बाल साहित्य के अनुवाद के संदर्भ : दिविक रमेश

Dr. Mulla Adam Ali
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Translation of children's literature is more than a linguistic exercise—it is a bridge between cultures, values, and young minds. In this insightful article, Divik Ramesh highlights the importance, challenges, and possibilities of translating children's literature, emphasizing its vital role in promoting cultural exchange and enriching young readers across languages.

The Importance of Translating Children's Literature: Insights by Divik Ramesh

बाल साहित्य के अनुवाद के संदर्भ : दिविक रमेश

बाल साहित्य का अनुवाद केवल भाषा का रूपांतरण नहीं, बल्कि संस्कृति, संवेदना और बाल-मन की सहज अभिव्यक्ति को एक भाषा से दूसरी भाषा तक पहुँचाने की सृजनात्मक प्रक्रिया है। भारत जैसे बहुभाषी देश में विभिन्न भाषाओं के उत्कृष्ट बाल साहित्य का परस्पर अनुवाद राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साहित्यिक समृद्धि का सशक्त माध्यम बन सकता है। प्रस्तुत लेख में वरिष्ठ साहित्यकार दिविक रमेश ने बाल साहित्य के अनुवाद की आवश्यकता, चुनौतियों, संभावनाओं और उसके व्यापक महत्व पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक दृष्टि प्रस्तुत की है।

बाल साहित्य के अनुवाद का महत्व

दिविक रमेश का विचारोत्तेजक लेख 

अनुवाद की बात करना प्राय: तब जायज माना जाता है जब मूल महत्त्वपूर्ण और समृद्ध हो। भारतीय भाषाओं की बात करें तो नि:संदेह बंगला और मराठी जैसी भाषाओं के समृद्ध और महत्वपूर्ण बाल-साहित्य की भांति आज हिन्दी का बाल-साहित्य भी महत्वपूर्ण और समृद्ध है। इस नाते यदि हिन्दी-बाल-साहित्य के संदर्भ में भी अनुवाद की दृष्टि से विचार किया जाए तो तर्कयुक्त ही कहा जाएगा। लेकिन बहुभाषी भारत के संदर्भ में तो मेरे विचार से सभी भाषाओं के बाल-साहित्य के एक दूसरे की भाषा में अनुवाद की आवश्यकता है। बावजूद इसके कि कई भाषाएं ऐसी भी हैं जिनसे या जिनमें हिन्दी बाल-साहित्य का अनुवाद करना कोई आसान काम नहीं है। मसलन र. शौरिराजन के अनुसार शब्द, वाक्य-रचना, व्याकरण आदि की भिन्नता के कारण अनुवाद की दृष्टि से हिन्दी और तमिल में आदान-प्रदान सरल नहीं है। यह मत उन्होंने बहुत पहले मधुमती (१९६७) के बाल विशेषांक में प्रकट किया था। आज कमोबेश सभी भारतीय भाषाओं में बाल-साहित्य की भी प्रकाशित सामग्री उपलब्ध है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे देश की एक बड़ी अनिवार्य जरूरत की तहत भावनात्मक एकता के स्वरूप की महत्तवपूर्ण जानकारी और उसके सच्चे संस्कार हमारे बच्चों में सहज और पुख्ता ढ़ंग से घर कर लें तो नि:संदेह यह कार्य बाल-साहित्य के आदान-प्रदान से ही संभव हो सकता है। आज न बड़ों के और न ही बालकों के दायरे संकुचित रह गए हैं, ऐसी स्थिति अपेक्षित भी नहीं है। हम वैश्विक होने की होड़ में हैं। सूचनाओं और जानकारियों को भण्डार हमारे सामने खुला पड़ा है। मूल्यों की कोई एक परिभाषा नहीं रह गई है। बिना सोचे-समझे अपनी-अपनी परिभाषाओं से चिपके रहना कोई अच्छी राह नहीं मानी जाती। हालांकि मूल्यविहीनता का मूल्य किसी को स्वीकार नहीं है -बच्चों की दुनिया में तो एकदम नहीं। लेकिन मूल्यों का आरोपण या उनका उपदेशीकरण भी आज बच्चों तक को ग्राह्य नहीं है। अत: बाल-साहित्य सृजन, आज के साहित्यकार के लिए एक बड़ी चुनॊती भी है। अत: बालक के एक बड़े और व्यापक परिवेश की सोच के बिना किसी भी भाषा का बाल-साहित्य सम्पूर्ण नहीं माना जाएगा। और इतने बड़े देश में, इतनी भाषाओं के बच्चों के संदर्भ में यह कार्य अनुवाद के माध्यम से बखूबी संभव हो सकता है। अनुवाद हर भाषा को अपने-अपने क्षितिज व्यापक करने का अवसर प्रदान करता है। आदान-प्रदान हर हाल भारतीय और वैश्विक बाल-साहित्य के विकास में मदद करता है। अगले पड़ावों के रूप में भारतीय बाल-साहित्य और वैश्विक बाल-साहित्य की प्रतिष्ठापना की जा सकती है। हम विश्व के बाल-साहित्य के परिदृष्य में दृढ़ पांव जमा सकते हैं। और ऐसा करके हम मानवीयता से भरपूर वैश्विक बालक और उसके साहित्य को प्राप्त कर सकते हैं। स्पष्ट है कि यही वह राह है जो हमें मानव और विश्व को बचाए रखने में कारगर ढंग से मदद कर सकती है। इस संदर्भ में अपनी पहले ही से बनी एक राय ज़रूर बांटना चाहूंगा कि विश्व तक जल्दी से जल्दी पहुंचने के लिए हिन्दी को अन्य भारतीय भाषाओं का द्वार बनाना ज़्यादा व्यावहारिक होगा। अर्थात सभी भारतीय भाषाओं के बाल-साहित्य का यदि हिंदी में अनुवाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर ली जाए तो विदेशी भाषाओं के संदर्भ में केवल एक भारतीय भाषा ’हिन्दी’ के माध्यम से उन भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से पहुंचना बहुत सरल तो होगा ही, प्रमाणिक भी होगा क्योंकि हमारे देश का एक एक हिस्सा सांस्कृतिक दृष्टि से तो एक है ही। सच तो यह है कि जब तक स्रोत और लक्ष्य भाषाओं में सीधे-सीधे अनुवाद करने वालों का अभाव हे तब तक किन्हीं भी दो भारतीय भाषाओं में भी बाल-साहित्य की सच्ची पहुंच के लिए ’हिन्दी’ का माध्यम सबसे ज़्यादा उपयुक्त होगा न कि अंग्रेजी का। कम से कम 21 वीं सदी में तो हमें इस तथ्य को स्वीकार कर ही लेना चाहिए। आज इस बात की भी खासी ज़रूरत है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को दोयम दर्जे का मानने वाले से सीधी टक्कर ली जाए।

यहां में बाल-साहित्य की पहचान से संबद्ध पहले ही से बना अपना यह मत भी बता दूं कि बाल-साहित्य के अन्तर्गत में केवल रचनात्मक बाल-साहित्य अर्थात कालात्मक अनुभूति जन्य बाल-साहित्य को ही स्वीकार करता हूं न कि अध्ययन, शोध, जानकारी अथवा तथ्यजन्य बालोपयोगी बाल-साहित्य को। और जिसेमें बाल-साहित्य के अन्तर्गत मान रहा हूं उसी के अनुवाद का मसला कठिन और चुनौतीपूर्ण होता है।

अनुवाद का मतलब एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा के शब्दों में रख देना मात्र नहीं होता। यहां आत्मा का अर्थात संस्कृति, पाठ आदि सब का अनुवाद करना होता है। और यह भी कि अनुवाद के माध्यम से एक भाषा मे लिखी रचना अन्य भाषा में पहुंचकर भी रचना ही लगनी चाहिए। अर्थात दूसरी भाषा की प्रकृति के एकदम अनुकूल। उदाहरण के लिए, अनूदित कविता पहले कविता होनी चाहिए। यह अनुवादक की दोनों भाषाओं पर अधिकार मात्र से संभव नहीं होता बल्कि भाषाओं से जुड़े जीवन और संस्कृति आदि के गहरे अनुभवात्मक ज्ञान से अधिक संभव होता है। पीताम्बार पबिल्शिंग कम्पनी प्रा० लि० द्वारा प्रकाशित स्लोवाकिया की लोक-कथाओं के रस में पगी दिलचस्प कहानियों के अनुवाद की पुस्तक मॆत्री का पुल के सम्पादकीय में जयप्रकाश भारती का कहना है -"डॉ. शारदा यादव ने कथाओं का ऐसा अनुवाद किया है कि अनुवाद नहीं लगता ।" 2008 में साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित और प्रीति पंत द्वारा अनूदित "उरुगुवाई बाल कहानियां" पढ़ते समय मुझे भारती जी द्वारा बताए गए गुण के भरपूर दर्शन हुए। उदाहरण के लिए मॆं एक कहानी गंजा तोता का ज़िक्र कर सकता हूं। तोते का नाम है -पेद्रीतो। अनुवाद देखिए - "पेद्रीतो उन बच्चों के साथ खूब समय बिताता था । वे उससे इतना कुछ कहते थे कि वह भी उनकी तरह बोलना भी सीख गया। वह कहता, "मिट्ठू राम राम अहा मीठी मिर्ची! पेद्रीतो का प्याला!" वह और भई बहुत कुछ कहता था, जो कि बताया नहीं जा सकता है, क्योंकि तोते भी बच्चों की ही तरह बुरी बातें आसानी से सीख जाते हैं।" स्पष्ट है कि यहां अनुवाद करते समय अनुवादिका ने ध्यान रखा है कि हिन्दी में अनूदित इन कहानियों के पाठक अधिकतर हिन्दी के जानकार भारतवासी होंगे । अत: राम राम आदि वाली सुखद और ज़रूरी छूट ले ली है और कृत्रिम भाषा-परिवेश से अनुवाद को बचा लिया है।

21 वीं सदी को ध्यान में रख कर कहा जाए तो भारत की सहवर्ती भाषाओं में बाल-साहित्य के आदान-प्रदान की स्थिति बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं है। विधाओं की दृष्टि से देखा जाए तो ज़्यादातर अनुवाद गद्य विधाओं में रची रचनाओं के हुए हैं , और उनमें भी अधिकतर ज़ोर लोककथाओं पर रहा है। विदेशॊ बाल-साहित्य के अनुवाद भी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हैं पर वे भी संख्या की दृष्टि से आशाप्रद नहीं हैं। कठिनाई यह भी है कि अनुवाद को भी दोयम दर्जे का मानने वालों की कमी नहीं है। डॉ. श्याम सिंह शशि कि यह चिन्ता जायज ही है कि "विदेशी भाषाओं के बालसाहित्य-लेखकों में चार्ल्स डिकिंस, मोपांसा, टॉलस्टाय, …का कुछ बालसाहित्य हिंदी में अनूदित हुआ है किंतु तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम आदि भारतीय भाषाओं के कई बाल उपन्यास का अनुवाद शायद ही हिंदी में हुआ हो। …बांग्ला से हिंदी में कथा साहित्य का जितना अनुवाद हुआ है - उसकी अपेक्षा एक-तिहाई भी शायद हिंदी से बांग्ला में नहीं हुआ।" महेश नेवाणी ने सिंधी के साथ हिन्दी में बाल कविताओं के हिन्दी अनुवाद पुस्तक रूप में प्रकाशित किए हैं । पुस्तक खास स्कूली बच्चों के लिए है। ’दो शब्द’ में महेश नेवाणी की चिन्ता विचारणीय है -"सिंधी जाति के लोगों पर से मेरा विश्वास डोल गया है। सिंधी भाषा में कविता करूं या नहीं इस पर फिर एक बार गौर करना पड़ेगा।" फिर भी ऐसा तो कहा ही जा सकता कि 21वीं सदी के एक दशक में अनुवाद के क्षेत्र में भले ही आशा के अनुरूप या पहले की तुलना में संख्या की दृष्टि से थोड़ी कमी नज़र आती हो लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से कोई कमी नहीं है । साहित्य अकादमी को ही लें । साहित्य अकादेमी के प्रकाशन कार्यक्रम की नई योजनाओं में से एक योजना है-विभिन्न भाषाओं में बाल पुस्तकों का प्रकाशन। भारतीय भाषाओं में बाल कृतियों के अनुवादों के प्रकाशन से इस योजना का शुभारंभ किया गया। आकर्षक चित्रों के साथ ये कृतियाँ अकादेमी द्वारा सन् 1990 से प्रकाशित की जा रही हैं। 16 भारतीय भाषाओं की बाल कृतियों के 100 से अधिक अनुवाद तथा साथ ही गारो, बोडो, आदि भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित किए जा चुके हैं।

इतिहास पर नज़र मारी जाए तो पाएंगे कि "हिन्दी बाल-कहानियों का उदय भारतेन्दु युग से माना जाता है। इस काल की अधिकांश कहानियाँ अनूदित हैं। इसके लिए वे संस्कृत की कहानियों के लिए आभारी हैं। सर्वप्रथम शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने कुछ मौलिक कहानियाँ लिखीं, इनमें ‘राजा भोज का सपना’ ‘बच्चों का इनाम’ तथा ‘लड़कों की कहानी’ का उल्लेख किया जा सकता है। आगे चलकर रामायण-महाभारत आदि पर आधारित अनेक कहानियाँ द्विवेदी युग में लिखी गईं। किन्तु हिन्दी बाल कहानी अपने स्वर्णिम अभ्युदय के लिए प्रेमचन्द्र जी की ऋणी है। उनकी अनेक कहानियों में बाल-मन का प्रथम निवेश हुआ और उसकी ज्वलंत झाँकी अनेक कहानियों में मिलती है। बालमन के अनुरूप उनकी बहुत सी कहानियाँ जो कि बड़ों के लिए ही थीं, बच्चों ने उल्लास के साथ हृदयंगम की।" (हिन्दी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ, उषा यादव एवं राजकिशोर सिंह, आत्माराम एण्ड सन्स, 2001) बताना चाहूँगा कि प्रेमचंद जी ने हिंदी मेँ पहला बाल उपन्यास लिखा था –एक कुत्ते की कहानी और बालकों के लिए लिख़ी गईं उनकी कहानियां जंगल की कहाँनियां शीर्षक से प्रकाशित हुई हैं। खैर, विडम्बना ही है कि कविताओं या कविता-पुस्तकों के अनुवाद अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलते हैं। रमेश कॊशिक ने रूसी बाल कविताओं के अच्छे अनुवाद किए हैं। दिविक रमेश द्वारा चयनित और अनूदित और नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित कोरियाई कविताओं की पुस्तक ’कोरियाई बाल कविताएं’ (2001) बच्चों में बहुत ही लोकप्रिय सिद्ध हुई है। एक पुस्तक वाणी ने प्रकाशित की है –जब लुटेरे इलायचीपुर आये जो कि नार्वे के प्रतिष्ठित लेखक थूरब्योर्न की बाल पुस्तक है जो क्लासिक मानी जाती है। इसमेँ गद्य भी है और कविता भी। कविताओं के अनुवाद बहुत ही खूबसूरत हैं। इधर कोरियाई बाल उपन्यास के अनुवाद की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक देखी है – द्वार के बाहर मुर्गी (कोरियाई नाम: मादांग नाओन आमथाक) जिसकी लेखिका है -ह्वांग सन मी, अनुवादक हैं – रविकेश और नौशाद आलम और प्रकाशक है - मानक पब्लिकेशन प्र. लि., नई दिल्ली। इसमें कोरियाई मुर्गी का नाम भले ही कोरियाई है अर्थात इप्साक (यह नाम मुर्गी ने स्वयं रखा है -कोरियाई में पत्ते के लिए शब्द इप्सावी के आधार पर क्योंकि उसे आकाशिया के पेड़, उसके पत्ते और फूल बहुत पसंद हैं), लेकिन हिन्दी अनुवाद में उसका कोरियाई मालिक उसे ‘कुकडूकु’ के नाम से पुकारता है।

मेरी कुछ बाल कविताओं के अनुवाद ओड़िया, कन्नड़ आदि भारतीय भाषाओं में हुए हैं लेकिन हैं व अपवाद स्वरूप ही।

यदि बालक सृष्टि की सबसे मूल्यवान रचना है तो बाल-साहित्य का महत्व भी कम नहीं है। और भारत के संदर्भ में भारतीय और विश्व के संदर्भ में वैश्विक बालक और बालक की कल्पना बिना अनुवाद के करना आज लगभग असंभव है। इसीलिए भारत में बच्चों की एक अलग केन्द्रीय अकादमी आज की बड़ी जरूरत है जिसकी एक महत्वपूर्ण गतिविधि अनुवाद कर्म होना चाहिए। जो संस्थाएं अपने सीमित साधनों के द्वारा इस दिशा में कुछ काम कर रही हैं उन्हें बढ़ावा मिलना चाहिए । फिर उतना ही ध्यान अनुवाद पर देना होगा। एक ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिसकी तहत किसी भाषा में लिखी गईं श्रेष्ठ बाल पुस्तकों की सूची उपलब्ध हो और साथ ही अच्छे अनुवादकों की सूची भी ताकि अनुवाद कार्य को सुगम बनाया जा सके।

इस सदी की हिन्दी में अनूदित कुछ पुस्तकों की और ध्यान दिलाना चाहूंगा, वे हैं -सुकुमार राय की चुनिन्दा कहानियां (अनुवादक : अमर गोस्वामी, साहित्य अकादमी ,2002), जापान की कथाएं (साहित्य अकादमी, 2001 ), जादुई बांसुरी और अन्य कोरियाई कथाएं ( अनुवादक: दिविक रमेश नेशनल बुक ट्रस्ट, 2009), कोरियाई लोक कथाएं (अनुवादक: दिविक रमेश पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी, 2000)। एक प्रकाशन है -तूलिका। इसने इसी सदी में द्विभाषी अर्थात अंग्रजी और हिन्दी में अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। असल में यह पुस्तक-श्रृंखला है। प्रकाशक के अनुसार इन पुस्तकों से बच्चों की शब्द-कल्पना-शक्ति बढ़ेगी- द्विभाषी पुस्तकों की यह श्रृंखला, कहानी सुनाने के माहौल में तस्वीरों की मदद से बच्चों की शब्द अनुमान शक्ति और शब्द भंडार बढ़ाने में मदद करती है। कहा गया है -"This series of bilingual books encourages children to ‘imagine words’ and build vocabulary with the aid of pictures in a storytelling setting. By providing words in two languages simultaneously, the books create a platform for children to build their own narratives. This helps them use words creatively, and remember them." एक खबर के अनुसार -" बच्चों के लिए काम करनेवाली गैरसरकारी और गैरव्यावसायिक संस्था ‘कथा’ ने बच्चों के लिए हिंदी भाषा में तीन पुस्तकें तैयार की हैं। तीनों पुस्तकें अन्य भाषाओं से हिंदी में अनूदित हैं। अनुवाद में हिंदी की आत्मा कितनी उतर पाई है या फिर कथाओं के तार स्थानीयता और बाल सुलभ भावनाओं के साथ कितना जुड़ पाते हैं? शायद ये अलग मुद्दे होकर भी वैश्विक युग में ज्यादा मायने नहीं रखते, लेकिन बच्चे पुस्तक को देखने के बाद उसे हाथ में लेते हैं, उसके पृष्ठों पलटते हैं और पुस्तकों के चित्रों में रम जाते हैं। इन पुस्तकों की यही ताकत है और बच्चों की पुस्तकों में यह ताकत होनी भी चाहिए। बच्चे चित्रों के जरिए शब्दों की पहचान कर लेते हैं और पृष्ठों को पलटते जाते हैं। पुस्तकों के निर्माण में संसाधनों की सुलभता का स्पष्ट दर्शन होता है, साथ ही उस सुरुचि का भी, जिसके बगैर इस दर्जे का काम कर पाना असंभव है। लेकिन इसके साथ ही पुस्तकों की कीमतें भी अधिक हैं। ‘सूई की नोक पर था एक’ गीता धर्मराजन द्वारा रचित अंग्रेजी भाषा की पुस्तक ‘ऑन द टिप ऑफ ए पिन वाज’ को विवेक नित्यानंद और मोयना मजुमदार ने हिंदी में रूपांतरित किया है। इसी तरह बियाट्रिस आलेमान्या द्वारा फ्रेंच भाषा में लिखी पुस्तक ‘ए लॉयन इन पेरिस’ को हिंदी में अनुदित किया है मोयना मजुमदार ने। इस पुस्तक की कथा पेरिस के प्रसिद्ध दोंफेर-रोशेरो चौराहे पर स्थापित शेर से प्रेरित है। यह पुस्तक अनोखी है। कथा की तीसरी पुस्तक है ‘उल्टा पुल्टा’। जर्मन भाषा की लेखिका ऑत्ये दाम्म की बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तक 'फ्लिडोलिन’ का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद मोयना मजुमदार ने किया है। यह कहानी चमगादड़ों के माध्यम से बच्चों में कुतूहल और सूझ-बूझ पैदा करती है। बहरहाल, इस सुरुचिपूर्ण कार्य के लिए ‘कथा’ और उसके साथ जुड़े लोग साधुवाद के पात्र हैं।" किताबघर प्रकाशन, वाणी प्रकाशन, आलेख प्रकाशन और आत्माराम एण्ड संस जॆसी अनेक महत्तवपूर्ण संस्थाएं हैं जिनका बाल साहित्य में भी अच्छा खासा हस्तक्षेप है । आशा की जा सकती है कि ये अनुवाद के क्षेत्र में भी, खासकर बाल कविता के अनुवाद के क्षेत्र में अधिक से अधिक कृतियां लाएंगी । किताबघर द्वारा प्रकाशित "बाल मनोवॆज्ञानिक लघुकाथाएं"(सं० रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु ) से एक पंजाबी लघुकथा का आनन्द लीजिए जिसका हिन्दी में शीर्षक है -बदला और इसके लेखक-अनुवादक डॉ श्यामसुंदर दीप्ति हैं :

’देख! तू हर बात पर जिद मत किया कर। जो काम करने का होता है, वह तू करती नहीं।’ उमा ने रचना को झिड़कते हुए कहा।’ ’करती तो हूँ सारा काम। सब्जी बनाने के लिए टमाटर नहीं ला के दिए थे! आपके साथ कपड़े भी तो धुलवाये थे।’ रचना ने मम्मी को दलील दी।”यही काम तो नहीं करने होते। पढ़ भी लिया कर।’ उमा को और गुस्सा आ गया।’ 

’कर तो लिया स्कूल का काम।’ रचना ने अपना स्पष्टीकरण दिया।

’अच्छा! ज्यादा बातें मत कर और एक तरफ़ होकर बैठ।’ रचना सिलाई-मशीन के कपड़े को पकड़ने लगी। उमा को गुस्सा आ गया और उसने थप्पड़ जमा दिया।

’अब अगर जो हाथ आ जाता मशीन में!’

रचना रोने लगी।

’अब रोना आ गया, चुप कर, नहीं तो और लगेगी एक। अच्छी बातें नहीं सीखनी, कोई कहना नहीं मानना।’

थोड़ी देर में दरवाजा खटका। उमा ने रचना से कहा, ’अच्छा! जाकर देख, कौन है बाहर?’

पहले तो वह बैठी रही और गुस्से से मम्मी की तरफ़ देखती रही, पर फिर दुबारा कहने पर उठी और दरवाजा खोला। रचना के पापा का कोई दोस्त था।

रचना दरवाजा खोलकर लौट आई।

“कौन था ?’ रमा ने पूछा।

’अंकल थे।’ रचना ने रूखा-सा जवाब दिया और साथ ही बोली, ’मैंने अंकल को नमस्ते भी नहीं की।’

और कोरियाई बाल कविताएं के सुविख्यात कवि यून सॉक जूंग की एक बाल कविता भी :

दुनिया का मानचित्र 

घर का काम मिला है मुझको

नक्शे में दुनिया दिखलाऊं

रात बॆठ कर मेहनत की पर

रहा अधूरा क्या बतलाऊं


देश न हो जो तेरा मेरा

राष्ट्र न हो जो मेरा तेरा

हो बस दुनिया देश बड़ा सा

तब होगा आसान बनाना

नक्शे में दुनिया बतलाना

(प्यारी सी दुनिया दिखलाना )।

- डॉ. दिविक रमेश

निष्कर्ष; बाल साहित्य के अनुवाद के माध्यम से विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और जीवन-मूल्यों का सहज आदान-प्रदान संभव होता है। यह न केवल बच्चों के साहित्यिक संसार को समृद्ध बनाता है, बल्कि राष्ट्रीय एकता और वैश्विक मानवीय दृष्टि के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दिविक रमेश का यह लेख बाल साहित्य के अनुवाद की आवश्यकता, गुणवत्ता और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

ये भी पढ़ें; हिंदी और दक्षिण कोरियाई भाषाओं में अनुवाद की दशा और संभावना

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