सूर्यकुमार पांडेय की 10 बाल कविताएँ: बादल और बरसात पर सुंदर कविताओं का संग्रह

Dr. Mulla Adam Ali
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These ten children’s poems by Suryakumar Pandey beautifully capture the joy, wonder, and playful spirit of clouds and rain. With simple language, lively rhythms, and vivid imagination, the poems bring the magic of the rainy season closer to young readers.

10 Best Hindi Children’s Poems on Clouds and Rain by Suryakumar Pandey

वर्षा ऋतु पर 10 बाल कविताएँ बादल और बरसात

इन दस बाल कविताओं में सूर्यकुमार पांडेय ने बादल और बरसात के विविध रूपों को बालमन की सहज कल्पना, लय और चंचलता के साथ प्रस्तुत किया है। कहीं बादल गरजते-बरसते हैं, कहीं बच्चों के साथ खेलते हैं, तो कहीं धरती की प्यास बुझाकर हरियाली और खुशियाँ बिखेरते हैं। इन कविताओं की सरल भाषा, ध्वन्यात्मक शब्दावली और कल्पनाशील चित्रण बच्चों को वर्षा की दुनिया से आत्मीयता से जोड़ते हैं। प्रस्तुत संग्रह में पांडेय जी की बाल-कविता की वही सहजता, संगीतात्मकता और बालमन के प्रति गहरी संवेदना दिखाई देती है।

वर्षा ऋतु पर 10 बाल कविताएँ: सूर्यकुमार पांडेय की रचनाएँ

चंपक"- पाक्षिक: जुलाई (II), 1980 में प्रकाशित सूर्यकुमार पांडेय की कविता बादल आए बादलों के आगमन को ध्वनियों और बालमन की चंचलता के साथ प्रस्तुत करती है। गरजते बादल, बोलते झींगुर और टर्राते मेंढक वर्षा के पूरे वातावरण को जीवंत बना देते हैं।

1. बादल आए


गड़-गड़-गड़-गड़

बाबा रे बाबा,

तड़-तड़-भड़-भड़ 

शोर-शराबा;

आसमान में

करने वाले,

बादल आए

काले-काले। 


गली-मुहल्ले 

टोले-टोले,

झनन-झनन-झन 

झींगुर बोले।

फिर उठ बैठे 

नदियाँ-नाले।

बादल आए

काले-काले। 


ता-ता थई-थई

छत पर कत्थक,

टर्र-टर्र-टर 

करते मेंढक।

धूप-नगर में 

लटके ताले।

बादल आए

काले-काले।


चंपक: अगस्त (I),1975 में प्रकाशित सूर्यकुमार पांडेय की सब को नहलाते बादल कविता में बादल केवल वर्षा के वाहक नहीं, बल्कि धरती की प्यास बुझाने वाले परोपकारी पात्र बनकर आते हैं। सरल शब्दों और मधुर लय के माध्यम से कवि बच्चों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।

2. सब को नहलाते बादल


उजले- उजले पंख लगा कर,

बहुत दूर उड़ जाते बादल।


खूब गरजते, बरसा करते,

नदी, ताल, पोखर सब भरते।

पानी भर-भर लाते बादल।

फिर सब को नहलाते बादल।


बेखटके ये घूमा करते,

साथ हवा के झूमा करते।

बड़ी दूर से आते बादल।

बिजली को संग लाते बादल।


झम-झम करतीं बूंदें आतीं,

इस धरती की प्यास बुझातीं।

परहित में मिट जाते बादल।

हैं खुशियां बिखराते बादल।


"लोटपोट" (साप्ताहिक बाल पत्रिका) के 26 अगस्त,1979 : अंक-388 में 'शब्दिकाएँ' स्तंभ में प्रकाशित कविता ‘वर्षा रानी’ में बारिश का व्यापक और उल्लासपूर्ण चित्र दिखाई देता है। नदियों-नालों के उफान से लेकर बच्चों के नाव चलाने तक, कविता वर्षा के विविध रंगों को बालसुलभ आनंद के साथ सामने रखती है।

3. वर्षा रानी


उफनाए नदियाँ, नाले,

बरस रहे बादल काले।


डूबे ताल-तलैया-घाट,

चौड़े हुए नदी के पाट।


लगा हुआ जल का अंबार,

डूबीं सब सड़कें-बाजार।


भीगे शहर और सब गाँव,

बहा रहे हम बच्चे नाव।


बागों में, उद्यानों में,

खेतों में, खलिहानों में।


वर्षा रानी आई हैं,

लेकर पानी आई हैं।


धरती पानी- पानी है,

बादल राजा दानी है।


"दैनिक जागरण"/ "नवभारत टाइम्स" के साप्ताहिक परिशिष्ट में 1980 से 1985 के बीच प्रकाशित कविता बादल चले सैर पर में बादलों की यात्रा को कवि ने बच्चों की सैर की तरह कल्पनाशील ढंग से प्रस्तुत किया है। पर्वत से टकराकर बरसते बादल अंततः धरती पर हरियाली और खुशियों का रूप ले लेते हैं।

4. बादल चले सैर पर


आसमान की झील तैर कर,

 बादल बाहर चले सैर पर। 


ताल- तलैया लाँघ गए ये, 

नदियाँ- खेत फलाँग गए ये।

पीछे छोड़े गाँव- शहर घर। 

 बादल बाहर चले सैर पर। 


पर्वत से ये जा टकराये, 

आँखों में आँसू भर आये।

बरस पड़े फिर झम-झम झर-झर। 

 बादल बाहर चले सैर पर। 


धरती में मिल गए सभी तब, 

फूलों-से खिल गए वहीं सब।

कितने खुश, हरियाली बन कर। 

 बादल बाहर चले सैर पर।


 "दैनिक जागरण" के साप्ताहिक परिशिष्ट में 23 जून,1985 को प्रकाशित कविता आते बादल में बादलों के परोपकारी स्वभाव को सहज और मधुर भाषा में व्यक्त करती है। बरसाकर धरती को सुख देने वाले बादल कवि की कल्पना में प्रेम और त्याग के सुंदर प्रतीक बन जाते हैं।

5. आते बादल


आसमान में आते बादल, 

       झम-झम जल बरसाते बादल।


अपना प्यार लुटाते हैं ये,

          परहित में मिट जाते हैं ये।

सबको सुख पहुँचाते हैं ये।

           इधर- उधर मँडराते बादल।


साथ हवा के उड़ते आए,

           गरज-तरज बिजली को लाए।

उजले- उजले पंख लगाए,

             दूर देश उड़ जाते बादल।

वर्षा ऋतु पर सूर्यकुमार पांडेय की दस बाल कविताएं हिंदी में

बादल आए तड़बड़-तड़बड़ कविता में गरजते बादलों के आते ही घर और आँगन में मची हलचल इस कविता को बेहद रोचक बना देती है। बच्चों की उत्सुकता, मेंढकों की खुशी और सावन का उल्लास इसकी जीवंतता बढ़ाते हैं।

6. बादल आए तड़बड़-तड़बड़


आसमान में गड़गड़-गड़गड़,

बादल आए तड़बड़-तड़बड़।


जल्दी छत से चीजें लाओ,

भीग न जाएँ, उन्हें बचाओ।

छाता लेकर बाहर जाओ,

रेनकोट पापा का लाओ।  


घर भर में है हड़बड़- हड़बड़।

बादल आए तड़बड़-तड़बड़।


मछली-मेंढक खुश हैं मन में,

उछल-कूद होगी सावन में।

चीलें उड़ने लगीं गगन में,

बच्चे उछल रहे आँगन में। 


गायब लू-अंधड़ की गड़बड़।

बादल आए तड़बड़-तड़बड़।


साप्ताहिक हिंदुस्तान के 26 जनवरी, 1978 के अंक में प्रकाशित कविता मचल पड़े बादल में बादलों को नटखट बच्चों की तरह कल्पित किया गया है, जो हवा की गाड़ी पर बैठकर आकाश में घूमते हैं। उनकी चंचल गतिविधियों के माध्यम से कवि ने वर्षा से पहले के आकाश का सुंदर बाल-चित्र रचा है।

7. मचल पड़े बादल


छोड़-छाड़कर अपना घर,

रखे हुए कंधों पर जल।

निकल पड़े ढेरों बादल।


छोटे नटखट बच्चों-से,

शोर मचाते, उछल रहे।

बैठ हवा की गाड़ी पर,

मनमाने-से टहल रहे।

गाँव-शहर सब के ऊपर,

मचल पड़े ढेरों बादल।


आँखें बिजली, रंग कई,

कुछ भूरे, कुछ काले हैं।

आसमान में उड़ जाते,

उजले पंखों वाले हैं।

करने को छाया सब पर,

लड़े-भिड़े ढेरों बादल।


सुमन सौरभ, अंक-28, अप्रैल 1985, पृ.-53 पर प्रकाशित कविता काले बादल में बादलों के अनेक रूपों के साथ उनके उपयोगी और समानतापूर्ण स्वभाव को भी उभारा गया है। धरती की प्यास बुझाने और फसलों की रक्षा करने वाले बादल बच्चों के लिए प्रकृति-प्रेम का सुंदर संदेश देते हैं।

8. काले बादल


देखो नीर सँभाले बादल,

उजले, भूरे, काले बादल।


शोर मचाते गड़-गड़ तड़-तड़,

हाथी-से मतवाले बादल।


भरते झीलें, ताल-तलैया,

पोखर, नदियाँ, नाले बादल।


धूप-नगर में लटका जाते,

भारी-भरकम ताले बादल।


धरती की है प्यास बुझाते,

फसलों के रखवाले बादल।


भेदभाव की बात न जानें,

प्यारे और निराले बादल।


सूर्यकुमार पांडेय की पानी ये कैसे भरते! कविता में बच्चों की जिज्ञासा को केंद्र में रखकर लिखी गई यह कविता बादलों के रहस्य को बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। पानी से भरे बादलों को देखकर बच्चे जिस तरह सवाल करते हैं, वह कविता को सहज ही विज्ञान और कल्पना से जोड़ देता है।

9. पानी ये कैसे भरते!


नील गगन में है हलचल,

बादल आए लेकर जल।


बोलो, बादल क्या करते, 

पानी ये कैसे भरते?


क्या ये जाते टंकी पर 

या इनके घर होते नल!


कुएँ खुदे हैं या झरने,

जाते हैं पानी भरने?


घड़ा-बाल्टी साथ नहीं,

घूम रहे नभ में हर पल।


दैनिक जागरण में वर्ष 1979 में प्रकाशित कविता बादल राजा में वर्षा के साथ आने वाले बाल-उल्लास की कविता है। नाव, बारिश, पकौड़े, झूले, छाता और रेनकोट जैसे परिचित बिंब बच्चों के मन में सावन की एक आनंदमय तस्वीर बना देते हैं।

10. बादल राजा


नाव बनाएँ, और तैराएँ,

ताली देकर मौज मनाएँ।

बादल आए, बादल आए।


पानी बरसा टप-टप-टप,

चलो नहाएँ छप-छप-छप।

खाएँ पकौड़े गप-गप-गप।

डालों पर झूले लटकाएँ।

बादल आए, बादल आए।


बूँदें गिरतीं छम-छम-छम 

बिजली चमकी चम-चम-चम।

बादल राजा थम-थम-थम।

छाता, रेनकोट ले आएँ।

बादल आए, बादल आए।


- सूर्यकुमार पांडेय

निष्कर्ष: सूर्यकुमार पांडेय की ये दस बाल कविताएँ बादल और बरसात के बहाने बालमन में आनंद, कौतूहल और प्रकृति-प्रेम जगाती हैं। सरल भाषा, मधुर लय और जीवंत कल्पनाओं के कारण ये कविताएँ बच्चों को सहज रूप से आकर्षित करती हैं और वर्षा के सुंदर संसार से उनका आत्मीय परिचय कराती हैं।

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