Sreelekha K. N. article explores the life and legacy of Mirabai, one of the most prominent poet-saints of the Bhakti movement. It highlights her deep devotion to Lord Krishna, her unique poetic expression, and her courageous resistance against social norms. Through her works and life journey, Mirabai emerges not only as a spiritual figure but also as a symbol of strength and individuality.
Mirabai: Bhakti Movement Poet, Life, Devotion to Krishna and Literary Legacy
डॉ. श्रीलेखा के. एन. जी का यह लेख मीराबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनके जीवन के तीन प्रमुख आयाम—भक्ति, सृजन और संघर्ष—को समग्र रूप से समझाया गया है। भक्तिकालीन सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में मीरा के आध्यात्मिक प्रेम, स्त्री चेतना और विद्रोही स्वर को इस लेख में विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। यह लेख न केवल मीरा को एक महान कृष्णभक्त के रूप में प्रस्तुत करता है, बल्कि उन्हें एक साहसी और क्रांतिकारी नारी के रूप में भी स्थापित करता है, जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
मीराबाई
भक्ति आंदोलन में योगदान, जीवन संघर्ष और काव्य विशेषताएँ
हिंदी का मध्यकालीन साहित्य व भक्तिकाल भक्ति की बहुलता का समय था। आदिकालीन सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की असफलता भक्ति के उदय का प्रमुख कारण था। इसमें एक ओर सामंती व्यवस्था के विरोध का शंखनाद मुखरित था तो दूसरी और पतनोन्मुख व्यवस्था से पीड़ित जनता उस अनंत, अज्ञात एवं निर्गुण-सगुण रूपी ईश्वर के आश्रय में भड़कने की कथा सर्वत्र सुनाई दे रही थी। ऐसी एक पृष्ठभूमि में आध्यात्मिकता का उदय हुआ, जिसकी साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में भक्ति काव्य का विकास हुआ था। भक्ति के साथ-साथ प्रेम तत्व की प्रधानता भी इस समय के हर साहित्य में दृष्टिगोचर है। जहाँ कबीर और जायसी ने हिंदु और मुसलमानों के बीच समता स्थापित करने हेतु प्रेम तत्व की स्थापना की थी, वहाँ सूर और तुलसी ने अपने आराध्य के प्रति अनन्य प्रेम और आध्यात्मिक भक्ति को दर्शाया था। इस समय धर्म साधना का महत्व अधिक था, किन्तु हिंदु और मुसलमानों के बीच निहित असमता को साहित्य के द्वारा दूर करने का प्रयास भी होता था। इस समय के कवि एक ओर भक्त थे तो दूसरी ओर मानवीयता के समर्थ भी थे। संत कवि कबीर और सूफी कवि जायसी के साथ-साथ राम के उपासक तुलसी और कृष्ण भक्त कवि सूरदास ने भी अपनी रचनाओं को प्रेम और भक्ति के प्रचार का माध्यम बनाया था। इन दोनों तत्वों का अद्भुत संयोग उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भक्तिकालीन कृष्णभक्ति शाखा की एकमात्र चर्चित कवयित्री मीराबाई है। मीरा के पूर्व लेखिकाएं थीं या नहीं इसकी प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। मीराबाई भक्ति में आत्मसमर्पण करने वाली पहली कवयित्री थीं। उनके पदों में भी भक्ति और प्रेम का समन्यव विद्यमान है। किन्तु अन्य जितने भी कवि हुए हैं उनसे अलग मीरा की सृजनात्मकता में कुछ खास तरह की विशेषताएँ मौजूद थीं, जिसके कारण उन्हें इस काव्यधारा में एक अलग स्थान प्राप्त हुआ है।
आदिकालीन साहित्य और समाज में स्त्री को उपभोग और शृंगार की वस्तु समझने की परंपरा प्रचलित थी, भक्तिकाल तक आते-आते पितृसत्ता का सर्वाधिक फैलाव होने लगा था और इसके साथ-साथ स्त्री के अधिकारों के ऊपर भी सीमाएँ लाँघी गई थीं। ऐसे एक समय और समाज में मीरा का आविर्भाव हुआ था। उनके सामने दो चुनौतियाँ थीं – एक ओर समाज में व्याप्त रूढ़ियाँ एवं प्रथाएँ तो दूसरी ओर पितृसत्ता का वर्चस्व। मीरा ने अपने वैयक्तिक जीवन में इन दोनों का विरोध किया है। इस समय के साहित्यिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मीरा के व्यक्तित्व के दो रूप उपलब्ध होते हैं – एक है कृष्ण की भक्ता के रूप में और दूसरी ओर एक क्रान्तिकारी नारी के रूप में। इन दोनों पक्षों पर विचार किए बिना मीरा की प्रासंगिकता को सिद्ध नहीं किया जा सकता।
मीरा का जन्म राजस्थान के राठौड राजकुल में हुआ था। उनकी जन्मतिथि और कुल के संबंध में विद्वानों के बीच कई मत-भेद प्रचलित हैं। स्व.श्री हरिनारायणजी पुरोहित ने मीरा की पदावली का संपादन करते हुए उनकी जन्मतिथि वि.सं 1555 निर्धारित की है। इस समय पूरे भारत में सती प्रथा प्रचलित थी, जिसके अनुसार पति की मृत्यु के बाद पत्नी को सती होकर अपना प्राण त्याग लेना है। मीरा की शादी 13-14 साल की उम्र में हुई थी, किन्तु इसके तुरंत बाद ही वे विधवा बन गई थीं। पति की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात उनके ऊपर इस प्रथा के पालन का दबाव आया, किन्तु उन्होंने पूर्ण रूप से इसका विरोध किया। मीरा कृष्ण की भक्ति में इतनी लीन हो गई थी कि वे कृष्ण को अपने पति समझती थीं। कई बार समाज की हंसी-मज़ाक का पात्र बनकर उन्हें अपमान सहना पड़ा, किन्तु उन्होंने अपनी शेष ज़िंदगी कृष्ण की सेवा में समर्पित की। मीरा को यहाँ सिर्फ एक भक्त तक सीमित करना उचित नहीं है। नारी को हर तरह से समाज के दोयम दर्जे की अधिकारी मानने वाले समाज में उन्होंने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। मीरा का संघर्ष कितना था, यह उनकी इन पंक्तियों में स्पष्ट हैं- “ पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे। लोग कहें मीरा भई रे बावरी, सास कहे कुलनासी रे।”¹ मीरा की जीवन-यात्रा पर संक्षिप्त रूप से प्रकाश डालते हुए कमला भसीन लिखती हैं - “मीराबाई ने अपनी ज़िन्दगी में हर कदम पर पुरुष प्रधान समाज के नारी विरोधी रीतिरिवाज़ों को चुनौती दी। उन्होंने इन शोषक बन्दिशों को तोड़ते हुए अपने लिए एक नई राह बनाई, जो उनके अपने मन के करीब थी। उस दौर और समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था मीराबाई की लगन और विश्वास को न हिला पाई।”²
मैनेजर पाण्डेय ने अपनी किताब भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य में मीरा की स्त्री दृष्टि और उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व की प्रशंसा की है। उनके शब्दों में - “स्त्री के बारे में मीरा का दृष्टिकोण बाकी भक्त कवियों से एकदम अलग है। उनकी कविता में एक ओर सामंती समाज में स्त्री की पराधीनता और यातना की अभिव्यक्ति है तो दूसरी ओर उस व्यवस्था के बंधनों का पूरी तरह से निषेध और उससे स्वतंत्रता के लिए दीवानगी की हद तक संघर्ष है। उस युग में स्त्री के लिए ऐसा संघर्ष कठिन था । लेकिन मीरा ने अपने स्वत्व की रक्षा के लिए कठिन संघर्ष किया।”³ उनके संघर्ष को रेखांकित करते हुए आगे वे लिखते हैं- “मीरा का जीवन और काव्य उस काल के अन्य भक्त कवियों की स्त्री-संबंधी मान्यताओं का प्रतिकार है और प्रत्युत्तर भी।”⁴
बच्चन सिंह ने अपने इतिहास ग्रंथ हिन्दी साहित्य का इतिहास में मीरा को संप्रदाय निरपेक्ष कवि की श्रेणी में रखा है। वे कहते हैं– “मीरा की लोकप्रियता का पहला कारण है ऊँचे राजकुल का त्याग करके साधुओं, संतों और भक्तों के बीच सामान्य जन के स्तर पर भक्तिभाव की अभिव्यक्ति, दूसरा कारण है - संप्रदाय निरपेक्षता और तीसरा कारण है - ऐसी भाषा का प्रयोग जो लोक-जीवन में रची-बसी थी।”⁵ उन्होंने मीरा की भक्ति और प्रेम को सामान्य- सा बताकर उसमें मौजूद स्वच्छंदता की सराहना की है।
मीरा का सृजन : परशुराम चतुर्वेदी ने अपनी किताब मीराँबाई की पदावली में उनकी कुछ रचनाओं का ज़िक्र किया है, इनमें ‘नरसीजी रो माहेरो’, ‘गीत गोविन्द की टीका’, ‘राग गोविन्द’, ‘सोरठ के पद’, ‘मीराबाई का मलार’, ‘गर्वागीत’ और ‘फुटकर पद’ आदि शामिल हैं। ‘नरसीजी रो माहेरो’ की प्रामाणिक प्रति उपलब्ध नहीं है, किन्तु जो अंश उपलब्ध हुआ है उसके आधार पर विद्वान यह निष्कर्ष निकालते हैं कि इसमें प्रश्नोत्तर रूप में पदों की प्रस्तुति हुई है। शीर्षक में दिया गया ‘मोहेरो’ राजस्थान की माहेरा प्रथा का सूचक है। इसकी कथा का संबंध कुछ विद्वान इस प्रथा से मानते हैं।
कुछ आलोचक ‘गीत गोविंद की टीका’ को मीरा की रचना मानने में असहमति जताते हैं। ‘राग गोविंद’ भी एक अनुपलब्ध कृति की कोटि में आने वाली रचना है। ‘सोरठ के पद’ की चर्चा करते हुए मिश्रबंधुओं ने इसे एक संग्रह माना है, जिसमें नामदेव और कबीर के कुछ पद भी शामिल हैं। ‘मीराबाई का मलार’ और ‘गार्वगीत’ से संबंधित प्रामाणिक जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हैं।
मीरा की रचनाओं में सर्वाधिक चर्चित कृति ‘फुटकर पद’ है। इसकी संख्या संबंधी सूचनाएँ अप्राप्य हैं। अप्रमाणिकता और असंदिग्धता के प्रश्न इस रचना को लेकर भी उठाये जाते हैं। इसके संबंध में परशुराम चतुर्वेदी लिखते हैं : “वास्तव में मीराँबाई के अनेक पदों को भी कबीर साहब आदि के पदों की भाँति ही, बहुत कुछ दुर्दशा हो गई है। जिस-जिस ने गाया है उसने उन्हें अपने रंग में राँगने की चेष्टा की है और, अपने-अपने विचारानुसार, मीरा के ढर्र पर कितने ही ऐसे स्वरचरित पद प्रचलित कर दिये हैं जो, बिना ध्यान पूर्वक देखभाल किये, मीरा रचित ही जान पड़ते हैं।”⁶
पदावली के केंद्र में कृष्ण भक्ति है। इसमें सूर और विद्यापति की शृंगारिकता के अतिरिक्त स्वच्छ और निर्मल प्रेम को प्रस्तुत किया गया है। यहाँ कृष्ण की सुदूरता में विरह का अनुभव करने वाली राधा का रूप धारण करके मीरा ने कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और उत्कृष्ट प्रेम का चित्रण किया है। उनकी पदावली की नायिका कृष्ण के आगमन के लिए प्रतिक्षारत विरहिणी नारी है। जो लौकिक सुख को त्याग कर कृष्ण में समर्पित है। भाव प्रधान ये पद माधुर्य भाव का उत्तम उदाहरण हैं। मीरा की पदावली में कुछ प्रार्थनाएँ भी शामिल हैं। इसका उदाहरण देखिए:-
“जागिए गिरधारीलाल, भक्तन हितकारी।
दासी हाजर खवास, कंचन ले झारी।।
सउच करो दन्तधावन, स्नान की तयारी।
वस्त्र और पुष्पमाल, तुलसी अति प्यारी।
रत्नजटित आभूषण, मुकुट लटक वारी।।
धूप दीप नैवेद्य, आरती संवारी।।
मीरां प्रभु विधि विधान, चरणान चित धारी।।”⁷
मीरा की भक्ति : भारत में मीरा के समय में भक्ति का प्रचार-प्रसार तीव्रगति से होने लगा था। उनके मन में कृष्ण के प्रति आस्था उत्पन्न करने में पारिवारिक माहौल का भी बड़ा योगदान रहा है। माँ की मृत्यु के बाद अपने पितामह की देख-रेख में रहने वाली मीरा के मन में भगवद कथा का प्रभाव पड़ा, इस प्रकार वे कृष्ण भक्ति में डूब गई और अंत तक यही स्थिति बनी रही । बाल्यावस्था में वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने के पश्चात भी मीरा का आकर्षण और आराध्य कृष्ण ही थे। स्व. श्री हरिनारायणजी पुरोहित द्वारा संपादित मीरां बृहत्पदावली के संपादकीय में डॉ.पद्मधर पाठक लिखते हैं - “मीरां के पदों को पढ़ते समय इसी बात का अनुभव होता है, चाहे उसका शृंगार हो या विरह, भक्ति हो या मुक्ति, वह कृष्णमय हो गयी है - सारा संसार उसे कृष्णमय दिखाई देता है- उसके श्वास में और उच्छवास में,रोम - रोम में, हर काम - काज में कृष्ण-ही-कृष्ण है।”⁸
मीरा की आध्यात्मिक भक्ति माधुर्य भाव (मधुर रस) से ओतप्रोत है, जिसमें सहजता और सरलता जैसे गुण निहित हैं। डॉ. शिवकुमार शर्मा ने अपनी पुस्तक हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ में इस प्रकार लिखा है : “सूर ने अपनी माधुर्य-भाव की भक्ति में गोपी और राधा के माध्यम से कृष्ण सान्निध्य प्राप्त करना चाहा है पर मीरा स्वयं राधा बन गई। उनके सांवलिया और उनमें कोई दुराव एवं छिपाव नहीं है। मीरा ने प्रेम के अत्यंत प्रवीण एवं अनुभूतिमय चित्र उतारे हैं। उनके पदों में वियोगजन्य दु:ख को नापना कोई सुगम नहीं है। उनमें मिलन, उत्सुकता, आशा और प्रतीक्षा से संबंध पद सभी अनुपम हैं।”⁹
गेयता की दृष्टि से भी मीरा के पदों को प्रासंगिक माना जा सकता है। मीरा कहती हैं कि कृष्ण मेरे जीवन का आधार हैं, उनके बिना यह संसार निरर्थक है –
“हरि मोरे जीवन प्रान अधार।।
और आसिरो नाहीं तुम बिन, तीनँ लोक मँझार।
आप बिना मोहि कछु न मुहावै, निरख्यौ सब संसार।
मीर्ग कहै मैं दास गवरी, दीज्यौ मनी बिसार।।”¹⁰
स्वयं को दासी घोषित करती हुई वे कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को इस प्रकार दर्शाती हैं -
“बसो मोरे नैनन में नंदलाल ।। टेक ।।
मोहनी मूरति सांवरी सूरति, नैणा बने बिसाल।
अधर सुधारस मुरली राजति, उर बैजंती माल।
छुद्र घंटिका कटि नट सोभित, नूपुर सबद रसाल।
मीरो प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाल।।”¹¹
मात्र भक्ति ही नहीं बल्कि प्रेम प्रसंग भी मीरा की पदावली में शामिल है, प्रेमपूर्ण पद के लिए एक उदाहरण इस प्रकार है :-
“कैसी जादू डारी, (अब) तूने, कैसी जादू डारी।
मोर मुकुट पीतांबर सोभे, कुण्डल की छबि न्यारी।।
वृन्दावन की कुंजगलिन में, लूटी ग्वालन सारी।।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, चरणकमल बलिहारी।।”¹²
आदिकाल में विद्यापति ने भी कृष्ण और राधा के प्रेम के द्वारा भक्ति का उद्घाटन किया था। कृष्ण के वियोग में दु:खी राधा को उन्होंने इस प्रकार प्रस्तुत किया था –
“की लागि कौतुक देखलहूँ सखि, निमिष लोचन आध।
मोर मन-मृग मरम बेधल, बिशम-बान बेआध।।
गोरस बिरस बासी बिसेखल, छिकहि छाड़ल गेह।
मुरलि निसान मो मन मोहल, बिकहु भेल संदेह।
तीर तरंगिनि कदंब-कानन, निकट जमुना घाट।
उलटि हेरइत बिपथ जाइत, चरन चीरग काँट।।
सुकृत सुफल सुनह सुंदरि, विद्यापति भन सार।
कंसदलन गोपाल सुंदर, मिलल नंद कुमार।।”¹³
मीरा की पदावली में ऐसी अनेक पंक्तियाँ समाहित हैं जिसमें वे अपने आराध्य कृष्ण के प्रति भक्तिपूर्ण प्रेम को दर्शाती हैं और उनसे मिलन की आकांक्षा रखती है।
एक प्रसंग इस प्रकार है - मीरा अपने गिरिधर गोपाल की प्रतीक्षा में राह देख रही हैं। वे अपने आपको कृष्ण के चरणों में समर्पित किया हैं। किन्तु कृष्ण अभी तक न आए, ऐसे में राधा के द्वारा मीरा ने अपनी विरह की पीड़ा को इस प्रकार प्रस्तुत किया है –
“आली रे मेरे नैणाँ वाण पड़ी ।। टेक ।।
चित्त चढ़ी मेरे माधुरी मूरत, उर बिच आन अड़ी।
कब की ठाढी पथ निहारूँ, अपने भवन खड़ी।
कैसे प्राण पिया बिनि राखूँ, जीवन मूर जड़ी।
मीराँ गिरधर हाथ बिकानी, लोग कहै बिगड़ी।।”¹⁴
प्रेम में विरह होना स्वाभाविक है। मीरा के पदों में संयोग से अधिक वियोग की अधिकता है। परशुराम चतुर्वेदी ने इसके कारण खोजते हुए यह प्रमाणित किया कि उनकी जीवन परिस्थितियों का प्रभाव उनकी लेखनी पर भी पड़ा है। बचपन में माँ और पिता की मृत्यु, विवाह के पश्चात पति की मृत्यु आदि आकस्मिक घटनाएँ मीरा के मन में जीवन के प्रति विरक्ति पैदा की थी। वे खुद लिखती हैं :-
“अब तो मेरा राम नाम, दूसरा न कोई (टेर)
माता छोड़ी पिता छोड़े, छोड़े सगा भाई।
साधु संग बैठ-बैठ, लोकलाज खोई।।”¹⁵
मीरा ने अपने इष्टदेव को ‘प्रभु’, ‘गिरिधर गोपाल’ और ‘हरि’ जैसे अनेक नामों से संबोधित किया है। उन्होंने गिरिधर गोपाल की पूजा और अर्चना के साथ-साथ अपने कुल की रीति और अनीतियों का उल्लंघन कर मंदिर में जाना और कृष्ण भक्ति में लीन होकर नाचना शुरू किया था। उस समय विधवा स्त्री के लिए ये सब वर्जित थे। इसकी अनेक आलोचनाएँ हुई थीं किन्तु मीरा उसके सामने हार न मानी।
मीरा के पद संगीतात्मकता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कोमल शब्दों के साथ ही उसकी लयात्मकता पर भी विशेष ध्यान दिया है। जिसके कारण गेयता उसमें स्वाभाविक रूप धारण करती हुई जन मानस के हृदय को स्पर्श करती है। मीरा के कोमल पदों में आकांक्षा, उत्कंठा, मनस्ताप, प्रेम की दृढ़ता, विनय, मिलन-लालसा, विरह और कृष्ण की लीलाओं का वर्णन आदि से संबंधित फुटकल पद शामिल हैं। कृष्ण की अनुपस्थिति में उत्पन्न वेदना को उन्होंने इस प्रकार प्रस्तुत किया है–
“हे ओ सहिया ! हरि मन काठ कियो । (टेर)
आवन कह गयो, अजहूं न आयो, करि करि वचन गायो।।
खानपान सुधबुध सब विसरा, कैसे करन जियो।।
बचन तुम्हारे तू ही बिसारो, मन मेरो हर लियो।।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, तुम बिन फटत हियो।।”¹⁶
मीरा कृष्ण के वियोग में जिस पीड़ा का अनुभव कर रही हैं जो पति से बिछुडकर रहने वाली स्त्री की भाँति है, इसलिए बच्चन सिंह ने मीरा के प्रेम और भक्ति को पारिवारिक जीवन के साथ जोड़ा है। वे अपनी सखी से बार-बार पूछती हैं :
“हे मेरो मन मोहना, आयो नहीं सखी री।
कै कहुं काज किया संतन का, कै कहुं गैल भुलावना।।
कहा करूँ किट जाऊण मोरी सजनी, लाग्यो है विरह सतावना।।
मीरा दासी दरसण प्यासी, हरि चरणा चित लावना।।”¹⁷
शुक्ल जी ने अपने इतिहास ग्रंथ में मीरा और उनकी काव्य प्रवृत्तियों का संक्षिप्त उल्लेख दिया है। वे मीरा के वैयक्तिक जीवन पर एक परिच्छेद में प्रकाश डालते हुए उनकी काव्य रचना में सूफी दर्शन के प्रभाव का आरोप लगाते हैं और उसे मीरा के काव्य में निहित रहस्यवादी भावना के साथ जोड़ते हैं । शुक्ल जी ने यह कह कर भक्तिकालीन साहित्य में मीरा का स्थान सीमित किया था कि –“मीराबाई का नाम भारत के प्रधान भक्तों में है और इनका गुणगान नाभाजी, ध्रुवदास, व्यासजी, मलूकदास आदि सब भक्तों ने किया है। इनके पद कुछ तो राजस्थानी मिश्रित भाषा में हैं और कुछ विशुद्ध साहित्यिक वृजभाषा में। पर सबमें प्रेम की तल्लीनता समान रूप से पाई जाती है।”¹⁸ इस प्रसंग में शुक्ल जी ने मीरा की प्रेमाभिव्यक्ति पर बल देकर उनके व्यक्तित्व को परिसीमित किया गया है। पितृसत्ता और सामंतवादी वातावरण में एक स्त्री होकर मीरा को जिस संघर्ष का सामना करना पड़ा और उनके सामने आने वाले बंधनों के विरुद्ध प्रतिरोध करते हुए समाज में स्त्री जागरण की जिस नवीन चेतना का प्रसार उन्होंने किया उसे शुक्ल जी ने अनदेखा किया है। वहीं सूरदास की कल्पना की प्रशंसा करते हुए वे लिखते हैं : “बाललीला और प्रेमलीला दोनों के अंतर्गत कुछ दूर तक चलने वाले न जाने कितने छोटे छोटे मनोरंजक वृत्तों की कल्पना सूर ने की है। जीवन के एक क्षेत्र के भीतर कथावस्तु की यह रमणीय कल्पना ध्यान देने योग्य है।”¹⁹ यहाँ शुक्ल जी ने मीरा के कांतिकारी व्यक्तित्व की उपेक्षा की है। आगे चलकर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने इतिहास ग्रंथ में मीरा के पदों की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं : “मीराबाई के पदों में अपूर्व भाव-विह्वलता और आत्म-समर्पण का भाव है। इनके माधुर्य ने हिंदी-भाषी क्षेत्र के बाहर के भी सहृदयों को आकृष्ट और प्रभावित किया है। माधुर्यभाव के अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेमनिवेदन और विरह-व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यन्तरित नहीं, बल्कि सहज और साक्षात संबंधित है। इसलिए इन पदों में जिस श्रेणी की अनुभूति प्राप्त होती है वह अन्यत्र दुर्लभ है।”²⁰ द्विवेदी जी ने भी अपने ग्रंथ में मीरा के जीवन संघर्षों का यथावत संकेत न करके सिर्फ उनकी भावाभिव्यक्ति की प्रशंसा तक अपने शब्दों को सीमित किया है।
मीरा की काव्य-भाषा बृज थी। बृज भाषा का माधुर्य और उसमें निर्मल प्रेम का संयोग दोनों ही उनकी पदावली की श्रेष्ठता के मूल कारण हैं। सरल भाषा में अर्थाभिव्यक्ति को मीरा ने प्राथमिकता दी थी, जिसके कारण उनकी प्रत्येक पंक्ति चमत्कृत करने वाली है। मीरा की काव्यभाषा की आलोचना करते हुए रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं :- “मीरां की काव्यभाषा में सर्जनात्मक क्षमता कम है। सूर या तुलसी जैसा भाषा का कुशल प्रयोग नहीं दिखाई देता। यहाँ लोकगीतों की तरह सीधी अभिव्यक्ति पर बल है, लाक्षणिक प्रयोग बीच-बीच में जहाँ-तहाँ भले मिल जाएँ। नारी होने के कारण मीरां की तन्मयता और विरह-भावना कुछ अपने-आप से प्रामाणिक लगती है, उनके पदों का भाषिक गठन उतना सशक्त नहीं है।”²¹ यह चतुर्वेदी जी की अपनी दृष्टि है, किन्तु काव्य भाषा की सरलता ही काव्य की उत्तमता का सूचक है।
तुलसी ने श्रीरामचरितमानस के सप्तम सोपान या उत्तरकाण्ड में भरत विलाप का चित्रण इस प्रकार किया है :-
“राम बिरह महँ भरत मगन मन होत।
बिप्ररूप धरि पवन सुत आइ गएउ जनु पोत।।
बैठे देखि कुसासन जटामुकुट कृस गात।
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात।।”²²
मीरा के एक ओर प्रसंग देखिए, जहाँ वियोगावस्था को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है :-
“आवो मनमोहनाजी,जोऊँ थारी बाट (टेर)
खान पान मोहि नेक न भावे, नैणा न लगे कपाट।।
तुम आयां बिन सुख नहिं मेरे, दिल में बहोत उचाट।।
मीरां कहे मैं भई रावरी, छाँडो नाहि निराट।।”²³
इन दोनों पंक्तियों में विरह की स्थिति का वर्णन है, दोनों कवियों ने अपने - अपने ढंग से अपनी विरहानुभूति को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। जहाँ मीरा के पदों में स्वान्त: सुखाय की अधिकता है, वहाँ तुलसी ने भरत के द्वारा ईश्वर से बिछुड़ कर रहने वाले भक्तों के दु:ख को दर्शाकर ‘बहुजन हिताय या बहुजन सुखाय ’ की बात की है। किन्तु भाव की अभिव्यंजना की दृष्टि से दोनों पंक्तियाँ महत्वपूर्ण हैं। अतः सरलता और भाव प्रधानता काव्य की श्रेष्ठता को सिद्ध करती हैं।
मीरा एक प्रतिष्ठित उच्चकुल की नारी थी । उनके सामने अपने परिवार के वैभव और समृद्धि थी, किन्तु मीरा का सम्पूर्ण जीवन कृष्ण की उपासना के लिए समर्पित था। इसलिए उन्होंने लीक से हटकर चलने का निर्णय लिया और अपने साहसी व्यक्तित्व के माध्यम से कृष्ण भक्ति को एक अन्य धरातल पर पहुंचाई, जिसकी स्मृति हेतु उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में मीरा के भजन गाये जाते हैं। मीरा के प्रति उस समय के समाज में जो उपेक्षा प्रचलित थी उसी प्रकार उनकी रचनाओं को भी साहित्यकारों और आलोचकों ने ज़्यादा महत्व नहीं दिया है। उनकी रचनाओं की अनुपलब्धि का मुख्य कारण यह उपेक्षा दृष्टि है। भक्तिकालीन समाज में स्त्री की भूमिका क्या थी यह मीरा के जीवनवृत्त से स्पष्ट हो जाती है । ऐसे एक संघर्षपूर्ण क्षणों में अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली मीरा हर समय में प्रासंगिक है।
संदर्भ ग्रंथ सूची;
- मीराबाई - कमला भसीन - भारत ज्ञान विज्ञान समिति, नई दिल्ली-110017, पृ.सं. 11
- वही,पृ.सं. 1
- भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य - मैनेजर पांडेय, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 27
- वही- पृ.सं. 27
- हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास - बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली-110002, पृ.सं. 135
- मीराँबाई की पदावली - परशुराम चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृ.सं. 15
- वही, पृ.सं. 68
- मीरा बृहत्पदावली (प्रथम भाग) – स्व. श्री हरिनारायणजी पुरोहित (सं),राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, संपादकीय से
- हिंदी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ, डॉ. शिवकुमार शर्मा, अशोक प्रकाशन, दिल्ली-6, पृ. सं. 301
- मीराँबाई की पदावली-परशुराम चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृ.सं. 2
- वही,पृ.सं. 2
- मीरा बृहत्पदावली (प्रथम भाग) – स्व. श्री हरिनारायणजी पुरोहित (सं), राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, पृ.सं. 45
- विद्यापति पदावली-रामवृक्ष बेनीपुरी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज-211 001,पृ.सं. 55
- मीराँबाई की पदावली-परशुराम चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग,पृ.सं. 5
- मीरा बृहत्पदावली (प्रथम भाग) – स्व. श्री हरिनारायणजी पुरोहित (सं),राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, पृ.सं. 4
- वहीं, पृ.सं. 279
- वहीं, पृ.सं. 279
- हिंदी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, अनन्य प्रकाशन,दिल्ली-110031, पृ.162
- वही, पृ.सं. 151-152
- हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास-हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली-110002, पृ.सं. 112
- हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास-रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-211001,।पृ.सं. 52
- श्रीरामचरितमानस-उत्तरकाण्ड-योगेंद्र प्रताप सिंह, सपना अशोक प्रकाशन, वाराणसी-221005, पृ.सं. 50
- मीरा बृहत्पदावली (प्रथम भाग) – स्व. श्री हरिनारायणजी पुरोहित (सं), राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, पृ.सं. 16
निष्कर्ष; मीराबाई का जीवन भक्ति, प्रेम और संघर्ष का अद्भुत संगम है। उन्होंने न केवल कृष्ण भक्ति को नई ऊँचाई दी, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों और पितृसत्ता के विरुद्ध साहसिक प्रतिरोध भी किया। उनकी काव्यधारा सरल, भावपूर्ण और जनसामान्य से जुड़ी हुई है, जो आज भी प्रेरणा प्रदान करती है। इस प्रकार मीरा एक भक्त कवयित्री के साथ-साथ एक क्रांतिकारी नारी के रूप में सदैव प्रासंगिक बनी रहती हैं।
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