझे नई नस्ल पर भरोसा है। भरोसा इसलिए है कि हर सियासत कभी-न-कभी पुरानी पड़ती है। आज से पचास वर्ष बाद ‘बांटो और राज करो’ का अंदाज बदलेगा, तब शायद आम इंसान आराम से रह सकेगा। जावेद साहब लंबी साँस खींचकर बोले।“ किंतु स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा है। मिश्राजी की बात यही साबित करती है; “सपना देखना आप लोग कब बंद करेंगे भाई? चालीस वर्षों बाद आप वही सब झेल रहे हैं जो पहले झेला था। मेरा विश्वास है, स्थिति और बिगड़ेगी।“ और हम देख रहे हैं, होता यही जा रहा है। पूरे समाज में एक प्रकार की जड़ता आई है। वह सिर्फ इन स्थितियों को देखते-देखते रहने का कार्य कर रहा है। उसका मानना है कि फासद करने वाला, दूसरों का हक मारने वाला ही चालीस चोर है, जो हमारे कमजोर वर्ग को दबाते हैं। सबके बीच बार-बार अपने होने का अहसास दिलाती छोटी मगर समझदार लड़की के मानसिक संघर्ष का चित्रण यह कहानी है। सकीना के मन की उदासी, निराशा, शाहरुख का चुपचाप सहना, शब्बीर साहब का ‘नई नस्ल’ पर भरोसा कहानी को नए अर्थों से भर देता है।

      ‘सबीना के चालीस चोर’ कहानी में ‘अली बाबा चालीस चोर’ कहानी प्रतीक के रूप में मौजूद है जो सबीना कि मासूम मानसिकता के बहाने उस हिंदुस्तान का नजारा दिखाती है जिसमें हम साँसे ले रहे हैं। गिनती में जितने भी हो मगर उन चारों को हम बखूबी पहचानते हैं।“ इन चारों द्वारा चौतरफा फैलाने वाले फासद, दंगे, हत्या, लूट आदि को लेखक ने कहानी में स्पष्ट किया है।

संदर्भ;

नासिरा शर्मा- सबीना के चालीस चोर

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