Hindi Bal Sahitya: Samiksha Ke Nikash Par by Prof. Surendra Vikram is a significant work that highlights the importance of critical evaluation in Hindi children's literature. This review presents a concise assessment of the book's contribution to the growth, quality, and direction of contemporary children's literature.
Hindi Bal Sahitya: Samiksha Ke Nikash Par – A Critical Review of Prof. Surendra Vikram's Book
हिंदी बालसाहित्य की गुणवत्ता, दिशा और मूल्यांकन पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करने वाली प्रो. सुरेंद्र विक्रम की पुस्तक 'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर' समकालीन बालसाहित्य समीक्षा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। प्रस्तुत समीक्षा में वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार जैन 'राजन' ने पुस्तक की विशेषताओं, समीक्षा-दृष्टि और हिंदी बालसाहित्य के विकास में उसके योगदान का संतुलित एवं सारगर्भित आकलन किया है।
प्रो. सुरेंद्र विक्रम की पुस्तक 'हिंदी बालसाहित्य समीक्षा के निकष पर'
एक आलोचनात्मक समीक्षा
कृति : 'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर'
लेखक : प्रो. सुरेंद्र विक्रम (लखनऊ)
प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, 212- एक्सप्रेस व्यू अपार्ट. सुपर एम आई जी, सेक्टर-93, नोएडा- 201304
संस्करण : 2025 मूल्य : ₹.399 /-
समीक्षक : राजकुमार जैन राजन, आकोला)
बच्चे समाज के महत्वपूर्ण अंग हैं। उनके अभाव में समाज की कल्पना नहीं कि जा सकती। यदि हम परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति चाहते हैं तो पहले वर्तमान के बच्चों की उन्नति पर ध्यान देना जरूरी है। कल देश का भविष्य इन छोटे-छोटे हाथों में निहित है। बच्चों का अपना एक अलग अस्तित्व है। उसका एक निराला ही कल्पना लोक होता है। उसमें अद्भुत जिज्ञासा होती है और तर्कशीलता भी।
बच्चों के मानसिक विकास के लिए साहित्य की अनिवार्यता स्वयं सिद्ध है। बालसाहित्य के मनस्वी रचनाकार निरंकार देव सेवक के शब्दों में कहें तो "जिस साहित्य से बच्चों का मनोरंजन हो सके, जिसमें वे रस लें और जिसके द्वारा वह अपनी भावनाओं और कल्पनाओं का विकास कर सके, वह बालसाहित्य है।"
वर्तमान परिवेश में बाल साहित्य से मेरा आशय बच्चों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य से हैं, जो बालक को संस्कार, जीवन जीने की राह, आत्मविश्वास, स्वावलम्बन, राष्ट्रप्रेम और परिवेश को समझकर सकारात्मक करने की प्रेरणा दे। यूं तो सदियों से समाज में साहित्य का प्रभाव रहा है तथा समयानुसार साहित्य के माध्यम से ही समाज का इतिहास जीवित भी रहा है। साहित्य की विभिन्न धाराओं में एक धारा 'बाल साहित्य' की भी है। निःसन्देह बालसाहित्य किसी परिचय का मोहताज नहीं है। स्पष्ट है की जब रचनाकारों ने बालकों को समाज का एक अंग माना होगा तभी बालसाहित्य का उद्भव हुआ होगा। बालसाहित्य में सबसे प्रमुख तत्व यही माना गया है कि बालमनोविज्ञन को प्रमुखता देते हुए ही इसका सृजन होना चाहिए। जैसे बालक की उम्र व मानसिक स्थिति क्या है ? बालक की भावनाएं कितनी कोमल व सरल है ? बालक की जिज्ञासाएं किस प्रकार की है? क्या रचना बालक के मन को प्रभावित करते हुए आवश्यक संदेश का बीजारोपण कर पाती है? बालसाहित्य वह रचनात्मक लेखन है जो बच्चों की उम्र, रुचि, समझ और मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर लिखा जाता है। सम्पूर्ण बालसाहित्य का प्रमुख स्वर रहा है - बालकों में राष्ट्र प्रेम जगाना, मुसीबतों से जूझने की प्रेरणा भरना, सकारात्मक जीवन जीने की चाह जगाना, साहस, नैतिकता, आत्मविश्वास, धैर्य, आस्था, श्रम, विश्वास का महत्व समझाना। पर्यावरण संरक्षण, रिश्तों का आदर, अच्छे स्वास्थ्य के लिए खेलों व योग के प्रति जागरूकता, देश व समाज के लिए विज्ञान के साधनों की उपयोगिता का ज्ञान कराने का कार्य भी बाल साहित्य करता है। इसका मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि बच्चों में कल्पना शक्ति, नैतिक मूल्य, भाषा-ज्ञान और संवेदना जगाना भी होता है।
आज बालसाहित्य अपने अस्तित्व के प्रति सजग है तथा साहित्य की सभी विधाओं - कविता, गीत, कहानी, नाटक, एकांकी, उपन्यास, यात्रा वृतांत, आत्मकथा, लोरी, पहेलियां, पत्र-लेखन, ज्ञान-विज्ञान आदि विधाओं से समृद्ध हुआ है।
बाजार में हर महीने सैकड़ों नई बाल पुस्तकें आती हैं। अभिभावक और शिक्षक के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन सी किताब बच्चे की उम्र, भाषा स्तर और समझ के अनुकूल है। जैसे हर चमकने वाली वस्तु हीरा नहीं होती, वैसे ही सुंदर साज सज्जा व आवरण वाली पुस्तक भी बालोपयोगी नहीं होती है। समीक्षा इस भ्रम को दूर करती है। समीक्षक जौहरी की तरह काम करता है। एक अच्छी समीक्षा बताती है कि पुस्तकों के अंदर बालक के जीवन निर्माण की सामग्री है या नहीं। बाल साहित्य की भाषा सरल है या कठिन, चित्र आकर्षक हैं या नहीं, और संदेश बच्चों तक कैसे पहुँचेगा? बाल साहित्य बीज की तरह होता है। जो बीज हम आज बच्चों के मन में बोते हैं, वही आगे चलकर उनके संस्कार, सोच और व्यक्तित्व का वृक्ष बनता है। इसलिए बच्चों के लिए लिखी हर पुस्तक की निष्पक्ष समीक्षा करना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी है। इससे जहां श्रेष्ठ किताबों के मूल्यांकन, चयन में सुविधा रहती है वहीं समय और पैसा दोनों बचते हैं।
बाल साहित्य की समीक्षा की दृष्टि से लखनऊ के प्रो. सुरेंद्र विक्रम दशकों से इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं। हाल में उनकी पुस्तक 'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर' प्रकाशित हुई है। 320 पृष्ठ की इस पुस्तक में बालसाहित्य की विभिन्न विधाओं की 50 पुस्तकों पर विस्तृत समीक्षात्मक आलेख समाहित किए गए हैं। प्रो. सुरेंद्र विक्रम ने पुस्तक के आरंभ में 26 पेज की 'अपनी बात' में समकालीन बालसाहित्य के सृजन, परिवेश, मूल्यांकन, चयन, दशा एवं दिशा पर अपनी बात बेबाकी से रखी है। यह सही है कि निष्पक्ष व सटीक समीक्षा करते हुए समीक्षक को पूर्वानुग्रहों को छोड़ते हुए कुछ रचनाकारों की नाराजगी को भी नजरअंदाज करना पड़ता है तभी किसी पुस्तक की निष्पक्ष समालोचना सम्भव हो पाती है। इसका निर्वाह पूर्ण रूप से किया गया है। इस संग्रह में ख्यातनाम वरिष्ट लेखकों के साथ ही नए उदयीमान रचनाकारों की पुस्तकों को भी सम्मिलित किया गया है जिनमें नासिरा शर्मा के उपन्यास 'भूतों का मैंकड़ोनल' , ममता कालिया की 'पांच कहानियां', डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल की 'सपनों को उड़ने दो', बालस्वरूप के कविता संग्रह 'सुनो डाकिए भाई', द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की आत्मकथा 'सीधी राह चलता रहा', रूप सिंह चंदेल के कहानी संग्रह 'श्रेष्ठ बाल कहानियां'!, डॉ. मधुपन्त के उल्लू और कला चश्मा', प्रो.उषा यादव के लोरी संग्रह 'आज री निंदिया', सूर्य कुमार पांडेय के कविता संग्रह 'हम हैं किससे कम', सामीर कुमार गांगुली के संग्रह 'भूत-प्रेतों की कहानियां', गोविंद शर्मा के बाल उपन्यास नाचू के रंग' आदि बालसाहित्य कृतियों पर विशद विवेचन- विशेषण किया है वहीं डॉ. ओम निश्चल, रेनू सैनी, शील कौशिक, डॉ. मोहम्मद अरशद खान, सुशील शुक्ल, डॉ. मोहम्मद साजिद खान, डॉ. रंजना जायसवाल, सौम्या पांडेय 'पूर्ति', मंजरी शुक्ला, प्रांजल सक्सेना, विमला भंडारी, किरण सिंह, सुधा आदेश आदि की बालसाहित्य कृतियों पर लिखकर हिंदी समीक्षा शास्त्र पर भी उपकार किया है। प्रो. सुरेंद्र विक्रम ने निष्पक्ष न्यायाधीश की भूमिका निर्वाह करते हुए तटस्थ, निर्लिप्त एवं तलस्पर्शी दृष्टि का परिचय दिया है। सबकी पुस्तकों पर अलग अलग टिप्पणी नहीं करते हुए सार स्वरूप जो बातें उभर कर आई उन्हें ही रख रहा हूँ।
प्रो. सुरेंद्र विक्रम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आप प्रसिद्ध शिक्षाविद और हिन्दी बाल साहित्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। क्रिश्चियन कॉलेज, लखनऊ से हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्ति के बाद से अब और भी जुनून और ऊर्ज़ा के साथ बालसाहित्य लेखन, समीक्षा एवं बालसाहित्य के समृद्ध इतिहास पर आपका सृजन, मंथन जारी है। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रो. सुरेंद्र 'विक्रम' विगत 40 वर्ष से शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न पदों को सुशोभित करते हुए साहित्य की सेवा में सक्रिय हैं। आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें- 'हिन्दी बालपत्रकारिता : उद्भव और विकास', 'हिन्दी बाल साहित्य : विविध परिदृश्य', 'समकालीन बाल साहित्य : परख और पहचान', 'बाल साहित्य : परंपरा, प्रगति और प्रयोग', 'हिन्दी बाल साहित्य : शोध का इतिहास', 'हिन्दी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर', 'इक्कीसवीं सदी की ओर', 'सारा देश हमरा घर', 'कविताओं में सुनें कहानी', 'पार्क हाथ से निकल गया' आदि विशेष रूप से चर्चित रही हैं।
हिन्दी बाल साहित्य के क्षेत्र में आपका काम विशेष ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। हिन्दी बाल साहित्य में नये- नये तथ्यों का उद्घाटन तथा उनका शोधपरक दृष्टि से विश्लेषण आपके लेखन की प्रमुख विशेषता है। आपके बालसाहित्य पर अनेक विश्वविद्यालयों में लगातार शोध हो रहे हैं। आप कई प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों से समादृत हैं ।
'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर' पुस्तक को पढ़ने के बाद मैं यह कह सकता हूँ कि समीक्षा लेखक के लिए दर्पण का काम करती है। जब समीक्षक यह बताता है कि कथा में जिज्ञासा कहाँ बनी, संवाद कहाँ सपाट लगे, रचना अपने उद्देश्य में कहां तक सफल हुई, रचना केवल बाल साहित्यकार कहलाने के लिए तो नहीं लिखी गई है, पुस्तकें केवल संख्या बढ़ाने के लिए तो प्रकाशित नहीं कि गई है या दिए गए चित्र रचना को कितना सहारा दे रहे हैं, तो लेखक को अगली रचना बेहतर बनाने की दिशा मिलती है।
प्रो. सुरेंद्र विक्रम की वर्षों की सतत साधना, अध्यन, लेखन, और गंभीर चिंतन का ही परिणाम है कि आपकी निष्पक्ष मूल्यांकन दृष्टि बालसाहित्य समीक्षा और इसकी विकास यात्रा को अपना सशक्त योगदान दे रही है। विविध विधाओं की इतनी पुस्तकों को पढ़ना, उन पर चिंतन, मनन करना और फिर तटस्थ भाव से निकष स्वरूप लिखना- निःसन्देह समय व श्रम साध्य कार्य है जिसे प्रो. सुरेंद्र विक्रम जुनून के साथ कुशलता से निर्वाह कर पा रहे हैं जिसके परिणाम स्वरूप अत्यंत प्रभावी और अनुप्रेरक यह आलोचनात्मक कृति 'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर' सामने आई है।
कमोबेश बालसाहित्य की प्रचलित अधिकतम विधाओं की पुस्तकों को इस समीक्षा ग्रन्थ में समाहित करने का सम्पूर्ण प्रयास किया गया है। समीक्षा के बहाने वे बाल साहित्य रचनाकारों के लिए बेबाकी से कई प्रश्न उपस्थित करने के साथ ही चिंतन के कई आयाम प्रस्तुत करते हैं और कोशिश करते हैं कि उनका समाधान भी प्रस्तुत कर पाएं।
बच्चे तभी पढ़ेंगे जब उन्हें लगेगा कि किताब 'उनके लिए' ही है। समीक्षा के जरिए हम किसी पुस्तक की रोचक घटनाओं, मजेदार पात्रों और सुंदर चित्रों को उजागर करते हैं। पत्रिका, अखबार या सोशल मीडिया पर छपी समीक्षा कई बार एक बच्चे को पहली बार लाइब्रेरी तक ले जाती है। इस तरह समीक्षा पाठक और पुस्तक के बीच पुल बनती है।
बालसाहित्य का सबसे बड़ा दायित्व बच्चों को भावी जीवन के लिए दिशा व संस्कार देना है। समीक्षा यह परखती है कि पुस्तक में हिंसा, भेदभाव या भ्रामक जानकारी तो नहीं है। साथ ही यह भी देखती है कि पर्यावरण प्रेम, सहयोग, ईमानदारी, साहस जैसे मूल्य कहानी में स्वाभाविक रूप से आए हैं या उपदेश की तरह थोपे गए हैं। प्रो. सुरेंद्र विक्रम की समीक्षाएं अच्छी सोच को ही आगे बढ़ाती है। जब पाठक लगातार समीक्षाएँ पढ़ते हैं तो पता चलता है कि इस समय बच्चों के लिए किस विषय पर लिखा जा रहा है - विज्ञान, इतिहास, फैंटेसी, ग्राम्य जीवन, लोककथाएँ या पर्यावरण। प्रकाशक भी समीक्षाओं से सीखकर नई थीम पर काम करते हैं। स्कूल और पुस्तकालय भी समीक्षा के आधार पर ही अपना संग्रह बनाते हैं।
इस संग्रह की हर समीक्षा अपने समय का दस्तावेज है। 10-15 साल बाद हम इन्हीं समीक्षाओं से समझ पाएंगे कि 2025 में बच्चों को कैसी कहानियाँ पसंद आ रही थीं, भाषा कैसी थी, चित्रों का चलन क्या था? इस तरह समीक्षा बालसाहित्य का इतिहास भी लिखती है। हिंदी के पुरोधा समीक्षक डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा है कि, ' श्रेष्ठ आलोचना भी रचनात्मक साहित्य की तरह ही सृजनात्मक हुआ करती है। रचनात्मक समीक्षा कृति की अन्तरात्मा तक पहुंचती है, उसको सम्पूर्णता में प्रस्तुत करती है।
समीक्षा न हो तो अच्छी और औसत किताब में अंतर करना मुश्किल हो जाएगा। समीक्षा लेखक को तराशती है, अभिभावक को रास्ता दिखाती है और बच्चे को सबसे अच्छी किताब तक पहुँचाती है। इसलिए बालसाहित्य की निष्पक्ष, संवेदनशील और प्रोत्साहन भरी समीक्षा उतनी ही जरूरी है जितना स्वयं बालसाहित्य लिखना। तभी हम आने वाली पीढ़ी को जिज्ञासु, संवेदनशील और संस्कारवान बना पाएंगे।
आज प्रो. सुरेंद्र विक्रम अवकाश प्राप्ति के बावजूद, सृजनात्मक रूप से सतत सक्रिय हैं। आप रचनात्मक ऊर्जा से लवरेज हैं। सच है कि हिंदी का बालसाहित्य जितना समृद्ध होगा, हिंदी भाषा का समग्र साहित्य उतना ही समृद्ध होगा। इस दिशा में विशिष्ट और महत्वपूर्ण कार्य कर रहे भाई प्रो. सुरेंद्र विक्रम जी का कार्य हिंदी बालसाहित्य जगत में मील का पत्थर साबित होगा। 'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर' के लिए लेखक व प्रकाशक दोनों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!
- समीक्षक
राजकुमार जैन राजन
निष्कर्ष; 'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर' केवल एक समीक्षा-संग्रह नहीं, बल्कि हिंदी बालसाहित्य की गुणवत्ता, दिशा और विकास को समझने वाला महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ है। यह कृति रचनाकारों, समीक्षकों, शोधार्थियों और पाठकों सभी के लिए समान रूप से उपयोगी एवं संग्रहणीय है।
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