रचना और आलोचना के रिश्ते: अपनी बात | बी. एल. आच्छा

Dr. Mulla Adam Ali
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This brief introduction presents the core ideas from “Rachna aur Alochana ke Rishte” by B. L. Achha, highlighting the dynamic relationship between creation and criticism. It reflects on literary freedom, reader engagement, and the evolving role of critical perspectives in understanding contemporary literature.

Rachana Aur Aalochana Ke Riste Book by B.L. Aachha

rachna aur alochana ke rishte

यह लेख बी. एल. आच्छा की नई कृति ‘रचना और आलोचना के रिश्ते’ से लिया गया है, जिसमें लेखक ने साहित्य, आलोचना और पाठक के बीच संवादात्मक संबंध को गहराई से समझाया है। यह “अपनी बात” न केवल पुस्तक की भूमिका है, बल्कि समकालीन साहित्यिक चिंतन की दिशा को भी स्पष्ट करती है—जहाँ रचना की स्वायत्तता, विचारधाराओं की भूमिका और बदलते सौंदर्यबोध पर गंभीर विमर्श उपस्थित है।

रचना और आलोचना के रिश्ते

अपनी बात

      एक निबंध में मैंने 'चित्रलेखा' के रत्नांबर को उद्‌धृत किया है। उपन्यास के समापन की पंक्तियों में कहा गया है- "यह मेरा मत है, तुम इससे सहमत हो या न हो, मैं तुम्हें बाध्य नहीं करता, न कर सकता हूं।" रचना, लेखक और पाठक के बीच यह पंक्ति 'पाठकीय लोकतंत्र 'का खुला आसमान रच जाती है। यह सही है कि रचना की अंतर्ध्वनि और प्रतिध्वनि को हर कोण से समझा जाए। इसमें आलोचना की भूमिका महत्वपूर्ण है।शास्त्रीय आलोचना की शताब्दियाँ चिंतनरत रही हैं। पाश्चात्य आलोचना के सरोकार भी सहकारी रहे हैं। परन्तु रचना को परखने में विचारधाराओं से अनुप्राणित आलोचना के सरोकार भी मुखर रहे। उनकी खेमेबाजी और समकालीन परिदृश्य में आलोचना का मैत्री भाव भी छुपी बातें नहीं है।

    बात यह भी है कि शास्त्रीय आलोचना का कोई सार्वकालिक पथ नहीं है। नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा के बदलते रूपों के स्पष्ट संकेत और सौंदर्य दृष्टि के प्रतिमान की खुली राह है। कालिदास ने तो इसीलिए साहित्य को प्रयोग विज्ञान कहा है। साहित्येतर प्रतिमानों और ज्ञान धाराओं ने रचना की स्वायत्तता के बजाय समाज सापेक्षता पर बल दिया गया है। इसके समांतर रचना और भाषा के वस्तुगत आधार पर रचना को समझने की दृष्टि भी महत्वपूर्ण रही है। रामचन्द्र शुक्ल ने फ्रायड, क्रोचे, एवरक्रॉम्बी, इलियट, रिचर्ड्स आदि की अवधारणाओं को यथासंभव भारतीय अलोचना से जोड़ा, पर उन्हें हावी नहीं होने दिया।इस दिशा में शुक्लोत्तर आलोचना भी समाजशास्त्रीय प्रतिमानों और सांस्कृतिक अवधारणाओं को मुखर करती रही ।

      आज रचना के अंतर्लोक, उसकी प्रतिध्वनि और संप्रेषण के सौंदर्य को समझने के लिए जरूरी है कि सामाजिक सरोकारों और बुनावट को रचना के भीतर से समझा जाए। उन परिवर्तनों को, विधागत संरचना में बदलाव, वैचारिक विमर्श को रेखांकित किया जाए, जो समकालीन सृजन में केंद्रीय है। पिछली पीढ़ियों के सृजन को अतिक्रांत करता है। वे भले ही विचारधाराओं से प्रभावित रचनाएँ रही हों, पर उनका विचारधारा के गत्यात्मक और समय सापेक्ष स्वरूप को अभिव्यक्त करने में क्या योगदान रहा है? बात विचारधाराओं के प्रवेश-निषेध की नहीं है, उनके गत्यात्मक समय सापेक्ष अवदान की है। मैं इस बात का पक्षपाती रहा कि विचाराधाराएँ हमारे नेपथ्य में हों और सृजन-मूल्यांकन में विचारधारा का अनुवर्ती बनने के बजाय समयानुकूल जोड़ें या घटाएँ, ताकि वे नवनवीन बनी रहें।

    इसीतरह विधागत स्वरूप में भी अंतर आया है। प्रबंध काव्य की सर्ग और छंद‌बद्धता आज मुक्त होकर गद्याभासी या गद्यब्रांड रूप में प्रकाशित हो रही हैं। उपन्यासों में मनोविश्लेषण की एन्द्रजालिकता के बजाय समाज - मनोविज्ञान का यथार्थ उसके मूल में है। विमर्शों में भी यह यात्रा प्रेमचन्द के होरी-धनिया से लेकर चित्रा मुद्गल के उपन्यास 'नाला सोपारा पोस्ट बॉक्स 203'की किन्नर- कथा तक आई है। ऐतिहासिक यथार्थवाद के नये कथा- पाठ भी रचे गये हैं।इसी कारण रेणु, अज्ञेय से लेकर समकाल तक कितनी शैलियों का विकास हुआ है।और यह सब प्रत्येक विधा में दिखाई देता है। कथाकथन हो या कविता, वे नाट्य और विज्युअल से असरदार बने हैं। कविता में लय नहीं है, पर संरचनागत पुनरावृत्ति में दोष के बजाय अर्थ का संघनन गुण बन गया है। हर विधा में अन्य विधाओं का पारस्परिक संक्रमण दिखाई देता है। नये फूलों- फलों-रंगों और स्वादों के लिए पौधों की ग्राफ्टिंग की तरह साहित्य विधाओं में ये प्रयोग साकार हो रहे हैं। इसीलिए शब्द- सहचार, आंचलिक - वैदेशिक- तत्समीय मिश्रण से कैसे व्यंजना-बोध और उसकी प्रभावकता को विश्लेषित करने की जरूरत है। काव्य शास्त्र के वक्रोक्ति संप्रदाय का ही नहीं अन्य संप्रदायों का उन्मुखीकरण जरूरी है।

प्रतिकार की ध्वनियों के साथ करुणा के संरक्षण- बोध की मानवीय पुकार की प्रत्यग्रता को रेखांकित करना जरूरी है, अन्यथा मनुष्यता और विमर्श को केवल नारावादी सोच ही मिलता रहेगा।

   संकलित निबंध किसी न किसी रूप से आलोचना और रचना के रिश्तों को ही व्यावहारिक धरातल पर रखते हैं। कोशिश रही है कि लक्ष्य कृति हो, उसकी संरचना हो, उसकी भाषा हो, भाषा-संस्चना से उद्रिक्त अर्थध्वनि का क्षेत्रफल हो, उसके सामाजिक सरोकार हों, लेखक और रचना की विशिष्टता हो, रचना के अंतर्लोक में समकालीन रचनाओं की विशिष्टता का आकलन हो। हर विधा में युगीन प्रवृत्ति लक्षित की जाए।लेखक की उस शक्तिमत्ता को पहचान मिले, जो उसे हस्ताक्षर बनाती है।

 इस पुस्तक को आकार देने में मेरे व्यंग्यकार मित्र डॉ.हरीशकुमार सिंह का सहयोग उल्लेखनीय है। अपने विद्यार्थी -डॉ. अंशु जोशी (सहायक प्राध्यापक, जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय, दिल्ली), श्री सचिन तिवारी (चयनित सहा प्राध्यापक,लो. से. आयोग, म.प्र.) और हिंदी प्रेमी डॉ. मुल्ला आदम अली को याद करना प्रीतिकर लग रहा है। चेन्नई में एक दशक में आत्मीय संवाद बना है- दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नई की कुलपति डॉ. राधिका, कुलसचिव डॉ मंजूनाथ, डॉ. नीरजा गोर्रमकुंडा, डॉ. संतोषी से बहुत सहयोग मिला। मद्रास विश्वविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अन्नपूर्णा चिट्टी एवं अन्य महाविद्यालयों के डॉ. पद्मावती, डॉ . मंजू रुस्तगी, डॉ. स्वाति पालीवाल, डॉ. मनोज सिंह, डॉ. मनोज द्विवेदी, डॉ. लावण्या, डॉ. हर्षलता आदि से इन विषयों पर संवाद होता रहा है।

   इंडिया इंटरनेट बुक्स संस्थान के निदेशक डॉ संजीवकुमार का आभार।सहयोगी श्री विनय माथुर को भी धन्यवाद । 'कृति की राह से' पुस्तक के बाद इस पुस्तक का प्रकाशन भी इन्हीं के सहकार से। उम्मीद करता हूं कि हिंदी आलोचना के सुधी पाठकों का स्नेह मिलेगा ।

- बी. एल. आच्छा

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