डॉ. शकुंतला कालरा का प्रभुदयाल श्रीवास्तव से विशेष साक्षात्कार

Dr. Mulla Adam Ali
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Explore an insightful interview with renowned Hindi children's literature writer Prabhudayal Srivastava and distinguished scholar Dr. Shakuntala Kalra. This conversation highlights their literary journey, creative vision, and valuable perspectives on children's literature, reading culture, and the future of Hindi writing.

Exclusive Interview with Prabhudayal Srivastava by Dr. Shakuntala Kalra | Hindi Children's Literature

डॉ. शकुंतला कालरा का प्रभुदयाल श्रीवास्तव से विशेष साक्षात्कार

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का विशेष साक्षात्कार: बालसाहित्य, लेखन और रचनात्मक यात्रा

हिंदी बालसाहित्य के प्रमुख रचनाकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव का साहित्य बहुआयामी सृजन का सशक्त उदाहरण है। कविता, बालगीत, कहानी, नाटक, व्यंग्य और नवगीत जैसी विविध विधाओं में उनकी उल्लेखनीय उपस्थिति उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य का विशिष्ट हस्ताक्षर बनाती है। प्रस्तुत साक्षात्कार में डॉ. शकुंतला कालरा ने उनके जीवन, साहित्य-साधना, बालसाहित्य-दृष्टि, रचनात्मक अनुभवों और समकालीन साहित्यिक सरोकारों पर विस्तार से संवाद किया है। यह वार्ता न केवल एक संवेदनशील रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को उजागर करती है, बल्कि हिंदी बालसाहित्य की दिशा, दशा और भविष्य पर भी गंभीर विचार प्रस्तुत करती है।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव से डॉ. शकुंतला कालरा का साक्षात्कार

जिनका लेखन पद्य और गद्य का मणिकांचन योग है

प्रभुदयाल श्रीवास्तव जी एक लब्धप्रतिष्ठित बालसाहित्यकार हैं और इसी रूप में चर्चित और प्रसिद्ध भी। जबकि बड़ों के लिए भी आपने प्रचुर मात्रा में लिखा है। आपका लेखन-यात्रा कविता से शुरू होकर आगे कहानी, लघुकथा और व्यंग्य की ओर बढ़ती हुई बालसाहित्य की और बड़ी तेजी से मुड़ गई। नवगीतकार बालकवि प्रभुदयाल श्रीवास्तव का पद्य और गद्य में, प्रौढ़ एवं बाल साहित्य दोनों में समान शिद्दत से लिखा गया विपुल रचना-संसार है। विशेष रूप से आपका काव्य-जगत्। बच्चों के हृदय में उतरकर, उनके मस्तिष्क में पहुँचकर, उनकी ही बोलचाल की भाषा में जो आप रचते हैं उन्हें बच्चे बहुत पसंद करते हैं और चाव से पढ़ते हैं। आइए मिलते हैं पेशे से इंजीनियर और मन से एक संवेदनशील बालसाहित्यकार से-

डाॅ. शकुंतला कालरा: प्रभुदयाल जी, मेरी पहली स्वाभाविक जिज्ञासा आपके दो अलग-अलग नामों को लेकर है। आपकी पुस्तकों में लेखक के नाम मे कहीं पी. दयाल श्रीवास्तव लिखा है और कहीं प्रभुदयाल श्रीवास्तव। उन्हें देखकर भ्रम होता है कि क्या ये पुस्तकें एक ही लेखक की है अथवा दो अलग-अलग लेखक है? हमारे पाठक जानना चाहेंगे कि उनके प्रिय साहित्यकार का वास्तविक नाम क्या है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : मेरा नाम तो प्रभुदयाल श्रीवास्तव ही है और स्कूल के दिनों और बाद में प्रथम चार रचनाएँ दो कवितायेँ और दो व्यंग्य जो अमृत सन्देश रायपुर में प्रकाशित हुए प्रभुदयाल श्रीवास्तव के नाम से ही हैं। लेकिन छिंदवाडा में पदस्थ होने के बाद प्रारंभ के कई वर्षों तक मेरा लेखन पी दयाल श्रीवास्तव के नाम से छपा। कोई विशेष कारण नहीं है। बस ऐसे ही एक दिन कीरो की अंक ज्योतिष की पुस्तक पढ़ रहा था। अंग्रेजी के अक्षर थे और हरेक का अपना एक नम्बर था। अपने नाम और उपनाम के अक्षरों के अंकों का जोड़ निकलकर शुभांक के अनुसार अपना नाम पी दयाल श्रीवास्तव कर डाला। मजा भी आने लगा जब लोग दयाल साहब कहने लगे। दैनिक भास्कर के रविवारीय रसरंग के एक अंक में जब मेरी कहानी “तांगेवाला” और एक अन्य अंक में व्यंग्य “अक्ल मापी यंत्र का जोरदार आविष्कार” छपा तो मुझे विश्वास हो गया कि यही नाम भाग्य जगाने वाला है। फिर मैंने पढ़ भी रखा था कि कई लेखकों ने छद्म नाम से लिखा। इसके बाद की सभी रचनाएँ इसी नाम से प्रकाशित होती रहीं तब तक कि जब तक ई पत्रिका ‘अनुभूति’ (शारजाह से) की संपादक पूर्णिमा वर्मन जी ने इस नाम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर असहमति जाहिर कर दी। बात तो सच थी लेकिन सरकारी सेवा में रहकर व्यंग्य लिखना जोखिम भरा भी था, इस कारण मुझे यह नाम ही उपयुक्त लगता रहा था। पी दयाल श्रीवास्तव के नाम कई रचनाएँ छपीं और कई सम्मान भी मिले। प्रारंभिक दो बाल कविताओं की पुस्तकें भी इसी नाम से आईं। एक व्यंग्य की पुस्तक भी इसी नाम से आई। शायद 2011-12 के बाद कविताएँ/रचनाएँ प्रभुदयाल श्रीवास्तव के नाम से ही छपीं।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आप कृपया अपना पूरा परिचय पाठकों को देंगे? आपका जन्म कहाँ और कब हुआ? आपकी स्कूली शिक्षा कहाँ हुई और आगे उच्चस्तरीय शिक्षा का क्षेत्र क्या था?  

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : मेरा जन्म मध्यप्रदेश के दमोह जिले के धरमपुरा नामक मोहल्ले में 4 अगस्त, 1944 में हुआ। मैनें पहली कक्षा धरमपुरा के पृथ्वीराज चौहान प्राथमिक पाठशाला से उत्तीर्ण की। अब स्कूल का नाम बदलकर सरदार पटेल स्कूल हो गया है। अब बारहवीं तक पढ़ाई होती है इसके बाद की शिक्षा मध्यप्रदेश के ही सागर जिले के रहली नामक कस्बे में हुई। जहाँ मैं दूसरी कक्षा से लेकर पाँचवीं तक पढ़ा। फिर दमोह वापस आया और छठी से ग्यारहवीं तक शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला दमोह में शिक्षित हुआ। प्रथम श्रेणी विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण होकर मैं मध्यप्रदेश के ही नौगाँव पोलिटेक्निक कॉलेज पढ़ने चला गया। वहाँ से विद्युत यांत्रिकी में पत्रोपाधि प्राप्त की।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपका जीवन-परिचय मैंने पढ़ा, जिसमें लिखा था कि आपने अपनी स्कूली शिक्षा से काॅलेज के अंतिम वर्ष तक छात्रवृत्ति प्राप्त की। आपका लेखन भी स्कूल से ही आरंभ हो गया था। आपकी कविता लिखते ही नहीं थे वरन् मंच पर सुनाते भी थे। मंचीय कवि की यात्रा आपकी कब से कब तक रही? 

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : इसे सौभाग्य कहें अथवा मेरा परिश्रम मुझे पाँचवीं कक्षा से प्रारंभ होकर पाॅलिटेक्निक कॉलेज के अंतिम वर्षों तक अविरल छात्रवृति प्राप्त हुई। उन दिनों प्राथमिक शाला चौथी तक ही होती थी। पाँचवीं से मिडिल स्कूल प्रारम्भ होता था और अंग्रेजी विषय शामिल किया जाता था। नियमानुसार पाँचवीं की प्रथम तिमाही परीक्षा में प्रथम आने वाले विद्यार्थी को आठवीं कक्षा तक बारह रूपये प्रति माह छात्रवृति प्राप्त होती थी। मैं प्रथम आया और मुझे यह छात्रवृति मिली। इसके बाद नौवीं कक्षा में भी तिमाही में प्रथम आने पर बीस रूपये माह ग्यारहवीं कक्षा तक मुझे प्राप्त होते रहे। फिर पॉलिटेक्निक में तो मेरिट बेसिस पर प्रथम वर्ष चालीस और बाद के दो वर्षों तक साठ रूपये प्रति माह मिलते रहे। स्कूल के दिनों मैं साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेता था। अपनी लिखी कवितायें भी मंच पर सुनाने में अग्रणी रहा। लेकिन बस यहीं तक, शाला छोड़ने के बाद विद्युत् मंडल की सेवाओं में रहते हुए कुछ भी संभव नहीं हुआ। पदस्थ होने के बाद लेखन जरूर खैरागढ़ में प्रारम्भ हो सका। क्योंकि पदोन्नति (सहायक यंत्री) के बाद तीन वर्ष ऑफिस में कार्यरत था। दिन भर काम रात को आराम और लेखन भी। फिर स्थानातरण, फिर फील्ड का काम। लेखन बंद। .....

इसके बाद- छिंदवाडा, सेवानिवृति के पहले का अंतिम पड़ाव। जो कुछ किया यहीं किया। यहीं मंच, यहीं कविता-पाठ, यहीं बुन्देली रचनाएँ यहीं सब कुछ। बुन्देलखंड परिषद का अध्यक्ष होने के कारण कई कार्यक्रम होते रहे, मंचों पर कविता पाठ, लेखन सभी कुछ यहीं किया। लेखक अथवा कवि अथवा व्यंग्यकार अथवा बाल साहित्यकार के रूप में थोड़ा बहुत मुझे लोगों ने यहीं जाना। मध्यप्रदेश आँचलिक साहित्यकार परिषद की गोष्ठियों में अभी यदा-कदा जाता हूँ। अभी दो माह पहले ही गया था।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आप पढ़ाई पूरी करने के बाद विद्युत प्रभारी के रूप में कार्यरत रहे। विद्युत मंडल की सेवाओं में कार्य करना बहुत ही जिम्मेदारी का काम होता है, जहाँ हर समय ड्यूटी पर रहना होता है। ऐसे में आपको लिखने-पढ़ने का समय क्या मिल पाता था?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : शिक्षा पूरी होने के बाद मुझे विद्युत् वितरण केन्दों में प्रभारी के रूप में कार्य करने की जबाबदारी हर समय रही। प्रायः तहसील मुख्यालयों पर मै ऑफिसर-इंचार्ज के पद पर कार्यरत रहा। सम्पूर्ण क्षेत्र की विद्युत् व्यवस्था, नये विद्युत् विस्तार, ढेर सारा काम, लिखने-पढ़ने का तो सवाल ही नहीं था। पदोन्नति के बाद तीन साल तक कार्यालय में पदस्थ होने के समय ही कुछ लिखना हुआ। उसके बाद फिर लिखना दूर की कौड़ी ही रही। जैसा ऊपर बताया कि जो कुछ लिखा वह छिंदवाड़ा में ही लिखा।

डाॅ. शकुंतला कालरा : लेखन के बाद शुरू हुई होगी प्रकाशन की यात्रा। पहली रचना कब और किस पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई? पत्रिकाओं में छपने के बाद पुस्तकों का प्रकाशन कब से शुरू हुआ?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : जहाँ तक प्रकाशन का प्रश्न है पहली रचना एक छोटी सी कविता स्कूल की पत्रिका ‘त्रिपथगा’ में प्रकाशित हुई जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था। “समय के संचित कण” इसे महेश सक्सेना जी ने अपना बचपन के किसी अंक में छापा भी है। उसके बाद अमृत सन्देश में “संकीर्ण स्वायत्तता” कविता जिसको प्रथम प्रकाशन कह सकते हैं, 3 अप्रैल, 1988 में छपी। पहली पुस्तक तो मेरी व्यंग्य की प्रकाशित हुई “दूसरी लाइन“ शीर्षक से जो 2006 में शैवाल प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित हुई।

डाॅ. शकुंतला कालरा : प्रभुदयाल जी, आपका लेखन कविता से शुरू होकर आगे कहानी, लघुकथा और व्यंग्य की ओर बढ़ा। तीनों गद्य-विधाएँ हैं। आपने सहजता किस विधा में महसूस की?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : कहानी, लघुकथा और व्यंग्य- मैंने इन तीनों विधाओं में लिखा। कठिन कुछ भी नहीं था लेकिन मुझे व्यंग्य लेखन में आनंद आता था। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक अथवा सांस्कृतिक, सभी क्षेत्रों में विसंगतियों का पसारा है। इसमें लिखने में अच्छा भी लगता था और आनंद भी आता था। आनंद इसलिए भी बढ़ता गया क्योंकि कई पत्र-पत्रिकाओं ने मेरे व्यंग्यों का स्वागत किया। दैनिक भास्कर के राग दरवारी स्तम्भ में मेरे व्यंग्य प्रकाशित हुए। उर्मी कृष्ण अम्बाला से शुभ तारिका का सम्पादन करती थीं। उन्होंने पत्राचार कर पत्रिका के व्यंग्य भेजने का आग्रह किया। न्यामती, पंजाबी संस्कृति, हम सब साथ साथ, अक्स, अहल्या, सरस्वती सुमन, बाइसा जैसी लघु पत्रिकाओं और अनेक समाचार पत्रों में छपने से प्रोत्साहन मिला और व्यंग्य ही मेरी विधा बनकर रह गई।

डाॅ. शकुंतला कालरा : यह विधा-वैविध्य फिर किसी नई विधा को साथ लेकर चला? आपने बालसाहित्य-लेखन का आरंभ कब किया और उसकी किस विधा में लिखा तथा यह कहाँ-कहाँ प्रकाशित हुआ? 

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : इसी समय गजलों पर थोड़ा ध्यान आकर्षित तो हुआ, कुछ कहने-लिखने का प्रयास भी किया लेकिन कुछ जमा नहीं। अथवा यह कहें बालसाहित्य की ओर रुझान हो गया और गजलें छूट गईं। बालसाहित्य-लेखन के मेरे गुरु मेरे पौत्र-पौत्रियाँ ही हैं। जनवरी 2003 में विद्युत मंडल की सेवा से निवृत हुआ। 2009 समाप्त होते-होते मैं पाँच बच्चों का दादाजी बन चुका था। दिनभर धमा-चौकड़ी, शोर-शराबा, ऊधम, हल्ला इन सबने मुझे कब बालसाहित्यकार बना दिया मुझे मालूम ही नहीं पड़ा। व्यंग्य, कविता, कहानी, सब पीछे रह गया। बाल कविताएँ, बालगीत और कहानियों तक ही लेखन सीमित हो गया। लेखन कोई भी हो प्रोत्साहन चाहता है। इसी बीच में बुंदेलखंड साहित्य परिषद भोपाल के सौजन्य से दिल्ली जाना हुआ। साहित्य अकादमी के केंद्रीय कक्ष में कार्यक्रम था। मुझे भी “बुन्देली की दक्षिण सीमाएं” विषय पर आलेख पढ़ने का सौभाग्य मिला। वहाँ कुछ मित्र सलाहकारों ने कुछ ई-पत्रिकाओं के पते दिए और जुड़ने का आग्रह किया। पते तो ले लिये लेकिन कम्प्यूटर चलाना आता हो तब तो बात बने। खैर जैसे-तैसे बेटे की दुकान पर जाकर कुछ बटन चटकाने लगा। धीरे-धीरे दिमाग के ताले खुलना प्रारंभ हुए। बंद-चालू, टाइपिंग करना सीखा। हिंदी कृतिदेव तो बनी नहीं, यूनीकोड में सीखा। अंग्रेजी में टाइप करो निकले हिंदी में। ईमेल भी सीखा। फिर क्या है, रचनाकार, प्रवक्ता सृजन गाथा जैसी ई-संस्थाओं में बालगीत भेज दिए। क्रिया की जब प्रतिक्रिया हुई तो आनंद आ गया। फिर तो अनुभूति (शारजाह), लेखनी (यू.के.) साहित्यकुंज (कनाडा) हिंदी समय, अनहद कृति साहित्य शिल्पी जैसी वेब पत्रिकाओं में भी बालगीत प्रेषित की जाने लगे। रचना भेजी और तुरंत मतलब जल्दी ही जबाब। ‘अनुभूति’ ने गीत, गजल, क्षणिकाएँ, नवगीत, बाल कवितायेँ प्रकाशित कीं तो ‘लेखनी’ ने बालगीत, लघुकथाएँ और बाल कविताएँ प्रकाशित कीं। फिर एक पुराना वेब समाचार पत्र वेब दुनिया सामने आया। वह तो हर दो-तीन दिन में बालगीत बड़ी साज-सज्जा और चित्रों के साथ प्रकाशित करने लगा। इसी समय नेशनल दुनिया का जयपुर संस्करण शनिवार को छोड़कर रोज बालसाहित्य छापने लगा। उसमें देश के सभी बड़े और नामचीन बालसाहित्य छप रहे थे। मेरा भी नंबर लगने लगा। रोज लिखता रोज भेजता। फेसबुक से भी जुड़ा। उसमे भी बालगीत प्रकाशित करने लगा। बाल साहित्य का विशाल मंच डॉ. मुल्ला आदम अली ब्लॉग पर ढेर सारे कविताएँ, कहानियाँ सुंदर सजावट के साथ छपे, फिर प्रिंट बाल पत्रिकाओं की तरफ ध्यान चला गया। बालवाटिका, बाल किलकारी, बच्चों का देश, बालवाणी, बालप्रहरी, देवपुत्र, टाबर टोली, नंदन, बालभारती इन सबसे जुड़ा। अभी भी जुड़ा हूँ। बाल किलकारी, बालवाटिका, देवपुत्र में लिखता रहता हूँ। दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता ने कई बालगीत प्रकाशित किये। बालगीत-कविता, बाल कहानी, बाल एकांकी, सभी विधाओं में लिखा और छपा भी।

डाॅ. शकुंतला कालरा : बच्चों के लिए बालसाहित्य लिखना क्यों जरूरी है? उसकी क्या उपयोगिता है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : बाल साहित्य तो बच्चों के निर्माण का आधार स्तम्भ है। आज का बालक कल देश का नागरिक बनेगा। पैदा होते समय बच्चा गीली मिट्टी का लौंदा ही होता है। जिस सांचे में ढालेंगे वैसा ही वह बन जाएगा। उसके चरित्र निर्माण, उसके बौद्धिक विकास और संसार का वाह्य ज्ञान बच्चा कहानियों से ही पाता है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : बाल साहित्य के विषय उतने ही विस्तृत और व्याप्त हैं जितना बच्चों का मनोजगत् इसीलिए बच्चों के साहित्य के विषय भी अनेक हैं। बच्चों के बालकविता के सबसे प्रिय विषय क्या है? कहानियों के प्रिय विषय क्या है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : सब बच्चों का प्रिय विषय एक सा नहीं हो सकता। बच्चे के पारिवारिक परिवेश के अनुसार भिन्नता हो सकती है। लेकिन एक बात तय है बच्चों को मनोरंजन, मौज-मस्ती, जिज्ञासा जगाने वाली बालकविता ही पहली पसंद होंगी। जो रचनाएँ बच्चों को सीधा प्रकृति से जोड़ती हैं वे ही बच्चों की पसंद हो सकती हैं। धरती, आकाश, नदी, पहाड़, हवा, पानी, विभिन्न प्रकार के रंग, सबसे निकटस्थ रहने वाले जानवर, आम, संतरे, केले जैसे फल मम्मी-पापा, दादा-दादी, नानी-नाना जैसे विषय वर्षों से बच्चों के प्रिय विषय रहे हैं। आसमान की परियाँ, नानी-नाना, गुबारे, बिल्ली, चूहा अभी भी बच्चों का प्रिय विषय है। हालाँकि बाल पहेलियाँ भी बच्चों को रुचिकर लगती हैं। इस पर भी अभी कोई शोध नहीं हुआ है। इस पर भी काम होना चाहिए। बच्चों की कहानियों के विषय भी अनेक हैं। पौराणिक कथाएँ, विज्ञान कथाएँ, परीकथाएँ, आधुनिक भाव-बोध की कथाएँ, बच्चों की रुचि की कहानियाँ हैं। अनजानी दुनिया, अलौकिक जीव-जंतु के प्रति असीम कुतूहल होता है। अंतरिक्ष की रहस्य-रोमांच की दुनिया में तो वह खो ही जाता है। बच्चों के लिए हर कहानी आकर्षण पैदा करती है।

वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव लेखन करते हुए

डाॅ. शकुंतला कालरा : विषय के साथ शिल्प भी उतना ही जरूरी है जिसमें सबसे अधिक महत्त्व भाषा का है। बालकविता की भाषा कैसी होनी चाहिए? क्या अलंकृत भाषा को भी अपनाया जा सकता है? बालकविता में मुहावरे और लोकोक्तियाँ भाषा को सौंदर्य प्रदान करती हैं। साथ ही बच्चों को लोकभाषा के शब्दों से भी परिचित कराती हैं। कविता में इनकी कितनी भूमिका है? विदेशी भाषाओं के शब्द क्या हमें कविता में लेने चाहिए मेरा आशय यहाँ अंग्रेजी के शब्दों से है। कभी-कभी कवि बच्चों में प्रचलित अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से करते हैं जबकि वह शब्द हमारी अपनी भाषा में होते हैं। क्या आप विदेशी भाषा के शब्दों के प्रयोग से सहमत हैं?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : शिल्प तो बालकविता के प्राण हैं। बिना शिल्प के तो कविता नीरस होकर रह जायेगी। बालकविता की भाषा बिलकुल सहज और सरल होनी चाहिए। अलंकार उतने हों जितना बच्चे समझ सकें। शब्दकोश देखकर अर्थ देखना पड़े वह बालकविता नहीं हो सकती। लोकोक्तियाँ और मुहावरे तो कविता के सौन्दर्य में चार चाँद तो लगाते ही हैं बच्चों के ज्ञान में वृद्धि भी होती है। लोकभाषा मतलब अपनी भाषा, बच्चों को एकदम समझ में आ जाती है और वे तुरन्त इसका मर्म ग्रहण कर लेते हैं। हम सब चाहे बड़े हों अथवा बच्चे परंपरा में ही जीते हैं और भोगा हुआ सीखना बिल्कुल सहज होता है। लोकजीवन से जुड़े सन्दर्भ बच्चों को तुरंत ही समझ में आ जाते हैं।

जहाँ तक विदेशी भाषाओं के शब्दों को बालकविताओं में शामिल करने की बात है तो मेरा सोचना है कि जहाँ शिल्प का सौन्दर्य बढ़े और समय की माँग हो वहाँ बिलकुल लेना चाहिए। जब हम दिन भर फारसी, अरबी के शब्दों को अपना मानकर धड़ल्ले से उपयोग करते हैं तो अंग्रेजी ने क्या बिगाड़ा है और अब बच्चे हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करते हैं तो बालसाहित्यकार को क्यों परहेज हो। लेकिन अनावश्यक प्रयोग भी ठीक नहीं है। मेरी ही एक कविता “होगी पेपरलेस पढ़ाई” शीर्षक से है। इस कविता को लोगों ने पसंद किया। नया प्रयोग है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि जबरदस्ती अंग्रेजी शब्दों को ठूँसें। जहाँ जरूरत हो तो ही लें। देखिए कविता-

होगी पेपर लेस पढ़ाई,

यही आजकल हल्ला।

कागज की तो शामत आई,

यही आजकल हल्ला।

कागज पेन किताबों की तो,

कर ही देंगे छुट्टी।

बस्ते दादा से भी होगी,

पूरी-पूरी कुट्टी।

पर होगी कैसे भरपाई,

बहुत आजकल हल्ला।

रबर पेन्सिल परकारों का,

होगा काम न बाकी।

चांदा, सेटिसक्वेयर, कटर भी,

होंगे स्वर्ग निवासी।

डाॅ. शकुंतला कालरा : प्रभुदयाल जी, आपने लेखन तो बहुत पहले शुरू किया और आप पत्र-पत्रिकाओं में भी खूब छपे, पर आपने अलग-अलग पुस्तकें प्रकाशित देर से क्यों करवाई?  

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : पत्र-पत्रिकाओं में छपना और फिर पाठ्यक्रम मे शामिल होना, मेरे लिए आश्चर्य ही था। मेरा उद्देश्य कि बाल साहित्य बच्चों तक पहुँचे सफल होता दिख रहा था। किताबें प्रकाशन की ओर कोई रुचि शेष नहीं थी। मेरा बालसाहित्य लगभग सारा का सारा वेब पत्रिकाओं में उपलब्ध है। फिर छिंदवाड़ा सरीखी छोटी जगह में रहकर प्रकाशकों की तलाश कठिन ही है। आखिर कुछ मित्रों के आग्रह से मैंने कुछ चुनिन्दा रचनाएँ चुनकर बाल कविताओं की दो पुस्तकें और शिशु गीतों को दो पुस्तकें प्रकाशित करवाईं।

डाॅ. शकुंतला कालरा : क्या आपका अभी भी कुछ अप्रकाशित साहित्य शेष है। अप्रकाशित से मेरा आशय जो पुस्तक रूप में न आया हो?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : पुस्तक रूप में प्रकाशन के लिए अभी तो बहुत सारा साहित्य बाकी है। अधिकांश बालगीत-कवितायेँ ही हैं। कुछ बाल एकांकी हैं। कुछ बुन्देली साहित्य है। यथार्थ में मुझे भी नहीं मालूम कितना साहित्य प्रकाशन के लिए शेष रह गया गया है। कुछ आदत ऐसी रही है कि कहीं भी कागज मिला, अगर फुर्सत रही और मन में कुछ हलचल हुई तो बस लिखा। कहीं चार पंक्तियाँ कहीं आठ और कहीं पूरी कविता या बालगीत। विज्ञापन के कागज, आमन्त्रण पत्र जहाँ पीछे कोरी जगह रहती है कई ऐसे कागज मिल जायेंगे। अधूरा बहुत सा है। बालकवितायें-बालकहानियाँ, कविता-कोष, वेब दुनिया, साहित्य कुञ्ज, प्रवक्ता, रचनाकार, हिंदी कविता डॉट कोम, जय विजय, 4 टू 40 डॉट कॉम, सेतु, भारत दर्शन डॉट काम एन जेड, अनहद कृति डॉट कॉम, डॉ. मुल्ला आदम अली डॉट कॉम इत्यादि वेब साइटों पर रचनाएँ उपलब्ध हैं। प्रारंभिक दौर की रचनाएँ तो डायरियों, कापियों, रजिस्टरों में हाथ से सुन्दर अक्षरों में लिखी हुई सुरक्षित हैं, लेकिन बाद में..........। बहुत सी ऐसी रचनाएँ हैं जो ईमेल से छपने कहीं भेजी और नहीं छपी और विस्मृत हो गईं। उनकी तलाश भी जारी है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : बालकविता के अतिरिक्त आपने एकांकी विधा में भी बड़े बढ़िया एवं सुंदर ढंग से पदार्पण किया है। आपकी एकांकियाँ रंगमंच से जुड़ी हैं और अभिनेय हैं। वैसे कहा जाता है कि नाट्य-विधा के लिए स्वयं रंगमंच पर जाकर उनका मंचन देखना आवश्यक है। बच्चों के बीच बैठकर, उनकी बोलचाल की भाषा को समझकर, उन्हीं की भाषा में छोटे-छोटे संवादों का प्रयोग करना, ये सफल नाटक के लिए आवश्यक है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : इंसान का सारा जीवन स्वयं में ही नाटक है। क्या हम सब नाटक के पात्र नहीं है? सुबह से शाम तक हम रोज नाटक करते भी हैं और देखते भी हैं। बच्चों के साथ डॉयलाग डिलीवरी और वर्तमान जटिल समस्याएँ और उनका निराकरण मंचित होते हुए जब हम मन में सोचते हैं तो नाटक का जन्म होता है। हाँ, यह बात सच है कि नाट्य-विधा के लेखक को मंच पर जाकर बारीकी से अध्ययन करना चाहिए। बच्चों की बोलचाल की भाषा और संवादों को समझना चाहिए। लेकिन मुझे इसकी बहुत अधिक आवश्यकता नहीं पड़ीं। बचपन में मैंने बहुत नाटक देखे। रहली में रहने के दौरान हर साल रामलीला का मंचन होता था। रामलीला के समापन के बाद नाटकों का दौर चलता था। दस पन्द्रह नाटक तो होते ही थे। रूप बसंत, भक्त प्रहलाद, राजा हरिश्चंद्र, ध्रुव इत्यादि कई नाटक मैंने देखे। नौटंकियाँ भी खूब देखीं। स्कूल के दिनों में भी सालाना कार्यक्रमों में नाटक होते थे। वह भी खूब देखे। बच्चों के साथ रहते हुए बोलचाल की भाषा, सरल संवाद अपने आप जन्म लेते हैं। यहाँ स्कूलों के कार्यक्रमों में बच्चों के नाटक जरूर देखे हैं। नाटक इस तरह का हो कि बिना किसी तामझाम के कहीं भी मंचित किया जा सके। मेरी एक बाल एकांकी “चलो संभल के” का सिलीगुड़ी (बंगाल के बी. एड. के छात्रों द्वारा) में अपने कॉलेज केंपस में ही मंचन बड़ा रोमांचकारी लगा। एकांकी एकशाला के बच्चों की शाला बस के सन्दर्भ में है जिसका चालक नशे में वाहन चला रहा है और बच्चे भयभीत हैं। यह बाल एकांकी कई प्रकाशकों ने पाठ्यक्रम में शामिल किया। यह शायद मुझे ईश्वर-प्रदत्त आशीर्वाद है कि बिना किसी विशेष योग्यता अथवा अध्ययन के कुछ एंकाकी बच्चों तक पहुँचा सका। बाल एकांकी यदि किन्हीं गेय पंक्तियों के साथ समाप्त हों तो एकांकी का आनंद कई गुना बढ़ जाता है। चलो संभल के अंत में..... 

दुर्घटना से देर भली है, ऐसे लिखे ढेर से नारे। 

पढ़ो सूचना आँख खोलकर, बोर्ड लगे हैं सड़क किनारे। 

वाहन इतना तेज चलाओ, रहे नियंत्रण में हाथों के। 

अगर नियंत्रण टूट गया तो, समझो पल अंतिम साँसों के। 

धीरे चलो संभलकर चलना, यही बुजुर्गों की शिक्षा है। 

आँख खोलकर बड़े धैर्य से, आगे बढ़ना ही अच्छा है। 

थोड़ी सी लापरवाही से, कितने लोग जा रहे मारे। 

पढ़ो सूचना आँख खोलकर, बोर्ड लगे हैं सड़क किनारे। 

ये पंक्तियाँ मुझे भी रोमांचित करती रहतीं हैं। यह सन्देश ही शायद पाठकों को पसंद आया हो। मेस्कॉट एजूकेशन ने कक्षा छठी में इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया तो मुझे बहुत अच्छा लगा। और भी कई किताबों में शामिल हुआ।

डाॅ. शकुंतला कालरा : प्रभुदयाल जी, आपकी सौ से अधिक रचनाएँ स्कूल के पाठ्यक्रम में छपी हैं जो आपके श्रेष्ठ बालसाहित्यकार होने का पुष्ट प्रमाण है। किस-किस विधा में ये रचनाएँ शामिल की गई हैं?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : मेरी कई रचनाएँ पाठ्यक्रम में शामिल हैं यह मुझे स्वयं भी आश्चर्यचकित करता है। सौ के लगभग प्रकाशनों में शामिल हैं। कई रचनाएँ कई किताबों में शामिल हैं और कहीं-कहीं एक ही किताब में एक से अधिक रचनाएँ शामिल हैं। इसलिए रचनाओं की गिनती करना थोड़ा कठिन है। फिर भी सौ से अधिक जगहों में रचनाएँ शामिल हैं। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है। मेरा बालसाहित्य सर्वथा सब जगह उपलब्ध है। प्रकाशकों ने भरपूर उपयोग भी किया है। यह भी हो सकता है कि और भी कई रचनाएँ पाठ्यक्रम में शामिल हों और मुझे ज्ञात भी न हो। सभी विधाओं में रचनाएँ शामिल हैं, जिसमें बाल कविताएँ सर्वाधिक हैं। नाटक बस्तों की फरियाद, चलो संभल के और भोजन नहीं करो बर्बाद शामिल हैं। कई कहानियाँ भी शामिल हैं।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपने बुंदेली भाषा में भी सुंदर रचनाएँ बालसाहित्य को दी हैं। ये कौन-कौन सी रचनाएँ हैं। क्या पुस्तक के रूप में भी कोई बुंदेली भाषा की कृति आई है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : मेरा जन्म स्थान दमोह है, ठेठ बुन्देली भाषा, बुन्देली संस्कारों का गढ़। बुन्देली मेरी आत्मा में रची बसी है। मध्यप्रदेश के चारों कोनों में सेवाकाल के दौरान मैं रहा। मालवी, निमाड़ी, बघेली, छत्तीसगढ़ी सब बोलियों का थोड़ा-थोड़ा स्वाद चखा, लेकिन बुन्देली... इसका अपना आनंद है। मैं दिसंबर, 1996 में स्थानांतरित होकर छिंदवाडा आ गया था, फिर बस यही बस गया। महाराष्ट्र से सटा होने के कारण यहाँ की बोली शुद्ध बुन्देली नहीं है। गोंडी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ मराठी का मिश्रण है। फिर भी यह है बुंदेलखंड का ही हिस्सा। मुझे बुंदेलखंड का जानकर यहाँ के जाने-माने साहित्यकार (अब स्मृति शेष) धरनीधर जी ने एक कवि गोष्ठी में मुझे बुन्देलखंड साहित्य परिषद् का जिला अध्यक्ष घोषित कर दिया। मध्यप्रदेश बुन्देलखंड परिषद् भोपाल इकाई से सम्बद्ध होने से मुझे दिल्ली, ओरछा, भोपाल के कई कार्यक्रमों में शिरकत करने का अवसर मिला। बुन्देली में रचनाओं का लेखन भी शुरू हुआ। बुन्देली में कई रचनाएँ लिखीं। हालाँकि बालसाहित्य की ओर झुकाव हो जाने के कारण इस तरफ रुचि कम हो गई। फिर भी जितना लिखा लोगों ने पसंद तो किया। सरस्वती वंदना बुन्देली में लिखी, बुन्देली के इतिहास और शौर्य पर गीत लिखा, पर्यावरण और जल-संरक्षण पर एक गीत लिखा, एक गीत अध्यात्म पर भी लिखा है। बुन्देली भाषा में कुछ बालगीत भी लिखे जिसे डॉ. सुधा गुप्ता ने शोध-प्रबंध में शामिल किया है। अभी तक बुन्देली की कोई भी किताब प्रकाशित नहीं हुई। हाँ इंटरनेट पर रचनाएँ उपलब्ध हैं। कुछ रचनाएँ बुंदेलखंड कनेक्ट पत्रिका जो बांदा उत्तरप्रदेश से निकलती है उसमें छपी हैं। वैसे भी बुन्देली में छपने वाली कोई भी मैगजीन इस क्षेत्र में नहीं है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : मैंने बुंदेली भाषा में आपका एक लंबा, बड़ी मीठा, मनभावन, सरस गीत पढ़ा था- ‘धन्य धरा बुंदेली’। इसकी कुछ पंक्तियाँ कृपया आप सुनाएँ गे?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : यह मेरा भी प्रिय बुन्देली गीत है। बुंदेलों की शौर्यगाथा और संस्कृति का संगम। सुनिए यह गीत-

धन्य धरा बुन्देली,

धन्य धरा बुन्देली है जा धन्य धरा बुन्देली।

राम लला को नगर ओरछा कित्तो लोक लुभावन,

कल-कल, हर-हर बहत बेतवा कित्ती नौनी पावन।

बीच पहरन में इतरा रई जैसें दुल्हन नवेली,

धन्य धरा ............................................।

वीर नारियाँ ई धरती पर रई दुश्मन पे भारी,

जान लगा कें लड़ी लड़ाई जीतन कबऊँ ने हारीं।

जुद्ध भूमि में लछमी बाई तलवारन सें खेली,

धन्य धरा ............................................।

गौंड वंश की रानी ने तो कैसो कहर ढहाओ,

दुर्गावती नाम सुनकें तो अकबर लौ थर्राओ।

सिंगौरगढ़ में रानी की ठांडी अबे हबेली,

धन्य ................................................।

आल्हा जैसे वीर बहादुर ई धरती पर आये,

मरे ने कबहूँ कौउ के मारे ईसें अमर कहाए।

दुश्मन खों तो ऐसें पोलो जैसें गाजर मूली,

धन्य ...............................................।

सरनागत खों सरन दये में बुन्देली रये आगे,

समर भूम में हटे कबहूँ ने अपनी पीठ दिखा के।

कबहूँ ने छोड़ी अपनी भासा कबहूँ ने अपनी बोली,

धन्य ................................।

डाॅ. शकुंतला कालरा : कुछ बातें आपके कवि रूप से हो जाएँ। आप नवगीतकार भी हैं। इस क्षेत्र की आपकी कौन सी कृतियाँ हैं? किन-किन गीतकारों से आप प्रभावित हुए हैं? 

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : बालगीत लिखते हुए मैं ‘अनुभूति’ से जुड़ा, जो एक साहित्यिक मंच है। मैनें कुछ गीत लिखे थे जो ‘अनुभूति’ की टीम ने अपनी वेबसाईट पर प्रकाशित किये। अनुभूति का संचालन पूर्णिमा वर्मन जी करती हैं। उनका प्रोत्साहन मिला तो नवगीत की पाठशाला से जुड़ा और नवगीत लिखे। व्यंग्य लिखते रहने के कारण व्यस्थाओं के विरोध में लिखना मेरा जुनून था। इसी विचार में नवगीत भी लिख गया। एक नवगीत की कुछ पंक्तियाँ जो रिश्वत खोरी पर चोट है, आपको सुनाता हूँ- 

“पैसा रहा हाथ में”

उसने सौ मांगे तो मैंने,

दो सौ उसे दिए।

पैसा रहा हाथ में तो फिर,

हर दिन उत्सव है।

ऊंची कुर्सी पदवी है तो,

रोज महोत्सव है।

जिस दिन डैडी ढेर-ढेर से,

रूपये लाते हैं।

उस दिन बीवी बच्चों के,

चेहरे खिल जाते हैं।

जल जाते हैं बिन दीवाली,

ढेरों ढेर दिए।

इसी का अंतिम पद देखिये।

झोपड़ियों में जिस दिन भी,

चूल्हा जल जाता है।

मानो उस दिन बहुत बड़ा,

उत्सव हो जाता है।

देख तवे पर रोटी बच्चे,

खुश हो जाते हैं।

बड़ी जोर से भारत माँ की,

जय चिल्लाते हैं।

आज आप भी भारत माँ की,

जय-जय-जय कहिये।

नवगीत लिखते हुए इसी तर्ज पर कुछ बाल गीत भी नवगीत के रूप आये हैं। ‘अम्मा को अब भी है याद’ पुस्तक से यह गीत देखिये-

शीत लहर फिर आई आई

गलियों में शोर हुआ,

शोर हुआ सड़कों पर।

शीत लहर फिर आई।

भाजियों के दौर चले,

कल्लू के ढाबे में।

ठण्ड नहीं आई है,

फिर भी बहकावे में।

गरम चाय ने की है,

थोड़ी सी भरपाई।

शीत लहर ....

इसी तरह और भी नवगीत हैं, बाल नवगीत हैं। बालगीत, नवगीत मैं लिख रहा हूँ यह सोचकर तो कभी नहीं लिखा। लिखने के बाद मालूम पड़ा यह नवगीत है। मैं प्रभावित कभी किसी से नहीं रहा। जो हूँ जैसा हूँ अपने जैसा हूँ। बचपन में सबसे पहले जो कविताओं की किताब पढ़ीं, वह पढ़ी हरिवंश राय बच्च्च्न जी “सतरंगनी’ जो उन्होंने अभिताभ बच्चन के जन्म होने पर अपनी पत्नी तेजी बच्चन को समर्पित की थी। उनकी रचनाएँ मुझे अच्छी लगती थीं। बाद में तो मुझे गीतकार प्रदीप की रचनाएँ जो अधिकतर देश प्रेम पर हैं बहुत भातीं है। नीरज, बुद्धिनाथ मिश्र, विष्णु सक्सेना के गीत भी बहुत प्रभावशाली होते हैं। अभी तक नवगीतों की कोई भी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। यथार्थ में इस तरह से मैं बहुत उदासीन रहा हूँ।

डाॅ. शकुंतला कालरा : प्रभुदयाल जी आपने आत्मकथा भी लिखी है। अक्सर आत्मकथाकार अपने जीवन के उत्तरार्ध में आत्ममंथन करता है। आत्मविश्लेषण करता है। वही उसे आत्म-लेखन के लिए प्रेरित भी करता है। आत्मकथा स्वीकारोक्ति होती है। आपकी आत्मकथा- लेखन की प्रेरणा क्या रही?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : आत्मकथा लिखने की इच्छा शायद हर लेखक की होती हो। मैंने तो बस यूँ ही सोचा अपने बारे में कुछ लिख लूँ तो बस लिख दिया। थोड़ी सी यह भावना भी मन थी कि परिश्रम का फल मीठा होता है यह लोग जान सकें। विज्ञान का विद्यार्थी होकर और विद्युत् मंडल में इंजीनियर का काम करते हुए भी साहित्य की साधना की जा सकती है। यह आत्मकथा तो जीवन का लघुचित्र जैसा ही है। यदि समय मिला और स्वस्थ रहा तो इसे विस्तार में लिखने का प्रयास करूँगा।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपने बालगीत भी लिखे हैं। इन्हें मैंने डाॅ. सुधा गुप्ता की किताब ‘मध्य प्रदेश की बोलियाँ’ में बालकाव्य में पढ़ा था। आपने प्रभातियाँ भी लिखी हैं। ग्राम्य परिवेश की प्रभाती अत्यंत ही खूबसूरत हैं। कृपया एक प्रभाती आप सुनाएँगे क्योंकि आप तो मंचीय कवि रहे हैं?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : हाँ मैंने बुन्देली भाषा में भी बालगीत लिखने का प्रयास किया है। जब डॉ. सुधा गुप्ता बालसाहित्य पर शोध कर रहीं थीं तो उनका एक टाॅपिक बोलियों में बालगीत भी था। इसी तारतम्य में उन्होंने फोन पर अपनी इच्छा जाहिर की। मैंने कोशिश करके कुछ बुन्देली गीत उन्हें दिए। उन्हें पसंद आये और उन्होंने अपने शोध प्रबंध में इन्हें शामिल किया। एक प्रभाती जो मुझे बड़ी प्रिय है सुनियेगा। आपको भी अच्छी लगेगी-

सूरज ऊंगत सी उठबो

सूरज निकर परो पूरब सें,

परे-परे तुम अब लौ सो रये।

कुनर-मुनर अब काये करत हो,

काये ने उठ कें ठांड़े हो रये।

ढोर ढील दये हैं दद्दा ने,

और चराबे तुम्खों जाने।

चना चबैना गुड के संगे,

बाँध दओ है बऔ अम्मा ने।

अब तो उठ्जा मोरे पुतरा,

कक्का बेजा गुस्सा हो रये।

कुनर मुनर .................

कलुआ को मोड़ा तो कबको,

बखर हांक कें हारे ले गओ।

बड़े साव की गैया बया गई,

ऊको मोड़ा तेली दे गओ।

मझले कक्का कब के उठ गये,

कुल्ला करकें गोड़े धो रये।

कुनर मुनर...........

डाॅ. शकुंतला कालरा : प्रभुदयाल जी, क्या आपने किसी अखबार में नियमित स्तंभ भी लिखे हैं? 

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : जी हाँ, मैंने नागपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र लोकमत समाचार में नियमित स्तम्भ लिखा। ‘तीर तुक्का’ नामक स्तम्भ में लगभग तीन साल लिखा। विषय समसामयिक होते थे। लगभग सौ व्यंग्य लिखे जो छपे।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपका साहित्य-लेखन बहुआयामी है। बालसाहित्य में, विशेष रूप से बालकविता में आपकीे विशेष पहचान है। बालकाव्य के विविध रूपों में लिखा है। लोरी बालसाहित्य की पहली विधा है। आपने लोरियाँ भी लिखी हैं? निरंकारदेव सेवक का कहना है कि लोरियाँ लिखना वास्तव में पुरुषों का काम नहीं है। पुरुष प्रयत्न करके भी भावों की वह कोमलता और कल्पनाओं की वह बारीकी नहीं ला सकते, जिनके आधार पर मधुर और सरस लोरियाँ लिखी जाती हैं। आपको क्या लगता है कि क्या सर्वत्र ऐसा है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : लोरी बालसाहित्य की पहली विधा है इसमें दो मत हो ही नहीं सकते। लोरी लोकजीवन के महासागर में जल तरंगों के उछाल सी मन को उद्वेलित करती रही हैं। बिलकुल, अनपढ़ महिलाओं के पास भी बच्चे के जन्म लेने बाद उसकी पीठ थपथपाने के साथ ही गुनगुनाने के लिए कुछ न कुछ तो रहता ही है। मैंने ग्राम्य-जीवन में रात्रि के समय घोर अंधकार और सन्नाटे में लोरियों की आवाज सुनी है। सोजा बारे बीर, बीर की बलैयां ले जा जमना के तीर ........। जहाँ तक मेरे लोरियाँ लिखने का प्रश्न है मैंने बाल गीत लिखे और जब ठीक से परखा देखा तो मालूम पड़ा कि यह तो लोरी है। मतलब यह सोचकर कि मैं लोरी लिखूँ मैंने लोरी नहीं लिखी। निरंकारदेव सेवक का कथन कि पुरुष लोरियाँ नहीं लिख सकते या उनका काम नहीं क्योंकि भाव और कोमलता के स्तर पर वह महिलाओं के सामान नहीं हो सकते जो लोरियाँ जननी होती हैं। कुछ हद तक ठीक हो सकता है लेकिन पूरी तरह शायद सही नहीं हो।

कन्हैयालाल मत्तजी ने अच्छी लोरियाँ लिखी हैं और भी कई बालसाहित्यकार हैं जिन्होंने लोरियाँ लिखीं। मत्त जी की एक लोरी- ‘‘सो जा प्राणों के अभिनंदन, सो जा!/ तुझको किसकी याद सताती? हिलुर-हिलुर कर हिचकी आती! आँखें सूज चलीं हैं अब तो,/ मेरा नम्र निवेदन सो जा।’’ मेरा मत है पुरुषों में न्यूनाधिक स्त्रियों के गुण होते हैं और इसके उलट स्त्रियों मे पुरुषों के। अब तो महिलायें अन्तरिक्ष में जा रही हैं, बॉक्सिंग रिंग में मुक्के बाजी कर रहीं हैं। इसके विपरीत पुरुष घर के सारे काम झाडू पोंछा बर्तन और बच्चों की देख-रेख के सारे काम कर रहे हैं। संसार के समर क्षेत्र में भाव भावनाएँ सभी कुछ, परिस्थितियों के वशीभूत हो जाता है। करुणा, ममता, वात्सल्य-भाव पुरुषों से लोरियाँ लिखवा लेता हो।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का साहित्यिक जीवन, सम्मान और बाल साहित्य यात्रा

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपने अनेक शिशुगीत भी लिखे हैं। शिशुगीत और शिशुकविता एक हैं या इनमें कोई अंतर है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : मैंने शिशुगीत लिखे हैं यह सच है, लेकिन यह भी सच है ये अनायास ही लिखा गए हैं बिना किसी पूर्व योजना के। मैं तो बस तीन-चार साल से छोटे बच्चों को ही शिशु मानता हूँ। इससे बड़े बच्चे तो अब शिशु रह ही नहीं गये। मोबाइल ने ग्यानी बना दिया है। शिशु अब लोरी सुनते नहीं क्योंकि आज की माँ को लोरी आती नहीं। मैंने कई वर्षों से शहर में किसी भी महिला के मुँह से बच्चे को सुलाते समय लोरी नहीं सुनी। लेकिन प्रकृति हर पल, हर क्षण गाती रहती है, नाचती रहती है और स्वाभाविक रूप से शिशु, गीत-संगीत के लालायित रहता है। मेरी सोच है कि लय, तुक, शब्दों का दुहराव और मधुरिम ध्वनि का रसानंद शिशुओं के ओंठों पर मुस्कान ला देता है। कविता जब गीत बन जाती है, गीत जब संगीत बन जाता है और संगीत से मन मयूर नृत्य करने लगता है तो परम आनंद की प्राप्ति होती है। कविता हो या गीत, कला तो प्रस्तुतीकरण की है। बच्चे को तो हाथ से बजाई चुटकी में भी कविता गीत और संगीत का आनंद आ जाता है। मुँह से बजाई सीटी, हाथ की बजाई ताली यह सब कुछ बच्चे के मन में गुदगुदी पैदा करता होगा तभी तो वह तुरंत प्रतिक्रिया देता है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : बालसाहित्य की आधारशिला आप किसे मानते हैं कविता को या कहानी को या दोनों को? क्योंकि जन्म के साथ ही शिशु को सुलाने में माँ लोरी और थोड़ा बड़ा होने पर कहानी सुनाती है।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : बालसाहित्य का मतलब ही बच्चों का साहित्य है। इसमें कविता, बालगीत कथा, कहानी, नाटक जैसी विधाएँ शामिल हैं। लेकिन नींव के रूप में तो कविता-गीत, लोरी के रूप में आदिकाल से उपस्थित हैं। शाला की प्राथमिक कक्षाओं में सर्वप्रथम बालगीत अथवा ईश्वर की प्रार्थना का समावेश रहता है। वर्तमान में भी जन-मन-गण राष्ट्रगान से ही स्कूल के क्रियाकलाप शुरू होते हैं। यथार्थ में गीत, संगीत, कविता, प्रकृति से हमे वरदान स्वरूप उपहार में मिले हैं। सर-सर, हर-हर, टप-टप, टन-टन, ढन-ढन ये गीत भी है संगीत भी है। गीत, संगीत, कविता हमें प्रकृति से जोड़े रखती है। यह सूत्र बड़ों की तरह बच्चों पर भी लागू है। बच्चे निश्छल, कोरी कॉपी होते हैं। उन्हें गीतों के द्वारा प्रकृति से जुड़ाव तुरंत हो जाता है।

कहानियाँ जीवन जीने का ढंग सिखाती हैं। नीति-अनीति, उचित-अनुचित, ग्राह्य-अग्राह्य यह सब कुछ कथाओं-कहानियों से ही बच्चों को मिलता है। हम सब कवितायें, कहानियाँ पढ़कर ही बड़े हुए हैं और आज जीवन के हर मोड़ पर चुनोतियों से जूझने में खुद को सक्षम पाते हैं।

डाॅ. शकुंतला कालरा : कविताएँ लिखते-लिखते आपको क्यों लगा कि बच्चों के लिए कहानी लिखना भी जरूरी है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : कविताओं में अभिव्यक्ति का दायरा सीमित होता है। अपने मन की बात को वृहत रूप में व्यक्त करना। यह कहानी में ही सहज होता है। फिर कहानियाँ तो बच्चों को जन्म के कुछ दिन बाद से ही घुट्टी के रूप में पिलाई जाने लगती हैं। बच्चों के बौद्धिक विकास, प्रकृति का ज्ञान, नैतिक शिक्षा, दया, धर्म, करुणा प्रेम कहानियों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुँचाया जा सकता है। बचपन के भोगे हुए सच कागज पर उकेरना ज्यादा सहज होता है। यही मैंने कुछ किया और कुछ कहानियाँ बन गईं।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपने बच्चों के लिए अच्छी कहानियाँ लिखी हैं। आपको क्या लगता है कि बच्चों की रुचि का क्षेत्र क्या है? आज बच्चों का आई.क्यू. बहुत ही तीव्र हो चुका है। वे कपोल-कल्पित विषयों पर आधारित कहानियों को नकार देते हैं। वे किस तरह की कहानियाँ पसंद करते हैं?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : यह तो नहीं पता कि अच्छी हैं या नहीं लेकिन मैंने कहनियाँ लिखीं जरूर हैं। 22 कहानियों की एक पुस्तक “दादाजी का पिद्दू” शीर्षक से रवीना प्रकाशन दिल्ली से छपी है। इनमे से कुछ कहानियाँ पाठ्यक्रम में भी शामिल हुई हैं। एक कहानी “लम्पू और गुलाबी” प्रकाश मनु जी के सम्पादन में छपी पुस्तक “श्रेष्ठ बाल कहानियाँ” भाग-3 में शामिल हैं। यह पुस्तक साहित्य अकादमी दिल्ली से प्रकाशित है। कहानियों के प्रति बच्चों की रूचि के बारे में मत भिन्नता हो सकती है लेकिन छोटे बच्चों को तो अभी भी परी वाले किस्से ही अच्छे लगते हैं। मोबाइल के पदार्पण से बच्चों का कहानियों से मोह भंग हुआ है परन्तु मोबाइल में भी रहस्य और रोमांच ही देखना पसंद कर रहे हैं। अभी यह भी देखने में आ रहा है बच्चों में पुरा कथाओं जैसे महाभारत, रामायण, सिंहासन बत्तीसी, जैसी कथाओं में रुचि जागृत हो रही है। बच्चे यह भी बखूबी जानते कि परियाँ तो बस कहानी में हैं, सच में नहीं हैं। आई.क्यू तीव्र होने से से बच्चों की समझ में एकदम उछाल आया है। टी.वी., मोबाइल में धार्मिक, ऐतिहासिक सीरियल, कहानियाँ बच्चों का मनोरंजन तो करती ही हैं, उनकी ज्ञान पिपासा को भी शांत करती हैं। बच्चों को क्या पसंद है उनकी स्थिति पर निर्भर करता है। गाँव के बच्चे की पसंद जरूरी नहीं कि किसी महानगर के बच्चे सामान हो। पुराने सामान को नये रंग-बिरंगे पैकेट में लपेटकर परोसा जा रहा है। हम कहते हैं यह नया है लेकिन पुराने लोग जानते हैं हमारा ज्ञान, हमारी कथाएँ विदेशों में जाकर पाॅलिश करके, चमकाकर नये रूप में हमें और सारी दुनिया में बाँटी जा रही हैं। जादू, साहस, रहस्य, रोमांच, हवा में उड़ना, शक्तिमान, डोरेमाॅन, स्पाईडरमैन बस ऐसे कंटेंट कहानियों में हैं। हमारे देवता के हाथ के पंजे से आग निकलती थी, तीर निकलते थे, आग के गोले निकलते थे तो अभी की कहानी में नायक हाथ में दस्ताना पहने हैं उसमें से किरणें निकलती हैं। हाँ आज की दुनिया को रंगीन ज्यादा दिखाने लगे हैं, जो दिखाई दे रहा है वही पढ़ा भी जा रहा है। विज्ञान कथाओं ने शहरी बच्चों को अपने मोहपाश में बाँध लिया है। वह है तो काल्पनिक लेकिन नई जानकारी और नये ज्ञान में वृद्धि भी करता है। नीरस कथाएँ जिसमें हास-परिहास, रोमांच, रहस्य न हो बच्चे नकार देते हैं। पहले भी मैंने कहा है कि हर कल्पना के पीछे सार्थक होने की संभावना छुपी है लेकिन यह संभावना हर वर्तमान में यथार्थ नहीं हो सकती।

डाॅ. शकुंतला कालरा : ऐसा माना जाता है कि बच्चों को केवल काल्पनिक विषयों पर आधारितक कहानियाँ ही नहीं दी जानी चाहिए। उन्हें यथार्थ की ठोस जमीन से भी परिचित होना चाहिए, जो पथरीली और कँटीली है। इस विषय में आप क्या सोचते हैं?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : कल्पना भविष्य हैं और यथार्थ वर्तमान। शिशु अवस्था से बचपन और बचपन से किशोरावस्था की तरफ बढ़ते हुए बच्चे कितने सपने देखते हैं, कितनी कल्पनाएँ करते हैं लेकिन जब सच से सामना होता है तो सब कुछ धरा रह जाता है। साधन-विहीन, निर्धन बच्चों को तो बचपन से ही ठोस जमीन पर चलना पड़ता है। उनके तो पग-पग पर काँटे बिछे होते हैं। उनका जीवन तो स्वयं में ही एक कहानी बन जाता है। परेशानी उन्हें हैं जो शुरू से ही आसमान में उड़ने लगते हैं और उड़ते रहना चाहते हैं। उन्हें बताना होगा कि जमीन ठोस है, उस पर काँटे हैं, पत्थर हैं। भिखारियों, पन्नी बीनने वालों, रेहड़ी लगाने वालों के नसीब में कहानियाँ होती भी हों इसमें तो संशय ही है। यह शोध का विषय हो सकता है। हमारी शारीरिक संरचना भी विचित्र है। इसमें कितने भटकाव हैं। हम मूवी देखते हुए या कहानी पढ़ते हुए दुःखांत दृश्यों को देखकर-पढ़कर रो पड़ते हैं और हँसोड़ जोकरों, कामेडियनों के क्रियाकलापों को देखकर हँसने लगते हैं। जबकि हमें पता होता है कि यह सब झूठा है। मुझे लगता है परी-कथाओं में जादू की छड़ी थी, गुब्बारे थे, परियाँ थीं, जिज्ञासा थी तो मीठी सी गुदगुदी थी और मस्ती भरा आनंद भी था। लेकिन अभी की कहानियों में रहस्य, रोमांच, जादू, रंगीनियाँ और चमक-धमक ऐसी है कि बच्चों में उत्तेजित होने की संभावना भी अधिक बनी रहती है

डाॅ. शकुंतला कालरा : परीकथाओं को लेकर भी बहस चलती आ रही है। कविता हो या कहानी बच्चे परीकथाओं पर केन्द्रित रचनाओं को पसंद करते हैं। थके-हारे, तनावग्रस्त, अवसाद में डूबे बच्चों में परियाँ आशा का संचार करती हैं। दूसरा पक्ष मानता है कि यह बच्चों में अकर्णमयता लाती है। बच्चा परी की छड़ी को जादू की छड़ी मानकर उससे बिना मेहनत किए फल पाना चाहता है। यह भी सच है कि ये बच्चों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। आपके विचार?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : परियों का कथा-संसार बहुत पुराना है। पुरातत्व के स्थलों में कई स्थानों पर नारी पात्रों के शरीर में पंख दिखाए गये हैं। पुरानी कहानियों में भी परियों के किस्से खूब पढ़े और ग्रामीण लोक-जीवन में तो पग-पग में परियाँ, उड़ने वाले घोड़े और न जाने कितने मिथकों के चर्चे होते रहते हैं। हमें यह देखना पड़ेगा कि परियों का कंसेप्ट आया कहाँ से। यह केवल मिथक है, कोरी गप्प है या इसमें किंचित सच्चाई भी है। इसके लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा और वर्तमान से उसकी तुलना करना होगी। जो उपलब्धियाँ ध्यान, धारणा, तप, साधना, अध्यात्म से पहले हो चुकीं हैं क्या आज विज्ञान उन्हें पाने के लिए प्रयासरत नहीं है? हनुमान चालीसा की चौपाई - ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता’ अधिकाँश भारतीय रोज पढ़ते हैं। भारत के ऋषियों, मुनियों के पास आठ सिद्धियाँ थीं- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व और वशित्व। इसमें शरीर को छोटा-बड़ा कर लेना, भारी-हल्का कर लेना, कहीं भी पहुँच जाना और मनचाही वस्तु प्राप्त कर लेना, किसी की भी इच्छा को पूर्ण कर देना और किसी को भी वश में कर लेना इत्यादि शामिल है। इतना सब था तो क्या परियों की उत्पत्ति नहीं हो सकती थी। अवश्य हो सकती रही होगी। समय के साथ सारी सिद्धियाँ विलोप हो गईं और परियाँ भी गईं। उनकी कहानियाँ बस शेष रह गईं। वैसे भी यह वायुमंडल रहस्य और रोमांच से भरा है। इसी वायुमंडल में विद्युत् चुम्कीय तरंगें, अविरल प्रवाहमान होती रहती हैं। इसी वायुमंडल में विद्युत् प्रकाश की तरंगें हैं। मोबाईल, टीवी, रेडियो, एआई इन सभी का उपयोग हम वायुमंडल की तरंगों के कारण ही तो कर पाते हैं और भी कई अज्ञात तरंगों की खोज जारी है। आज से सौ साल पूर्व आज की वीडियो कालिंग और विदेशों में बैठे अपने बच्चों को साक्षात देख लेने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। वायुमंडल के आयाम उसमे उतराती तैरती तरंगें, नहीं मालूम कितनी रहस्य छुपाये बैठीं है। इसमें कई परतें है। आज तो हम वर्तमान की घटनाओं को सामने देख पा रहे हैं। हो सकता है आने वाले वर्षों में हम हजारों साल पहले होने वाली घटनाओं को आँखों के सामने देख सकें अथवा भविष्य को अपने सम्मुख मूर्त होते देख सकें। हर कल्पना में सार्थक होने की संभावना छुपी रहती है। प्रत्यक्ष रूप से बच्चों में परियों विषयक यह चर्चा व्यर्थ मालूम पड़ेगी लेकिन बच्चों को परियों के किस्से सुनाते समय अपना अतीत और अपने विशद ज्ञान की भी जानकारी दे दी जाए तो बच्चे कभी भी अकर्मण्य नहीं बनेंगे और न ही परी की छड़ी को जादू की छड़ी मानकर बिना मेहनत किये फल पाना चाहेंगे। हमने तो रोज परियों के किस्से सुने और जादू के कारनामों की किताबें पढ़ीं। अलिफ लैला, अलादीन का चिराग और न जाने कितनी कहानियाँ सुनी, पढ़ीं लेकिन कोई असर नहीं हुआ। यह भी नहीं सुना कि परियों की कहानी सुनकर कोई बच्चा अकर्मण्य हो गया। हाँ बच्चों को सच्चाई से अवगत कराना चाहिए। उन्हें अंध-विश्वासों से दूर भी रखना चाहिए लेकिन विज्ञान सम्मत जानकारी भी देना चाहिए।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपने बालसाहित्य का विशद् अध्ययन किया है। बालकहानियाँ भी खूब पढ़ी होंगी। कोई यादगार कहानी जिसका प्रभाव आज तक आपके मन-मस्तिष्क पर अंकित रह गया हो?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : कहानियाँ मैंने बहुत पढ़ीं हैं यह तो नहीं कह सकता लेकिन पढ़ीं जरूर हैं। कई कहानियाँ तो ऊपर ही ऊपर निकल जातीं हैं कुछ भी याद नहीं रहता। लेकिन कुछ कहानियाँ ही ऐसी रहती हैं जो भीतर स्थाई घर बना लेती हैं। स्मरण रहती हैं या थोड़ा सा दिमाग पर जोर डालो तो याद आ जाती हैं। मुझे तो सुदर्शन की लिखी कहानी ‘हार की जीत’ में बाबा भारती के शब्द कि इस बात की चर्चा लोगों में मत करना क्योंकि इससे लोग अपाहिजों कमजोरों पर विश्वास करना छोड़ देंगे। यथार्थ में डाकू खड्ग सिंह अपाहिज बनकर जान से भी प्यारा उनका घोड़ा बाबा से छीनकर ले जाता है। घोड़े की चिंता छोड़ अपाहिजों की चिंता! कितना त्याग। अमर कहानी। चिर स्मरणीय।

डाॅ. शकुंतला कालरा : कविता हो या कहानी या कोई भी दूसरी विधा बालसाहित्य के मूल प्रयोजन के मुद्दे को लेकर यह बहस चली आ रही है कि बालसाहित्य का प्रयोजन शुद्ध मनोरंजन होना चाहिए न कि शिक्षा या उपदेश या नीति-कथन। आपके विचार।  

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : आयु के हिसाब से बच्चा तीन श्रेणियों में विभाजित है- जन्म से चार-पाँच साल तक शिशु, पाँच साल से बारह साल तक बचपन और बारह साल से ऊपर अठारह साल तक किशोर। इस तथ्य में मत भिन्नता हो सकती है कि बालसाहित्य में केवल मनोरंजन होना चाहिए। लेकिन नीरस बालसाहित्य भी किसी काम का नहीं। ‘केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए/उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।’ इस कविता को पढ़कर बालसाहित्य में मनोरंजन की प्राथमिकता पर प्रश्न खड़े होते रहते हैं। लेकिन समय के साथ कविता को भी बदलना होगा और यह कविता बालसाहित्य पर लागू भी नहीं होगी। शिशु के लिए गीत-कवितायेँ-कहानियाँ तो शुद्ध मनोरंजन हैं जिसमें मौज-मस्ती खिलंदडपन, बादशाहत का ही बोलबाला होता है। परियाँ, उड़ने वाला घोड़ा, तारे पकड़ लाने की होड़ - इसमें कहाँ का उपदेश और कैसा सन्देश। हाँ उसके बाद की अवस्था में राह के कांटे तो बटोरना पड़ेंगे। फिर परियों का सच, घोड़े और तारों का यथार्थ समझाना पड़ेगा- मनोरंजन और थोड़ा सा सन्देश। उपदेश के जमाने लद गये। एक समय था जब बच्चे को बच्चा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता था लेकिन अब बच्चा बड़ों के साथ अधिकार सहित खड़ा है। उसकी भी भागीदारी बराबरी की है। सलाह तो दी जा सकती है आदेश नहीं। आज के बालसाहित्यकार इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही रचनाएँ कर रहे हैं। किशोर तो अब बड़ों का मित्र है ही। पहले से ही कहा जाता रहा है कि जब बाप का जूता बेटे के पैर में आ जाए तो बेटे से मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।

डाॅ. शकुंतला कालरा : बच्चों के लिए निकलने वाली पहली पत्रिका आप किसे मानते हैं और वह कब निकली?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : बच्चों के लिए निकलने वाली पहली पत्रिका का नाम शोध का विषय है। निरंकारदेव सेवक और प्रकाश मनु जैसे बालसाहित्य के पुरोधाओं ने इस विषय पर मत व्यक्त किये हैं। हिंदी बालसाहित्य के इतिहास में प्रकाश मनु लिखते हैं- “सेवक जी ने बच्चों का पहला पत्र लखनऊ से सन 1991 में प्रकाशित होनेवाले बाल हितकर को माना है।” फिर मनुजी आगे यह भी लिखते हैं - “हालाँकि बाल हितकर से कोई नौ वर्ष पहले संन 1992 में इलाहबाद से बाल दर्पण पत्र निकला था जिसमे देशभक्ति से पूर्ण आदर्शवादी रचनाएँ छपती थीं।” खैर जो भी हो उन्नीसवीं सदी के अंत में बालसाहित्य कागज पर छपने लगा था। मुझे तो बचपन से ही अंधेर नगरी चैपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा कानों उड़ेला गया है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : क्या आपने विज्ञान से जुड़ी कोई कृति भी लिखी है क्योंकि विज्ञान फंतासी आज बच्चों में बड़ी लोकप्रिय हो रही है?       

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : नहीं, मैंने विज्ञान से जुड़ी कोई कहानी नहीं लिखी। कभी लिखने की रूचि भी नहीं जागी।  

डाॅ. शकुंतला कालरा : बालसाहित्य लिखा तो बहुत जा रहा है, किंतु उसके प्रचार-प्रसार के लिए क्या किया जाना चाहिए जिससे वह पाठकों तक पहुँच सके? इसके लिए क्या सरकार को ठोस कदम नहीं उठाने चाहिए जिससे गाँवों और छोटी जगहों पर भी पुस्तकें उपलब्ध हो सकें?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : बालसाहित्य के प्रसार-प्रचार के लिए क्या करना चाहिए इस प्रश्न का उत्तर क्या दूँ। यह तो मेरी समझ से परे है। अभी तो यह आकलन करना भी सरल नहीं है कि इसके लिए कितने सार्थक प्रयास किये जा रहें हैं। प्रयास किसको करना चाहिए, लेखक को प्रकाशक को अथवा सरकार को? किताबें बहुतायत से छप रहीं हैं, लेखन की भी कोई कमी नहीं है लेकिन जिसके लिए यह साहित्य लिखा जा रहा है, उस तक कितना पहुँच रहा है बात यहाँ आकर अटक जाती है। जहाँ तक हिंदी बाल साहित्य की बात है, बच्चों को प्रोत्साहित किया जाए तो बच्चे पढ़ते हैं लेकिन प्रोत्साहन कौन देगा, किताबें कौन लाएगा? यहाँ इस बात को भी स्वीकार करना पड़ेगा कि अधिकाँश पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से होने के कारण बाल पाठक इस तरफ से उदासीन हैं। पाठ्यक्रम में जितनी हिंदी है बस वहीँ तक पढ़ाई है। अब घरों में बाल पत्रिका कोई आती नहीं और बाल साहित्यकारों की किताबें कोई खरीदता नहीं। परिस्थितियाँ इस तरह की हो गईं है कि बालसाहित्य आम घरों में है ही नहीं। हाँ, लेखक का प्रयास जरूर रहता है कि बच्चे उसकी लिखी किताबें पढ़ें। शहरों की अपेक्षा गाँव के बच्चों में बालसाहित्य की तरफ रुझान अधिक देखा गया है। शालाओं के वार्षिक कार्यक्रमों में जरूर बाल कविताओं की प्रतिस्पर्धाएँ होती हैं तो बच्चे बाल कवितायें-गीत तलाशते नजर आते हैं। संस्थाएँ थोड़ा सा भी ध्यान दें और हर महीने ऐसे कार्यक्रम-प्रतिस्पर्धाएँ आयोजित होने लगें तो कम से कम बच्चे कुछ तो बाल कविताओं से रू-ब-रू होंगे। प्रकाशक तो व्यवसायी हैं, लाभ होगा तो किताब बेचेंगे। उन्हें प्रसार-प्रचार से मतलब भी नहीं हैं। सरकारें जरूर इस दिशा में पहल कर सकतीं हैं। हर बच्चे को प्रति माह एक मैगजीन की अनिवार्यता, पाठ्यक्रम की तरह हो तो बहुत कुछ सुधर सकता है। कोई बहुत कठिन काम भी नहीं है यह। लेकिन इच्छाशक्ति और शासन का ध्यानाकर्षण यह तो बुद्धजीवियों को ही करना पड़ेगा और राजनीति तक पहुँच बढ़ाना पड़ेगी। औपचारिकतायें निभाने से काम नहीं चलेगा। मोबाइल ने भी बालसाहित्य का कबाड़ा किया है। बच्चे रियल छोड़कर, रील की तरफ चले गये हैं जहाँ रोमांच, रहस्य तो है लेकिन संवेदनाएँ लगभग शून्य ही हैं। यह समस्या हमारे देशभर की नहीं है, सारी दुनिया इससे पीड़ित है। हालाँकि आज के समाचार-पत्र में पढ़ रहा हूँ कि आस्ट्रेलिया में 16 साल तक के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए गए हैं। वहाँ के प्रधानमंत्री ने कहा है, बच्चों को टेक कम्पनियों से वापस लेकर परिवारों को सौंप रहे हैं। बाकी कई देश इस योजना पर अमल करने की तैयारी में हैं। यह सुखद पहल है। वहाँ भी माना जा रहा है कि अभी बच्चे परिवार की गिरफ्त से बाहर हैं।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आज अभिभावक बच्चों को कैरियरोन्मुखी बना रहे हैं। वह उनके मस्तिष्क को, बुद्धि को चमकाने वाली खुराक दे रहे हैं ताकि वह इस प्रतियोगिता की दौड़ में आगे आ सके। किंतु उसके हृदय के सद्गुणों के विकास का, उनमें संवेदनशीलता, सहृदयता, करुणा आदि गुणों के विकास की ओर ध्यान नहीं है। ऐसी स्थिति में बालक पैसा कमाने की एक अच्छी मशीन तो बन जाएगा पर एक अच्छा इंसान नहीं। आप के विचार।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : यह बिलकुल समसामयिक और ज्वलंत प्रश्न है। इस प्रश्न का उचित समाधान हो जाये तो गर्त में गिरती मानवता बच जाए। मानव-मूल्यों का ह्रास इसी सोच के कारण हो रहा है। हमारे समय में रोटी, कपड़ा और मकान ही हमारी आवश्यकताएँ थीं। जितना था हम खुश थे। कोई होड़ नहीं, पैसे की दौड़ नहीं। सर्वे भवन्तु सुखिनः..... वाले हम अब कहाँ हैं? ये हम ही तो हैं जिन्होंने चाहा बच्चा प्रतियोगता में दौड़े और जीते। फिर विदेश जाए और फिर डॉलरों की बरसात करे। इसमें सफल भी हुए लेकिन बहुत कुछ खो दिया। प्रेम, दया, ममता, करुणा गई। संवेदनाएँ समाप्त। सम्बन्ध भी बचे हैं तो स्वार्थ के। सबसे दुखद बात तो यह हुई कि परिवार बिखर गये और वृद्ध हाशिये पर चले गये। इसमें बच्चों का कोई दोष नहीं। जो चाहा मिल गया लेकिन इंसानियत चली गई। अभी भी दौड़ जारी है और तेज और तेज पता नहीं कब तक? सच बात तो यह है अब हम विश्व के साथ दौड़ रहे हैं। मल्टी-कल्चर, बंगले, करोड़ों का बैंक बेलेंस, सुख-सुविधाओं ने हमे अमानवीय बना दिया है। हालाँकि सुखद पहलू यह भी है कि अभी भी संस्कृत पाठशालाओं में बटुक वेदों का पाठ पढ़ते हैं, उन्हें संस्कारों की घुट्टी पिलाई जाती है। अभी भी बेटे बड़ों का, बुजर्गों का सम्मान करते हैं और उनके आदेशों का पालन करते हैं। बहुत सी सामजिक, धार्मिक संस्थाएँ धन कमाने की होड़ से होने वाले खतरों से आगाह कर रही हैं। हमारे देश के मूल में हमारे संस्कार हैं। कितनी भी आँधी आये, तूफान आयें, हमें समूल जड़ से तो नहीं उखाड़ सकते।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपकी दृष्टि में उत्तम बालसाहित्य की अवधारणा क्या है? 

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : उत्तम बालसाहित्य तो वही होगा जो बच्चों को अच्छा लगे। विभिन्न वर्गों की पसंदगी भी अलग-अलग ही होगी लेकिन आनंद तो अपनी रुचि की रचनाओं में ही आयेगा। रचनाएँ अपनी आँचलिकता को समेटे हुए सरल, सहज शब्दों में हों। थोड़ा मनोरंजन, थोड़ा सा सन्देश हो, जिसे पढ़कर बच्चों के चेहरे पर मुस्कान के फूल खिल जाएँ तो समझो कि रचना अच्छी है। बालगीत, बालकविता, शिशुगीत, लोरी, प्रभाती, पहेली, प्रयाणगीत, परीकथाएँ आदि बच्चों की प्रिय पसंद होती हैं। छंदबद्ध रचनाओं को पढने में मजा भी आता है और कंठस्थ भी जल्दी हो जाती हैं। कहानियाँ, नाटक, उपन्यास सबमें पहली शर्त मनोरंजन तो है ही लेकिन कुछ सन्देश भी होना चाहिए। अच्छी रचनाओं में संस्कारों के बीज भी छुपे रहते हैं। अच्छी रचना की परिभाषा तो समय के बद्लती रहती है। जो कल अच्छा था, आज अच्छा न हो और जो आज अच्छा है कल अच्छा न रहे। एक पीढ़ी को अच्छा लगे, दूसरी पीढ़ी को अच्छा न लगे। पसंद अपनी-अपनी मिजाज अपना-अपना। बालसाहित्य तो बड़े भी पढ़ते हैं। पुराने राष्ट्रभक्ति के गाने हमारी पीढ़ी में जोश भर देते हैं लेकिन नई पीढ़ी को ये ही गाने नीरस लगते हैं। वैसे भी उत्तम बालसाहित्य कैसा हो इस पर भी शोध होना चाहिए। जनसंख्या, साक्षरता, अमीरी, गरीबी, बीमारियाँ, दुर्घटनाऐं जैसे विषयों पर सरकारी आंकड़े जारी होते रहते हैं लेकिन बच्चों में बालसाहित्य के प्रति अभिरुचि के आंकड़े कहाँ हैं? हम साहित्यकार ही सब फैसला कर लेते हैं जिनके लिए यह साहित्य लिखा जाता है वह अभी तो इससे बहुत दूर है। इस पर शोध होना चाहिए कि कितने ग्रामीण बच्चे बालसाहित्य पढ़ते हैं और कैसा साहित्य पढ़ते हैं। यही शहरी बच्चों के लिए होना चाहिए। इसमें भी वर्गीकरण हो गरीब-अमीर, किसान, व्यापारी, मजदूर इन सबके बच्चे।

डाॅ. शकुंतला कालरा : 21वीं सदी का बालसाहित्य हमें आश्वस्त करता है कि वह उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर बढ़ रहा है। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास के अतिरिक्त नई विधाएँ- पत्र विधा, डायरी विधा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत आदि में भी बालसाहित्य का भविष्य उज्ज्वल दिखाई दे रहा है। आप बालसाहित्य की इस प्रगति से कितना संतुष्ट हैं?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : 21वीं सदी में तो बालसाहित्य की बाढ़ आई है। सोशल-मीडिया का समय है। जो कुछ है सब सामने आ जाता है। बालगीत, कवितायेँ, बाल कहानियाँ, बाल एकांकी, उपन्यास रोज पटल पर सज कर आ जाते हैं। समीक्षाएँ भी पढ़ने को मिल रहीं हैं। बालसाहित्य की सदी है यह। अपुष्ट खबरें यह भी बतातीं हैं कि साहित्य बिक भी खूब रहा है। संस्मरण और यात्रा-वृतांत भी सीमित मात्रा में ही सही पर छप रहे हैं। लेकिन पत्र विधा और डायरी विधा के कटोरे नहीं भर रहे हैं। कारण भी है, यह विधा बच्चे के लिए कितनी उपयोगी है इसका संशय भी है। बाल साहित्य भरपूर लिखा जा रहा है और अच्छा भी लिखा जा रहा है। अच्छे साहित्य को सम्मान भी मिलता है। लेकिन बच्चों तक कितना पहुँच रहा है और बच्चे कितना पढ़ते हैं इसका सही आँकलन शेष है। इस पर सार्वजनिक तौर पर कोई शोध उपलब्ध नहीं है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : बालसाहित्य में सृजन के समान आलोचना का क्षेत्र उतना आश्वस्त नहीं करता। इस क्षेत्र में अभी बहुत काम होना शेष है। बालसाहित्य के हाशिए पर रहने का प्रमुख कारण ही आलोचना की कमी रही है किंतु आज वह स्थिति नहीं रही। भले ही आलोचना में स्वयं बालसाहित्यकार ही उतरे हैं पर अब स्थिति उतनी निराशाजनक नहीं है। आपको क्या लगता है कि बालसाहित्य के मुख्यधारा में न आने का कारण आलोचना ही है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : बड़ों के सृजन की आलोचना का दायरा बड़ा है। मंच भी बड़े-बड़े ही हैं। प्रयोगवादी और प्रगतिशीलता की विचारधारा के विस्तार ने बड़ों के साहित्य को जो ऊचाइयाँ दीं वह बालसाहित्य को तो नहीं मिलीं। फिर स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श जैसे आन्दोलनों ने तो बड़ों के साहित्य को आकाश में पहुँचा दिया। बड़ों के साहित्य की लम्बी कतार है जो आजादी से बहुत पहले की है। बाल साहित्य आजादी तक तो लगभग बच्चा ही था। फिर इसके लिए कोई बड़ा आन्दोलन भी नहीं हुआ। सरकारें भी उदासीन रहीं। हाँ अब जरूर चेतना का संचार हुआ है। मेरे पास बहुत अधिक जानकारी नहीं है और बड़े बालसाहित्यकारों जितना गहन अध्ययन-अनुभव भी नहीं है लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि आलोचना के क्षेत्र में अब बहुत काम हो रहा है। ढेर सारी किताबों का प्रकाशन और उनकी समीक्षाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन होना फिर उनका सोशल प्लेटफोर्म पर आते रहना एक आन्दोलनकारी कदम है। बालसाहित्य पर ढेर सारे आलोचनात्मक ग्रन्थ, बालसाहित्य के इतिहास, बालगीतों, कहानियों, लोरियों, प्रभातियों, पालना गीतों, उपन्यासों पर बालसाहित्यकारों की विवेचनात्मक पुस्तकों का ढेर प्रकाशन यह तो आश्वस्त करता ही है कि आने वाला समय बालसाहित्य भी बड़ों के साहित्य के समकक्ष अपने को खड़ा पायेगा। बालसाहित्य के वे मनीषी जिन्होंने साधन-संपन्न नहीं रहते हुए भी इस साधना में खुद को समर्पित कर दिया। निरंकारदेव सेवक से प्रारंभ हुई आलोचना-इतिहास लेखन की यह यात्रा प्रकाश मनु, दिविक रमेश, नागेश पांडेय, शकुंतला कालरा, ऊषा यादव, सुरेन्द्र विक्रम जैसे कई बालसाहित्य-साधकों तक होती हुई अब तक जारी है। काश, बालसाहित्य के लेखक बच्चे होते, पाठक बच्चे होते और समीक्षक भी बच्चे ही होते तो बालसाहित्य अब तक किलकारियाँ भरता हर सड़क, हर गली में दौड़ लगा रहा होता।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आलोचक का कर्म और धर्म क्या होना चाहिए? यानी एक अच्छे आलोचक में क्या गुण होने चाहिए जिससे वह तटस्थ होकर आलोचना कर सके?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : आलोचना का काम इतना सरल नहीं है जितना समझा जाता है। नीर-क्षीर का विभाजन करना होता है। इसके लिए आलोचक का निष्पक्ष होना जरूरी है। आलोचक को अपने विषय में निष्णात होना चाहिए, तभी तो नीर-क्षीर का विभाजन उचित ढंग से कर पायेगा। आलोचक की दृष्टि बालमन के अनूरूप होगी, उसको बालमन को पढ़ने की गहरी समझ होगी तभी वह गहराई से सूक्ष्म विवेचना कर कृति के गुण दोषों को परख पायेगा। आलोचक अपने कर्म के प्रति ईमानदार होगा तो ही कृति का सही मूल्यांकन कर सकेगा। यह तो एक फ्रेम में कसी हुई शास्त्रीय परिभाषा है। लेकिन आलोचक को विचारधारा में भी निष्पक्ष होना होगा। वामपंथी सोच वाला आलोचक परंपरावादी, दक्षिणपंथी विचारों से प्रेरित लिखी कृतियों की कैसी इतनी निष्पक्ष समीक्षा करेगा यह भी विचारणीय होना चाहिए। मित्रों की कृति बहुत अच्छी और जो विरोधी हैं उनकी अच्छी नहीं, यह तो उचित नहीं होगा।

डाॅ. शकुंतला कालरा : प्रभुदयाल जी, एक प्रश्न आपके कवि रूप से हट कर पूछना चाहूँगी। एक तरफ आप कोमल भावों के कवि हैं तो दूसरी ओर व्यंग्य लेखक भी हैं, जो अपने शब्दों से तीखा प्रहार करता है। यह परस्पर विरोधाभास आपके लेखन की विशेषता है। आप इनमें अनुपात कैसे बनाते हैं क्योंकि दोनों के लेखन में मानसिक स्थिति अलग-अलग रहती हैं? बालकविता की भाषा सरल, सुबोध होती है तो व्यंग्य की भाषा द्विअर्थी। आपकी अब तक व्यंग्य-लेखन की कौन-कौन सी पुस्तकें आ चुकीं हैं? 

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : मैं कवि ज रूर हूँ कालराजी, लेकिन अनुचित के प्रति असहमति व्यक्त करना मेरा बचपन से स्वभाव रहा है। शासकीय सेवाकाल का अनुभव कुछ ठीक नहीं रहा। सामाजिक, प्रशासनिक व्यवस्था की सड़ांध मुझे कभी रास नहीं आई। हाँ में हाँ करना, चापलूसी करना मुझे पसंद ही नहीं आया। विसंगतियों, विद्रुपताओं और दोगली बातों से मेरे भीतर अनजानी सी बेचैनी बढ़ती रही और इसी के फलस्वरूप व्यंग्यों की तरफ रुझान हुआ। लिखा खूब लिखा। लेकिन मन तो सदा से कोमल रहा। किसी का दुःख-दर्द मुझे भी दुःख देता रहा। गुस्से का पारा जितनी ऊपर चढ़ा उससे भी जल्दी नीचे उतरा। किसी को मुझसे नुकसान न हो यह सोच संवेदनशील भी बनाती रही। व्यंग्य सेवाकाल में ही लिखे। लेकिन सेवानिवृति के बाद पौत्र-पौत्रियों के सानिध्य ने मुझे बच्चों का लेखक बना दिया। मैंनें कभी नहीं सोचा था कि मैं कभी बच्चों के लिए लिखूँगा। यह अनायास हुआ। एक तथ्य यह भी है मैंने बालसाहित्य का बहुत अधिक मनन-अध्ययन भी नहीं किया था। यह शायद सरस्वती का आशीर्वाद ही था कि मैंने लिखा तो लिखता ही चला गया। मेरी व्यंग्य की एक ही पुस्तक प्रकाशित हुई है “दूसरी लाइन“ शीर्षक से।

डाॅ. शकुंतला कालरा : आपकी दृष्टि में अच्छी कहानी की कसौटी क्या है? कहानी की ऐसी कौन सी विशेषता है जिसका बच्चों पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ता है और वह उनकी यादगार कहानी बन जाती है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : अच्छी कहानी का मतलब जो पाठक को अच्छी लगे। अच्छी लगने की परिभाषा सबकी अलग अलग हो सकती है। लेकिन आनंद का चरम एक विशेष कथन अथवा कहन पर हो सकता है। जो कहानी मन के भीतर उतरकर ह्रदय के मर्म स्थल को छू ले वह चिर स्थायी यादगार बन जाती है। एक शब्द ‘आनंद आ गया’ बहुत प्रचलित है। जब कहानी में भी आनंद की अनूभूति होने लगती है तो वह कहानी अच्छी होती है। यथार्थ में कहानियों में कुछ् तथ्य होते हैं या ऐसे वाकया होते हैं जो हमें भीतर झकझोर कर रख देते हैं और जब यह घटना घटती है तो भीतर का मन मयूर नाचने लगता है। जब मन नाच उठे वही कहानी दअच्छी होगी। वैसे समय काल परिवेश परिस्थति के अनूरूप हर बच्चे की पसंद अलग अलग हो सकती है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : प्रभुदयाल जी! कविता की तुलना में कहानियाँ आपने बहुत कम लिखी हैं। इसका कोई विशेष कारण? क्योंकि आपके पास बच्चों का भावजगत् भी है। मनोजगत् भी है। बालमनोविज्ञान भी है। सबसे बड़ी बात अभिव्यक्ति-कौशल और उसके लिए सामर्थयवान भाषा भी है। कृपया थोड़ा इस विषय में आप मेरी जिज्ञासा का शमन करेंगे?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : यह बिलकुल सच है कि मैंने कविताओं की तुलना में कहानियाँ बहुत कम लिखीं हैं। इसका कोई विशेष कारण नहीं है। बस यूँ ही बाल कवितायेँ लिखने में आनंद मिलता था तो बाल कवितायेँ ही खूब लिखीं। जैसा मैंने पहले ही बताया है मेरे पौत्र-पौत्रियाँ ही मेरे बाल साहित्य के गुरु हैं। उनके सानिध्य ने ही मुझे बाल साहित्यकार बनाया। बाल साहित्य में मैं बहुत बाद में मतलब सेवानिवृति के बाद ही आया। हाँ 2020 में कोरोना की चपेट में आने के कारण मेरा लेखन बहुत हुआ। उस समय मैं अपने गृह नगर दमोह में था और लॉक डाउन के कारण लगभग छह महीने तक वहीँ अटक कर रह गया। बीमार हुआ और लेखन भी बंद रहा। उस दौरान मैंने कहानियों की ओर विशेष ध्यान दिया। फिर मेरी सोच है निरर्थक, बहुत सारा न लिखकर थोड़ा लिखना लेकिन अच्छा लिखना ही ठीक है। एक रचना जो लोगों की जुबान पर चढ़ जाए यही बहुत है।

डाॅ. शकुंतला कालरा : कहानी क्या बच्चों के मनोरंजन के लिए लिखी जाए अथवा कहानी प्रेरक हो जो बच्चों में सद्गुणों की वाहक भी हो?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : कहानी में मनोरंजन पहली शर्त तो है ही लेकिन साथ में कहानी प्रेरक और सन्देश देने वाली भी होनी चाहिए, अन्यथा थोथा मनोरंजन मनोरंजन ही रह जायेगा। सन्देश-परक कहानी टिकाऊ मन को दिशा देने वाली और सोचने को मजबूर कर देती है। केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए (मैथिलीशरण गुप्त)। यहाँ आज के परिवेश में उपदेश की जगह सन्देश लिखना समीचीन होगा।

डाॅ. शकुंतला कालरा : चलते-चलते एक अंतिम सवाल! आप बच्चों के लिए लिखते समय किस प्रकार की तृप्ति का अनुभव करते हैं? क्या वैसी ही तृप्ति का अनुभव आपने प्रौढ़ साहित्य के लेखन के समय भी किया है?

प्रभुदयाल श्रीवास्तव : जैसा मैंने पहले बताया है बाल साहित्य मैंने बहुत बाद में अर्थात सेवानिवृति के बाद प्रारंभ किया। बच्चों के साथ रहते हुए उनके क्रिया-कलापों, भाव-मुद्राओं और नटखट-अदाओं ने मुझे बाल साहित्यकार बनाया। स्पष्ट है इसी विधा में मुझे तृप्ति मिली। प्रौढ़ लेखन में मुझे बुन्देली में रचनायें लिखने में आनंद तो मिला लेकिन बाल साहित्य का मजा अलग ही आनंद की अनुभूति कराता है।

- डाॅ. शकुंतला कालरा, डी.लिट्

(सेवानिवृत्त एसोसियेट प्रोफेसर, मैत्रेयी काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)

निष्कर्ष; प्रभुदयाल श्रीवास्तव से हुई यह बातचीत उनके रचनात्मक व्यक्तित्व, साहित्य-दृष्टि और बालसाहित्य के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से सामने लाती है। उनके अनुभव, विचार और सृजन-दर्शन यह विश्वास जगाते हैं कि बालसाहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संवेदनशील, संस्कारित और जागरूक पीढ़ी के निर्माण का सशक्त आधार है। यह साक्षात्कार साहित्य और बालसाहित्य के गंभीर अध्येताओं, शोधार्थियों तथा पाठकों के लिए समान रूप से प्रेरक और उपयोगी है।

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