पूँछ वाले बीज : विनीता राहुरीकर की ज्ञानवर्धक विज्ञान आधारित हिंदी बाल कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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Tail Seeds is an engaging children's story by Vinita Rahurikar that blends science with storytelling. Through simple conversations and curious young minds, the story introduces children to seed germination, scientific experiments, and the wonders of nature in an enjoyable and educational way.

Tail Seeds – A Science-Based Children's Story in Hindi

विज्ञान और प्रकृति पर प्रेरक हिंदी बाल कहानी पूँछ वाले बीज

प्रकृति अपने भीतर अनगिनत रहस्य समेटे हुए है। बच्चों की जिज्ञासा और विज्ञान का सुंदर संगम प्रस्तुत करती विनीता राहुरीकर की बाल कहानी "पूँछ वाले बीज" बीजों के अंकुरण, वैज्ञानिक प्रयोगों और खेती से जुड़े रोचक तथ्यों को सरल, मनोरंजक और संवादात्मक शैली में समझाती है। ज्ञान और मनोरंजन का संतुलित मेल लिए यह कहानी बच्चों में वैज्ञानिक सोच, अवलोकन क्षमता और प्रकृति के प्रति रुचि विकसित करने वाली एक प्रेरक रचना है।

विज्ञान और प्रकृति पर प्रेरक हिंदी बाल कहानी

पूँछ वाले बीज...

स्कूल से घर आते ही चेरी और आदित्य का सबसे पहले काम होता था ऊपर दौड़ लगाकर मामा जी की प्रयोगशाला में पहुंच जाना। बड़ी मुश्किल से माँ उन्हें कुछ खिला-पिला कर कपड़े बदलवा पाती। आज भी दोनों जैसे ही घर पहुंचे अपना बैग कमरे में रखकर ऊपर जाने लगे।

"पहले दूध पी लो फल खा लो तब मामा जी के पास जाना। मैं दूध गर्म कर रही हूँ तब तक दोनों हाथ मुंह धो कर कपड़े बदल लो नहीं तो दो घंटे तक नीचे ही नहीं आओगे।" माँ ने उन्हें दबे पांव सीढ़ियों की ओर जाते देखा तो टोका।

दोनों मन मार कर कमरे में गए और मुंह हाथ धोकर कपड़े बदल आए। माँ ने फल और दूध तैयार रखे थे दोनों के लिए। दोनों ने दूध और फल खत्म किया और तेजी से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर वाली मंजिल पर आ गए। ऊपर एक कमरा मामा जी के रहने का था और एक बड़ा सा हॉल था जिसमें मामा जी की प्रयोगशाला थी। मामा जी कॉलेज में वनस्पति शास्त्र के प्रोफेसर थे। वह विविध शोध भी करते रहते थे, कभी पेट्रिडिश में रंग बिरंगी फंगस उगाते तो कभी टेस्ट ट्यूब में उनके स्पेसिमेन तैयार कर किसी कॉलेज में शोधार्थियों के अध्ययन के लिए भेजते, कभी आलू या जिलेटिन में रसायन मिलाकर कल्चर मीडियम बनाते।

कांच के पलड़ों वाली एक अलमारी में तरह-तरह के रंग-बिरंगे रसायनों से भरी कांच की बोतले रखी थी। इस अलमारी को मामा जी हमेशा ताला लगा कर रखते थे। दूसरी अलमारी में पेट्रिडिश, टेस्ट ट्यूब, बीकर, स्लाइड्स आदि रखे हुए थे। दोनों को मामा जी की प्रयोगशाला में आना बहुत अच्छा लगता था क्योंकि यहां पर उन्हें बहुत सी मजेदार बातों की जानकारी मिलती थी जिसे सुनना दोनों को ही बहुत पसंद था।

आज जब दोनों प्रयोगशाला में पहुंचे तो देखा कि रोज की तरह ही आज भी मामाजी नाक पर चश्मा चढ़ाए किसी शोध में जुटे हुए थे। एक टेबल पर बहुत सी पेट्रिडिश रखी, बीकर, कुछ रसायन की बोतले रखी थी। मामा जी काम करते हुए टेबल पर रखी एक पुस्तक से कुछ पढ़ते भी जा रहे थे। दोनों चुपचाप उनके पीछे जाकर खड़े हो गए।

"आ गए तुम दोनों स्कूल से।" मामा जी ने बिना पीछे देखे ही पूछा।

"हम तो आपके पीछे खड़े हैं आपको कैसे पता चला कि हम हैं आपने तो हमें देखा भी नहीं।" चेरी ने आश्चर्य से पूछा।

"देखा नहीं मगर सुनी तो सही तुम्हारे आने के बाद तुम्हारी और दीदी की बातें, फिर इस समय ऊपर तो तुम दोनों ही आ सकते हो।" मामा जी हंसते हुए बोले।

वह एक टेस्ट ट्यूब में बोतल से कोई रसायन डाल रहे थे। सामने टेबल पर अलग-अलग पेट्रिडिश में कई तरह के बीज रखे हुए थे।

"देखो भैया पूँछ वाले बीज, इन बीजों को तो पूँछ निकल आई है।" चेरी एक जार की ओर इशारा करके बोली।

"अरे हाँ इन बीजों को तो पूँछ है मामा जी, यह पूँछ वाले बीज किस पौधे के हैं?" आदित्य ने पूछा।

मामा जी जोर से हंसे "यह पूँछ नहीं है अंकुर है।"

"मतलब?" नन्ही चेरी कुछ समझ नहीं पायी।

"जब बीज में से पौधा उगता है तो पहले एक नन्हा अंकुर निकलता है। इन बीजों से अंकुर निकले हैं जो आगे जाकर पेड़ बनेगा।" मामा जी ने बताया।

"लेकिन बीजों को तो मिट्टी में बोते हैं तभी वह अंकुरित होते हैं तो आपने इन्हें यहां क्यों अंकुरित किया है?" आदित्य ने सवाल किया।

"हाँ तुमने ठीक कहा कि बीज मिट्टी में नमी की उपस्थिति में अंकुरित होकर पौधा बनते हैं लेकिन कुछ बीज अंकुरित होने में अधिक समय लेते हैं इसलिए उन्हें पानी में या कुछ रसायनों में भिगोकर अंकुरित कर लिया जाता है और फिर मिट्टी में बोया जाता है ताकि वह जल्दी से पौधे के रूप में बढ़ सकें।" मामा जी ने समझाया।

"लेकिन कुछ बीज अंकुरित होने में अधिक समय क्यों लेते हैं?" अबकी बार चेरी ने पूछा।

"क्योंकि कई बार कुछ बीज मिट्टी में अंकुरित हो ही नहीं पाते। उन्हें पानी में भिगोने से अंकुरण का अनुपात बढ़ जाता है। इस तरह से पौधे उगाने की संभावना बढ़ जाती है। कई बीजों पर रक्षात्मक आवरण बहुत कठोर होता है और यह कई बार मिट्टी में दो से तीन महीने बाद या कभी-कभी साल भर बाद अंकुरित हो पाते हैं, लेकिन भिगोने से आवरण नरम हो जाता है और चार से आठ दिनों में ही अंकुर निकल आता है, तब हमें पौधा जल्दी मिल जाता है।" मामा जी ने चेरी को बताया।

"कौन से बीजों को भिगोना पड़ता है?" इस बार सवाल आदित्य का था।

"लगभग सभी बीजों को पहले भिगोया जा सकता है। कुछ को कम देर पानी में रखना पड़ता है कुछ को थोड़ी अधिक देर फिर उन्हें पानी से निकालकर प्रकाश वाले स्थान पर रखते हैं ताकि अंकुर अर्थात पूँछ निकल आए।" मामा जी हंसकर बोले "फसलों में सोयाबीन, मटर, चुकंदर, खीरा, मक्का, कद्दू के बीजों को भिगो लेने से फसल जल्दी मिल सकती है। इसका एक फायदा यह भी होता है कि जो बीज अंकुरित नहीं होते उन्हें खाने में या दूसरे कामों में लिया जा सकता है।" मामा जी ने बीजों से भरे एक जार में पानी के साथ ही कुछ रसायन भी मिलाया।

"यह आप क्या मिला रहे हो पानी में, क्या इससे बीजों की पूँछ जल्दी निकलेगी?" चेरी को अभी भी अंकुर पूँछ ही लग रहे थे।

"हाँ कुछ रसायन जैसे नाइट्रेट्स आदि कुछ बीजों में पूँछ को तेजी से निकलने में मदद करते हैं। इसके साथ ही कई बार बीजों को भिगोते समय पानी में कवकनाशक और कीटनाशक दवाइयां मिलाने से वह रोगों से बचे रहते हैं। इसके अलावा ऑक्सीजन तथा पर्याप्त प्रकाश भी पूँछ निकालने में सहायक होते हैं।" मामा जी ने उसी की भाषा में उत्तर दिया "मैं यही शोध कर रहा हूँ कि कौन से बीजों में कौन सा रसायन कितनी मात्रा में मिलाने से वह जल्दी अंकुरित होंगे।"

"मगर इससे क्या होगा?" आदित्य ने पूछा।

"बड़े पैमाने पर खेती करने के लिए यदि पहले से अंकुरित बीज लिए जाएं तो फसल जल्दी और हर बीज से पौधा मिलने से बीज की खपत भी कम होगी। इससे किसान के समय और बीज दोनों की बचत होगी किंतु फसल अधिक मिलेगी। साथ ही जो बीज अंकुरित नहीं हुए उनका किसी अन्य कार्य में उपयोग किया जा सकता है।" मामा जी ने बीजों से भरे जार को खिड़की के पास धूप में रखते हुए बताया। 

दोनों कुछ और भी पूछना चाहते थे लेकिन मामा जी ने पहले ही टोक दिया "अब और सवाल नहीं शैतानों जाओ अब जाकर अपना होमवर्क करो नहीं तो दीदी मुझे डाटेंगी, और मुझे भी अपना काम करने दो।"

दोनों उन जारों और पेट्रिडिश की ओर कौतूहल से देखते हुए नीचे चले गए जिनमें विविध रंग रूप वाले पूँछ वाले बीज रखे हुए थे। कितना कुछ नया सीखा था उन्होंने आज मामा जी से बीजों के बारे में।

- विनीता राहुरीकर

निष्कर्ष; "पूँछ वाले बीज" एक ज्ञानवर्धक बाल कहानी है, जो मनोरंजक संवादों के माध्यम से बच्चों को बीजों के अंकुरण और वैज्ञानिक सोच का महत्व समझाती है। यह कहानी जिज्ञासा, प्रयोगशीलता और प्रकृति के प्रति प्रेम जगाने का सुंदर संदेश देती है।

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