Prabhudayal Shrivastava is a distinguished Hindi children’s poet whose writings beautifully blend childhood innocence, folk culture, humor, imagination, and life values. His deep connection with Bundelkhandi language and his remarkable understanding of child psychology make his poetry unique and engaging. This review explores the creative world of a poet who, even at eighty, continues to write with the heart and innocence of a child.
Prabhudayal Shrivastava: The Child Poet of Hindi Literature and Bundelkhandi Culture
अवधेश तिवारी जी का यह आलेख केवल किसी बालकवि के कृतित्व का परिचय नहीं, बल्कि प्रभुदयाल श्रीवास्तव के रचनात्मक व्यक्तित्व को समझने की एक आत्मीय और सूक्ष्म पाठकीय दृष्टि है। उन्होंने कवि की बाल-कविताओं, बुंदेलखंडी भाषा की मिठास, ध्वनि-सौंदर्य, बाल-मनोविज्ञान और लघुकथा-संसार के विविध पक्षों को उदाहरणों के साथ परखा है। इस समीक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आलोचक ने रचनाकार को केवल साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि बच्चों के बीच आज भी जीवित एक निर्मल मन वाले ‘अस्सी बरस के बच्चे’ के रूप में देखा है। प्रस्तुत लेख प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बाल-साहित्य की संवेदना, शिल्प और प्रयोगधर्मिता को समझने का एक आत्मीय और सार्थक प्रयास है।
प्रभुदयाल श्रीवास्तव : अस्सी बरस का बच्चा—बालकवि
(एक पाठकीय दृष्टि)
पहला फूल खिला डाली पर
विटप बहुत मुस्काया था,
जब बदली मुस्कान हँसी में
तब पहला फल आया था...
अपने हाथों से सींचे गए विटप में मुस्कुराते पहले फूल की सुगंध बिखर उठी। उसमें फले पहले फल का स्वाद चखा तो होठों का मंदस्मित सुहास में बदल गया। जो सच्चे भाव से हँसते-मुस्कुराते हुए आशाओं के विटप सींचते हैं, उनके जीवन में ऐसे फूल खिलते ही रहते हैं और उन्हें ही मीठे फलों के नए-नए स्वाद भी चखने को मिलते हैं।
अपनी बाल-कविताओं की छोटी-छोटी पंक्तियों में, नन्हें-नन्हें बच्चों को, ऐसे बड़े-बड़े सबक़ देने वाले बुंदेलखंड की माटी के यशस्वी कवि श्री प्रभुदयाल श्रीवास्तव जी का रचना-संसार बहुआयामी है। एक ओर उनकी कविताओं में हँसता-मुस्कुराता बचपन है तो दूसरी ओर अपनी बोली की सुगंध में लिपटा बुंदेलखंड की माटी का गहन-गूढ़ दर्शन भी है, जो पत्तल में परोसी, घी से तर दाल-बाटी की शक़्ल में, हमारी स्वादेंद्रियों को भरपूर तृप्ति प्रदान करता है। उनकी लेखनी में बच्चों के स्वच्छ हृदय का निर्मल उजास रंगबिरंगे फूलों की तरह खिलता है तो षटरसों से भरे छप्पन भोग का स्वाद भी चखाता चलता है-
कैसे कें मन खों सादो तो
मुस्क्ल में मन खों बांदो तो
माया को सागर पार करो
सो प्रभु खों थोड़ो प्यार करो...
लाख करी कोसिस पे मन फिर
काम क्रोध में पर गओ,
आगी को तिलगा गिर गओ
दादा को कुरता बर गओ।
यें 'आगी का तिलगा' पाप का प्रपंच है और 'दद्दा को कुरता' मनुष्य की निर्मल-निर्दोष आत्मा है। पाप के प्रपंच का अंगारा जीवन की पवित्रता को कैसे खाक करने की कोशिश करता है, साधारण-सी दिखने वाली इस कविता में यह बात बड़े प्रभावी ढंग से कही गई है।
मध्यप्रदेश के धरमपुरा दमोह में ०४ अगस्त, १९४४ को जन्मे श्री प्रभुदयाल श्रीवास्तव अपनी शिक्षा- दीक्षा से 'इलेक्ट्रिकल इंजीनियर' हैं। मध्यप्रदेश विद्युत-मंडल में कार्यपालन- यंत्री के पद पर काम करते हुए वे ऊर्जा को तकनीक में बॉंधने की विधा में दक्षता प्राप्त कर सेवानिवृत्त हुए हैं। उनकी ये ऊर्जा उनकी कविताओं के भाव-पक्ष में, और तकनीक़ कविताओं के कला-पक्ष में भी कुछ इस तरह उपस्थित है कि कविता 'एक इंजीनियर की कविता' होते हुए उन्हें 'कविता का इंजीनियर' बनाते चलती है। उनकी कविताओं में खड़ी बोली की शास्त्रीयता है तो बुंदेलखंडी की सरलता और सौंधापन भी है। खड़ी बोली की कविताओं में तत्सम शब्दों का जगमगाता संसार है तो बुंदेलखंडी रचनाएँ अपनी माटी की महक से कुछ ऐसे सराबोर हैं जैसे आषाढ़ के पहले दोंगरे से नहाई धरती की आकाश की ओर उठती सौंधी गंध हो। उनके भाषा- प्रयोग भी, इन दोनों स्तरों पर, अपनी पृथक् विशेषताऍं लिए हुए हैं। बाल- गीतों में ये प्रयोग केवल भाषागत ही नहीं ध्वनिगत भी हैं, अर्थात् 'लिंग्विस्टिक' होते हुए 'फ़ोनेटिक' भी हैं। कवि इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ रहे हैं कि बच्चों के लिए शब्द को लिखने या बोलने का उतना महत्व नहीं होता जितना उसके भीतर विशेष ध्वनि का समाहित होना आवश्यक होता है। अतः उनका अधिकांश ज़ोर 'लिंग्विस्टिक' होने के बजाय 'फ़ोनेटिक' होने पर है। एक उदाहरण देखिए-
झोलक-झोलक,झम्मा- झम्मा,
उई अम्मा, उई अम्मा,
तोता- मैना नाच रहे हैं
छत पर छम्मा- छम्मा।
नाच देखकर कोयल दीदी
दौड़ी- दौड़ी आई,
हाथ पकड़ कर कौवे का भी
खींच- खींच कर लाई ।
फिर दोनों ही लगे नाचने
धुम्मा, धुम्मा, धुम्मा ।
शोर हुआ तो छत पर सारे
पंछी दौड़े आए,
ढोल- मंजीरा- तबला टिमकी
बाँध गले में लाए।
खूब बजा संगीत नाच पर
ढमर-ढमर ढम-ढम्मा...
श्री प्रभु दयाल जी बोली और भाषा- दोनों के कवि हैं। बोली से भाषा का निर्माण होता है और भाषाओं की जननी संस्कृत है। संस्कृत की अपनी भी यही विशेषता है कि वह 'लिंग्विस्टिक' से अधिक 'फोनेटिक' होने में भरोसा रखती है, इसीलिए सदियों तक वह लिखित ग्रंथ के बजाय 'श्रुति' बनी रही। क्योंकि भाषा को लिखते ही 'ज़ोर' बदल जाता है, 'ध्वनि', 'शब्द' बन जाती है और शब्द बनते ही ध्वनि की बारीक संवेदनाएँ मरने लगती हैं। और जब शब्द की संवेदनाएँ मरती हैं तो शब्द निष्प्राण होने लगता है । इसीलिए बच्चे उस कविता को अधिक पसंद करते हैं जिसमें उनके मनोनुकूल ध्वनि के आघात हों, कहीं तीव्र, कहीं उदात्त कहीं अनुदात्त। उच्चारण-विज्ञान कहता है कि सम्यक रीति से उच्चरित शब्द शाखा पर खिले हुए ताज़े पुष्प की तरह होता है जिसमें जीवन और सुगंध दोनों उपस्थित रहते हैं किंतु जो शब्द ठीक से उच्चरित नहीं हो पाता वह सूखे फूल की तरह निष्प्राण हो जाता है। ध्वनि-विज्ञान इससे एक कदम और आगे बढ़कर कहता है कि जब साधक कोई शब्द दोहराता है तो उसके शरीर के विभिन्न चक्रों पर चोट पड़ती है और वे चक्र सक्रिय होने लगते हैं। फिर इससे उत्पन्न होने वाली ऊर्जा साधक के कर्म-कौशल की श्रीवृद्धि करती है। ये 'साइंस' को 'आर्ट' बनाने की तक़नीक़ है। बच्चों को साइंस तो पुस्तकों से सिखाई जा सकती है किन्तु आर्ट सिखाया नहीं जा सकता, वो तो अंदर की संवेदनाओं से ही जन्म ले सकता है। प्रभुदयाल जी की कविताओं में यही 'आर्ट' और यही 'साइंस' उपस्थित है, जो ध्वनि को लिंग्विस्टिक के साथ फोनेटिक भी बनाए रखता है । यही कारण है कि उनकी कविताएँ भारतवर्ष के अनेक राज्यों में प्राथमिक से लेकर माध्यमिक कक्षाओं तक बच्चों को पढ़ाई जाती हैं और राष्ट्रीय शैक्षिक तथा अनुसंधान परिषद (NCERT) की गाइडलाइन के अनुसार पाठ्यक्रमों में शामिल की गई हैं।
जीवन के उस कालखंड में, जब वे प्रयोगों के दौर में थे, तब बालसाहित्य के साथ-साथ आपने कविताऍं, कहानियाँ, लघुकथाएँ और व्यंग्य आदि विधाओं में भी अपनी क़लम चलाई। शुरुआती रचनाएँ रायपुर से प्रकाशित होने वाले 'अमृत- संदेश' में छपीं और उसके बाद धीरे-धीरे प्रकाशन का सिलसिला आरंभ हो गया। आज पूरे देश में बाल- साहित्यकार के रूप में आपकी जो पहचान है, उसकी शुरुआत तो सबसे बाद में हुई। यानी जिस विधा में उन्होंने सबसे अंत में क़लम चलाई, वही विधा उनकी पहली पहचान बन गई। उनकी बाल-कविताओं में बाल-मन के विविध चित्र हैं। कहीं रूठी बिन्नू है, कहीं अकेली नानी। कहीं टप्-टप् संगीत सुनाती बूँदों की चौपाल तो कहीं तोता हरा-हरा । कहीं कंप्यूटर पर बैठी चिड़िया है कहीं मंदिर जैसी माँ। कहीं सूरज चाचा, कहीं भुखैला हाथी, कहीं जंगल की बात, रैन- बसेरा तो कहीं गप्पीमल की गप्प... यानी बाल- मनोविज्ञान के जितने विषय हो सकते हैं, सबको कविता के माध्यम से बच्चों के चित्त में उतारने की इनमें सार्थक कोशिश है। कविता पढ़ते समय सामने चलचित्र-सा उपस्थित होता है-
उन्हें याद है बूढ़न काकी
सिर पर तेल रखे आती थी,
दीवाली पर दिए कुम्हारिन
चाची घर पर रख जाती थी,
मालिन काकी लिए फुलहरा
तीजा पर करती संवाद
अम्मा को अभी भी है याद...।
उनकी कविताओं की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि ये बाल-कविताएँ खड़ी बोली के साथ-साथ बुंदेलखंडी में भी लिखी गई हैं,जो ग्राम्य जीवन में पलने वाले बच्चों से लेकर नगरीय संस्कृति की चमक-दमक में पढ़ने-बढ़ने वाले बच्चों तक सबका मन लुभाती हैं ।और इतना ही नहीं, हम बड़े- बूढों को भी उनका यह प्रयोग आनंदित करता है । ऐसा प्रयोग बहुत कम बालसाहित्यकारों की लेखनी से संभव हुआ है-
बौ कल सें बीमार डरीं हैं,
दद्दा खों माता निकरीं हैं,
ई कारन सें हे पंडतजू,
मैं पड़बे खों ने आ पेहों।
मोखों रोटी आज बनाने,
घर भर खों फिर मोय जिवाने,
उठत भुंसरा चाय बनाई,
भर भर कप सबखों पिबवाई,
तनक देर में दद्दा बौ खों,
बैदराज के घरे दिखेहों।
ई कारन सें हे पंडतजू,
मैं पड़बे खों ने आ पेहों।
इन रचनाओं के साथ-साथ आपने गद्य की विविध विधाओं में भी अनेक रोचक प्रयोग किए हैं, जिनमें भी मुख्यतः बच्चे ही केंद्र में हैं। अपने लेख 'हरि अनंत हरि कथा अनंता' में उन्होंने वह प्रसंग उठाया है जब उनकी पोती अचानक उनसे पूछ बैठती है कि 'दादा, दो लाख करोड़ कितने होते हैं?' वास्तव में दादा स्वयं भी ठीक से नहीं जानते थे कि दो लाख करोड़ कितने होते हैं,लेकिन फिर भी वह बच्ची को किस तरह समझाते हैं,ज़रा देखिए। ये बच्चों को खेल-खेल में हास्य- व्यंग्य से जोड़ने की अच्छी कोशिश है। प्रसंग मज़ेदार भी है और शिक्षाप्रद भी-
"एक दिन सुबह-सुबह मेरी नन्हीं पोती अखवार उठा लाई और पूछने लगी- 'दद्दा, ये दो लाख करोड़ कितने होते हैं? मैंने कहा आप ही बताओ कितने होंगे, आप भी तो तीसरी कक्षा में पढ़ने जाती हैं' सच बात तो यह है कि मुझे खुद ही समझ में नहीं आया था कि दो लाख करोड़ कितने होते हैं। मैं क्या, मेरे पिताजी भी यदि जीवित होते तो वह भी शायद ही बता पाते कि दो लाख करोड़ कितने होते हैं। दो चार करोड़ तक तो भेजे में घुस जाते हैं कि यह बहुत बड़ी राशि होती है परंतु दो लाख करोड़ सुनके माथा ही चकरा गया अक्ल भी गधे के सिर से सींग की मानिंद गायब हो गई। पोती ने फिर से जोर मारा कहने लगी दद्दा एक करोड़,दो करोड़, तीन करोड़.. सौ करोड़ ऐसे ही दो लाख करोड़ ।मैंने कहा, 'ऐसे कैसे दो लाख करोड़? ठीक से समझाओ बिन्नू,. कितने रुपये हुये?' वह कुछ देर तक माथे पर हाथ फेरती रही फिर सिर खुजलाने लगी और कहने लगी दद्दा दो लाख में एक करोड़ का गुणा कर देंगे तो दो लाख करोड़ हो जायेगा..."
कुछ इसी तरह रोचक शैली में उन्होंने लघुकथाएँ भी लिखी हैं, जिनमें उनकी प्रयोगधर्मिता का एक और रूप दिखाई पड़ता है। उदाहरण के तौर पर 'राम वापस आ गया है', इस लघुकथा-का छोटा-सा अंश देखिए, जिसमें केवल संवादों के माध्यम से सारा घटनाक्रम चित्रित किया गया है। संवाद इतने जीवंत हैं कि पात्रों के परिचय की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती, केवल कथोपकथन से ही सारा घटनाक्रम स्पष्ट होता चला जाता है-
"मालूम है ,राम वापिस आ गया है?”
“क्या? कब आया है?
"उसके मां बाप, क्या वह भी आ गये हैं?
"क्या वह भी जीवित हैं?”
“नहीं, केवल राम ही वापिस आया है,
"मां बाप तो चट्टानों में दब गये या नदी के तेज प्रवाह में बह गये,
'"अभी तक पता नहीं है।”
"सारे गांव में हल्ला है कि उत्तराखंड से राम आ गया है।
"उसके पिता बदरी प्रसाद और मां भोली बाई का कुछ पता नहीं है।
"लोग टेलीविज़न देख देख कर दुखी हो रहे हैं।
"सात दिनों से शोर है, उत्तराखंड की तबाही का...."
लघुकथा के अंतिम भाग में, जिस राम को उत्तराखंड की तबाही में (विशेषकर केदारनाथ-आपदा के समय) गॉंव के लोग मृत समझ बैठते हैं, वही राम बर्फीला तूफ़ान थमने के बाद वापस आता है और अपनी माँ के सामने शपथ लेता है कि जितने लोग इस तबाही में मारे गए हैं मैं उन सब की स्मृति में उतने ही पेड़ लगाऊँगा ताकि भविष्य में प्रकृति का संरक्षण हो और दोबारा इस तरह की आपदा न झेलनी पड़े। तबाही के चित्रण के माध्यम से पर्यावरण- संरक्षण की ये बात केवल संवादों के माध्यम से संप्रेषित करना सचमुच एक प्रशंसनीय प्रयोग है।
कहते हैं एक उदाहरण सौ शब्दों से अधिक प्रभावी होता है। विशेषकर बच्चों के संदर्भ में यह बात और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। बच्चों को जिस तरह उपमा, रूपक,उत्प्रेक्षा के बिंबो के माध्यम से शीघ्र समझाया जा सकता है, उतना केवल विवरणात्मक शैली से संभव नहीं होता। फिर एक शर्त यह भी है कि बिम्ब बच्चों के आसपास के हों, जिन्हें उनका बालमन सहजता से स्वीकार कर सके। आपकी बाल- कविताओं में ऐसे बिंबो की कमी नहीं है। सूरज को बादल ढक लेते हैं तो कवि के शब्दों में यह 'सूरज और बादल के बीच छुपा-छुपौअल का खेल' बन जाता है। उदयाचल पर उदित होता बाल-रवि 'पूर्व की अरुणाभा के नरम बिछौने पर खेलता हुआ आलोक- शिशु हो जाता है।' धरती पर आकर अंधकार को दूर भगाती किरणों को कवि 'सूरज का झाड़ू फेरना' कहकर रचना को बालमन के लिए त्वरित- ग्राह्य बना देते हैं। देखिए, निम्नलिखित पंक्तियों में यह उदाहरण कितनी सुंदरता से दृष्टव्य है-
अभी-अभी छत पर बैठी थी.
अभी हो गई फुर्र,
काना बाती कुर्र चिरैया
काना बाती कुर्र।
उदयाचल के नरम बिछौने
पर सूरज का डेरा,
पकड़ हाथ में किरणें उसने
भू पर झाडू फेरा।
फैली थी कोहरे की चादर,
फटी ज़ोर से चुर्र, चिरैया
काना बाती फुर्र।
भाभी हँसकर दाल धो रही
चाची बीने चावल
सूरज खेल रहा बादल सँग
पल-पल छुपा-छुपऊअल।
अम्मा मटके से ले आई
मुट्ठी भर अमचूर चिरैया
काना बाती फुर्र...
आपका 121 बाल कविताओं का एक संग्रह है, 'मुट्ठी में है लाल गुलाल।' जैसा कि नाम से स्पष्ट है, कवि ने इसे 'सतरंगी इंद्रधनुष' कहा है, जो उनकी स्मृति-शेष अग्रजा श्रीमती सावित्री श्रीवास्तव जी के लिए समर्पित है, जिनका वात्सल्य इन गीतों में और कवि के जीवन में पल्लवित और पुष्पित हुआ है। कविताओं में बच्चों-सी सरलता और भोलापन तो है ही, साथ ही बालमन को चमत्कृत करने वाले अनेक प्रयोग भी हैं। इसकी पहली कविता है, 'जादू की पुड़िया', जिसमें गुड्डा और गुड़िया की कहानी है। गुड्डा राजा भोपाली हैं और गुड़िया शुद्ध जबलपुरिया है। गुड्डा को पापा भोपाल के मेले से लाए थे और गुड़िया सदरगंज जबलपुर के ठेले से आई थी। गुड्डा रसगुल्ले खाता है तो गुड़िया को डोसे अच्छे लगते हैं। गुड्डे को इमली भाती है और गुड़िया को आम पसंद हैं। इस तरह कविता बाल-कल्पनाओं के नए-नए चित्र उपस्थित करती आगे बढ़ती चली जाती है और कविता के साथ-साथ बच्चे क्या, बड़ों के होठों की मुस्कुराहट भी चौड़ी होती चली जाती है। कविता का एक चित्र देखिए-
गुड्डा राजा भोपाली हैं
गुड़िया शुद्ध जबलपुरिया।
गुड्डा को पापा लाए थे
भॊजपाल के मेले से,
गुड़िया आई जबलपूर में
सदरगंज के ठेले से।
गुड्डा को आती बंगाली गुड़िया को भाषा उड़िआ..
इसी संग्रह की दूसरी कविता में बिल्ली के बच्चे कतार में बैठकर अपनी माँ से पूछ रहे हैं- "माँ ! बाज़ार में चूहे क्यों नहीं बिकते ? हम तो घात लगाकर बिल के बाहर बैठे रहते हैं लेकिन चूहे धता बताकर हमें छकाते रहते हैं और इस तरह कई-कई रातें बेकार ही बीत जाती हैं। यदि हाट में चूहे बिकते तो हम गिन-गिन कर दर्जनों ले आते। अगर तौल में मिलते तो क्विंटल भर-भर ले आते और फिर तीज- त्योहारों में भरपूर मौज उड़ाते।"
इस तरह ये संपूर्ण कविता कथ्यात्मक तो है ही,उसमें एक कथा- तत्व भी पिरोया हुआ है, ऐसा कथा- तत्व जो बच्चों के दिलों- दिमाग में चलचित्र पैदा करता चले। कविता में कथा-तत्व का प्रयोग वैसे भी हृदयग्राही होता है और बाल-साहित्य में तो इसका प्रयोग और भी प्रभावशाली हो जाता है। इस कविता की अंतिम पंक्तियॉं देखिए-
"जब भी मर्जी होती चूहे
छाँट-छाँटकर ले आते,
दाम अधिक मोटे-तगड़े के
मुँह माँगे दे आते ।
दाम न होते अगर गॉंठ में
लाते माल उधार में,
पूछ रहे बिल्ली के बच्चे
बैठे एक कतार में
चूहे क्यों न बिकते हैं माँ!
मेलों या बाज़ार में?
इन कविताओं के साथ-साथ आपका बाईस बाल- कहानियों का भी एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ है- 'दादाजी का पिद्दू।' इन कहानियों में प्रमुख्रतः कुछ सूचनात्मक हैं, कुछ शिक्षाप्रद हैं कुछ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई हैं । कहानी के शीर्षक भी बड़े रोचक हैं, जैसे 'लम्पू और गुलाबी, अम्मू का छक्का, रोटी बोली सब्जी बोली, झिंगू-डिंगू, उछलू की चित्रकारी, ऑपरेशन बाल्टी, नाक में चूहा, इत्यादि। ये शीर्षक पढ़ते ही बच्चों का मन आगे पढ़ने के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार हो जाता है। यानी शीर्षक से ही रोचकता आरंभ हो जाती है और जैसे-जैसे कहानी बढ़ती है वैसे-वैसे आनंद बढ़ते चला जाता है ।आनंद बढ़ता है तो पठनीयता का तत्व बच्चों के मन- मस्तिष्क में जड़ें जमाने लगता है । इनमें से कुछ कहानियों में ध्वनि-चित्रों का सुंदर प्रयोग है। जैसे कहानी 'लम्पू और गुलाबी का एक अंश देखिए-
"एक दिन गुलाबी अचानक लंपू के यहाँ पहुँच गई । लंपू लट्टूसिंह को खिला रही थी। लट्टू हँस रहा था। गुलाबी लम्पू के पास जाकर बैठ गई और उसे गाने सुनाने लगी- 'मोरा भइया सोवन लागा- रूं रूं रूं रूं रूं रूं रूं... गुलाबी ने देखा कि जो लट्टू अभी झूले में हँस रहा था गाना सुनते ही गहरी नींद में सो गया है...."
इसके अलावा उनकी दो और बहुचर्चित लघुकथाऍं हैं, 'हवा का रुख' तथा 'संसद'। ये भी अपनी विषयवस्तु और संप्रेषण-कौशल में अविस्मरणीय प्रभाव छोड़ती हैं। ये दोनों खड़ी बोली की लघुकथाएँ हैं, जो बच्चों से लेकर बड़ों तक सबको कुछ नया सोचने के लिए विवश करती हैं। 'हवा के रुख़' में हमारी सनातन परंपराओं पर हावी होते पाश्चात्य प्रभाव का जीवंत चित्रण है, जिसे लेखक ने भोपाल की सिटी-बस में सफ़र करते हुए अपनी ऑंखों से प्रत्यक्ष देखा है। कॉलेज के कुछ छात्र बस में बैठकर जा रहे हैं । एक जगह हनुमान- मंदिर मिलता है । छात्र हनुमान जी को 'हाय हनु', 'गुड मॉर्निंग हनु', 'टेक केयर हनु', 'लौट कर फिर मिलेंगे हनु' कहते हुए चलती बस से हाथ हिला रहे हैं। उनमें से एक छात्र इठलाकर कहता है- "हनु हमारा डियर- डियर वेरी डियर फ्रेंड है।" लेखक सनातन भारत में यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह जाते हैं और केवल यह सोचते रहते हैं कि 'सचमुच, हवा का रुख़ कितना बदल गया है...।" हवा का यह बदलता रुख लेखक को ही नहीं, पाठक को भी काफी हद तक चिंता में डाल देता है।
इसी तरह 'संसद'भी खड़ी बोली की ही एक लघुकथा है, जिसमें लेखक ने राजनीति के विद्रूप चेहरे पर करारा व्यंग्य किया है। और केवल व्यंग्य ही नहीं, नन्हे बच्चों के माध्यम से प्रस्तुत किए गए इस घटनाक्रम को पढ़कर लगता है कि लेखक ने राजनीति के बिगड़ैल चेहरे पर एक मखमली 'तमाचा' भी जड़ा है । आइए इस लघुकथा को पढ़कर उनकी लेखनी के इस तेवर को भी समझने की कोशिश करते हैं-
"कल रविवार था। ज़ाहिर तौर पर अवकाश था और मैं संपूर्ण आराम के मूड में था कि खाना खाकर लंबी तानकर दो चार-घंटे सोऊंगा ताकि पिछले सप्ताह अनावश्यक भागदौड़ से हुई थकावट से कुछ निज़ात पा सकूं। खाने के बाद लेटा ही थाकि बाहर पोर्च में बड़ी ज़ोर-ज़ोर से लड़ने और चीखने की आवाजें आने लगीं।
घबराकर मैं बाहर भागा कि ऐसा क्या हो गया कि बच्चे अचानक चीखने लगे।
पोर्च में मेरे तीन और मोहल्ले के कोई तीन-चार बच्चे चीख रहे थे, कुर्सियां लेकर एक दूसरे पर झपट रहे थे। कुछ बच्चे हाथों में ईंटों के टुकड़े और पत्थर लिये थे और एक दूसरे को भद्दे शब्दों से संबोधन कर रहे थे।। पोर्च के दूसरी तरफ भी मोहल्ले के सात आठ बच्चों का हुज़ूम था। छोटे छोटे प्लास्टिक के गैस चूल्हों पर अल्यूमीनियम के बर्तन रखे थे और इधर उधर छोटे छोटे थाली गिलास बिखरे पड़े थे। मैंने अपने बच्चों से पूछा "क्या कर रहे हो तुम लोग ,क्यों इतना शोर मचा रहे हो? थोड़ा आराम भी नहीं करने देते, और हाथों में ये ईंटे पत्थर.........क्या है ये ?"
और मैंने अपने बेटे पिंटू का कान पकड़कर पोर्च के दूसरी तरफ इशारा कर चिल्लाते हुये कहा "उधर देखो वे भी तो तुम्हारी तरह बच्चे हैं,कितनी शांति से खेल रहे हैं।
"मगर पापा वे लोग तो घर- घर खेल रहे हैं।"
"फिर तुम लोग क्या खेल रहे हो?"
"पापा हम लोग संसद- संसद खेल रहे हैं न।"
-पिंटू ने भोलेपन से जबाब दिया और कान छुड़ाने का प्रयास करने लगा।
मेरा गुस्सा काफूर हो गया और मुझे हंसी आ गई। उसके कान पर से कब हाथ छूट गया मुझे मालूम ही नहीं पड़ा।
"ठीक है खेलो बेटा" मैं इतना ही कह सका और भीतर आ गया।"
अब इस लघुकथा को पढ़कर पाठक रोना चाहे तो रो सकता है, हँसना चाहे तो हँस भी सकता है। तीसरी स्थिति यह भी है कि उसे क्या करना चाहिए या क्या कहना चाहिए, वह इसे तय ही न कर सके...
इस तरह कविताओं के साथ-साथ लघुकथाओं का भी लेखक के पास एक समृद्ध ख़ज़ाना है...
कुल मिलाकर कवि के प्रयास बच्चों के लिए, एक तरह से संपूर्णता लिए हुए हैं। उनकी कविताओं की अंतर्वस्तु का अध्ययन करके प्रतीत होता है कि वे चाहते हैं, कम- से-कम बौद्धिक व्यायाम में बच्चों को अधिक- से- अधिक बौद्धिक जागरण मिल सके अर्थात् कविता पर 'विज़्डम' का बोझ न हो । कविता का सही 'विज़्डम' तो यही है कि वो बच्चों को 'विज़्डम' से अधिक कविता प्रतीत हो और इसी तकनीक के साथ कविता में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन की त्रिवेणी भी बहती रहे । केवल शिक्षा- ही- शिक्षा अथवा सूचना- ही- सूचना से कविता पुनःबोझिल हो सकती है तथा केवल मनोरंजन- ही-मनोरंजन से वह उद्देश्य- विहीन होने लगती है। अतः इन तीनों तत्वों का प्रयोग इस तरह सावधानी से हो कि आनुपातिक संतुलन भी बना रहे और तीनों उद्देश्य एक साथ पूरे भी होते रहें। बच्चों को हम कुछ सिखा रहे हैं, ये अहसास किये बिना वे कुछ नया सीखतै चले जाऍं, उनके लिए ऐसी कविता ही अभीष्ट होती है। हम अपनी ओर से बच्चों के लिए बहुत-. सी कसौटियॉं बना कर रखते हैं किंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों के पास भी कवि के लिए अपनी कसौटी होती है जो बड़े-बड़े विचारकों तथा विद्वानों की कसौटियों से अधिक जटिल हो सकती है । किंतु चूँकि वह जटिलता बच्चों की सरलता से उत्पन्न होती है अतः कवि 'सरल' होकर ही उस जटिलता के पार जा सकता है। सरल होना भी तो जटिल ही है न! अतः इस कसौटी पर खरा उतरने के लिए कवि को भी 'बच्चों के साथ बच्चा' बने रहने की शर्त पूरी करनी पड़ती है। आज लगभग अस्सी वर्ष की उम्र में भी प्रभुदयाल जी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनके कृतित्व और व्यक्तित्व- दोनों. में हमेशा एक निर्मल-निर्दोष बच्चा दिखाई पड़ता है। उनकी हँसी में बच्चों की किलकारी की अनुगूँज मिलती है, उनकी ऑंखें रात- दिन बच्चों को खोजती हैं, इसलिए बच्चे भी उनकी खोज में रहते हैं। मैं उनसे जब भी उनसे मिलता हूँ, ऐसा लगता है, अस्सी बरस के किसी बच्चे से मिलकर आ रहा हूँ। छिंदवाड़ा- अञ्चल में एक बहु-प्रचलित कहावत है-
किसम- किसम के मिल जेहें, तुम्हें हिंया इंसान।
इक बुढ़ियानो बीस में इक अस्सी में ज्वान।
बीस में बुढ़याए लोग तो आए दिन देखने को मिल ही जाते हैं, अस्सी में 'ज्वान' ही नहीं, बच्चा बना रहने का ये जज़्बा बहुत कम लोगों में होता है। प्रभुदयाल जी ऐसे ही लोगों में हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि वे उन्हें सदैव स्वस्थ- प्रसन्न और दीर्घायु बनाए रखें, उनका मन,हृदय और ऑंखें बच्चों जैसे निर्मल निर्दोष भावों से इसी तरह भरे रहें ताकि उनकी उर्वरा लेखनी से नित नई कविताएँ जन्म लेती रहें। उनकी कविताऍं यशस्वी हों ताकि हमारे बच्चे भी उन्हें पढ़कर यशस्वी हो सकें।
निष्कर्ष; अवधेश तिवारी जी की यह पाठकीय दृष्टि प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बाल-साहित्य की संवेदना, भाषा, ध्वनि-सौंदर्य और प्रयोगधर्मिता को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। उनकी रचनाओं में बालमन की सहजता, लोकजीवन की सुगंध और जीवन-मूल्यों की गरमाहट साथ-साथ दिखाई देती है। सचमुच, अस्सी वर्ष की उम्र में भी बच्चों जैसा निर्मल मन बनाए रखना ही प्रभुदयाल जी की सबसे बड़ी रचनात्मक शक्ति है।
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