हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास : प्रो. सुरेंद्र विक्रम की पुस्तक की विस्तृत समीक्षा

Dr. Mulla Adam Ali
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‘Hindi Bal Sahitya Ka Sankshipt Itihas’ by Prof. Surendra Vikram is an important reference book that traces the history, development, major trends, writers, and changing perspectives of Hindi children’s literature. This review explores the book’s historical significance, research value, and relevance for writers, critics, researchers, and readers of children’s literature.

‘A Brief History of Hindi Children’s Literature’

हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास' एक अप्रत्तिम पुस्तक

हिंदी बालसाहित्य के इतिहास को समग्रता और प्रमाणिकता के साथ समझने के लिए प्रो. सुरेंद्र विक्रम की पुस्तक ‘हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास’ एक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी कृति है। प्रस्तुत समीक्षा में राजकुमार जैन राजन ने न केवल पुस्तक की विषयवस्तु और ऐतिहासिक दृष्टि को रेखांकित किया है, बल्कि हिंदी बालसाहित्य के इतिहास-लेखन की आवश्यकता, उसके विकासक्रम और वर्तमान संदर्भों पर भी सार्थक प्रकाश डाला है। यह समीक्षा पुस्तक के महत्त्व को समझने के साथ-साथ बालसाहित्य के अध्येताओं और शोधार्थियों के लिए इसकी उपयोगिता को भी सामने लाती है।

पुस्तक समीक्षा

'हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास' एक अप्रत्तिम पुस्तक

  • पुस्तक : 'हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास' 
  • लेखक : प्रो. सुरेंद्र विक्रम (लखनऊ)
  • प्रकाशक : के. एल. पचौरी प्रकाशन, डी- 80, इंद्रापुरी लोनी, गाजियाबाद - 201102 (उ.प्र.) 
  • मोबाइल. 98716 49742
  • प्रथम संस्करण : 2026 मूल्य : 300/- रुपये
  • समीक्षक : राजकुमार जैन राजन , आकोला

सबसे पहले हम बात करते हैं, कि इतिहास लेखन की आवश्यकता क्यों होती है? इतिहास सिर्फ 'क्या हुआ' का लेखा-जोखा नहीं होता है। इसके अलावा वह यह भी बताता है कि समाज कैसे बदला, सोच कैसे बनी और आगे की दिशा क्या हो? इतिहासकार का काम अतीत के मानव-समाज की तस्वीर बनाना और समय के साथ आए बदलावों को समझाना है। तथ्यों के संग्रह मात्र से इतिहास नहीं बनता, जब तक उनका सुसंगत दृष्टिकोण से संचयन और व्याख्या न हो। काल-विभाजन इसी लिए जरूरी है। 

अब हम इस विषय पर चर्चा करते हैं कि देश में बालसाहित्य के इतिहास लेखन की आवश्यकता क्यों है और इतिहास लेखन का औचित्य क्या है? हिंदी बालसाहित्य लोरी, पहेली, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आदि से समृद्ध है, लेकिन इसके सही मूल्यांकन और उसके सही रेखांकन का अभी तक अभाव है।

बालसाहित्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि मानसिकता, संवेदना और भविष्य की दिशा को गढ़ने वाला माध्यम है। डॉ. अलका सिंह के अनुसार, 'आज इसे नए सिरे से देखने, गढ़ने और इतिहासबद्ध करने की जरूरत पहले से अधिक है। प्राचीन काल से ही पौराणिक कथाएं, जातक कथाएं, अमीर खुसरो की पहेलियां, सूरदास का कृष्ण बाल-वर्णन, पंचतंत्र, हितोपदेश बालसाहित्य के स्रोत रहे हैं। इन गौरवशाली ग्रन्थों पर कायम भारतीय बालसाहित्य महज किस्से कहानियां नहीं हैं। यदि हम भारतीय हिंदी बालसाहित्य की जडें तलाशने की कोशिश करेंगे तो पता चलेगा कि यह कितना समृद्ध है। इन्हें व्यवस्थित किए बिना हम यह नहीं जान पाएंगे कि आज का बाल साहित्य कहां से आया?

डॉ. हरिकृष्ण देवसरे का कहना है, 'आज के बाल साहित्यकार के सामने जो चुनौतियाँ हैं, उनका सामना करने के लिए उसे सक्षम बनना ही पड़ेगा अन्यथा उसके बालसाहित्य लेखन का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।' इतिहास हमें पिछली पीढ़ियों की गलतियों और उपलब्धियों से सीख देता है। स्कूल जाने वाले बच्चों को 'स्तरीय बालसाहित्य' तक सहज पहुँच मिले, इसके लिए इतिहास लेखन जरूरी है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय बालसाहित्य ने बच्चों में देशप्रेम और भाईचारे की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 

यदि हम इसके औचित्य पर चिंतन करें तो बालसाहित्य के प्रखर विद्वान प्रकाश मनु ने इसे 3 चरणों में बांटा - प्रारंभिक युग 1901 -1947, गौरव युग 1947- 1980, विकास युग 1981 से अब तक। हरिकृष्ण देवसरे ने इसे भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, स्वतंत्रतयोत्तर युग आदि में विभाजित किया। इससे विकास की प्रवृत्तियां समझ में आती हैं। इतनी भूमिका बनाने के पीछे मेरा मंतव्य यह है कि बालसाहित्य के इतिहास को लेकर कई विद्वानों ने काम किया है और इनकी पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ है। इसी क्रम में प्रो. सुरेंद्र विक्रम की किताब 'हिंदी बालसाहित्य का संक्षिप्त इतिहास' भी प्रकाशित होकर पाठकों के मध्य पहुंची है। मेरे पास भी यह कृति आई तो इस पर चर्चा करने की एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ।  

प्रो. सुरेंद्र विक्रम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आप प्रसिद्ध शिक्षाविद और हिन्दी बाल साहित्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। क्रिश्चियन कॉलेज, लखनऊ से हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्ति के बाद से अब और भी जुनून और ऊर्ज़ा के साथ बालसाहित्य लेखन, समीक्षा एवं बालसाहित्य के समृद्ध इतिहास पर आपका सृजन, मंथन, चिंतन जारी है। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रो. सुरेंद्र विक्रम विगत 40 वर्ष से शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न पदों को सुशोभित करते हुए साहित्य की सेवा में सक्रिय हैं। आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें- 'हिन्दी बाल पत्रकारिता : उद्भव और विकास', 'हिन्दी बालसाहित्य : विविध परिदृश्य', 'समकालीन बालसाहित्य : परख और पहचान', 'बाल साहित्य : परंपरा, प्रगति और प्रयोग', 'हिन्दीबाल साहित्य : शोध का इतिहास', 'हिन्दी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर', 'इक्कीसवीं सदी की ओर', 'सारा देश हमरा घर', 'कविताओं में सुनें कहानी', 'पार्क हाथ से निकल गया' आदि विशेष रूप से चर्चित रही हैं।

हिन्दी बालसाहित्य के क्षेत्र में आपका काम विशेष ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। हिन्दी बाल साहित्य के लेखन और आलोचना दोनों स्तरों पर आपका कार्य स्तुत्य है। बालसाहित्य में नये- नये तथ्यों का उद्घाटन, इतिहास लेखन, समीक्षा तथा उनका शोधपरक दृष्टि से विश्लेषण आपके लेखन की प्रमुख विशेषता है। आपने देश-विदेश में आयोजित 500 से अधिक कार्यशालाओं में विषय विशेषज्ञ वक्ता के रूप में भाग लिया है तो मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में 'बालसाहित्य एवं भारतीय संस्कृति' विषय पर ऐतिहासिक व्यख्यान प्रस्तुत करने का सौभाग्य भी प्राप्त किया है।आप कई प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों से समादृत हैं। आपके बाल साहित्य पर कई विश्वविद्यालयों से शोधकार्य सम्पन्न हुए हैं, हो रहे हैं तो कई शोधार्थी आपके निर्देशन में बालसाहित्य में शोध कर चुके है व कई कर रहे हैं।

'हिंदी बालसाहित्य का संक्षिप्त इतिहास' में कुल चार अध्याय हैं। पहला काल विभाजन, दूसरा बालसाहित्य का ऐतिहासिक परिदृश्य, तीसरा स्वतंत्रता से पूर्व का बालसाहित्य एवं चौथे अध्याय में स्वतंत्रता के बाद के बालसाहित्य का मूल्यांकन दिया गया है। इस कृति की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. ओम निश्चल लिखते हैं कि, 'विडंबना है कि आज भी बालसाहित्य की पुस्तकें व पत्रिकाएं किसी लाइब्रेरी में नहीं मिलेगी कि कोई वहां जाकर शोध व मूल्यांकन कर सकें। इसके लिए लेखकों के बनाये हुए पुस्तकालय ही एक बड़ा आधार है।' इसका सबसे प्रमुख कारण है कि बालसाहित्य, साहित्य की नींव होने पर भी इसे नजरअंदाज किया जाता रहा, उपेक्षित समझा जाता रहा। कुछ दशकों में ही हिंदी बालसाहित्य की तरफ लोगों का ध्यान जाना, इस विषय पर वृहत कार्य होना व सृजन के क्षेत्र को एकदम गति मिलना, बालसाहित्य को एकदम मुख्य धारा में ले आया। 'नन्दन' के संपादक जयप्रकाश भारती ने कहा भी था कि, 'इक्कीसवीं सदी बालसाहित्य की होगी।' यह सच होता प्रतीत हो रहा है। प्रो. सुरेंद्र विक्रम पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि, 'बच्चों को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में महत्व देना ही बालसाहित्य को प्रश्रय देना है। .. कोई भी विधा या प्रवृति तब तक अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुंचती, जब तक उसका बारीकी से विश्लेषण नहीं किया जाए।' 

प्रो. सुरेंद्र विक्रम द्वारा रचित 'बालसाहित्य का संक्षिप्त इतिहास' 

पुस्तक खास तौर पर उन सुधि पाठकों के लिए हैं जो बाल साहित्य के आधार को समझना चाहते हैं। उसकी बातों के मर्म तक पहुंचना चाहते हैं। उसे रचने वाले मनीषियों के प्रेरणा स्त्रोत का पता लगाना चाहते हैं। अगर आप भारतीय बालसाहित्य का अध्यन कर रहे हैं और आपको यह अपनी तरफ खींचता है तो यह पुस्तक आपके लिए है। मगर आप इस विषय के नवागंतुक हैं तो इस पुस्तक को पढ़ने, समझने में आपको समय लग सकता है। वस्तुतः यह पुस्तक आपसे न्यूनतम जानकारी और काफी धैर्य की अपेक्षा रखती है। 

प्रो. सुरेंद्र विक्रम ने डॉ. मस्तराम कपूर, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, डॉ. प्रकाश मनु, डॉ. परशुराम शुक्ल, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, डॉ. विजयलक्ष्मी सिन्हा सहित कई अन्य विद्वानों द्वारा बालसाहित्य के इतिहास, एवं कालखंड को अपने- अपने तरीके से प्रस्तुत करने को भी मान्यता देते हुए अपना संतुलित व प्रमाणिक इतिहास प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है जो आदिकाल से लेकर वर्तमान तक का काल विभाजन पूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों, घटनाओं, साहित्यिक, सामाजिक परिवर्तनों एवं बदलते जीवन जीवन दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर किया है जो निःसन्देह लगातार अध्यन, अनुसन्धान, विश्लेषण एवं निष्कर्ष का ही परिणाम है। इस इतिहास ग्रन्थ का सृजन करते हुए रचनाकार ने बिना किसी लागलपेट व पुर्वाग्रह के विभिन्न विद्वानों के मत की चर्चा भी की है जिससे इस पुस्तक की स्वीकार्यता बढ़ गई है। प्रो. सुरेंद्र विक्रम वर्तमान में सृजनरत बालसाहित्यकारों से अपेक्षा करते हैं कि, 'वह भविष्य की वे चुनौतियाँ जिनका तत्कालीन बच्चे सामना करेंगे, पूर्णतः चिंतन, मनन कर उनके उत्तर भी प्रस्तुत करें। इस संक्षिप्त इतिहास की पुस्तक को पढ़ने के बाद कह सकता हूँ कि बालसाहित्य के इतिहास लेखन का औचित्य यह है कि वह हमें बताता है कि हमने बच्चों के लिए क्या लिखा, क्यों लिखा, और आगे क्या लिखना चाहिए। यह केवल अतीत नहीं बताता, बल्कि बाल मन की कोमलता को आकार देने का रोडमैप भी तैयार करता है। उनका मानना है कि अब बाल साहित्य सृजन में बच्चों की जिज्ञासा और बदलते जीवन दृष्टिकोण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

प्रो. सुरेंद्र विक्रम मानते हैं कि, 'इतिहास देखने में जितना सहज और सरल लगता है, दरअसल ऐसा होता नहीं है। सर्जना के स्तर पर ऐसी प्रवृतियों से गुजरना पड़ता है कि द्रविड़ प्राणायाम भी छोटा लगने लगता है। तथ्य तो यह है कि इतिहास प्रामाणिक व तथ्यपरक चीजों को सामने लाने का काम करता है। .... कहने को तो इतिहास लेखन निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।' सही भी कहा है। इस इतिहास कृति की प्रस्तुति लगातार चार दशक के चिंतन, मंथन का परिणाम है जिससे शानदार निकष की प्राप्ति हुई है।

डॉ. सुरेंद्र विक्रम ने हिंदी बालसाहित्य की विकास यात्रा को मोटे तौर पर लगभग 150 वर्षों का मानते हुए उन्नसवीं शताब्दी के अंत से ( सन् 1882 से) इक्कीसवीं शताब्दी से आजतक (सन् 2001 से अब तक) भारतेंदु युग से लेकर अद्यतन लेखा जोखा प्रस्तुत किया है। क्योंकि इतिहास तथ्यों पर आधारित होता है इसलिए इसमें कल्पना की संभावना बिल्कुल नहीं होती। श्रम व शोधपूर्वक आजादी पूर्व से वर्तमान तक की बालसाहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों का विवरण भी इस पुस्तक में समाहित किया गया है जो अध्येताओं के लिए बहुत ही उपयोगी है। पुस्तक के अंत में सहायक, पठनीय व उपयोगी पुस्तको की सूची भी दी गई है।

युग-विभाजन से पता चलता है कि बालसाहित्य ने समाज, शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन के साथ -साथ कैसे बदलाव किया। इससे आज के लेखक विकास की प्रवृत्तियां समझते हुए भविष्य की चुनौतियों के लिए लिख सकते हैं। बालसाहित्य के क्रमिक विकास में बाल पत्रिकाओं के योगदान को भी प्रो. सुरेंद्र विक्रम ने महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है कि, 'हिंदी बालसाहित्य का इतिहास इन पत्र- पत्रिकाओं के बिना लिखा ही नहीं जा सकता।' हमारी पीढ़ी ने तो 'बाल रत्न', 'मुन्ना', 'बालसखा', 'लल्ला', 'मदारी', 'तितली', 'मनमोहन', 'शिशु' जैसी पत्रिकाओं के केवल नाम ही सुने होंगे पर आपके संग्रह में इन पत्रिकाओं के अंक उपलब्ध हैं जो बहुत बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। बाद की लोकप्रिय पत्रिकाओं में 'पराग', 'नन्दन', 'नन्हें सम्राट', 'कुटकुट', 'मेला', 'बालहंस' आदि का प्रकाशन बन्द हो गया। वर्तमान में गिनती की बाल पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही है जिनमें भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की 'बाल भारती' और उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान की 'बालवाणी' तो सरकारी पत्रिकाएं हैं 'बाल वाटिका' व 'बच्चों का देश' व्यक्तिगत स्तर पर प्रकाशित पत्रिका है। बालसाहित्य की स्वीकार्यता एवं एकदम से चर्चा में आने का ही परिणाम है कि अब कई साहित्यिक पत्रिकाएं भी अपने बालसाहित्य विशेषांक प्रकाशित करने लगी है। इन पंक्तियों के लेखक को भी विभिन्न पत्रिकाओं के 12 बालसाहित्य विशेषांक संपादित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। बाल साहित्य विशेषांक का सम्पादन करना अध्यन व जागरूकता के साथ साथ समय व श्रम साध्य कार्य भी है।

आज जब हिंदी बालसाहित्य में निरन्तर विषयों की नवीनता और प्रस्तुतिकरण के माध्यमों में विविधता दिखाई दे रही है प्रो. सुरेंद्र विक्रम की 'हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास' पुस्तक में इतिहास, काल-विभाजन और प्रमुख प्रवृतियों एवं रचनाकारों का क्रमबद्ध ब्योरा मिलने से बालसाहित्य के शोधार्थियों को विषय की रूपरेखा तुरंत मिल पाएगी। संदर्भ और प्रमाण एक जगह मिल जाने से शोध का समय बचता है। उपेक्षित बालसाहित्य को मुख्यधारा में लाने का महनीय कार्य  हुआ है। यह पुस्तक उस खालीपन को भरती है और नए शोध के द्वार खोलती है। प्रो. विक्रम ने तथ्यों के साथ विश्लेषण दिया है। इससे नए समीक्षक स्तरीय बालसाहित्य को पहचानना और परखना सीख सकते हैं। इस पुस्तक में आशा से भी अधिक प्रमाणित सामग्री उपलब्ध हुई है। 

अंत में डॉ. ओम निश्चल की बात को उदृत करते हुए कि, 'डॉ. विक्रम आज हमारे बीच हैं तो बालसाहित्य का एक- एक बारीक सन्दर्भ उनकी निगाह में है। वे न रहेंगे तो ऐसे संदर्भ के लिए कोई जीवित इकाई नहीं बचेगी। जो बचे रहेंगे वे महज शोभाधारक होंगे। लेकिन इसमें संशय नहीं कि आगामी बालसाहित्य इतिहास लेखन में प्रो. सुरेंद्र विक्रम का लेखन एक लैम्प पोस्ट की तरह होगा, वह आगामी पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक होगा।' कहना चाहूंगा कि इस पुस्तक का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह आपको उंगली पकड़कर बालसाहित्य की उस दुनिया में ले जाती है जो आपका जाना- अनजाना इतिहास है। पुस्तक से होकर गुजरना एक विरल अनुभव है। आपकी यह कृति हिंदी बालसाहित्य के शुभचिंतकों, रचनाकारों, अध्येताओं, शोधार्थियों और समीक्षकों के लिए अनुपम उपहार है। इसकी उपलब्धता समस्त विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों एवं अध्यताओं के पुस्तकालयों में अनिवार्यतः होनी चाहिए। प्रो. सुरेंद्र विक्रम को लेखन एवं के. एल. पचौरी प्रकाशन को इस उपयोगी पुस्तक के सुंदर ढंग से प्रकाशन करने हेतु हार्दिक बधाई एवं शुभकामना।

● समीक्षक- 
राजकुमार जैन राजन 
चित्रा प्रकाशन 
आकोला- 312205
चित्तौड़गढ़ - राजस्थान 
मोबाइल- 982-821-9919

निष्कर्ष; कुल मिलाकर, ‘हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास’ हिंदी बालसाहित्य के इतिहास, विकास और बदलती प्रवृत्तियों को समझने वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति है। प्रो. सुरेंद्र विक्रम का दीर्घकालीन अध्ययन, शोध और निष्पक्ष दृष्टि इस पुस्तक को विशेष विश्वसनीयता प्रदान करता है। यह पुस्तक रचनाकारों, समीक्षकों, शोधार्थियों और बालसाहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए उपयोगी संदर्भ-ग्रंथ के रूप में लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेगी।

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