Hindi children's novels have evolved into a vibrant and significant genre of children's literature, reflecting changing social values, imagination, and the psychological world of young readers. This article presents a concise overview of their historical development, major authors, landmark works, and emerging trends in Hindi children's fiction.
Hindi Children's Novels: History, Evolution and Major Authors
हिन्दी बाल उपन्यास : विकास यात्रा, इतिहास और प्रमुख कृतियाँ
हिन्दी बाल साहित्य में बाल उपन्यास की परंपरा लगभग एक शताब्दी पुरानी है। प्रेमचंद के कुत्ते की कहानी से आरंभ होकर यह विधा सामाजिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, साहसिक और समकालीन विषयों तक निरंतर विकसित हुई है। प्रस्तुत लेख में प्रो. सुरेन्द्र विक्रम ने हिन्दी बाल उपन्यास की विकास-यात्रा, प्रमुख रचनाकारों, महत्वपूर्ण कृतियों और नवीन प्रवृत्तियों का तथ्यपूर्ण एवं व्यापक अवलोकन प्रस्तुत किया है। हिन्दी बाल साहित्य के इतिहास और विकास को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए यह लेख अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय है।
हिन्दी के बाल उपन्यास : एक विहंगावलोकन
बालसाहित्य की अन्य विधाओं के साथ बाल उपन्यास का जन्म भी बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही हुआ। डॉ. विजयलक्ष्मी सिन्हा का मानना है कि –” अपने आरंभिक दौर में बाल उपन्यासों की गति बहुत मंद रही, इसका प्रमुख कारण यही था कि लोग बालक के अस्तित्व को अपने अस्तित्व में मिलाकर देखते थे। उनकी धारणा थी कि बच्चों को कहानियों तक सीमित रखा जा सकता है, परंतु धीरे-धीरे उनके विचारों में बदलाव आया और उन्होंने बच्चों के अस्तित्व को पृथक् रूप में स्वीकार किया फलत: बाल उपन्यास का लेखन एक पृथक् विधा के रूप में होने लगा।”
प्रेमचंद का बाल उपन्यास कुत्ते की कहानी सन् 1936 में प्रकाशित हुआ था। इसे हिन्दी का पहला साल उपन्यास भी कहा जाता है। इसकी भूमिका में प्रेमचंद ने 14 जुलाई 1936 को बच्चों से शीर्षक से लिखा था कि—-
“प्यारे बच्चो! तुम जिस संसार में रहते हो, वहाँ कुत्ते- बिल्ली ही नहीं, पेड़-पत्ते और ईंट- पत्थर तक बोलते हैं, बिल्कुल उसी तरह जैसे तुम बोलते हो और तुम उन सब की बातें सुनते हो और बड़े ध्यान से कान लगाकर सुनते हो। उन बातों में तुम्हें कितना आनंद आता है। तुम्हारा संसार सजीवों का संसार है, उसमें सभी एक जैसे जीव बसते हैं। उन सबों में प्रेम है, भाईचारा है, दोस्ती है। जो सरलता साधु- संतों को बरसों के चिंतन और साधना के नहीं प्राप्त होती, वह तुम परम पिता के घर से लेकर आते हो।
यह छोटी पुस्तक मैं तुम्हारी उसी आत्म- सरलता को भेंट करता हूँ। तुम देखोगे कि यह कुत्ता बाहर से कुत्ता होकर भी भीतर से तुम्हारे जैसा ही बालक है, जिसमें वही प्रेम और सेवा तथा साहस और सच्चाई है जो तुम्हें इतनी प्रिय है।”
प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य
प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ डॉ. कमलकिशोर गोयनका के इस कथन को विशेष रूप से संज्ञान में लेना चाहिए कि सन् 1936 में प्रकाशित उनके बालसाहित्य सृजन की आलोचकों ने अनदेखी की—--
“प्रेमचंद का बालसाहित्य भी उनके ही मानस- संसार से निकला है, लेकिन हिन्दी आलोचना का इतिहास देखें तो प्रायः हिन्दी आलोचकों ने प्रेमचंद के बाल सहित्य को कोई विशेष महत्व नहीं दिया। जब डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक प्रेमचंद सन 1941 में छपी, तो इसमें उन्होंने प्रेमचंद के बालसाहित्य का कोई उल्लेख नहीं किया और जब इसका सन् 1989 का संस्करण प्रेमचंद और उनका युग के रूप में प्रकाशित हुआ तो उन्होंने इसमें भी उनके बालसाहित्यकार की कोई चर्चा नहीं की। आरंभिक काल के दो प्रेमचंद आलोचकों की पुस्तकों में अवश्य ही प्रेमचंद की बाल पुस्तकों पर टिप्पणियाँ की गई हैं।
मन्मथनाथ गुप्त की सन् 1949 में प्रेमचंद और उनका साहित्य पुस्तक छपी, लेकिन इसमें इन पुस्तकों का उल्लेख नहीं है, परंतु उन्होंने जब इस पुस्तक को नए रूप में लिखा और प्रेमचंद व्यक्ति और साहित्यकार शीर्षक से सन् 1961 में प्रकाशित कराया तो उसमें उन्होंने प्रेमचंद का बालसाहित्य शीर्षक से एक अध्याय भी लिखा और कुत्ते की कहानी तथा महापुरुषों की जीवनियों की चर्चा की। इसके साथ डॉ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ ने भी अपनी पुस्तक प्रेमचंद और उनके साहित्य साधना में बालसाहित्य की सूची दी और उसे जीवनी एवं शिशु साहित्य दो भागों में बाँटा। डॉ. कमलेश ने उनकी सभी बाल पुस्तकों का उल्लेख किया, यद्यपि विस्तृत व्याख्या से वे भी बचकर निकल गए।
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प्रेमचंद की आलोचना के उन आरंभिक प्रयासों में डॉ. इंद्रनाथ मदान, नंददुलारे वाजपेई, रामरतन भटनागर आदि की पुस्तक भी आती हैं। इन आलोचकों ने अपनी पुस्तकों में प्रेमचंद के बालसाहित्य का उल्लेख नहीं किया और इसके बाद तो स्थिति यह बनी की प्रायः प्रेमचंद के आलोचकों ने उनके बालसाहित्य को अपने दृष्टिपथ से बहिष्कृत कर दिया। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि जब प्रेमचंद के छोटे पुत्र अमितराय ने पेपरबैक में प्रेमचंद रचनावली प्रकाशित करने का दावा किया तो उन्होंने भी इस रचनावली में बालसाहित्य को शामिल नहीं किया।” (प्रेमचंद बालसाहित्य समग्र: पृष्ठ 6-7)
इस दिशा में बालकों के लिए मौलिक उपन्यास लिखने की शुरुआत कृष्णचंद्र शर्मा ने की। उनका बालोपयोगी उपन्यास आदमी का बच्चा धारावाहिक रूप में सन् 1946 में प्रकाशित हुआ था । इसके पूर्व सन् 1933 में बैजनाथ का उपन्यास काने की करतूत प्रकाशित हुआ था। इसी समय पौराणिक विषयों को लेकर भी उपन्यास लिखे गए जिनमें से अधिकतर प्रसिद्ध ग्रन्थों के बाद संस्करण थे। जैसे – बाल महाभारत, बाल शकुंतलम तथा सावित्री -सत्यवान आदि।सन् 1944 में देवीदयाल चतुर्वेदी का बाल उपन्यास दोस्त की पुलटिन तथा नर्मदा प्रसाद मिश्र का छू-मंतर की पोथी तथा गंजी खोपड़ी भी प्रकाशित होकर बच्चों में बेहद लोकप्रिय हुए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक लेखकों का ध्यान विशेष रुप से बाल उपन्यास की ओर नहीं गया। हाँ, इतना अवश्य हुआ कि कहीं -कहीं छिटपुट प्रयास अवश्य हुए। बाल उपन्यासों की दिशा में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उल्लेखनीय प्रगति हुई।
स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी बालउपन्यास
जैसाकि पहले कहा जा चुका है- बालउपन्यास लेखन की शुरुआत तो स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ही हो गई थी तथा कुछ बालउपन्यास लिखे भी जा चुके थे। इन बालउपन्यासों का प्रकाशन उस समय की प्रसिद्ध बाल पत्रिकाओं में हो चुका था तथा कुछ स्वतंत्र रूप से संकलन के रूप में भी प्रकाशित हो चुके थे। सही अर्थों में बच्चों के लिए उपन्यास लिखने की शुरुआत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही हुई। बहुत से बालसाहित्यकारों ने इस विधा में अपनी लेखनी आजमाई। सामाजिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक, पौराणिक तथा भौगोलिक कथानकों को आधार बनाकर अनेक मौलिक बाल उपन्यास लिखे गए। प्रेमचंद की उत्कृष्ट रचना एक कुत्ते की कहानी हिन्दी का पहला बालउपन्यास माना जाता है। सन् 1952 में धूप नारायण दीक्षित का बाल उपन्यास खड़खड़ देव बालसखा में धारावाहिक प्रकाशित हुआ था। इसी प्रकार सन् 1957 में अयोध्या प्रसाद झा का बालउपन्यास लाल पुतला भी उस समय की मशहूर पत्रिका किशोर मासिक में प्रकाशित हुआ था।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हर दिशा में बदलाव की एक पहल शुरू हो गई थी। बालसाहित्यकार आज़ादी दिलाने के नाम पर जो साहित्य बच्चों को परोस रहे थे, उसमें अचानक परिवर्तन आ गया। इस परिवर्तन को समझना इसलिए भी आवश्यक था कि अब स्वच्छंद साँस लेने की खुली छूट थी। रूपनारायण दीक्षित ने इस मर्म को अच्छी तरह समझ लिया था। उन्होंने अपने बाल उपन्यासों नानी के घर में टंटू तथा बालराज्य में बदलते परिवेश के साथ बच्चों की भावनाओं को जोड़कर प्रस्तुत किया था , इसलिए इनकी गणना हिन्दी के उत्कृष्ट बाल उपन्यासों में की जा सकती है। इसी के समानांतर भगवतशरण उपाध्याय ने सूरजपंखी चिड़िया,शीशमहल की राजकुमारी, सागर का घोड़ा तथा खजाने का चोर उपन्यासों में अद्भुत शैली का प्रयोग करके पाठकों को चौंका दिया था। इनकी भाषा - शैली पूरी तरह से बाल मनोविज्ञान पर आधारित थी।
आगे चलकर छठवें दशक में उत्कृष्ट बाल उपन्यासों को केन्द्र में रखकर एक बार फिर से चिंतन-मनन प्रारंभ हुआ। बड़ों के लिए लिखने वाले कई रचनाकारों ने भी इस क्षेत्र में हाथ आजमाया। इसका परिणाम यह हुआ कि चंदामामा दूर के: हिमांशु श्रीवास्तव, एक डर पाँच निडर: सत्यप्रकाश अग्रवाल, खरगोश का सपना: कृष्ण चंद्र, हरी घाटी : लक्ष्मीनारायण लाल, करामाती कद्दू: द्रोणवीर कोहली तथा डाकू का बेटा: हरिकृष्ण देवसरे जैसे उपन्यास पाठकों के बीच में उपलब्ध हुए। ये ऐसे उपन्यास थे जिनमें बाल चेतना, बालमन की उड़ान के साथ बदलते बाल मनोविज्ञान को प्रमुखता से रेखांकित किया गया था। यह वही समय है जब बाल उपन्यासों में तरह -तरह के प्रयोग भी किए गए। जासूसी बाल उपन्यासों की शुरुआत भी इसी समय हुई। विज्ञान के अनेक सिद्धांतों तथा सफल प्रयोगों को भी बाल उपन्यासों में सम्मिलित किया गया। बच्चों को नई-नई जानकारियों के साथ स्वस्थ जीवनशैली के बारे में भी बाल उपन्यासों में बताया गया।
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छठवें और सातवें दशक में अनेक चर्चित विदेशी उपन्यास रूपांतरित होकर हिन्दी बाल-साहित्य में आए। अंग्रेज़ी उपन्यास दि गोल्डेन मिल का सोने की चक्की नाम से कमला सोंधी द्वारा अनुवाद किया गया। द्रोणवीर कोहली ने जर्मन उपन्यास का फूलों की टोकरी शीर्षक से अनुवाद किया। किशोर गर्ग ने मिस्टर रैबिट एंड फॉक्स का चालाक खरगोश शीर्षक से अनुवाद किया। लुइस कैरोल के सुप्रसिद्ध उपन्यास एलिस इन द वंडरलैंड का हिन्दी अनुवाद आश्चर्यलोक में एलिस शीर्षक से शमशेरबहादुर सिंह द्वारा अनुवाद किया गया तथा रूसी उपन्यास का अनुवाद योगेन्द्र कुमार लल्ला ने अनाड़ीराम और उसके साथी शीर्षक से किया। विनोद कुमार ने दो प्रसिद्ध उपन्यासों राजा और भिखारी तथा टाम काका की कुटिया का अनुवाद किया जिसका प्रकाशन पराग में हुआ। अरेबियन नाइट्स की कहानियों का अनुवाद अलीबाबा और चालीस चोर शीर्षक से प्रकाशित हुआ। गुजराती बालउपन्यास जादूगर कबीर का हिन्दी रूपांतरण मनहर चौहान द्वारा किया गया, जिसका प्रकाशन साप्ताहिक हिंदुस्तान में धारावाहिक रूप में हुआ। इसी प्रकार बांग्ला के उपन्यासों का भी हिन्दी में अनुवाद इसी काल में हुआ।
हिन्दी बालउपन्यासों का यह दौर बालसाहित्य के इतिहास में विशेष रूप से रेखांकित किया जाएगा, क्योंकि इस दौर में बच्चों की रुचियों पर केन्द्रित सैकड़ों उपन्यास प्रकाशित हुए। कुछ उपन्यास बच्चों की प्रमुख पत्रिकाओं में धारावाहिक तथा कुछ सीधे पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। ऐसे उपन्यासों में कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:-----सागर का घोड़ा (भगवतशरण उपाध्याय),जय सोमनाथ (बाँकेबिहारी भटनागर), माँ का आँचल और नन्हें जासूस ( शांति भटनागर), हाथियों के घेरे में ( स्वदेश कुमार), बीस बरस की मौत, बर्फ का आदमी,एक घंटे बाद तथा बोतल में बंद आदमी (वीर कुमार अधीर), डाकुओं के बीच (रामकुमार भ्रमर), राधा (मधुकर सिंह), शाही हकीम, एक कटोरा पानी तथा इंदल का विवाह (राधेश्याम ‘प्रगल्भ’), बीरबल (ललित सहगल), एक था छोटा सिपाही (विमला शर्मा), खोखला सिक्का (अवतार सिंह), नकली चाँद (राजेश कुमार जैन),होटल का रहस्य, सुरखाब के पर, सोहराब रुस्ताब रुस्तम, जाली नोट,जाली चेक (हरिकृष्ण देवसरे), शनिलोक ( विभा देवसरे), नानी माँ का महल (देवेन्द्र कुमार), अस्सी घाव (यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’), चाणक्य (वीरेन्द्र कुमार गुप्त), आकाशवाणी (व्यथितहृदय), राजपूत का बेटा (ओमप्रकाश), सूरज का बेटा (गोविन्द सिंह) तथा रामगंगा का शेर (चन्द्रदत्त ‘इंदु’) आदि।
उपर्युक्त बाल उपन्यासों की सूची देखकर आसानी से यह कहा जा सकता है कि यह समय वास्तव में स्वर्णयुग था। बाल साहित्यकारों की पूरी टीम इस कार्य में लगी हुई थी। विषय-वैविध्य के साथ -साथ सामाजिक, ऐतिहासिक, धार्मिक तथा पौराणिक विषयों को बाल उपन्यासों के दायरे में लाकर बच्चों तक पहुँचाने का मिशन कितना कामयाब था। अच्छी बात यह भी थी कि उनमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना से ही यह अद्भुत कार्य हो पाया। आगे चलकर धीरे-धीरे बाल उपन्यास लेखन के केन्द्र में सीधे बच्चे आ गए। उनका बदलता परिवेश, उनकी अपनी समस्याएँ, उनकी परिस्थितियाँ, उनकी सूझबूझ को ध्यान में रखकर उपन्यास लिखे जाने लगे। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे बाल उपन्यासों को प्रमुखता से नंदन और पराग ने धारावाहिक प्रकाशित किया। इससे भी अधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान ने भी अपने स्तंभों क्रमशः बाल जगत और फुलवारी में बाल उपन्यासों को जगह देकर अनूठी पहल की। पराग में प्रकाशित होने वाले कुछ प्रमुख बाल उपन्यास हैं:---- बहत्तर साल का बच्चा: आबिद सुरती, खलीफा तरबूजी: के. पी. सक्सेना, नागराज वासुकि: देवराज दिनेश, चींटीपुरम के भूरे लाल:मुद्राराक्षस,शाबाश श्यामू: डॉ. श्रीप्रसाद, एक डर पाँच निडर: सत्यप्रकाश अग्रवाल, चंदामामा दूर के: डॉ. हरिकृष्ण देवसरे तथा शेर का पंजा: अवध अनुपम आदि। इनके अतिरिक्त नंदन में प्रकाशित हरी घाटी: डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, धर्मयुग में प्रकाशित जादुई खड़िया, करामाती कद्दू : मनहर चौहान, तथा सुनहरा: शशिप्रभा शास्त्री के रोचक उपन्यासों ने बच्चों के बीच में अपनी अलग पैठ बनाई।
अपने समय में बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में अलौकिक पहचान बनाने वाली पत्रिका मिलिन्द ने भी कई रोचक उपन्यास प्रकाशित किए थे। मिलिन्द की पाँचवीं वर्षगाँठ के अवसर पर हरिकृष्ण देवसरे का किशोरोपयोगी उपन्यास हांगकांग की गुड़िया प्रकाशित किया गया था। मिलिन्द का यह विशेष अंक पाठकों द्वारा खूब प्रशंसित हुआ था। हांगकांग की गुड़िया उपन्यास की कथावस्तु ही इतनी सुगठित थी कि मिलिन्द में छपते ही यह चर्चा में आ गया, बाद में यह पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ। इस बेहद दिलचस्प, रोमांचक, सनसनीखेज और शिक्षात्मक उपन्यास में हांगकांग की गायब गुड़िया को खोजने चार बच्चे निकल पड़ते हैं। अँधेरी और डरावनी रात में वे जासूसी करते हुए गलत रास्तों पर भटक जाते हैं। वे अपराधियों के हाथ में पड़ जाते हैं, जिससे उनके प्राणों पर आ बनती है। काफी जद्दोजेहद के बाद अंत में गायब गुड़िया का रहस्य खुल जाता है।
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में हिन्दी के बाल उपन्यासों ने विशेष प्रगति की। प्रकाशन की दृष्टि से यह काल विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा है। इसमें एक साथ तीन पीढ़ियों के रचनाकार सक्रिय रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर बीसवीं शताब्दी के अंत तक का समय बालसाहित्य के उतार -चढ़ाव और उलझाव -सुलझाव का रहा है। समय की धारा में हिचकोले खाता हुआ बालसाहित्य कभी डूबता तो कभी उतराता रहा, बाल उपन्यास भी इससे अछूता नहीं रहा है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस काल में जो भी बाल उपन्यास प्रकाशित हुए ,उन उपन्यासों ने बच्चों को विशेष रूप से प्रभावित किया। ऐसे उपन्यासों में अक्ल बड़ी या भैंस: अमृतलाल नागर, बोस्की के कप्तान चाचा: गुलजार, उस्ताद भूरेलाल:बल्लभ डोभाल, नागों के देश में:भगवतीशरण मिश्र, घड़ियों की हड़ताल: रमेश थानवी, भवानी के गाँव का बाघ: क्षितिज शर्मा, आँगन-आँगन फूल खिले हैं:गीता पुष्प शॉ, पेड़ नहीं कट रहे हैं तथा चिड़िया और चिमनी : देवेन्द्र कुमार,पाँच जासूस: शकुंतला वर्मा,दूसरा पाठ, शिब्बू पहलवान, मिट्ठू का घर, पीलू राजा बदल गया तथा होमवर्क: सभी की रचनाकार क्षमा शर्मा, गोलू और भोलू:पंकज बिष्ट,काजू और किसमिस: रतन शर्मा, कमाल का कमाल: बलवीर त्यागी, सत्य का बल: यादराम रसेन्द्र, कंप्यूटर के जाल में तथा गजमुक्ता की तलाश: गया सक्सेना, गोल्डी सिल्विया के कारनामे:अभिलाष वर्मा, लाखों में एक, नन्हा दधीचि, हीरे का मोल, पारस पत्थर:सभी की रचनाकार उषा यादव, शाबाश मन्नू:अमर गोस्वामी तथा डाकू बाबू का पार्सल: द्रोणवीर कोहली आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
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उपर्युक्त बाल उपन्यासों की परंपरा में कुछ ऐसे बालोपयोगी उपन्यास भी लिखे गए हैं जो एक ही थीम होने के बावजूद उनकी कहन, शैली-शिल्प और विन्यास में इतनी रोचकता है कि बार-बार पढ़े जाने के बावजूद उनमें नयापन नजर आता है। यहाँ मैं कोरोना काल पर केन्द्रित उन बाल उपन्यासों का जिक्र करना चाहता हूँ, जिनकी रचनाकार डॉ. कामना सिंह ने बाल-साहित्य में न केवल अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज़ कराई है, अपितु अपने खाते में कई रिकॉर्ड भी सुरक्षित कर लिया है।
डॉ. कामना हिन्दी बाल साहित्य में पी-एच.डी. और पहली तथा फिलहाल इकलौती डी.लिट्. हैं। स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी बाल साहित्य पर शोधकार्य करके उन्होंने न केवल उसके महत्त्व को रेखांकित किया है, बल्कि आज के बालक की रुचि, आधुनिकता, उसकी महत्त्वाकांक्षाएँ और अस्मिता को भी भरपूर समर्थन दिया है। उन्होंने अपने शोध कार्य में जिस तथ्यपरक दृष्टि और ऊर्जा का सदुपयोग किया है, वही ऊर्जा और विवेक उनके बाल उपन्यासों में भी देखने को मिलता है। कोरोना पूरे विश्व में ऐसी आपदा थी जिसने सभी को हिला कर रख दिया था। लंबे समय तक चली इस आपदा ने सब कुछ छिन्न-भिन्न करके रख दिया था। बच्चों की दिनचर्या सबसे अधिक प्रभावित हुई थी। स्कूल-कालेज सब बंद हो गए थे। बच्चों का घर से निकलना,खेलना-कूदना, अपने दोस्तों से मिलना-जुलना सब बंद। घर के ही दायरे में सिमटकर रह गए बच्चों को केन्द्र में रखकर , उनकी मानसिकता को परखकर डॉ. कामना सिंह ने धड़ाधड़ कई बाल उपन्यास लिख डाले।
सन् 2020 से 2023 के बीच में डॉ. कामना सिंह के कोरोना पर केन्द्रित पाँच बाल उपन्यास प्रकाशित हुए :-- हम चलेंगे साथ-साथ (2020), मास्क वाली खुशी (2021), सपने सतरंगी (2021), गुलाबी क़मीज़ (2021) तथा नैना के सपने (2023)। इन सभी बाल उपन्यासों में पूरा कोरोना काल, उसकी विसंगतियाँ, अंदर से हिली हुई संवेदना तथा रोज़ -रोज़ बदलती हुई परिस्थितियों से पूरा जीवन ही पटरी से उतर गया था। हम चलेंगे साथ-साथ शीर्षक यह संकेत कर रहा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी साथ-साथ चलने का संकल्प बिना दृढ़ निश्चय के संभव नहीं है। दोस्तों के बीच में चहलकदमी करने वाले बच्चे एकाकी जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो गए थे। न कहीं निकलना न किसी से भी मिलना -जुलना बस कंप्यूटर व लैपटॉप और मोबाइल में भी जिन्दगी सिमटकर रह गई थी। सड़कों पर पसरा हुआ सन्नाटा अंदर से चीरकर रख देता था। सभी को मन में बार-बार मन में यही चिन्ता खाए जा रही थी कि अब आगे क्या होगा? बच्चों की मासूमियत गायब हो गई थी। उपन्यासकार डॉ. कामना सिंह पूरी संवेदना के साथ इस उपन्यास का ताना-बाना बुनती हैं:----- “मासूम बचपन की मासूमियत को दर्शाता, बरकरार रखता और आगे बनाए रखने की आस दिखाता यह उपन्यास हम चलेंगे साथ-साथ इस बात का संकल्प है कि बच्चे कोरोना से जीवन जीना सीखेंगे, न कि हारना। कठिनाइयों से टकराते -जूझते जो राहें निकलती हैं, उन पर चलकर मंज़िल तक पहुँचने में जो मज़ा आ रहा, वह चिकनी-रेशमी आसान राहों से फिसलते हुए पहुँच जाने में नहीं।”
बच्चों का हौसला अफजाई करता हुआ यह बाल उपन्यास निम्नलिखित शीर्षकों में विभाजित किया गया है —-कोरोना और लॉकडाउन, ऑनलाइन कक्षाएँ, कहाँ हैं हमारी जड़ें, हमारा परिवार, उलझन-सुलझ एक नया मेहमान, नए घर में टाइमपास, मैं अपना सामान क्यों बांटूँ, बदली हुई दुनिया तथा वायरस और मनुष्य। हर एक शीर्षक में कोरोना की त्रासदी समाई हुई है। कब क्या हो जाएगा, कुछ भी निश्चित नहीं है। हर बदलते परिदृश्य पर उपन्यासकार की नज़र ऐसी टिकी हुई है जैसे सिनेमा की रील पर दर्शक टकटकी लगाकर देखते रहते हैं। इस संपूर्ण कथानक को छोटे -छोटे संवाद न केवल जीवंत बनाते हैं, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा भी देते हैं।
दूसरा बाल उपन्यास मॉस्क वाली खुशी में भी कोरोना की त्रासदी का वर्णन किया गया है। अगस्त 2021 में लॉकडाउन तो खुल गया है लेकिन स्कूल नहीं खुले हैं। बच्चों ने लंबे समय से अपने -अपने स्कूल का मुँह नहीं देखा है। कहीं-कहीं स्कूल तो खुल गए हैं, मगर कक्षाएँ ऑनलाइन ही चल रही हैं। कक्षाएँ खाली हैं , जिन दोस्तों के बीच में रोज मौजमस्ती होती थी, साथ में टिफिन खुलते थे,एक दूसरे से हँसी -मज़ाक होता था, इन सबसे बच्चे अभी भी बहुत दूर हैं। स्कूल के प्लेग्राउंड में सन्नाटा पसरा हुआ है। बकौल उपन्यासकार —---”इस कोरोना वायरस ने हमारे और हमारे स्कूल के बीच एक ऐसा पुल बना दिया है, जिस पर चलते हुए हमें डर लगता है और हम चुपचाप स्वयं को अपने घर में बंद कर लेते हैं।
यह उपन्यास इसी विषय पर लिखा गया है। इसमें संसार भर के बच्चों की कहानी है। कोरोना महामारी की वजह से संसार भर के बच्चे जो झेल रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, इसमें दिखाने का प्रयास किया गया है।”
इस उपन्यास को जिन उपशीर्षकों में विभाजित किया गया है, वे इस प्रकार हैं:-- वैश्विक महामारी कोरोना, लॉकडाउन, ऑनलाइन कक्षाएँ, हम सब एक हैं, बाहर की दुनिया, नए सितारों का उदय, मैं भी हीरो हूँ, फिर ऑनलाइन पढ़ाई, हाँ, मैं कर सकता हूँ, मन के हारे हार है, मन के जीते जीत तथा ऑनलाइन खुशियाँ । बच्चों ने जो कुछ भी इस कोरोना काल में देखा, समझा, जाना और महसूस किया, वह सब एक-एक कर सिलसिलेवार इस बाल उपन्यास में पिरोया गया है। बच्चे धीरे-धीरे ऑनलाइन पढ़ाई के आदी तो हो गए थे, लेकिन उन्हें वह आनंद नहीं आ रहा था जो कक्षाओं में बैठकर पढ़ने में आता था। पूरा उपन्यास बालमनोविज्ञान का जीवंत दस्तावेज है, जिसमें खुशियाँ कम ग़म ज्यादा है। यह उपन्यासकार की लेखनी का कमाल है कि उपन्यास के एक- एक पृष्ठ में आरंभ से लेकर अंत तक रोचकता भरी हुई है।
भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से सन् 2021 में प्रकाशित सपने सतरंगी उपन्यास भी कोरोना को ही केन्द्र में रखकर लिखा गया है। समग्रत: यह विशिष्ट जरूरत वाले बच्चों पर केन्द्रित है। ऐसे बच्चे आपस में एक दूसरे की भावनाओं से गंभीरता से जुड़े होते हैं। कोरोना में इन बच्चों ने न केवल अपना ख्याल रखा बल्कि आपस में एक दूसरे की मदद करते हुए इस त्रासदी से बड़ी मजबूती से लड़कर अपनी जगह बनाई। कोरोना का प्रभाव इतना घातक था कि सभी ओर मौत का साया टहलते हुए दिखाई दे रहा था। हर व्यक्ति उससे डरा हुआ था। इस कठिन परिस्थिति में जब लोगों को कुछ भी सूझ नहीं रहा था तब ये विशिष्ट बच्चों ने इस महामारी का जिस तरह मुकाबला किया और जीवन को सहज तथा सरल बनाने में अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। यह आख्यान इस उपन्यास में बड़ी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
इस बाल उपन्यास को भी जिन शीर्षकों में विभाजित किया गया है, उनमें से कई पहले दोनों उपन्यासों के इर्द-गिर्द ही घूमते नजर आते हैं। साथ ही साथ कुछ नए शीर्षक उस दास्तान पर मुलम्मा चढ़ाने का काम भी कर रहे हैं। लॉकडाउन, पुरानी यादें, आदर्श स्कूल का लर्निंग सेन्टर, सपन-तपन, रागिनी, समस्याओं का अंबार, बिल्लू बिलौटा, लॉकडाउन और रागिनी, लॉकडाउन और सोशल डिस्टटेंसिंग, सपन-तपन से मुलाकात, ऑनलाइन कक्षाएँ, छुट्टियों की शुरुआत, अनलॉक तथा छुट्टियों वाला दिन शीर्षकों से पूरे उपन्यास को ऐसा सजाया गया है कि कहीं -कहीं पूरी कथा आँखों देखें वर्णन में तब्दील हो जाती है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उपन्यास के बीच-बीच में दिए गए रंगीन चित्रों से कथा को और विस्तार मिल रहा है।
इसी कड़ी में सन् 2021 में ही भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित बाल उपन्यास गुलाबी क़मीज़ डॉ. कामना सिंह का ऐसा रोचक और बाँधकर रखने वाला है जो एक ओर बच्चों को वैश्विक कोरोना महामारी के फैले हुए आतंक से उबारता है तो दूसरी ओर उन्हें ऐसे भविष्य के लोक में ले जाता है जिसमें सुखद सपने हैं। कोरोना के आपदा से जितना बड़े प्रभावित हुए थे, उससे कहीं ज्यादा इसने बच्चों से उनकी खुशियाँ छीन ली थी। ऊपर से दो वक्त की रोटी कमाने की समस्याओं से जूझता हुआ परिवार और उसमें डरे-सहमे बच्चे अजीब मानसिकता से गुजर रहे थे। यह उपन्यास का नायक हीरा के हीरो बनने की कहानी दर्शाता है। बकौल उपन्यासकार —”कोरोना के संदर्भ में बच्चों के मनोबल और आशावादिता से हम सब वाक़िफ हैं। इसीलिए हीरा की यह सोच हवा की लहरों पर तैरती हुई पता नहीं कब विश्व भर के बच्चों की आवाज़ बन जाती है —’ दुनिया कितनी सुन्दर है। कोरोना आँसू बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है, पर हम अपनी दुनिया को बिगड़ने नहीं देंगे।
बात सच है। कोरोना ने भले ही दुनिया को भारी नुक़सान पहुँचाया हो, पर मनुष्य की मेहनत, सच्चाई, ईमानदारी, प्यार, दोस्ती और रिश्तों तक वायरस नहीं पहुँच सका है। गुलाबी क़मीज़ हमें इसी बिन्दु पर आश्वस्त करता है। यही इस उपन्यास का मानवता को संदेश है और देश के स्वर्णिम भविष्य का संकेत भी।”
वस्तुत: इस पूरे बाल उपन्यास में जिस तरह मुश्किलों से निपटने का संदेश दिया गया है वह इस अर्थ में और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि बड़े भले ही एक बार मुसीबतों से डगमगा जाएँ, लेकिन बच्चे न तो मुसीबतों के आगे झुकना जानते हैं और न ही हार मानते हैं। बच्चों का यही संकल्प उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। पूरा उपन्यास इतने रोचक ढंग से लिखा गया है कि इसे बार-बार पढ़ने का मन करता है। कहीं-कहीं हमारी आँखों के कोर भीगते भले हैं, लेकर यह आश्वस्त भी करते हैं कि डर के आगे जीत है।
सन् 2023 में प्रकाशित डॉ. कामना सिंह का बालउपन्यास नैना के सपने भी कोरोना पर आधारित है, मगर इसमें कोरोना पर विजय प्राप्त करने का उल्लास है। उन डॉक्टरों की संकल्प गाथा है जिन्होंने न केवल मानवता का उदाहरण प्रस्तुत किया बल्कि लोगों की उम्मीदों को जिन्दा रखा। उपन्यासकार का यह कथन बिल्कुल सही है कि —”कोरोना वायरस ने दुनिया को हिला दिया। एक समय लगा कि सब कुछ खत्म हो जाएगा, पर मनुष्य ने हार नहीं मानी। एक ओर डॉक्टरों ने एक जंग लड़ी, तो दूसरी ओर दुनिया भर के मनुष्य अपने जीवन को संजोकर दुनिया की खूबसूरती को कायम रखने का प्रयास करते रहे। मनुष्यता की ऐसी चेन बनी कि सोशल डिस्टेंसिंग के बावजूद सभी एक दूसरे के लिए खड़े थे।”
यह उपन्यास अपने उप-शीर्षकों —-यह कोरोना कहाँ से आया, नैना का बतासपुर, बदली हुई दुनिया, आँगनबाड़ी वाली दीदी, टीका यानी वैक्सीन, पिताजी लौट आए, चाँद -सितारों वाली दुनिया, पत्रकार दीदी, मत जाओ मीरा, समय कब रुका है, नए रास्ते, पहला कदम जीत की खुशी के पल तथा छू लें आसमान में कोरोना के आतंक से लेकर विजय तक की कहानी है। मुसीबतों का टूटता पहाड़ मनुष्य को थका अवश्य देता है, मगर जब मुसीबतें दूर हो जाती हैं तो उससे जो खुशी मिलती है, उसकी कल्पना से ही पूरा शरीर रोमांचित हो जाता है। यह पूरा उपन्यास उसकी रोमांच को बरकरार रखता है।
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डॉ. कामना सिंह ने जिस तरह कोरोना पर आधारित एक नहीं, दो नहीं कुल पाँच बाल उपन्यासों का सृजन किया है, यह उनकी कारयित्री और भावयित्री दोनों प्रतिभा का परिचायक है। उन उपन्यासों को पढ़ते हुए रचनाकार का कौशल हमें कहीं हतप्रभ कर देता है तो कहीं उनकी प्रतिभा का लोहा मानने के लिए विवश करता है।
पहाड़ी के उस पार डॉ. मोहम्मद अरशद खान का एक बालउपन्यास है। यह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा एवं बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उपन्यास का नामकरण वस्तुतः किरनदुल नगर की बैलाडिला पहाड़ियों के आधार पर किया गया है, जिसके एक ओर अबूझमाड़ का घना जंगल है और दूसरी ओर शहर की जगमगाहट है। यहाँ हेमेटाइट लौह अयस्क की सबसे बड़ी खदान है, जो देश में इस्तेमाल के साथ-साथ विदेश में भी निर्यात होता है। वास्तव में यह उपन्यास शहर की जगमगाहट के उस पार सिसकते हुए अँधेरे की कहानी है। किरनदुल की पहाड़ियाँ इस विसंगति की विभाजन रेखा हैं। कहानी इस प्रकार है कि प्रोफेसर रमन एक वनस्पति शास्त्री हैं, जिनके कदम औषधीय पौधों की खोज में जगह-जगह भटकते रहते हैं। उनकी इस यात्रा के साथी होते हैं– विक्की और मोंटू। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान वह अबूझमाड़ के जंगलों में जा पहुँचते हैं। अबूझमाड़ यानी ऐसी अबूझ धरती जहाँ चप्पे-चप्पे पर खतरे मँडराते हैं, जहाँ कदम- कदम पर आशंकाएँ थरथराती हैं। खोज के दौरान वे नक्सलियों के बीच फँस जाते हैं और नजरबंद कर लिए जाते हैं। इसके साथ ही शुरू होता है– रोमांचक घटनाओं का सिलसिला। षड्यंत्र, संघर्ष साहस और जीवटता से भरा हुआ एक ऐसा रोचक उपन्यास है, जिसे पढ़ना शुरू करें तो रुक नहीं सकते हैं।
इस उपन्यास की विषयवस्तु राजनीतिक है, पर डॉ. अरशद ने उसे बिना राजनीतिक रंग दिए आगे बढ़ाया है। इस उपन्यास में जहाँ एक ओर सरकार और कानून की अपनी मजबूरी का उल्लेख है, तो वहीं दूसरी ओर उस सिस्टम को भी रेखांकित किया गया है जिनके कारण नक्सलवाद पैदा होता है। इसमें नक्सली जीवन की समस्याओं और उनके समाधान की ओर भी लेखक की दृष्टि गई है। बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि उन बड़ों के लिए भी यह उपन्यास उपयोगी है, जो नक्सली नाम सुनकर ही आतंकी होने का भ्रम पाल बैठे हैं। उनकी निगाह उस व्यवस्था की ओर नहीं जाती जिसके कारण यह समस्या जन्म लेती है। बालसाहित्य में इस तरह के उपन्यास बहुत कम लिखे गए हैं। कुल बीस परिच्छेदों में बँटे हुए इस उपन्यास का प्रकाशन फ्लाइट ड्रीम्स पब्लिकेशन ने किया है तथा इसके चित्र पार्थसेनगुप्ता ने बनाए हैं।
डॉ संजीव कुमार का बाल उपन्यास बर्फ के देश में भोलू भालू उसके पिता कालू और माँ डिम्बा की उस यात्रा से जुड़ा हुआ है जिसमें बर्फ पर चलने, घूमने- फिरने और उससे खेलने का आनंद जुड़ा हुआ है। गिरती हुई बर्फ के साथ भोलू की जिज्ञासा पहाड़ के बारे में भी जानने की होती है। उसके पिता कालू ने बताया कि–धरती के अंदर बहुत गहराई पर लावा बहता है। बहुत गर्म और फिर चट्टानों के खिसकने से यही लावा बाहर निकलता है और इकट्ठा हो जाता है। लावा इतना गर्म होता है कि उसके ठंडा होने पर पहाड़ बन जाते हैं।
यह भी कहा जाता है कि जब दो टेक्नाटिक प्लेटें एक दूसरे से टकराती हैं, तो एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे घुस जाती है, तो ऊपर वाली प्लेट पृथ्वी से बाहर निकलकर पहाड़ का रूप लेती है। इस काम में करोड़ों साल का समय लगता है क्योंकि पहाड़ प्रतिवर्ष 5 इंच से 10 इंच तक बढ़ते हैं। इस उपन्यास से ठंडी हवाएँ, ग्लेशियर, म्यूजियम के साथ-साथ शहीद स्मारक का वर्णन करके रचनाकार ने उन अमर शहीदों की स्मृति को भी सजीव रखने का सफल प्रयास किया है। कलेवर में छोटा होने के बावजूद जितनी जानकारियाँ इसमें दी गई हैं, वह पाठकों को बाँधकर रखती हैं। पुस्तक का आवरण आकर्षक है लेकिन अंदर एक भी चित्र का न होना आश्चर्य प्रकट करता है।
नाचू के रंग गोविन्द शर्मा का बड़ा ही रोचक और मनोरंजन से भरपूर उपन्यास है।इसकी कथावस्तु में नाचू एक ऐसा बालक है जो पहले अपने ब्रश और रंगों से खेलते हुए लोगों का मनोरंजन करता था लेकिन बड़ा होने पर वह प्रेरक व्यक्तित्त्व के रूप में सामने आया। एक ओर सफाई और दूसरी ओर पर्यावरण की सुरक्षा उसके मुख्य उद्देश्य हो गए। वह खाली जमीन पर वृक्षारोपण करवाने के साथ -साथ खुद इस कार्य में ऐसा रमा कि उसके नाम रिकॉर्ड बन गया।
उपन्यासकार ने नाचू की जो तस्वीर आरंभ में खींची है, वह इतनी मनमोहक है कि दिल में उतरती चली जाती है —’जब वह (नाचू) मुस्कुराता है तो इसका मतलब है, अभी उसने कुछ नया नहीं किया है, किसी भी समय कर सकता है। हँसी का मतलब है कि वह कुछ कर चुका और उसे किसी की परवाह नहीं।’ ऐसे अनूठे बालक के रंग और ब्रश दो ऐसे औजार हैं जिनसे वह अद्भुत कारनामें करके लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता है। एक से एक किस्सों से सुसज्जित यह उपन्यास पाठकों को पूरी तरह बाँधकर रखता है।
यह उपन्यासकार की कहन शैली का प्रभाव है कि वह नाचू से रंग और ब्रश के सहारे नैतिक मूल्यों को ऐसे जोड़कर प्रस्तुत करता है कि कहीं पर भी बनावटीपन नजर नहीं आता है। इस उपन्यास से नाचू समवयस्क बच्चों में जमीनी हकीकत को भी ऐसे उजागर करता है मानो सब कुछ आँखों के सामने ही सामान्य रूप से घट रहा है । कहीं पर भी बनावटीपन नहीं है। दूसरों की सहायता बिना ढोल बजाए की जाए तो उसका आनंद ही कुछ और है। जब परंपराओं के साथ आधुनिकताबोध दूध और पानी की तरह मिल जाते हैं तो नाचू के रंग जैसा उपन्यास लिखा जाता है जो समाज की धरोहर बन जाता है।
वरिष्ठ बालसाहित्यकार समीर गांगुली का एक अद्भुत उपन्यास प्रकाशित हुआ है -एक गुलाबी भैंसा अलग सा। सच तो यह है कि यह हिन्दी बाल साहित्य लेखन में एक तरह का प्रयोग है, और प्रयोग भी ऐसा -वैसा नहीं बल्कि बाल मनोविज्ञान की गहराइयों में उतरकर कल्पनाशीलता की उड़ान भरता हुआ लाजवाब अनुभवों से गुजरता हुआ एक ऐसे भैंसे की दास्तान जो जंगल में भटककर बहुत कुछ सीखता है। अनोखी यात्रा पर निकला हुआ गुलाबी भैंसा सही अर्थों में जिंदगी के उद्देश्य को तलाश रहा है। इसमें उसकी भाँति-भाँति के जीवों से मुलाकात होती है। ये मुलाकात इतनी रोचक और रहस्यों से भरी होती है कि उसमें नैसर्गिक सुषमा के बार-बार दर्शन होते हैं। इसमें कल्पनाओं का ऐसा लोक गढ़ा गया है जिसमें बच्चों के साथ सामान्य पाठक भी ऊभ-चूभ होते रहेंगे। ऐसे उपन्यास बहुत परिश्रम और खोज के बाद ही लिखे जाते हैं।
इस पूरे उपन्यास की कथा के शीर्षक इतने मज़ेदार हैं कि जिन्हें पढ़कर ही जानने की जिज्ञासा जन्म लेने लगती है–मेरी कहानी, शेरों के साथ, मगरमच्छों से मदद, हर हाल में खुशी, गाइड सियार से मुलाकात, चाहते क्या हो, खूबसूरती का झरना, कछुवा ज्ञान, सात काई जमे पत्थर, सुरंग और कूड़ेदान और अंत में मिल गया मकसद। इन छोटे -छोटे प्रसंगों से गुजरते हुए जितना पाठक आह्लादित होता है, उतनी ही रोचक यात्रा गुलाबी भैंसे की भी होती है। पूरा आख्यान ऐसे कौशल के साथ गूँथा गया है कि एक -एक कड़ियाँ स्वयमेव जुड़ती चली जाती हैं।
बच्चों का देश पत्रिका के संपादक संचय जैन के इस कथन से अपनी सहमति व्यक्त करते हुए कहना चाहता हूँ कि–एक गुलाबी भैंसा अलग सा बच्चों को एक अद्भुत कल्पना लोक में ले जाएगा, जहाँ बिना विरोधाभास के वे खुद को गुलाबी भैंसे से और उसकी चिन्तन प्रक्रिया से गुँथा हुआ महसूस करेंगे। आपने अलग-अलग जानवरों की कुछ विशेषताओं को भी अपनी विशिष्ट शैली में रेखांकित किया है। बड़ों की सी लगने वाली, जीवन मूल्यों से जुड़ी बातें बच्चों को बताने में सामान्यतः परहेज किया जाता है या फिर जिस शैली में यह बातें बताई जाती हैं बच्चे उससे जुड़ने में परहेज करते हैं, लेकिन उपन्यासकार का प्रयास दिल को छू गया। खुशी, खूबसूरती, भय, दोस्ती, सहयोग, स्व-भाव, विश्वास, स्वावलंबन जैसे न जाने कितने पशुओं को इसमें छुआ गया है। खुद को जानने और जीवन का लक्ष्य हासिल करने का संदेश तो मूल में है ही, जीवन को हल्का बनाने का मंत्र देने से भी उपन्यासकार नहीं चूका है।
इस उपन्यास की जितनी अच्छी कथावस्तु, प्रस्तुतीकरण और कहन शैली है , उतनी ही अच्छी इसकी बहुरंगी प्रस्तुति है। मुखपृष्ठ तो कमाल का है। पुस्तक के अंदर दिए गए चित्रों ने इसमें चार चाँद लगा दिए हैं। जैसे- जैसे कथावस्तु आगे बढ़ती है, पाठक अवाक् और उसका मुँह खुला का खुला रह जाता है। अब आगे क्या होगा, जानने की जिज्ञासा उपन्यास में बराबर बनी रहती है, और यह जिज्ञासा तभी समाप्त होती है जब वह मिल गया मकसद पर पहुँचता है।
सौम्या पाण्डेय ‘पूर्ति’ का बाल उपन्यास शुभू का स्कूल बच्चों और किशोरों के स्कूल से जुड़े रोचक प्रसंगों पर आधारित है। इस उपन्यास की मुख्य पात्र शुभू कक्षा 3 की छात्रा है। कोरोना काल में ऑनलाइन कक्षाओं में कुछ बच्चों का मन लगता था, लेकिन कुछ बच्चे जबर्दस्ती माता-पिता के बार-बार कहने पर अनमने भाव से कंप्यूटर के सामने बैठ जाते थे। कोरोना के बाद स्कूल नियमित खुलते ही बच्चों की दिनचर्या में बदलाव आता है। कुछ बच्चों ने पहली बार स्कूल जाना शुरू किया। अब वही क्रम स्कूल जाने की तैयारी, स्कूल का पहला दिन, स्कूल में खटपट, स्कूल की कैंटीन, स्कूल का स्पोर्ट्स -डे, पहली पिकनिक और फाइनल एग्जाम पूरे साल भर चलने वाला रूटीन।
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उसी रूटीन में इस उपन्यास की प्रमुख पात्र शुभू की गप्पें, उसको मिले पैसे, उसका कविता पाठ और रिजल्ट सभी घटनाओं को इतने मनोवैज्ञानिक ढंग से पिरोया गया है कि एक-एक बदलता घटनाचक्र जीवन-प्रसंगों को जीवंत कर देता है। ढेर सारे ऊहापोह और उनके बीच में समस्याओं की जुड़ती कड़ियाँ, लेकिन इन सबके बीच में शुभू का हार नहीं मानना उपन्यास को इतना रोचक बना देता है कि घटनाओं को बार-बार पढ़ने पर भी मन नहीं भरता है। इस उपन्यास में जो सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु उभरकर सामने आता है, वह यह है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, जीवन में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। निराशा हमारे मनोबल को तोड़ देती है, इसलिए उसे जीवन में आने ही नहीं देना चाहिए।
इस उपन्यास की एक और विशेषता यह है कि इसे एक ही बैठक में पूरा पढ़ा जा सकता है। कहीं -कही संवाद आत्मकथन जैसे लगते हैं। कविता पाठ वाले अध्याय में कविताओं की प्रस्तुति उपन्यास में एक और रंग भर देती है। भाषा -शैली इतनी सहज और प्रभावशाली है कि एक जिज्ञासा समाप्त होते ही दूसरी बढ़ जाती है और वह तभी खत्म होती है, जब उपन्यास समाप्त हो जाता है। उपन्यास के मुखपृष्ठ पर बना प्राइमरी स्कूल और बैग लटकाए स्कूल जाती बच्ची पाठकों को इसे पढ़ने के लिए स्वाभाविक ही प्रेरित करता है। यह उपन्यास बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों के लिए भी उतना ही पठनीय है।
अपनी विशेष योजना को साकार करने के उद्देश्य से फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशन ने 5 ऐसे उपन्यासों का प्रकाशन किया जिनमें फंतासी, रहस्य -रोमांच, नई खोज और साहस की कथाएँ हैं। माया का रहस्यमयी टीला: डॉ. शील कौशिक, जादुई अँगूठी: डॉ,मंजरी शुक्ला, एडवेंचर्स ऑफ गोलू: मनमोहन भाटिया, हाथिस्तान: प्रांजल सक्सेना और क्रिस्टल साम्राज्य: सुमन बाजपेयी उपन्यासों में एक साथ इतनी घटनाओं का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है कि कभी हम हतप्रभ हो जाते हैं तो कभी कल्पना लोक में विचरण करते हुए दूसरे ही ग्रह में पहुँच जाते हैं।
माया का रहस्यमयी टीला में भवानी जंगल के रेतीले टीले पर लाल रंग की चींटियों का पूरा अधिकार है जो किसी दूसरे ग्रह ‘टाइटन-टैनो’ से आकर यहाँ पर बस गई थीं। बसने के साथ ही इनका इरादा पूरी धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित करने का था। इसी टीले के सामने दूसरे टीले पर काले रंग की चींटियों का घर था। लाल चींटियों की रानी माया और काली चींटियों की रानी झिलमिल के स्वभाव बिल्कुल एक दूसरे के विपरीत थे। जहाँ झिलमिल रानी शांत स्वभाव की तथा सबका ध्यान रखने वाली थी, वहीं माया रानी दुष्ट स्वभाव की थी। माया चींटी अपनी जादुई शक्तियों से काली चींटियों से मनमुटाव रखती थी और हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहती थी।
उपन्यास में यह जानना रहस्य -रोमांच से भर देता है कि एलियन चींटियों ने रूप बदलकर माया चींटी में ऐसा परिवर्तन किया कि उसका स्वभाव पूरी तरह से बदल गया। इस रोचक उपन्यास में प्रस्तुतीकरण इतना प्रभावशाली है कि अंत तक जिज्ञासा बनी रहती है। यह जिज्ञासा ही पूरे उपन्यास को बाँधकर रखती है। पुस्तक का मुखपृष्ठ बहुत ही आकर्षक और नयनाभिराम है, इसका स्वागत अवश्य होना चाहिए।
जादुई अँगूठी में जिज्ञासा से भरपूर मुरब्बा भोलू को ढूँढ़ने निकल पड़ता है, रास्ते में उसे बौने जादूगरों के आक्रमण का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप भोलू बौनों के चंगुल में फँस जाता है। हँसोड़ कद्दू, उड़ने वाली मछली, बोलने वाली नटखट नाव और मज़ाक़िया बंदर कैसे मुरब्बा की मदद करते हैं, यह उपन्यास पढ़कर ही जाना जा सकता है। जादुई अँगूठी के प्रभाव से उड़ते हुए भोलू, मुरब्बा और मछली को देखकर बौने सिर धुनने लगते हैं। लेखिका ने इसमें जगह-जगह ऐसा प्रभाव डाला है कि उपन्यास में कहीं पर भी गतिरोध नहीं आने पाया है। इसे दोस्ती की मिसाल बनाकर पाठकों के बीच में इसी उद्देश्य से परोसा गया है कि अगर मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ा जाए तो मंजिल अवश्य मिलती है।
एडवेंचर्स ऑफ गोलू शीर्षक ही बता रहा है कि इसमें साहस की कथाएँ हैं और यह भी सच है कि साहस के साथ किया गया कार्य हमेशा सफल होता है। यह गोलू का साहस ही है जो उसे साहसिक पुरस्कार विजेता बालक गौरांग बना देता है। उसके साहस की कथा में उसके तत्काल निर्णय लेने की क्षमता से ही अपराधी पकड़े जाते हैं उसे इस साहसिक कार्य के लिए पुरस्कार भी मिलता है। इसका एक पक्ष यह भी है कि गोलू के दिमाग में शैतानी पुलाव भी पकते रहते हैं, इसीलिए उपन्यास में उसे विभिन्न उपाधियों से भी नवाजा गया है। जैसे –फूफा का चहेता,शीला बुआ का लाड़ला, टोनी का परममित्र, अपराधियों के लिए छोटा पैकेट-बड़ा धमाका साथ ही अध्यापकों से खट्टी-मीठी शरारतें करने वाला। इन उपाधियों के पीछे उसकी साहस कथाएँ ही हैं, जो इस उपन्यास के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। इस पूरे उपन्यास की कथा काल्पनिक होते हुए भी ऐसा वातावरण तैयार करती है जिसमें लगातार डुबकी लगाने के बावजूद पाठक ऊबते नहीं हैं।
यह उपन्यासकार का कौशल है कि उसने कहीं से भी मुख्य पात्र गोलू को कमजोर नहीं होने दिया है। रचनाकार का भाषा पर पूर्ण अधिकार है जिसके बल पर वह पूरी कथा को बाँधकर रखता है। पुस्तक का मुखपृष्ठ तो आकर्षक है ही, अंदर के श्वेत- श्याम चित्र भी कथा को विस्तार देने में पूरी तरह सक्षम है।
सुमन बाजपेयी ऐसी लेखिका हैं जिन्हें पढ़ने में जितना सुखद अनुभूति होती है, उससे कहीं ज्यादा उनके अनुभवों को सुनने/बात करने में आता है। लेखन, संपादन और अनुवाद का इतना विशाल भंडार उनके पास है कि बस सुनते जाइए। क्रिस्टल साम्राज्य रहस्य -रोमांच से भरा हुआ एक ऐसा ही उपन्यास है जिसमें पाठक जितना गहरे डूबते जाएँगे, उतना ही मोती पाएँगे। मोती भी ऐसे -वैसे नहीं, बिलकुल चमकदार और कीमती इतने कि उनका मूल्य आँका ही नहीं जा सकता है। क्रिस्टल क्या है, जादुई क्रिस्टल वह भी रंग-बिरंगा, यह तो पुस्तक पढ़ने पर ही पता चलेगा। बिन्नी का अजीब सपना और सपने में सुनहरा शेर, उड़ने वाला घोड़ा यह सब ऐसी फंतासी है जिसने पूरे उपन्यास को महत्त्वपूर्ण ही नहीं उल्लेखनीय बना दिया है।
पाठक जैसे -जैसे उपन्यास पढ़ते जाएँगे, वैसे -वैसे ही एक के बाद एक सारे रहस्य खुलते जाएँगे। चमकती गुफा, जानवरों की आकृतियाँ, अद्भुत मीनार, पंखों वाला घोड़ा, गहराता रहस्य और लौटता आत्मविश्वास सब कुछ इस करीने से इस उपन्यास में पिरोया गया है। एक जिज्ञासा खतम नहीं होती है कि दूसरी आगे आ जाती है और यही इस उपन्यास की सफलता का रहस्य है। बहरहाल, उपन्यास की कथावस्तु जितनी रोचक है, उतने ही पार्थ सेनगुप्ता के आकर्षक और मुखर चित्र हैं । बहरहाल, उपन्यास की लोकप्रियता से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
प्रांजल सक्सेना का एक अद्भुत उपन्यास हाथिस्तान-गजप्रलय की आहट में हाथियों की अनोखी दुनिया की अनोखी दास्तान है। इसका आरंभ ही भूमिका के रूप में गज गप्प से किया गया है —’गजप्रेमियों को चिग्घाड़ भरा नमस्कार! थोड़ा चौक तो रहे होंगे आप कि बिना आपको जाने, बिना आपसे मिले, बिना आपको देखे भी, मैंने आपको गजप्रेमी क्यों बुलाया? वह इसलिए क्योंकि मुझे पूरा भरोसा है कि हाथिस्तान आपके हाथ में है तो आप पहले से ही गजप्रेमी होंगे।’
उपन्यासकार को बचपन से ही हाथियों से बड़ा लगाव रहा है, यह उसी गजप्रेम का परिणाम है कि 200 पृष्ठों का हाथिस्तान पूरी हाथियों की दास्तान के रूप में पुस्तकाकार सामने आया जाओ पूरा उपन्यास बातचीत शैली में लिखा गया है, इसलिए इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानों हम ऐसे दृश्यों से रूबरू हो रहे हैं जो धीरे-धीरे एक-एक करके मानसपटल पर अंकित होते चले जा रहे हैं।
उपन्यास की शब्दावली ऐसी कि दिल की गहराइयों में उतरती चली जा रही है। जैसे–बदलागज मचाने वाला है पूरे ब्रह्मांड में गजप्रलय।हाथिस्तान की रोचक यात्रा करते हुए आप पाएँगे कि रोहन और सोनाली दोनों हाथिस्तान की ओर गजप्रलय रोकने निकल पड़ते हैं। इस काम में सिर्फ चुनौतियाँ और चुनौतियाँ हैं, चुनौतियांँ भी ऐसी- वैसे नहीं अभूतपूर्व युद्ध के रूप में उपस्थित चुनौतियों से लड़ना इतना आसान नहीं है। लेकिन कहा गया है– जहाँ चाह- वहाँ राह, अगर हमारी चाहत मजबूत हो तो रास्ते अपने आप निकल आते हैं।
इस पूरी रोमांचक यात्रा को उपन्यासकार ने बखूबी विस्तार दिया है। गद्य के बीच में पद्य की पंक्तियाँ चंपू काव्य का आनंद दे रही हैं —
उनकी
जब मुट्ठी बँधी हुई हो तो भय की क्या बिसात है।
वीर वही होता रण में, जो होता सत्य के साथ है। थथं
नहीं हो शरीर से बलशाली तो भी तुम न घबराओ
स्मरण गजानन का करके गजसिंह से बढ़ जाओ।
पुस्तक का मुखपृष्ठ तो चमत्कारिक है ही, अंदर के श्वेत -श्याम चित्र भी बोलते हुए नजर आते हैं। पुस्तक में उत्कृष्ट कागज तो लगा ही है, मुद्रण सहित बाइंडिंग भी इसलिए मजबूत की गई है कि कहीं हाथियों के आक्रमण से कुछ नुकसान न हो जाए। कुल मिलाकर यह उपन्यास पाठकों को पूरी तरह जोड़कर रखने में सक्षम है।
हमारी भी सुनो -अलका प्रमोद का सामाजिक परिवेश से जुड़ा हुआ महत्त्वपूर्ण उपन्यास है जिसमें परिवार के वे सूत्र भी हैं जो उसे बिखरने से बचाते हैं, तो बच्चों को कितनी छूट मिले कि वे बंधन भी महसूस न करें और न ही अधिक छूट मिलने पर बहकने लगें। उपन्यासकार ने संकेत कर दिया है कि यह उन दोस्तों की कहानी है जो हमेशा एक दूसरे का साथ देते हैं तथा कोई मुसीबत आने पर मिलजुलकर उसका समाधान खोजते हैं। आपसी सहयोग के साथ एक दूसरे के पूरक बनकर बुद्धिमानी से आगे बढ़ना दोस्ती को और मजबूत करना है।
उपन्यास पढ़ते समय रचनाकार का यह कथन बार -बार कौंधता रहा कि -साहस किसी मुसीबत से निकलने में सहायता करता है और उसके विपरीत दुस्साहस मुसीबत में फँसा देता है। उपन्यास की कथा वह आवाज़, आदमी कौन था, सच्चा दोस्त, मोबाइल की रिंग तक तो रूपरेखा की तरह सामान्य गति से चलती है, लेकिन इसके बाद भेद-खोल प्लान, साहसी निर्णय,कॉल पर धमकी कथा को उत्कर्ष पर ले जाते हैं। बच्चे खतरे में, मानता की खोज,मिशन मंदा, दोस्ती हमारी सबसे प्यारी तक आते-आते उपन्यास नए-नए आइडिया से गुजरता हुआ अवसान की ओर जाता है।
अंत में सदाशिव का यह कहना बच्चों के लिए चेतावनी भी है कि—’माना तुमने आज बहुत बहादुरी का काम किया और अपने दोस्त की जान बचाई पर आगे कभी अकेले इतने बड़े खतरे का काम नहीं करोगे। बिना बड़ों को बताए कहीं नहीं जाओगे।’
उपन्यास अपने शीर्षक को सार्थक करता हुआ मान्या की आवाज से अभिभावकों को जोड़ने का उपक्रम है कि —’पर आप बड़े लोग भी हमारी बात सुनोगे। अगर मम्मी पहले ही मेरी बात सुनतीं तो यह सब न होता।’ रचनाकार ने अनेक उहापोहों से गुजरते हुए इस उपन्यास को सुखांत बनाकर पाठकों को उचित संदेश दिया है।
पद्मा चौगांवकर का किशोरों के लिए लिखा गया उपन्यास सरहद के उस पार उन किशोरों के मन में अवश्य अपने मूल्यों के प्रति आस्था जगाएगा जो अपनी जड़ों से जुड़ने के महत्त्व को जानते और समझते हैं। ऐसे लोग हर परिस्थिति में सकारात्मक सोच को ही विशिष्ट महत्त्व देते हैं। दरअसल,हमारी सोच हमारी संवेदनाओं से जुड़ी होती है, और यही संवेदना हमारे जीवन को सरस और रसमय बनाती है। नीरस जीवन व्यक्ति को गहन अंधकार में ढकेल देती है।
राजा सुमंतक के कीर्तिसर राज्य के विजय न प्राप्त करने से शुरू हुआ उपन्यास अजेय कीर्तिसर से प्रारंभ होकर कीर्तिसर विजय पर समाप्त होता है। इसके बीच में सुभद्र का स्वप्न लक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ रहस्यमयी सुरंग तक पहुँच जाता है। अंत में कीर्तिसर विजय के साथ परिणति होती है। ऐसा हो सकता है कि ऐतिहासिक सूत्रों को समेटे हुए यह किशोर उपन्यास उन्हें पढ़ने में थोड़ा अधिक परिश्रम करना पड़े, लेकिन एक दूसरे के तारों को जोड़ने पर इसकी पठनीयता अवश्य आनंदित करेगी।
- प्रो. सुरेन्द्र विक्रम
निष्कर्ष; हिन्दी बाल उपन्यास ने समय के साथ विषय, शिल्प और संवेदना—तीनों स्तरों पर उल्लेखनीय विकास किया है। आज यह विधा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि बालमन के सर्वांगीण विकास, जीवन-मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टि और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम बन चुकी है। प्रस्तुत आलेख इस समृद्ध परंपरा और उसके विकासक्रम का सारगर्भित परिचय कराता है।
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