Chuppi Arth Bhari by B. L. Achachha is a powerful collection of contemporary Hindi poems that explores human sensitivity, environmental concerns, social realities, and the contradictions of modern life. Through meaningful imagery and sharp satire, the poet presents a thought-provoking reflection on changing values and the challenges of contemporary society.
Chuppi Arth Bhari by B. L. Achachha
समकालीन हिंदी कविता आज केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि अपने समय की जटिल सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय चुनौतियों का सशक्त दस्तावेज भी है। ऐसे दौर में बी. एल. आच्छा का कविता-संग्रह 'चुप्पी अर्थ भरी' अपने गहन संवेदनात्मक स्वर, तीक्ष्ण व्यंग्य-दृष्टि और जीवन-मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के कारण विशेष महत्त्व रखता है। प्रस्तुत समीक्षा में डॉ. कुँवर संजय विक्रम सिंह ने संग्रह की कविताओं का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उनके वैचारिक, कलात्मक और सामाजिक पक्षों को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया है। यह आलेख न केवल इस काव्य-संग्रह की सार्थकता को उद्घाटित करता है, बल्कि समकालीन हिंदी कविता की दिशा, संवेदना और सरोकारों को समझने का एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक दस्तावेज भी प्रस्तुत करता है।
समकालीन बोध, व्यंग्य और मानवीय संवेदना का सशक्त काव्य-संग्रह
'चुप्पी अर्थ भरी'
- डॉ. कुँवर संजय विक्रम सिंह
प्रतिष्ठित व्यंग्यकार और आलोचक बी. एल. आच्छा का कविता संग्रह 'चुप्पी अर्थ भरी' समकालीन बोध, ग्राम्य सहृदयता में प्रकृति और मानवेत्तर जीवन की चिंताओं का महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है। इस संग्रह में इकत्तीस कविताएँ संकलित हैं, जो जीवन के विभिन्न आयामों को समाहित करती हैं।
समकालीन हिन्दी कविता में संवेदना की अभिव्यक्ति अनेक रूपों में सामने आती है। आधुनिक जीवन की जटिलताओं, सामाजिक विसंगतियों और व्यक्ति के भीतर के एकांत ने कविता को नई दृष्टि और भाषा प्रदान की है। साथ ही समाज में बढ़ रहे बदलाव, तकनीकी क्रांति और बाजारवाद इत्यादि का सामाजिक असर भी हिन्दी कविता की सृजन प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। इसी संदर्भ में 'चुप्पी अर्थ भरी' नामक कविता-संग्रह विशेष महत्व रखता है। शीर्षक ही यह संकेत देता है कि कवि के लिए चुप्पी केवल मौन नहीं है, न तटस्थता। बल्कि विपरीत ध्रुवों पर अनुभवों, संवेदनाओं और विचारों से भरी हुई एक गहरी अभिव्यक्ति है। इस संग्रह की कविताएँ उस मौन को स्वर देती हैं, जो अक्सर शब्दों में व्यक्त नहीं हो पाता।
इस काव्य-संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संवेदनात्मक गहराई है। कवि जीवन के सामान्य अनुभवों में भी असाधारण अर्थ खोजता है। आधुनिक मनुष्य की अकेलेपन की स्थिति, उसके भीतर की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीदें, ग्राम्य सहृदयता का क्षरण,कंकरीट सभ्यता में मानवेतर जीवन का संकट इन कविताओं में सहज रूप से अभिव्यक्त हैं। बाजारवाद और मशीनी युग के इस दौर में अमानवीय हो रहे समाज का त्रासद चित्र इस संग्रह की अनेक कविताओं में उपस्थित हैं। आच्छा जी की कविताओं में लोकतंत्र के बनावटीपन की जीवंत आलोचना मौजूद है। कवि की अधिकांश कविताओं में उसका व्यंग्यकार और आलोचक बड़ी सहजता से दिखाई पड़ता है। व्यंग्यात्मक लहजे में कवि ने समाज में हो रहे बदलावों को तो काव्य रूप में प्रस्तुत किया ही है। साथ ही ऐसे सामाजिक परिवर्तनों और उनके कारणों को बड़ी निर्भीकता से आड़े हाथों लिया है ,जो समाज के लिए अभिशाप बनकर आए हैं। इस काव्य संग्रह में समकालीन समाज के लगभग वे सभी विषय मौजूद हैं जो कमोवेश समाज को प्रभावित कर रहे हैं; जैसे एकाकीपन, बाजारवाद, उपभोक्तावाद, औद्योगीकरण, जल संरक्षण, लोकतंत्र की आलोचना, बेचैनी, संवेदनहीनता, पर्यावरण, प्रकृति चित्रण, सोशल साइट्स का बढ़ता प्रकोप, स्त्री विमर्श, किसान चेतना, लोकपर्व इत्यादि। हालांकि इन कविताओं का केन्द्रीय विषय जल, जंगल और जमीन पर आए संकट तथा मानवीय संबंधों या यों कहें कि मानवीय संवेदना में आयी कमी से उपजी चिंताएं है। मानवीय संबंधों के बीच आयी कमी से कवि चिन्तित है और उसको बचाए रखने हेतु प्रयासरत जान पड़ता है। समाज में हो रहे ऐसे बदलाव कवि की चिंताएं हैं।उसके भीतर की बेचैनी उसे मजबूर करती है तभी विपरीत छोरों को व्यक्त करती कविता 'चुप्पी अर्थ भरी 'में लिखता है -"कभी फटता है/भीतर का ज्वालामुखी/भरे हुए लावों से/ कभी चोट खाए शब्दों की तरह /आती है सुनामी/बँधी मर्यादाओं को लीलते हुए।"
कवि का मानना है कि इस मशीनी युग में सामाजिक मर्यादाएं भंग हो रही हैं। हमारे संस्कार टूट रहे हैं । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमारे समाज ने इस टूटन को देखकर चुप्पी साध लिया है ।पर कवि कहता है कि दरअसल ये चुप्पी साधारण चुप्पी नहीं है यह अपने पीछे एक क्रान्ति रच रही होती है। वे लिखते हैं-
"यह चुप्पी जब रचती है/टंकार भरे शब्दों को/रंगों रेखाओं को/आन्दोलन की आग और हवाओं को/तो नदियाँ रास्ते बदल देती हैं/लहरें हिला देती हैं/ठहरी पिचकी/ जड़ता की चट्टानों को।"
'हरी जबानों की व्यथा' कविता उजड़ते- कटते पेड़ों की करुण पुकार है।कंकरीट सभ्यता में कटते वानस्पतिक संसार में शुद्ध हवा और शुद्ध पानी मिल पाना दूभर हो गया है। मानव को तो बोतल में बंद पानी मिल भी जा रहा है। पर पशु पक्षी तो उनसे भी वंचित हैं। नदी नाले सूख गए है। कवि इन परिस्थितियों को देखकर पुराने दिनों को याद करता हैं और प्यास से बिलबिलाते पशु-पक्षियों के जीवन से उपजी परिस्थितियों पर करारा व्यंग्य भी करता हैं-"पनघट पर बहते पानी में/हम फुदकी लेते थे/ छत पर के बर्तन को/स्विमिंग पूल बना लेते थे/माथे पर पानी के बर्तन / लेकर आती माँ/कोस भर दूरी से /हम भी नन्हीं बूंदों से/प्यास बुझा जाते थे / पर अब आँखों में/सूखी नदियों के प्यासे होठ/दरकती जमीनें तालाबों की।"
ये स्मृतियां बिसलरी सभ्यता पर चोट करते हुए स्मृति और समकाल के मूल्यबोध पर व्यंग्यपरक टिप्पणी करती है-"प्याऊ का जूठा पानी भी/हलक बुझा देता था/पर बिसलरी सभ्यता में/संस्कृति सूखी है पानी की /बड़ी बड़ी अट्टालिका में आती है /गिलास आधे पानी की।" जल संरक्षण हेतु जो प्रयास किए जा रहे हैं, वे भी बस पोस्टर तक ही सीमित बचे हैं उनका व्यावहारिक असर नगण्य है। 'सूखी टोंटी पर चिड़िया' कविता में इसे भी मार्मिक स्वर दिया है:-" निहार रही हूँ पोस्टर/जल ही जीवन के/ सेव वाटर के जलसों के/सबमर्सिबल और बोतल संस्कृति के।"
वर्तमान में हम देखते हैं कि व्यक्ति आशंकाओं से घिरा हुआ है। उनके आपसी रिश्तों में विश्वास की कमी आयी है। निस्संदेह इस कमी के पीछे आत्मविश्वास का कमजोर होना है। यह आत्मविश्वास अफवाहों की वजह से टूट रहा है। वर्तमान समाज अफ़वाहों और झूठी खबरों से पटा पड़ा है। कवि ने 'इन दिनों हवाओं' शीर्षक कविता में इन्हीं विषयों को व्यंग्यात्मक लहजे में बड़ी सरलता के साथ चित्रित किया है। कुछ पंक्तियाँ निर्दिष्ट हैं:-
"हवाएँ जी. पी. एस. से नहीं चलती/वे फैलती भी हैं /और फैलाई भी जाती हैं/हवाएँ बनाई भी जाती हैं/और निकाल भी दी जाती हैं/
अभिव्यक्ति के लोकतंत्र /पहिये में भरी हवाओं से नहीं चलते/हवाएँ तो बनानी पड़ती है/हवा तुम धीरे धीरे बहो/आते होंगे चित चोर ।" लोकतंत्र के चितचोर इन हवाओं के सहचर हैं।
समूचे काव्य संग्रह की सबसे गंभीर कविताएँ 'समुद्र छह कविताएं' शीर्षक से प्रकाशित हैं। कवि बहुत ठहरकर इन कविताओं में जीवन की हलचल एवं उसके पुनर्सृजन को सामुद्रिक क्रियाकलापों के रूपकों में अभिव्यक्त किया है। विनाश और सृजन का वह निरंतर प्रवाह इन कविताओं में संरक्षित है, जिसे हम आए दिन दार्शनिक विचारों के रूप में सुनते रहते हैं। महाग्रन्थ के रूप में समुद्र की कल्पना कवि की एक नवीन कल्पना है, जिसमें कवि यह बताना चाहता है कि महग्रन्थों की तरह समुद्र भी एक कालजयी निरंतर सृजनशील दस्तावेज है। एक बिम्ब प्रस्तुत है :-"समुद्र भी कालजयी महग्रन्थ है / लहराते रहते हैं पन्ने/टकराते हैं चट्टानों से/नई लिपि रचता है प्रतिदिन / रचते -मिटते रेतीले शिल्प में।"
इसी कविता में कवि ने तटीय जीवन का अद्भुत चित्र खींचा है, जिसमें उन्होंने उनके नवजीवन की यथार्थ कल्पना मछली और जाल में की है। वे लिखते हैं:-"सागरतट के जीवन पर नावें/मत्स्यगंध में उतरायी बस्ती/ मछली में/ आस लगी पतवारें/जालों में पातीं नवजीवन।" पुनर्सृजन की इस प्रक्रिया को कवि ने नदियों के पुनर्मिलन और पुनर्पाठ में महसूस किया है और उसे ही आद्याचक्र की संज्ञा दी है। वे लिखते हैं:-"यह है समुद्र/अपने पानी से उपजाई/ नदियों का पुनर्मिलन/ होते रहते पुनर्पाठ/खारे से मीठे तक/पी जाए कोई अगस्त्य/फिर भर जाता है समुद्र/जीवन का आद्या चक्र/बना है जीवन का सम्बल।"
बूंद और लहर को स्वर और व्यंजन के रूपकों में ढालकर बड़े कारीने से महाकाव्य और सागर को समतुल्य प्रस्तुत किया है। पंक्तियाँ निर्दिष्ट हैं :-"वर्षा की बूँदें गिरकर स्वर सी/मिलती हैं लहरों के व्यंजन से/फिर काव्य पंक्ति सी बनकर/बिछ जाती हैं रेती पर/ दे जाती हैं शिल्प किनारों को/महाकाव्य के सर्गों सी।"
कवि ने समकालीन अभिव्यक्ति में बनावटी चिंताओं पर भी अंगुलि उठाई है। किस प्रकार शब्दों में चीखें आजकल सायास बनाई जा रही हैं। हम देखते हैं कि अब समाज में चीखें सिर्फ मीडिया के सेटअप बॉक्स में ही सुनाई पड़ती हैं ,जो अपनी सुविधानुसार बनाई गई चीखें हैं। ये किसी को द्रवीभूत नहीं करतीं, बल्कि गुस्सा पैदा करती हैं। कवि ने इसे बहुत गहरे से महसूस किया कि अब पीड़ा किसी किसान की फसल के बर्बाद होने से उपजी पीड़ा नहीं है, न ही ये किसी की आंतों से निकली आह ही जान पड़ती है। कवि ने पीड़ा को नकली आक्रोश और आंदोलनों में उपजाने वाले समाज पर तीखी प्रतिक्रिया अपनी कविता 'चीखें' में दी है। वे लिखते हैं:-" इन दिनों उगाई जाती हैं/शब्दों के गमले में चीखें/ वे किसी कुचले जीवन की/अंतड़ियों से नहीं आती।" सारी संवेदनाएं सिर्फ सोशल साइट्स के लाइक और कमेन्ट में सिमट कर रह गई हैं। वे लिखते हैं:-"भूखे आदमी के लिए/खुद के हिस्से का निवाला नहीं/पर शब्द शोर मचा जाते हैं/वातानुकूलित चीखों में/छपते हैं रेशमी कागज पर/फेसबुक के अनेकवर्णी पन्नों पर/पहचाने जाते हैं लाइक्स में/धन्य हो जाते हैं कमेंट्स में।"
इतिहास में दर्ज उन चरित्रों के आक्रोश को भी कवि याद करता है; जो गोदान, मैला आँचल और धूमिल के मोचीराम में मौजूद है। पीड़ा के ताप से निकले आक्रोश के महत्व को कवि ने भी ठीक ढंग से पहचाना है, वे लिखते हैं:-" जैसे मूस में तपा सोना/पानी में गिरते ही चमक दे गया हो/आक्रोश के पुरस्कार को ।"
यह काव्य स्वर उन कवियों में शुमार हैं, जो अपने समय की लगभग सभी घटनाओं पर पैनी नजर रखते हैं। वर्तमान समय में अव्वल तो नदियाँ सूख गईं हैं जो बची भी हैं वे नाले में बदल गईं हैं। हालांकि नदियों की सफाई के नाम पर कई योजनाएं चलाई गईं, जैसे नमामि गंगे इत्यादि पर ये योजनाएं कागजों पर ज्यादा कारगर हुईं। कवि ने बड़े चुटीले अंदाज में' 'सूखी नदी के प्यासे ओठ' की काव्य पंक्तियों में इसे व्यक्त किया है :-"नमामि नदियाँ अब/कचरास्मि में बदल गई हैं/ प्रगति के औद्योगिक/काले जल में, तेजाबी पानी में/शहराती सभ्यता लिए।"
कवि ने नदियों के किनारों पर चल रहे रेत के बाजार को नदियों के सूखने का कारण बताया है और इस खुदाई से व्यथित हैं। कवि ने इस खुदाई को नदियों के हृदय को छेदना बताया है-"प्यासे होंठों के तट पर/कुछ ट्रैक्टर, कुछ बुलडोजर/हक जमाए हैं बजरी पर/छेदते नदी हृदय को/सूखे आँसू भी कहाँ बचे हैं।"
तंत्र और सभ्यता की गहरी आलोचना कवि की कविताओं में मौजूद है। सिक्स लेन ने पेड़ों पर ऐसा अतिक्रमण किया है कि उन्हें अपनी जड़ें डामर और सीमेंट के भीतर ही फैलानी पड़ रही हैं। जल, जंगल और जमीन पर आए संकट पूरी तरह से मानवीय सभ्यता को प्रभावित कर रहा है। इस परिस्थिति में सब बेबस हैं।वानस्पतिक पीड़ाओं का संवेदन इन पेड़ों का आस्थामय सृजन राग है:-" तंत्र और सभ्यता ने/पाट दी है मेरी जमीन/बेबसी है मेरी/पर लोकतंत्र की चीख में भी /कौन नहीं है बेबस/सपाट और सिक्स लेन/डामर और सीमेंट/इनके भीतर भी फैलाता हूँ जड़ें/यही आस लिए/कि मेरी सघन डालें/कटती पिटती भी/देती रहेंगी छायाएँ ।"लेकिन इस वानस्पतिक आस्था को कवि ने 'बीज 'कविता में बीज के विकासमान रूप के साथ हरित जीवन का संविधान कहा है-"कभी कल्लू काटेगा-बीनेगा डाली/सिकती रोटी का चूल्हा बन/महल चलाएँगे आरी /सुंदरता की इठलाती पूँजी बन ।/झूले डालेंगे राधा-कान्हा/रोमानी रंगत में सज-धज कर ।/कभी धनिया लाएगी होरी की रोटी/लिए छाछ की तरी संग।"
बाजार-बस्तियों ने जंगलपन को अपने आगोश में ले लिया है। जंगल के जीव जन्तु निकट के शहरों में भटक जाते हैं ।बड़ी संवेदनहीनता के साथ जंगलों की जमीनों को खरीदकर बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं बनाई जा रही हैं। जंगल में शेर- चीतों की जगह सौदागर घूम रहे हैं, उन जमीनों को बेचने और खरीदने के लिए। इन दृश्यों को भी कवि ने चिंता के साथ अपनी कविताओं में प्रस्तुत किया है। वे लिखते हैं:-" उन्हें मालूम है/दलाल और सौदागर / जमीन की नाप करते- करते/जंगल की जमीन को बेच देंगें लालच में। फिर कहेगा जंगल भी/हो गया हूँ मैं जंगल आदमियों का।"
मशीनी युग के बढ़ते प्रकोप को देख 'आसक्ति- अनासक्ति' कविता में कवि का कहना है कि" अजीब सा लगता है पर/यांत्रिकता जब भीतर से टकराती है/तो भविष्य सवालिया बनकर ढलता है"। निस्संदेह भविष्य के संकट की ओर इशारा है, जिससे हमें सावधान रहने की जरूरत है।नेता और जनता के अंतर्संबंधों को घोड़ा और घास के रूपक में बड़ी चतुराई से कवि ने प्रस्तुत किया है। इन रूपकों में कवि का व्यंग्यात्मक कौशल अपने पूरे उत्कर्ष पर दिखाई पड़ता है। कवि लिखता है :-" घास जानती है /घोड़ा उससे दोस्ती करेगा/ तो खाएगा क्या / वह भी उन्हें चरने देती है जनता की तरह। पर इस व्यंग्य की पूर्णता इन पंक्तियों में नजर आती है, जब वे लिखते हैं -" घासबनी ही इसलिए/कि घोड़े उसे खाएं/मगर गूंदें नहीं/उसकी जिजीविषा को/वरना पहुंच जाती है /किले-कंगूरों पर/जनता की तरह।"
कवि ने गरीब परिवारों की छोटी- छोटी खुशी को बहुत करीब से देखा और उसे महसूस करते हुए अपनी कविताओं में संजोया है-"कचरा बीनती बच्ची को /मिल गई हो नई कंघी/ बड़े भाई का छोटा होता हुआ कोट/ मनवा लेता था दिवाली / आकर छोटे के कंधों में।" समकालीन कविता के दौर में भ्रूण हत्या पर लगभग सभी महत्वपूर्ण कवियों ने कलम चलाई और जनता को जागरूक किया । आच्छा जी ने भी इस विषय पर अपने भावों की अभिव्यक्ति की है। वे लिखते हैं:-"आतुर है जानने को / लक्ष्मी का लालच दे / भ्रूण के लक्षण को / भविष्यफल की तरह / सोनोग्राफी में।" लगभग सभी बड़े कवियों ने शक्ति की आराधना से ही सृजन को संभाव्य बताया है। कवि ने भी शक्ति के आराधन एवं उसके महत्व को प्रस्तुत किया है। वे लिखते हैं :-"शक्ति की पूजा में / कहाँ होता है बोध/कि हार जाते हैं देवता सारे / तो शक्ति ही / फेंकती है पाशुपत को / त्रिपुर के वध के लिए "यह कविता निराला जी कविता की पंक्ति 'शक्ति की करो मौलिक कल्पना 'की याद दिलाती है।यह भी कि-"डाली हैं हम इसी पेड़ की/खिलें चाहे भाई या बहिन/पेड़ कहां करवाते हैं सोनोग्राफी/बस इनका खिलना ही है काफी।"
भारतीय समाज में लोकपर्व के आयोजन हेतु जनता चन्दा एकत्रित करती रही है। लोक पर्व को याद करते हुए चन्दा मांगने के तरीके को कविता में व्यक्त करना कवि के लोक में रचे बसे होने का परिचायक है। 'होली' कविता की पंक्ति है :-"युवकों का टुल्लर जब / सड़कों पर / टोल टैक्स बन जाए / जेबें खुल जाएं चंदे में न देने पर कारें पंचर हो जाएँ / समझो होली आयी है।" 'माँ' कविता में कवि ने कई बिंबों में मातृत्व को संजोने की कोशिश की है। इस कविता का बेहतरीन बिम्ब है -"आँख पिता की टेढ़ी देखे / कनखी से सरसाये माँ / हलवे से पिज्जा तक / लालच दे समझाए माँ।"
गाँव और शहर के जीवन को भिन्न भिन्न बिंबों में कवि ने बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत किया है ,जिसमें गाँव की जीवन्तता का बड़ा सजीव चित्रण किया है। शहर में फैली सवेदनहीनता और स्वार्थपरकता को भी कवि ने व्यंग्यात्मक लहजे में चित्रित किया है, वे लिखते हैं -
"पड़ोस की दहलीजें बना लेती हैं / लाईन ऑफ कन्ट्रोल / कभी-कभार मुस्कुराहट फेंकती हैं/ सीमा चौकी की तरह।"
इस कविता संग्रह की सभी कविताओं को पढ़ते हुए जिन कवियों को सबसे ज्यादा याद किया उनमें प्रमुख रूप से कवि धूमिल, निराला और नागार्जुन एवं कबीर हैं। व्यंग्य की शैली ने इन कविताओं को धार प्रदान की है ,जो इस कविता के प्रभाव को दूरगामी बनाता है । आच्छा जी का यह कविता संग्रह भारतीय समाज को समझने और महसूस करने का जीवंत दस्तावेज है। बिंबों की अद्भुत रचना कवि के यहाँ मौजूद है। आह और पीड़ा को बड़ी ताकत के रूप में कवि ने प्रस्तुत किया है। जिस आह से किसी जमाने में कविता के फूटने की बात कही गई थी उसी आह से कवि ने स्वराज्य की आग की निर्मिति की कल्पना की है। वे लिखते हैं :-" पीड़ाएँ जब महल को छू जाएँ / दिल पिघलकर प्रज्ञा बन जाए / चल देता है राजकुमार बुद्ध बनकर /गाड़ी में अपमानित होकर गांधी / उबल पड़ता है जिस पीड़ा से/स्वराज्य की आग बन जाता है।"
हिन्दी काव्य समीक्षा के अनुसार महत्वपूर्ण काव्य स्वर वही होता हैं जो अपने समय की हलचल को महसूस करे और संवेदना के धरातल पर उसे अभिव्यक्त करे। आच्छा जी का यह कविता संग्रह 1975 से लेकर वर्तमान तक के सभी संवेदनशील मुद्दों से परिपूर्ण है। युद्ध की इस विभीषिका में उनकी अत्यंत प्रासंगिक पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-"इधर टी. वी. ने झलक दी है/युद्ध में बमबारी की / ध्वस्त हैं चारदीवारी / बिछी हैं ममता की लाशें / किलकारी भरता बच्चा /रो भी नहीं पा रहा।"धूमिल ने कहा है कि कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है। इन सार्थक वक्तव्यों की अनुगूंज के साथ ही लोक के प्रचलित शब्द एवं मुहावरों का प्रयोग असरदार दिखता है।
हम देखते हैं कि वर्तमान समय अत्यंत जटिल है। चारों तरफ निराशा फैली है। जल, जंगल और जमीनों पर हुए अतिक्रमण ने गाँव के गँवईपन को सारहीन कर दिया है। शहरों में बहुमंजिला इमारतें एक कमरे में ही गाँव स्थापित करने के असफल प्रयास में लगी हुई हैं। युवा मनुष्य से मशीन बनने की ओर अग्रसर हैं। ऐसे कठिन समय में भी कवि आच्छा जी पूरे विश्वास के साथ विनम्रता और कोमलता के माध्यम से उस संवेदनशीलता और जीवन की हलचल को लौटाने की मुहिम छेड़ने वाले कवियों की पंक्ति में खड़े हैं। जब वे 'स्पंदन' कविता में लिखते हैं :-"हर कठोरता में / कोमलता है जीवन का स्पंदन / साँसों का नवाचार / सृजन का / आलोकित संसार।"
निस्संदेह ये काव्य पंक्तियाँ कवि के सृजन,संवेदन और जीवन की आकांक्षाओं को निर्देशित करती हैं। इन कविताओं में हिंदी की सृजन यात्रा का कालबोध भी है और समकालीन चिंताओं का व्यंग्य स्वर भी-"इन्कार नहीं है-चीखों से/कोई गुजरे मेड़ों-खपरैलों से/पेट- पीठ की अंतड़ियों से/ गोदान और मैला आंचल से /कभी दुष्यन्त की लौ में/कभी धूमिल के मोचीराम की तरह/ कभी चित्रा के नालासोपारा में।" व्यंग्य प्रतिभा के साथ बिंबों और प्रतीकों का जीवंत प्रयोग अभिव्यक्ति को महत्वपूर्ण बनाता है। कुछ एक गंभीर कविताएं भी हैं ,जो खुलने के लिए पाठक के लिए विशेष तैयारी की मांग करती हैं विशेष रूप से समुद्र शीर्षक की कविताएँ। अन्ततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि कविता संग्रह 'चुप्पी अर्थ भरी ' भारत और समकालीन भारतीय समाज को समझने और महसूस करने का जीवंत दस्तावेज है।
- डॉ. कुंवर संजय विक्रम सिंह
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| पुस्तक का शीर्षक- चुप्पी अर्थ भरी लेखक का नाम-बी.एल. आच्छा प्रकाशक -इडिया नेट बुक्स, नोएडा प्रकाशन वर्ष-2026 मूल्य-₹200/- |
निष्कर्षतः, 'चुप्पी अर्थ भरी' समकालीन जीवन, प्रकृति, मानवीय संवेदना और सामाजिक विडंबनाओं को गहरी दृष्टि से अभिव्यक्त करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह है। बी. एल. आच्छा ने व्यंग्य, प्रतीक और बिंबों के माध्यम से अपने समय की चुनौतियों को प्रभावशाली स्वर दिया है। यह संग्रह पाठक को केवल संवेदित ही नहीं करता, बल्कि समाज, प्रकृति और मानवीय मूल्यों के प्रति गंभीर आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करता है। समकालीन हिंदी कविता में यह संग्रह अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने में पूर्णतः सफल सिद्ध होता है।
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