बाल साहित्य की पहचान के लिए एक जरूरी नाम : डॉ. शकुंतला कालरा

Dr. Mulla Adam Ali
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Dr. Shakuntala Kalra is a well-known name in Hindi children's literature. Through her creative writing, reviews, and interviews with renowned children's writers, she has made a significant contribution to the field of बाल साहित्य. This article by Pratap Sehgal highlights her literary journey, vision, and contribution to children's plays and literature.

Dr. Shakuntala Kalra: A Significant Name in Hindi Children’s Literature and Her Literary Contribution

डॉ. शकुंतला कालरा : हिंदी बाल साहित्य की सशक्त पहचान और साहित्यिक अवदान

हिंदी बाल साहित्य के क्षेत्र में डॉ. शकुंतला कालरा का नाम सृजन, आलोचना और बाल-साहित्य के गंभीर अध्ययन के लिए विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। प्रस्तुत लेख में वरिष्ठ साहित्यकार प्रताप सहगल ने डॉ. शकुंतला कालरा के व्यक्तित्व, उनके बाल साहित्य के प्रति समर्पण तथा विशेष रूप से उनके बाल-नाटकों की साहित्यिक दृष्टि और महत्ता का आत्मीय एवं विश्लेषणात्मक परिचय दिया है। यह लेख न केवल एक साहित्यकार के रचनात्मक अवदान का मूल्यांकन करता है, बल्कि हिंदी बाल साहित्य की दिशा, चुनौतियों और संभावनाओं पर भी सार्थक विचार प्रस्तुत करता है। बाल साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों, शिक्षकों और साहित्य-प्रेमियों के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय आलेख है।

बाल साहित्य की पहचान के लिए एक जरूरी नाम

डॉ. शकुंतला कालरा

डॉ. शकुंतला कालरा तब तक मेरे लिए एक अपरिचित नाम था। यह बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक की शुरुआत के किसी साल का कोई दिन था। मेरे मित्र डा रत्नलाल शर्मा सेवा-निवृत्त हो चुके थे और पढ़ने लिखने के लिए नित दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फ़ैकल्टी के सामने वाली लायब्रेरी में आ जाते। वहीं उनकी बैठकी होती और नए-नए रिसर्च-स्कालर का मार्ग-दर्शन करते रहते। रोज़ तो नहीं लेकिन कभी-कभी कुछ किताबें लेने या लौटाने के लिए उसी पुस्तकालय जाया करता था। जाने का अर्थ था अपने इस मित्र के साथ कुछ समय बिताना, दो-एक गिलास चाय पीना और गपियाना।

लायब्रेरी के सामने ही एक लान था। सरदी की गुनगुनी धूप में वहाँ बैठना बहुत अच्छा लगता। मुझे याद है कि उसी परिसर में एक दिन एक साँवली सी महिला आईं। रत्नलाल शर्मा ने उनसे मेरा परिचय करवाया तो पता चला कि उन मोहतरमा का नाम शकुंतला कालरा है और बाल-साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी है। वह न केवल बाल-कहानियाँ लिखती हैं, बाल-साहित्य में हो रहे लेखन की परख भी करती रहती हैं। कुछ देर बातें चलीं और हम लोग अपने-अपने रास्ते। कभी-कभी किसी गोष्ठी आदि में शकुंतला कालरा से मिलना होता रहा लेकिन कभी भी आत्मीय संबंध नहीं बने। शकुंतला जी की छवि मेरे मन में बहुत ही मृदु-भाषी और निहायत तहज़ीब-याफ़्ता महिला की बन चुकी थी। लेकिन अभी भी कभी लंबी साहित्यिक बातें नहीं हो पाईं। हमें एक-दूसरे के बारे में या तो रत्नलाल शर्मा के माध्यम से या फिर हमारी किताबों के माध्यम से ही पता चलता। बाल-साहित्य के प्रति मेरा रुझान ज़रूर था लेकिन अभी भी इस दिशा में कुछ विशेष काम नहीं किया था।

समय फ़िसलता गया। हम एक दूसरे की दृष्टि से ओझल हो गए लेकिन संभवत: मानसिक उपस्थिति बनी रही। बाल साहित्य पर शकुंतला जी की टिप्पणियाँ, समीक्षाएँ और बाल-साहित्यकारों से लिए गए उनके साक्षात्कार पढ़ता रहता। इस बीच मेरी अन्य विधाओं की पुस्तकों के साथ-साथ बाल साहित्य पर पुस्तकें आना शुरू हो गईं। इससे पहले मेरी कुछ कहानियाँ नंदन, जिसका श्रेय मैं भाई देवेन्द्र कुमार को देता हूँ और पराग में नाटक प्रकाशित होने लगे। शकुंतला कालरा यह सब नोटिस करती रहती थीं। जब भी वह मिलतीं, मेरी किसी प्रकाशित रचना का ज़िक्र ज़रूर करतीं। मैं उनके जैसा बाल-साहित्य का सतर्क पाठक नहीं था। पराग में प्रकाशित बाल-नाटक विशेषांक में प्रकाशित मेरे नाटक नकली दीवार ने मुझे बहुत ख्याति दी। एक सर्वे के अनुसार पहले दो पसंद किए जाने वाले नाटकों में विष्णु प्रभाकर और मेरा नाटक ही थे।

एक दिन शकुंतला कालरा की एक किताब मुझे मिली। यह बाल-साहित्यकारों से लिए गए साक्षात्कारों की किताब थी। पढ़ा तो लगा कि बाल-साहित्य को समझने के लिए यह एक ज़रूरी किताब है। उसके बाद शकुंतला जी मुझे किसी गोष्ठी में मिलीं तो उस पुस्तक की प्रशंसा के साथ-साथ अपनी शिकायत भी दर्ज कर दी कि आपने मुझे याद नहीं किया। शकुंतला जी ने भी इस बात को रेखांकित करते हुए कहा कि हाँ यह चूक तो हुई है लेकिन अभी और अवसर आएँगे। मुझे आपसे बाल-साहित्य विशेषत: नाटकों को लेकर लंबी बात करनी है। और इस तरह से बातों का सिलसिला शुरु हुआ तो विस्तार पाता गया। मेरे जितने भी साक्षात्कार लिए गए हैं, शकुंतला कालरा का लिया हुआ साक्षात्कार सबसे लंबा और उसी अनुपात में गहरा भी है। वे जानती थीं कि मैं अनेक विधाओं में लिखता हूँ। उन्होंने सब नहीं तो काफी-कुछ पढ़ा हुआ था। इस साक्षात्कार से ही मुझे उनकी अंर्तदृष्टि का पता चला। यह साक्षात्कार आमने-सामने बैठकर लिया गया साक्षात्कार नहीं है। उन्होंने मुझे कुछ प्रश्न भेजे, जिनका मैंने जवाब कंप्यूटर पर ही लिखकर उन्हें भेज दिया। यहाँ से यात्रा आगे बढ़ती है। वे उन उत्तरों को ज्यों का त्यों ही स्वीकार न करके कुछ प्रतिप्रश्न भेजती हैं, जिनका जवाब मैं देता जाता हूँ। इस तरह से यह साक्षात्कार विस्तार पाता जाता है लेकिन यही विस्तार इसे कई आयाम भी देता है। मेरे लेखन के बहुत से कोने खुलते चले जाते हैं। वह मेरे जीवन से भी जुड़ता हुआ लेखन की प्रामाणिकता को पुख़्ता करता जाता है। मुझे उनका साक्षात्कार लेने का यह तरीका मर्मभेदी लगा। इसी तरह से उन्होंने अन्य लेखकों के भी साक्षात्कार लिए होंगे। एक लेखक का साक्षात्कार कैसे लिया जाए, उसके लिए शकुंतला कालरा द्वारा लिए गए साक्षात्कार मानक हैं। नाटक, नाटक की संरचना, नाटक और बाल-नाटक आदि में अंतर, बाल-नाटकों एवं बाल रंगमंच की दशा और दिशा, कठिनाइयाँ और संभावनाएँ आदि शायद ही कोई पक्ष छूटा हो, जिसके बारे में उन्होंने मुझे न घेरा हो। इसी के साथ-साथ समकालीन नाटकों का संसार, बाल-साहित्य की ज़रूरत, उसकी पहचान, उसकी मुश्किलें, अंतरराष्ट्रीय बाल साहित्य के बरक़्स हिन्दी बाल-साहित्य आदि अनेक विषयों पर यहाँ चर्चा हुई है। मेरे अन्य लेखन के बारे में भी। यानी कह सकता हूँ कि शकुंतला कालरा अगर आपसे बात कर रही हैं तो आपको तब तक वे छोड़ेंगी नहीं, जब तक वे आपको सृजनात्मक और मानसिक स्तर पर अच्छी तरह से निचोड़ नहीं लेती।

पिछले दिनों शकुंतला जी मुझे यह बताकर चौंका दिया उन्होंने कुछ बाल-नाटक लिखें हैं और वे चाहती हैं कि उन नाटकों को पढ़कर मैं न केवल अपनी राय बताऊँ, पुस्तक रूप में प्रकाशित होने से पूर्व उसकी भूमिका भी लिख दूँ। नाटक मैंने पढ़े और उनसे लंबी बातें भी कीं और उनपर लिखा भी। चाहता हूँ वह भी इस आलेख के साथ दर्ज कर दूँ ताकि शकुंतला जी के इस पक्ष के बारे में भी आप बेहतर तरीके से जान सकें।

Dr. Shakuntala Kalra Hindi Children's Literature Author

शकुंतला कालरा के तीन बाल नाटक

बेशक हिन्दी में अच्छे बाल-साहित्य की बहुत कमी है। कविताएँ, कहानी तो फिर भी मिल जाती हैं लेकिन नाटक खोज-खोजकर ही मिल पाते हैं, जबकि नाटक ही ऐसी विधा है, जिनके साथ बच्चों का सीधा रिश्ता जुड़ पाता है। नाटक पढ़े भी जाते हैं और खेले भी। नाटक खेलने का अर्थ होता है बच्चों का मानसिक, शारीरिक एवं सांस्कृतिक विकास। इसी विकास-यात्रा में वे बहुत कुछ सीख जाते हैं। नाटक भाषण नहीं है। नाटक इकतरफा आलाप भी नहीं है। नाटक एक संवाद है। संवाद करते हुए ही बहुत कुछ सीख जाना नाटक है। नाटक केवल संवाद भी नहीं है। नाटक एक सामूहिक कलात्मक खेल भी है। खेल-खेल में ही व्यक्तित्व का निर्माण हो जाना नाटक है। बहुत सी कलाओं से एक साथ रिश्ता जुड़ जाना ही नाटक है। बच्चे जब नाटक खेलते हैं तो उनके अंदर अनजाने ही बहुत सारे परिवर्तन एक साथ हो रहे होते हैं। नाटक खेलने वाला बच्चा अधिकतर बहिर्मुखी हो जाता है। वह इस तरह से बहुत सारे सवाल उठाना सीखता है। सवाल उठाना ही तो सीखने की सबसे अधिक कारगर प्रक्रिया है। इसलिए जब भी नए बाल-नाटक मेरे सामने आते हैं, मैं उनका खुले मन से स्वागत करता हूँ।

अब मेरे सामने शकुंतला कालरा के तीन नए बाल-नाटक हैं। शकुंतला कालरा बाल-साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती हैं। बाल कहानियाँ, बाल कविताएँ तथा बाल-साहित्य का सृजन करने वाले लेखकों से उनके साक्षात्कार एक मानक के रूप में हमारे सामने उपस्थित हैं। लघु-कथाएँ और कहानियाँ भी उनके सृजन-लोक का हिस्सा हैं। शकुंतला कालरा के तीन बाल नाटक अलग-अलग भावभूमि पर लिखे गए नाटक हैं।

सबसे पहले हम उनके बाल-नाटक 'देर आयद दुरुस्त आयद' पर बात करते हैं। यह नाटक हमारे घरों में बच्चों की शिक्षा से जुड़ी एक बहुत ही सामान्य समस्या को उठाते हुए एक समाधान की ओर ले जाता है। नाटक में कुल चार पात्र हैं। शांता और विकास पति-पत्नी हैं। उनके दो बच्चे हैं आहान और प्रिया। दोनों भाई-बहन स्कूल जाने वाले बच्चे हैं। समस्या आहान की शिक्षा के साथ जुड़ी हुई है। आहान को साइंस पढ़ना पसंद है। वह अब्दुल कलाम की ओर आकर्षित है और उनसे प्रेरित भी। प्रश्न उठता है कि बच्चे पिता के सपने को साकार करने के लिए एक साधन मात्र हैं या उनकी अपनी कोई पसंद-नापसंद भी है। कोई भी व्यक्ति सब विषयों में एक जैसा पारंगत नहीं हो सकता। पिता आहान को कामर्स की ओर धकेलना चाहता है, क्योंकि वह उसे एक बड़ा बिज़नसमैन या सी ए या कोई बड़ा बैंक अधिकारी आदि के रूप मे देखना चाहता। नाटक का द्वन्द्व यही है। शिक्षा में विषयों का चुनाव बच्चों की रुचि के अनुसार हो या माता अथवा पिता के सपनों या उनकी महत्वाकांक्षाओं के आधार पर। जब बच्चे पर हम उसकी नापसंद का विषय लाद देते हैं तो परिणाम वही होता है, जो इस नाटक में आहान के साथ हुआ। आहान की माँ शांता अपने बेटे के द्वन्द्व को समझती है। एक ओर पिता का खौफ़ और सम्मान तथा दूसरी ओर उसकी अपनी पसंद का विषय। शांता के बीच-बचाव से ही बात बन पाती है और अंतत: आहान को अपनी पसंद का विषय यानी साइंस मिल जाता है। एक संघर्ष के बाद। यह कहानी घर-घर की कहानी है। खासतौर पर मध्य-वर्ग में। मध्य-वर्ग अपने सपनों को अपने बच्चों के कंधों पर सवार होकर पूरा करना चाहता है, जोकि सही नहीं है। यह नाटक यही संदेश देता हुआ विराम लेता है कि माता-पिता बच्चे की पसंद की अपेक्षा अपने सपनों को तरजीह न दें। विषय थोड़ी देर से ही बदला, लेकिन बदला। यानी देर आयद दुरुस्त आयद।

शकुंतला कालरा का ही एक ओर नाटक है 'लाकडाउन खुल गया है'। इसमें भी पात्र महेश और माधवी पति-पत्नी हैं। उनके दो बच्चे हैं विभु और मीशा। विभु की उम्र ग्यारह साल है और मीशा की नौ साल। उनके घर में एक मिट्ठू नाम का एक तोता है। यह नाटक कोरोना महामारी की भयावहता को रेखांकित करता हुआ लाकडाउन में बन्द लोगों की मानसिक व्यथा को खोलता है। बात केवल इतनी ही होती तो यह तो यह नाटक नाटक न बनता। यह नाटक नाटक बनता है मिट्ठू की पीड़ा से, जो उनके ही घर में एक पिंजरे में बन्द है। विभु और मीशा का लाकडाउन तो एक दिन खुल भी जाएगा लेकिन तोता अगर पिंजरे में ही बन्द रहा तो उसका लाकडाउन तो कभी भी नहीं खुलेगा। आपसी संवादों के माध्यम से यही प्रश्न सामने आता है। यानी एक तरह से पक्षियों की आज़ादी के प्रति बच्चों को सैंसेटाइज़ करने वाला नाटक है। यह अहसास बच्चों में स्वत: ही जाग जाता है और वे एक दिन तोते को पिंजरे से आज़ाद कर देते हैं। वस्तुत: यह आज़ादी केवल तोते की आज़ादी नहीं, बाल-मन की भी उन भावों से आज़ादी है, जो पर्यावरण के खिलाफ़ होते हैं। तोते की आज़ादी विभु और मीशा के मन की भी आज़ादी है। यह नाटक इसी सन्देश के साथ ही विराम लेता है।

अब हम कालरा के एक अन्य नाटक 'बच्चे बदल गए हैं' की बात करते हैं। इस नाटक में भी निशा और नितिन पत्नी और पति हैं। इसमें भी राहुल और नेहा भाई-बहन हैं। घर में उनकी दादी भी है और मोहल्ले का चौकीदार भी। इस नाटक का परिवेश भी लॉकडाउन है। लॉकडाउन के समय आने वाली दिक्कतें यहाँ सिलसिलेवार उजागर होती हैं और घर के कामकाज का भार केवल घर की गृहणि पर न रहकर सबका साझा हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि घर के बच्चे घर का काम न करके अपनी पढ़ाई या फिर खेलने-कूदने में व्यस्त रहते हैं। घर के पुरुष प्राय: घर के कामों में हाथ बंटाना हेय समझते हैं। यह नाटक इस माइंड-सैट को तोड़ता हुआ अपना परिवेश खोलता है। मेड की अनुपस्थति में घर के सभी सदस्य घर के काम में जुट जाते हैं। यह एक अलग तरह का अनुभव है, जो सभी को घर के साथ पूरे समर्पण के साथ जोड़ देता है। बच्चे जंक फूड की जगह घर का खाना खाने लगते हैं। न केवल इतना बच्चों को इस बात की भी चिंता है कि इस लॉकडाउन में मोहल्ले के चौकीदार की हालत क्या होगी? यह एक कड़वी सच्चाई है कि लॉकडाउन में हर परिवार को आर्थिक संकटों से गुज़रना पड़ा। मध्य-वर्ग ने जैसे-तैसे गुज़ारा किया लेकिन गरीब परिवारों का क्या हाल हुआ, यह किसी से छिपा नहीं। भूखे-प्यासे पैदल चलते हुए लोग, रास्ते में बीमार होते और मरते हुए लोग आज भी मन में असहायता की स्थिति के साथ-साथ सरकारों के निकम्मेपन को रेखांकित करते हैं। इस मुश्किल वेला में सरकारें भले ही इम्तिहान में फेल हुई हैं लेकिन लोग फेल नहीं हुए। लोगों ने एक-दूसरे की मदद की है। वस्तुत: बातों-बातों में ही यह सब निकलकर आता है कि मोहल्ले के चौकीदार को खाना मिल रहा होगा या नहीं। दादी, माता-पिता, बच्चे सभी चिन्तित हैं और वे उस तक खाना पहुँचने का सुरक्षित रास्ता निकाल लेते हैं। यानी अब बच्चे न तो लापरवाह रहे हैं और नाही वह घर का काम करने से कतराते हैं। अब वे जंक फूड की जगह घर का खाना खाने लगे हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। इस नाटक के यही संदेश हैं।

अब कुछ सामान्य बातों की संकेत किए बिना यह आलेख अधूरा रहेगा। तीनों नाटकों के विषय अलग हैं। तीनों नाटकों के सन्देश अलग हैं। यानी तीनों नाटक शिक्षाप्रद नाटक कहे जा सकते हैं। यह बच्चों के लिए ज़रूरी भी है कि वे नाटक की भूल-भलैयां में ही भटक कर न रह जाएँ, अपितु नाटक पढ़ते अथवा खेलते हुए कुछ नए अनुभव भी अर्जित करें। कुछ नया सीखें। इन तीनों नाटकों की भूमिका यही है। तीनों नाटकों की पृष्ठभूमि मध्य-वर्ग है। तीनों नाटकों में पात्रों का विन्यास भी लगभग एक जैसा ही है। भाषा भी एक सी ही है। तीनों नाटक एक जैसी गति से ही आगे बढ़ते हैं। इन्हें अगर मंचित किया जाए तो ज़रूर इसके संवादों में कुछ परिवर्तन अपेक्षित होंगे। कहीं-कहीं संगीत भी शामिल किया जा सकता है। बच्चों को गीत-संगीत, नाचना-गाना बहुत भाता है। यह शुद्ध रूप से यथार्थवादी नाटक हैं। इनमें भी अगर संगीत का तड़का लगा दिया जाए तो इनकी ग्राह्यता कई गुना बढ़ जाएगी। यह सब हो भी जाएगा। इन नाटकों की सबसे अच्छी बात है इनकी सामयिकता। आज तो सामयिक है, कल वही इतिहास हो जाएगा। दोनों ही दृष्टियों से इन नाटकों का महत्व बना रहेगा। शकुंतला कालरा ने इन नाटकों के माध्यम से बाल नाट्य-लेखन की दुनिया में प्रवेश किया है। उनका स्वागत किया ही जाना चाहिए और आशा की जानी चाहिए कि उनके लेखन के माध्यम से हमें और भी अच्छे और सार्थक बाल-नाटक मिलेंगे।

- प्रताप सहगल

एफ़-101, राजौरी गार्डन
नई दिल्ली-110027
9810638563

निष्कर्ष; डॉ. शकुंतला कालरा ने बाल साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे बच्चों के व्यक्तित्व विकास, संवेदनशीलता और विचार निर्माण का सशक्त साधन बनाया है। प्रताप सहगल का यह आलेख उनके साहित्यिक अवदान, बाल नाट्य लेखन और बाल साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। निस्संदेह, डॉ. शकुंतला कालरा हिंदी बाल साहित्य की एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी हस्ताक्षर हैं।

ये भी पढ़ें; जब शोध का केन्द्र बना डॉ. परशुराम शुक्ल का बाल साहित्य

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