पनडिब्बी | मजेदार बाल कहानी जिसमें छुपा है बड़ा संदेश

Dr. Mulla Adam Ali
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“Pandibbi” by Dr. Mohammad Arshad Khan is a delightful short story that captures the humor and chaos of everyday family life. Through a simple incident involving a missing betel box, the story unfolds into an engaging narrative filled with warmth, confusion, and a subtle life lesson.

Pandibbi: A Simple Story with a Powerful Message

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प्रख्यात बाल साहित्यकार डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान की यह मनोरंजक कहानी “पनडिब्बी” एक छोटे-से प्रसंग के माध्यम से घर-परिवार की हलचल, हास्य और मानवीय स्वभाव को बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। एक साधारण पान की डिबिया कैसे पूरे घर में हलचल मचा देती है—इसी दिलचस्प घटना को पढ़िए इस कहानी में।

बच्चों और बड़ों के लिए मजेदार कहानी

पनडिब्बी

सारा बखेड़ा उस दिन से शुरू हुआ, जिस दिन दादामियाँ घर आए। दादामियाँ यानी हमारे दादाजान के बड़े भाई। वे रुके तो बमुश्किल आधा दिन, पर हमारे लिए कई दिनों की हलचल छोड़ गए।

पिछले कई दिनों से दादाजान से उनकी बात हो रही थी। ‘आऊँगा-नहीं आऊँगा’ बीच पूरा हफ्ता गुज़र गया था। किसी दिन कहते ‘ज़रूर आऊँगा। बहुत दिन हो गए तुम सबको देखे।’ पर अगले रोज़ उनका सुर बदल जाता-‘रऊफ और नन्हें तो जाएँगे ही, मैं भी साथ चला आऊँ तो घर पर कौन रहेगा?’

दरअसल, उनके पोते को सऊदी में नौकरी मिल गई थी। ख़ानदान का पहला शख़्स वतन से बाहर जा रहा था, इसलिए ख़ुशी भी थी और फ़िक्र भी। सबकी आँखें उसे सही-सलामत जाते देखने का सुकून चाहती थीं। दादामियाँ भी इसी पशोपेश में थे। ‘जाऊँ, न जाऊँ’ के बीच उनका इरादा गर्दिश कर रहा था। पर वे अपने दोनों बेटों के साथ लखनऊ गए और लौटते में घर भी आए।

आना तो ख़ैर उन्हें था ही। पर उम्मीद थी कि ऐशबाग़ में अपने दोस्त इस्माइल टिंबरवाले से मिलते हुए शाम तक आएँगे। दादाजान को भी बीच में फोन करने का ध्यान नहीं रहा। अभी साढ़े दस बजे थे और सुबह की चाय का ज़ायक़ा फीका भी नहीं पड़ा था कि उनका फोन आ पहुँचा।

दादाजान के चेहरे का रंग उड़ गया। पूरे घर में हड़बड़ी मच गई। यह उठा-वह रख। तख़त पर नई चादरें बिछाई जाने लगीं, घर का अल्लम-गल्लम पर्दों के पीछे छिपाया जाने लगा, झाड़ू की खरर-खरर गूँजने लगी।

‘‘जाले साफ करो, जाले,’’ दादाजान अपनी दुखती कमर लिए चिल्ला रहे थे। दादी उन्हें कमरे में जाकर लेटे रहने की हिदायत दे रही थीं कि दर्द फिर से न उखड़ आए। पर दादाजान इतने बेचैन थे कि अब्बी के हाथों से लग्गी खींच लेने को उतारू थे।

घर का हंगामा अपनी अधूरी राह में ही था कि दरवाज़े पर इन्नोवा का हॉर्न बज उठा।

‘‘आ गए...आ गए...भाईजान की ही गाड़ी है।’’ दादाजान बदहवास चेहरा लिए बोले।

दादामियाँ ही थे। लंबे सफर के बावजूद वे लकदक कुर्ते-पाजामे में गाड़ी से उतरे। उनके पीछे-पीछे दोनों बेटे और एक पोता भी घर में दाखिल हुआ। दादाजान लपककर गले लगे।

सलाम-दुआ के बाद दादाजान को देखते ही तपाक से कहने लगे, ‘‘अमाँ मियाँ, ये क्या हाल बना रखा है?’’

‘‘कुछ नहीं भाईजान, सब ठीक है, सब ठीक है। मज़े में हूँ, सब ठीक है।’’ दादाजान अपनी बातों को इस तरह दुहरा रहे थे, जैसे अल्फ़ाज़ चुक गए हों। हमेशा तुर्रम बने रहनेवाले चिड़चिड़े दादाजान को इस तरह देखना घरवालों के लिए हैरत भरा था।

‘‘क्या ठीक है? तुम्हारा चेहरा तो ऐसा हो गया है कि बग़ल खड़ा होऊँ तो लोग तुम्हें बड़ा भाई कह दें। हालत सुधारो। बालों में मेहंदी लगा लिया करो। हफ्ते-दो हफ्ते में दाढ़ी तराशवा लिया करो। एकदम बीमारों जैसा हाल बना रखा है।’’ दादामियाँ अँगुली रगड़कर धूल देखते हुए कुर्सी पर बैठ गए और बोले, ‘‘ख़ैर, कमर का दर्द कैसा है?’’

दादाजान तो जैसे कमर का दर्द भूल ही चुके थे। तखत के किनारे सिमटे-सकुचाए बैठते हुए बोले, ‘‘ठीक है भाईजान। अब इतनी राहत है कि थोड़ा-बहुत चल-फिर लेता हूँ।’’

‘‘अमाँ यार...’’ दादामियाँ कुर्सी की टेक लेते हुए झुँझलाहट से बोले, ‘‘हड्डी-गुड्डी का सालन पियो, गोंद के लड्डू बनवाकर खाओ। मुझे देखो कमोबेश तुमसे छः साल बड़ा होऊँगा। कमर दर्द तो क्या, सिर दर्द भी पास आते घबराता है। लगता है सलमा तुम्हारे खाने-पीने का ध्यान नहीं रखतीं।’’

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‘‘अरे नहीं भाईजान, मैं तो कहते-कहते थक जाती हूँ, ये ही कुछ नहीं खाते’’ दादी ने पर्दे की ओट से सफाई दी।

दादामियाँ ठहाका लगाकर हँस पड़े। तब तक गुड्डन पानी की ट्रे ले आई थी। दादाजान उसे खा जानेवाली निगाहों से घूर रहे थे क्योंकि ट्रे के नीचे प्याज़ का छिलका चिपका दिख रहा था। कहीं सलीक़ा पसंद दादामियाँ ने देख लिया तो?

ख़ैर उन्होंने नहीं देखा या देखकर भी नज़रअंदाज़ किया, कौन जाने? नफ़ासत से गिलास उठाया और दो-तीन घूँट पीकर वापस रखते हुए बोले, ‘‘कैसी हो बेटा, इंटर तो हो गया होगा?’’

‘‘जी, ग्रेजुएशन भी कम्प्लीट हो गया। एम.एससी. में एडमीशन लिया है।’’ गुड्डन सिर पर बमुश्किल दुपट्टा सँभालते हुए बोली।

‘‘माशाअल्लाह...’’ दादामियाँ ने दुआ के लिए हाथ बढ़ाया तो गुड्डन ने सिर आगे कर दिया, ‘‘हमारी बिटिया इतनी बड़ी हो गई! ख़ूब पढ़ो-लिखो, क़ौम की खिदमत करो। अल्लाह ख़ूब तरक़्क़ी दे, ख़ुश रखे।’’

गुड्डन दुआ पाकर निहाल होते हुए वापस लौटी।

‘‘और हाँ,’’ पीछे से उन्होंने आवाज़ दी, ‘‘अम्मी से कहना खाना मत बनाएँ हम लोग थोड़ी देर में निकलेंगे। घर पर बहुएँ अकेली हैं।’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है भाईजान।’’ दादाजान मिनमिनाए, ‘‘इतने दिन बाद आए हैं। दो-एक दिन तो रुकिए ही।’’

दादामियाँ कुछ नहीं बोले। बस, सुनहरी चेनवाली कलाई घड़ी पर नज़र डाली और बोले, ‘‘रऊफ, नन्हे, यहाँ से ऐसा निकलेंगे कि मग़रिब से पहले घर पहुँच जाएँ।’’

ख़ैर, दोपहर का खाना हुआ। दादामियाँ ने सब बच्चों और बहुओं को रुपए बाँटे और सबसे विदा लेकर गाड़ी में जा बैठे। पल भर में गाड़ी गलियारा पार कर गई।

बस, सारे हंगामे की शुरुआत यहीं से हुई।

दादामियाँ के जाते ही दादाजान बोले, ‘‘भाईजान के सामने आज भी हालत ख़राब हो जाती है। अब्बा के गुज़र जाने के बाद वही तो हमारे बुज़ुर्ग हैं।’’ कहते-कहते उन्होंने दादी की तरफ हाथ बढ़ाया, ‘‘अच्छा अब पान की डिबिया लाओ। जाने कहाँ छिपा दी। भाईजान के लिहाज में सुबह से नहीं खाया। मुँह फीका हो रहा है।’’

‘‘मुझे क्या पता। आपने ही कहीं रखी होगी।’’ दादी सिर से सरकाकर दुपट्टा गले में डालती हुई बोलीं।

दादाजान तड़प उठे, ‘‘अरे, साफ-सफाई तुम लोगों ने की। मैंने तो कुछ छुआ भी नहीं।’’

वह बेचैनी से इधर-उधर अपनी डिबिया तलाशने लगे।

‘‘अपने कमरे के पास किसी को आने भी देते हैं? कोई क्यों छुएगा आपकी पनडिब्बी?’’

‘‘सफाई तो तुम्हीं लोगों ने की थी।’’ दादाजान बेचारगी से चिल्लाए।

गुड्डन और अब्बी को बुलाया गया, जिनका आज की साफ-सफाई में सबसे अहम रोल था।

‘‘हमने तो चादर हटाकर नई चादर बिछा दी थी बस। हमें तो कुछ भी नहीं दिखा।’’ दोनों ने बताया।

तब तक दादी गुसलखाने में पड़ी चादर उठा लाईं और झाड़ते हुए बोलीं, ‘‘इसमें भी नहीं है।’’

‘‘पान की डिबिया है, कोई सुई नहीं,’’ दादाजान झल्लाकर बोले।

दादी भुनभुनाते हुए चली गईं, ‘‘एक तो मदद करो ऊपर से बातें भी सुनो। यही ज़माना है।’’

शक की सुई अब सिराज और शिब्बू पर घूमी। ज़रूर खेल के चक्कर में उठा ले गए होंगे। जब वह ‘खट्ट’ से खुलती है और ‘चट्ट’ की आवाज़ करते हुए बंद होती है तो बड़ा मज़ा आता है। लेकिन उन दोनों ने भी मासूमियत से इनकार कर दिया। उनकी शक्लों को देखकर भी लगता था कि ये काम उनका नहीं होगा। फिर भी दादाजान ने गुड्डन को पीछे लगाया कि उनके खिलौनों की टोकरी की तलाशी ले।

दादाजान की सुई घूम-फिरकर फिर दादी पर अटक गई, ‘‘पक्का यही होंगी। मेरे पान खाने से इन्हीं को दिक़्क़त है। इधर न थूको, उधर न खँखारो। जब देखो तब टोका-टाकी।’’

दादी तैश में कमरे से लपकती आईं, ‘‘मौलवी की बेटी हूँ। रखना-उठाना तब न किया जब बच्ची थी, अब आख़िरी वक़्त में क्या आिक़बत बिगाड़नी है।’’

सारी खोजबीन के बाद भी पान की डिबिया न मिली। मुरादाबादी पीतल की चमचमाती डिबिया दादाजान कभी किसी की बारात में मुरादाबाद गए थे, तो लाए थे। घर पर कोई पान खाता नहीं था। दादी पीक से होनेवाली गंदगी के सख़्त खिलाफ़ थीं। इसलिए गिल्लू की गुमटी से सुबह ही उनके लिए पान लगकर आ जाते थे। दादाजान एक-एक बीड़ा डिबिया में बिछे तर मलमल पर सहेजकर रखते और इत्मीनान से खाते रहते।

डिबिया आख़िर गई कहाँ...? यह घरवालों के लिए भी बड़ा सवाल था।

दादाजान की ख़ुशनूदी हासिल करने के लिए सब डिबिया ढूँढने में लग गए। दादी ख़ुद भी बेचैनी से लगी हुई थीं क्योंकि क़समें खा लेने के बावजूद दादाजान का सारा शक उन्हीं पर था। अब्बू, जिन्हें काहिल और नाकारा का खिताब हासिल था, वे भी इस मुहिम का हिस्सा बने हुए थे। डिबिया खोजकर अपनी लियाक़त साबित करने का इससे बेहतर मौक़ा दूसरा नहीं था।

लेकिन घर भर की कोशिशों के बाद भी पान की डिबिया नहीं मिली। अब्बू बाज़ार से एक नई डिबिया लेकर आए, पर दादाजान ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं।

कुछ दिनों बाद की बात है। एक दिन दादाजान ने गद्दे को सही करते हुए यों ही नीचे हाथ फिराया कि उनका जी धक से रह गया। एक पुराने फिल्मी रिसाले में लिपटी पान की डिबिया गद्दे के नीचे दबी थी। पुरानी बातें एकाएक रील की तरह दिमाग़ में घूम गईं। दादामियाँ का फोन पाते ही हड़बड़ी में रिसाला उठाकर गद्दे के नीचे दबा दिया था। दादामियाँ देख लेंगे तो क्या कहेंगे? हड़बड़ी में ख़बर भी न हुई कि रिसाले के भीतर पान की डिबिया रखी है।

डिबिया हाथ में लिए वे हैरत और शर्मिंदगी से टुकुर-टुकुर ताक रहे थे। डिबिया को लेकर इतना तिल का ताड़ बन चुका था कि किसी को बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

दादाजान ने इधर-उधर नज़र घुमाई। आस-पास कोई नहीं था। उन्होंने पान की डिबिया को नज़र भर देखा, मुहब्बत से हाथ फिराया और हाथ बढ़ाकर डिबिया को और गहराई में दबा दिया। उस दिन के बाद उन्होंने फिर कभी पान की डिबिया के बारे में चर्चा नहीं की।

घरवालों के लिए आज भी यह राज़ है कि पान की डिबिया आख़िर गई कहाँ?

- डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान

निष्कर्ष; “पनडिब्बी” हमें यह सिखाती है कि कई बार छोटी-सी बात भी हमारी जल्दबाज़ी और गलतफहमी के कारण बड़ी समस्या बन जाती है। डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान ने इस कहानी के माध्यम से सरल और रोचक ढंग से यह संदेश दिया है कि धैर्य और समझदारी से काम लिया जाए तो अनावश्यक उलझनों से बचा जा सकता।

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