वेदों और पुराणों में पर्यावरण संरक्षण की महत्ता

Dr. Mulla Adam Ali
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Dr. Poonam Singh’s article “Importance of Environmental Conservation in the Vedas and Puranas” explores the deep connection between nature, human life, and Indian spiritual traditions. Drawing on references from the Vedas and Puranas, the article highlights the importance of protecting the Earth, water, air, forests, plants, and animals. It also shows the relevance of these ancient ecological values in addressing today’s environmental challenges.

Environmental Conservation in the Vedas and Puranas: Ancient Indian Wisdom for Nature Protection

वेदों और पुराणों में पर्यावरण संरक्षण की महत्ता

डॉ. पूनम सिंह जी का आलेख ‘वेदों और पुराणों में पर्यावरण संरक्षण की महत्ता’ भारतीय ज्ञान-परंपरा में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति रही संवेदनशील दृष्टि को सामने लाता है। आलेख में वेदों और पुराणों के संदर्भों के माध्यम से पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, सूर्य, वनस्पतियों, वृक्षों तथा पशु-पक्षियों के संरक्षण की महत्ता को रेखांकित किया गया है। वर्तमान पर्यावरण संकट के संदर्भ में यह आलेख हमारी प्राचीन परंपरा से प्रेरणा लेकर प्रकृति के प्रति जिम्मेदार और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का सार्थक संदेश देता है।

वेदों और पुराणों में पर्यावरण संरक्षण की महत्ता

प्रकृति संरक्षण का प्राचीन भारतीय दृष्टिकोण

शोध सारांश

पर्यावरण परि तथा आङ् उपसर्ग पूर्वक वृ वरने धातु से ल्युट प्रत्यय होकर पर्यावरण शब्द बना है। संस्कृत के वृ धातु का अर्थ है आवृत करना; जो भूमण्डल को परितः आवृत करे वही पर्यावरण है। तृण से ब्रह्माण्ड पर्यन्त समस्त चेतन- अचेतन वस्तुएँ पर्यावरण में अन्तर्भूत है। ये प्रकृति पर्यावरण ईश्वर की अमूल्य निधि है। जो इस संसार के समस्त प्राणी को प्राप्त है। पर्यावरण के अन्तर्गत पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश, नदी, वन, पर्वत, सूर्य आदि शोधक तत्व हैं। हमारे चारों ओर का वातावरण तथा उसमें पाये जाने वाले प्राकृतिक-अप्राकृतिक, जड़-चेतन, जीव जगत सभी का मिला जुला रूप ही पर्यावरण है। पर्यावरण एक व्यापक शब्द है जिसके बिना प्राणि अथवा वनस्पति की कल्पना नहीं की जा सकती है। हमारे प्राचीन ऋषि गण पर्यावरण के उपादानों पर देवीय रूपों का प्रत्यारोपण किया है। पर्यावरण संवर्धन के प्रति ऋषि गण उसके विकास के तत्वों को धर्म तथा धार्मिक क्रियाओं से जोड़कर आम जनता को पर्यावरण की महत्ता का दर्शन कराया। पर्यावरण के मुख्य घटकों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा सूर्य आदि का हमारे धर्मग्रन्थों में वर्णन हैं, जिसके संरक्षण संवर्धन की बात हमारे ग्रंथों वेद, उपनिषद्, पुराणों आदि में की गयी है तथा पर्यावरण के सभी घटको के पूजा की बात भी कही गयी है। पर्यावरण को धर्म से जोड़ने पर प्राचीन जनता इसके विकास में बढ़-चढ़कर योगदान देती थी, जिससे पर्यावरण संतुलन बना रहा।

बीज शब्द : उपनिषद्, संवर्धन, ऋग्वेद, धार्मिक, पुराण, पर्यावरण, पौराणिक, ऋषिगण आदि

मूल आलेख

पर्यावरण मानव जीवन का एक अभिन्न अंग है। इसके बिना जीवन की कल्पना मुश्किल है। आज भौतिकवादी युग में विकास और प्रगति के नाम पर पर्यावरण को दूषित व नष्ट किया जा रहा है। दूषित पर्यावरण सम्पूर्ण विश्व के लिए घातक है। स्वच्छ पर्यावरण स्वस्थ समाज का निर्माण करती है। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया। प्रकृति पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों को देवी-देवता मानकर श्रद्धा भाव व्यक्त की है। उन्होंने प्रकृति को धार्मिक पौराणिक रूपों से जोड़कर आम जनमानस से भी पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन करवाया है। शुद्ध पर्यावरण मानव जीवन के लिए आवश्यक है जिसे हमारे वैदिक ऋषि-मुनि जानते थे। उनका मानना था जहाँ पर्यावरण शुद्ध रहता है वहाँ मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी स्वस्थ्य एवं सुखी रहते हैं। अथर्ववेद मंत्र में पर्यावरण को परिधि और पूर्णशुद्धि के ब्रह्म कहा गया है- 

सर्वो वै तत्र जीवति गौरश्व : पुरुषः पशुः। यत्रदं ब्रह्म क्रियते परिधि र्जीवनाय कम्॥¹

प्राचीन काल में पर्यावरण संरक्षण के लिए हमारे ऋषि - महर्षियों ने व्यापक प्रयास किया है।

पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए ऋग्वेद काल में यज्ञ प्रमुख साधन था । विविध प्रकार के यज्ञों का ऋषिगण आयोजन करते थे। यह यज्ञ व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों स्तरों पर होता था। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में प्रातः-सायं पूजा-आराधना होता था। सामान्य जन के लिए 'अग्निहोत्र' करना अनिवार्य था। घर के सभी-सदस्यों के साथ मिल जुलकर हवन करना, मंत्रोच्चारण करना वैदिक संस्कृति की विशेषता रही है। आग में गाय के दूध से बना शुद्ध घी, गाय के गोबर के उपले, आम, चंदन आदि की लकड़ी, जौ, गुड़, चावल तथा अन्य वानस्पतिक हवन सामग्री की आहुतियों से जो धुंआ उठता था वह आक्सीजन और कार्बनडाई ऑक्साइड में संतुलन रखने में सहायक होता था। साथ ही कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता थी। यही कारण रहा है कि वैदिक सस्कृति की आधारशिला यज्ञ है। यज्ञ को अथर्ववेद में सृष्टि का आधार माना जाता है - अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः ।² 

भारतीय संस्कृति के अनुसार ऋषियों द्वारा स्वस्थ्य एवं फलदायी पर्यावरण केन्द्र 'इको सिस्टम' महत्वपूर्ण देन है, जो आज की जरूरत है। इसी प्रकार यज्ञ को यजुर्वेद में भी महत्वपूर्ण माना गया है-

इयं वेदि : चरो अन्त पृथिव्याः, अयं यज्ञो भुवनस्य. नाभि।³

ऋग्वेद में भी कहा कहा गया है कि अग्निहोत्रसे यौ को प्रसन्न किया जाता है तो मेष धरा को तृप्त करते हैं । देवों और मनुष्यों में सम्बध यज्ञ के माध्यम से बनता है। इसी से संतुलन रहता है। अच्छी कृषि, अन्न, वर्षा आदि सब यज्ञ पर ही आधारित है। जो पर्यावरण से सम्बधित है। जिसका उल्लेख यजुर्वेद में मिलता है- कृषिश्च में वृष्टिश्च मे यज्ञेन् कल्पताम्।"⁴

भारतीय वाङ्मय में पुराणों का भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें कर्मकाण्ड, उपासना तथा ज्ञानविस्तार के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का मंत्र भी विद्यमान है। पुराणों में पर्यावरण शुद्धि के लिए यज्ञ किये जाते रहे हैं। इन यज्ञों से प्रकृति के वायुमंडल को सुरक्षित करने के तत्व विद्यमान रहें। यज्ञ प्रकृति के बायोरिदम् पर आधारित है जिसका मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर प्रभाव पडता है। यज्ञ के मंत्र से तरंगे नि:सृत होती हैं जो प्रदूषण को दूर करने में सहायक होती हैं। केवल देवताओं के पोषण के लिए ही यज्ञ नहीं बल्कि पर्यावरण को सुरक्षित एवं संरक्षित करने के लिए भी यज्ञ आवश्यक है। पद्म पुराण में भी कहा गया है-

यज्ञेनप्यायिता देवा वृष्टयुत्सर्गेण मानवाः। आप्यायन वै कुर्वन्तिं यज्ञाः कल्याणहेतवः॥"⁵

पर्यावरण के मुख्य घटक पंचमहाभूत है जिसमें पृथ्वी, सूर्य, जल, वायु, अग्नि है। यहीं पर्यावरण के मुख्य स्रोत हैं। सूर्य प्रकृति की महानतम शक्तियों का द्योतक है। जगत और जीवन का आधार है। प्रकृति का देवताओं में प्रमुख स्थान रहा है क्यों कि सूर्य ही पर्यावरण का प्रमुख कारक है। सूर्य के बिना तृण से लेकर औषधि तक कुछ नहीं उत्पन्न हो सकता है। सूर्य के द्वारा ही अन्न जल की उत्पत्ति होती है, जिससे प्राणियों, पशु- पक्षी, वनस्पतियों आदि का जीवन चलता है। ऋग्वेद में सूर्य को एक देवता के रूप में स्वीकार गया है। भविष्य पुराण और साम्ब पुराण में भी वर्णन मिलता है। भविष्य पुराण में सूर्य देवता सर्वातिशायी देवता हैं-

 प्रत्यक्षं देवता सूर्यो जगच्चक्षुर्दिवाकर:।

तस्मादभ्यदिका काचिद् देवता नास्ति शाश्वती।।⁶ सूर्य का जितना महत्व धार्मिक दृष्टि से है, उससे कहीं अधिक महत्व प्राकृतिक आयुर्वेदिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से है। जैसा कि ऋग्वेद में कहा गया है- 

आप्रा द्यावा पृथिवी अंतरिक्षं सूर्य आत्मा जगत स्तस्थुषश्च।⁷ सूर्य ही सम्पूर्ण जगत की आत्मा है।ऋषिगण ने भी सूर्य को सर्वोच्च शक्ति के रूप में माना है। पुराणों में सूर्य को रोग निवारण तथा स्वास्थ्य लाभ का विवरण मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य रोग निवारण हैं। सूर्य पर्यावरण का सबसे प्रधान अंग है क्योंकि सूर्य से ही जीवन शुरु व अस्त होता है।

भारतीय साहित्य में सोम चन्द्रमा है। सोम अपनी शीतलता के लिए जाना जाता है। इसके प्रकाश से मनुष्य मन शान्त प्रसन्न चित्त रहता है और शीतलता बुद्धि को बढ़ाती है। इसलिए पुराणों में चन्द्रमा की उपासना का प्रचलन है। पुराणों में पर्यावरण के साथ चन्द्रमा को भी अभिहित किया गया गया है।

वेदों, पुराणों में अग्नि को पर्यावरण का संवाहक माना गया है। अग्नि मे जब हवन किया जाता है तो उसके धुएँ से पर्यावरण शुद्धा होता है और प्रदूषण नष्ट होता है। अग्नि सभी को पवित्र करने वाली है। इससे मनुष्य का जीवन कल्याणकारी होता है। ऋग्वेद में अग्नि देवता को पहला मंत्र ही समर्पित है- अग्निमीहे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् होतारं रत्नधातमम्।⁸ प्राचीन काल में वर्णित पर्यावरण के कष्टमय जीवन से अग्नि मनुष्य की रक्षा करता रही है। इसलिए अग्नि की पूजा का उल्लेख मिलता है।

वायु पर्यावरण का एक प्रमुख अंग है। इसके विपरीत प्रभाव से मानव- पशु-पक्षियों, वनस्पतियों का जीवन संकटमय हो जाता है । वायु के बिना जीना असम्भव है। इसलिए वायु की शुद्धता पर प्राचीन ऋषियों ने बहुत जोर दिया है। वायु को शुद्ध करने का संकेत वेदों में मिलता भी है। वायु अशुद्ध होने पर उदर,मस्तिष्क,फेफड़ा तथा हृदय आदि में कई प्रकार की बीमारियों उत्पन्न हो जाती है।मनुष्य ऑक्सीजन से जीवन ग्रहण करता है जिसे वेदों में प्राण कहा गया है। ऋग्वेद में कहा गया है कि वायुमंडल में अमृत (प्राणवायु) का कोश है, जिसे प्राप्त करके हम उत्कृष्ट जीवन जी सकते हैं, क्योकि वायु ही जीवन का प्राणाधार है।

यददो वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हितः। ततो नो देहि जीवसे॥⁹ वायु सब रोगों से बचाने वाला एवं रोगनाशक औषधियों का वाहक भी है। हमे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे वायु प्रदूषण फैले और जनजीवन को नुकसान पहुँचे।

पृथ्वी पर्यावरण की आधारभूत शिला है। ऋग्वेद में इसकी स्तुति की गयी है। पृथ्वी ही समस्त सृष्टि की जननी है। पृथ्वी के अन्दर ही वायु, जल, मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पति, नदी, पहाड़ सभी समाहित है। पृथी सभी के लिए कल्याणकारी है।इसीलिए धरती माँ है और हम सभी उसकी संतान हैं।माँ को स्वच्छ,सुन्दर रखना हम सबका कर्तव्य है। अर्थववद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है- माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्याः ।¹⁰ पृथ्वी माता - पिता के रूप मे सम्पूर्ण जगत की रक्षा करती है।

प्रकृति में चारो ओर सौन्दर्य है। बर्फ से ढके पहाड़ व पर्वत श्रृंखलाएँ है। पृथ्वी पर सर्वत्र हरीतिमा है। वन व घने जंगल हैं। विभिन्न रंगो की मिट्टी है, जिसमे विविध प्रकार की जड़ी बूटियाँ है। नदियाँ, पहाड़, झरने, पर्वत व महासागर पृथ्वी मे ही स्थित है। जो हमारे पर्यावरण के स्रोत हैं। पर्यावरण के क्षरण से सभी जीवों की हानि है। इसलिए वैदिक ऋ‌षियों ने पर्यावरण के बचाव हेतु पृथ्वी को देवता के रूप में स्थापित किया। पृथ्वी की विविधता का सूक्त वेदों में मिलता है -जना विबाति बहु‌धा विवाकसम, 

नाना धर्मानाम् पृथ्वी यथकसम् ।

सहस्रा धरा द्रवित्स्य ये दुहम्। ध्रुवेना धमुरेक पस्पुरन्ति।"¹¹

ऋग्वैदिक काल में जल को देवता के रूप में माना गया है। यह उसके पर्यावरणीय महत्ता के कारण। सारे जीव-जन्तु वनस्पति तथा मनुष्यों का जीवन जल बिना अधूरा है। जल जीवन का आधार है। इस धरती पर पाए जाने वाले सभी पदार्थों का 75% जल ही है चाहे वह पेड-पौधे फल हों या मनुष्य। सभी को जीवित रहने के लिए पानी की आवश्यकता पड़ती है। जल पर्यावरण का प्रमुख घटक है। इसलिए इसके संरक्षण की बात ऋषियों ने की है। ऋग्वेद से लेकर आज तक के साहित्य में जल को देवता के रूप में स्थापित किया गया है। पुराणों में जल संरक्षण के लिए तालाबों के निर्माण को पुण्य का कार्य माना गया है। शुद्ध जल सभी रोगों से मुक्त करता है। शुद्ध जल पर्यावरण के साथ मानव जीवन को आनंद प्रदान करता है। वेदों में में जल सभी के लिए कल्याणकारी बताया गया है- शन्नोदेवीरभिष्ट्ये आपो भवन्तु पीतये,शं योर भिस्रवन्तु नः ॥¹²

वेदों ने निर्देश दिया गया है कि जल को प्रदूषण से बचाकर शुद्ध रखें। जल को प्रदूषित करना अनैतिक माना गया है। प्राचीन तऋषि जल की शुद्धता के प्रति कितना सचेष्ट थे। शुद्ध जल पीने से रोग नहीं होता। ज्यादातर बीमारी अशुद्ध जल पीने से होती है। जैसा कि वर्तमान समय में विज्ञान की रिपोर्ट बताती है कि 80% बीमारी प्रदूषित जल से होती है। पुराणों के समय में जल प्रदूषण न होते हुए भी जल की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया गया है। वेदों,पुराणों मे जल में किसी प्रकार की गंदगी न करने का निर्देश दिया गया है।

पुराणों, वेदों में जल संरक्षण पर विशेष बन दिया गया है। वर्षा के जल को भी संरक्षित करने का प्रावधान हैं। वर्षा के जल को तालाब बनाकर संचित करने को प्राचीन समय में उल्लेख मिलता है। आज भी कई जगह पर वर्षा जल को संरक्षित किया जाता है। वर्षा का जल पर्यावरण की दृष्टि से विशेष शोधक है। इस जल को वेदों में आनंद प्रदान करने वाला बताया गया है-

यत्पर्जन्य कनिक्रदत् स्तनयन् हंसि दुष्कतः । प्रतीदं विश्वं मोदते यत् किंच पृथिव्यामधि।।¹³

जब जल सबके लिए महत्वपूर्ण है तो सभी का कर्तव्य बनता है कि जल संरक्षण के साथ-साथ जल की शुद्धता को बनाए रखना। वर्तमान समय में विश्व के सामने जो ग्लोबल वार्मिंग की बात उठ रही है वह इसी जल की भयावहता की है। यदि ध्यान न दिया गया तो देश में जल की कमी के साथ ही जल प्रदूषण से कई बीमारियों के फैलने की आशंका है।

पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से वेदों, पुराणों में वृक्षों, वनस्पतियों एवं औषधियों का विशेष महत्व रहा है। जहाँ वृक्षों का अभाव होता है वही गर्मी व अनावृष्टि होती है। इसलिए वृक्ष लगाना चाहिए। औषधियों पर्यावरण के साथ ही मानव रोगों को दूर करने का कार्य करती हैं। वेदों, पुराणों में वृक्षों व औषधियों का उल्लेख मिलता है -वृक्षाणाम् औषधीनां च वीरुधां च प्रकीर्तिनम्। आम्रादिना तरुणां च सर्जन। व्यंजन तथा।¹⁴ वृक्ष, वन औषधि सभी हमारे लिए गुणकारी एवं हितकारी हैं। इनका संरक्षण करना मानव का परम कर्तव्य है। इसीलिए वेदों, पुराणों में इनकी महत्ता दर्शायी गयी है। सभी वेदों, पुराणों में वृक्षों, वनों औषधियों के संरक्षण, संवर्धन को पवित्र कार्य माना गया है। क्योंकि ये सभी पर्यावरण के साथी हैं। प्राचीन काल में पर्यावरण संकट नहीं था फिर भी मनीषियों ने पर्यावरण के प्रति जागरुकता दिखाई है। उन्होंने वृक्षों को धर्म के साथ जोड़ा जिस‌मे आम जन भी पर्यावरण के प्रति सचेष्ट रहें।

वेदों में स्थान - स्थान पर औषधियो व वनस्पतियों के गुण गाए गये हैं। औषधियां विश्व की माता की भाँति हमारा भरण-पोषण करती हैं। हमें रोगों से बचाती हैं- औषधीरिति मातास्तट् वो देवीरूप बुवे ॥¹⁵

औषधि प्रदूषण को भी दूर करती हैं ।जिसका उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। ओषं ध्येति तरुः ओषधयः सम्भवन् ।"¹⁶

वनौषधियों से पर्यावरण का नुकसान न होकर पर्यावरण का संरक्षण ही होता है। ये वनौषधियाँ पर्यावरण के साथ मनुष्य की भी मित्र हैं। आयुर्वेदिक दवाएँ वन से उत्पन्न होने के कारण पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित हैं। वेदों, पुराणों, आरण्यकों, उपनिषदों आदि में औषधि के गुणों का उल्लेख मिलता है। इनमें तुलसी, पीपल, नीम, बेल, बरगद, मदार, अर्जुन आदि न जाने कितन वृक्ष हैं जो औषधि के साथ पर्यावरण की दृष्टि से उत्तम है। भारतीय समाज में आज भी नीम, तुलसी, पीपल की पूजा होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी ये वृक्ष अति लाभकारी हैं। तुलसी की सुगंध को लेकर वायु जिस दिशा में बहता है वह दिशा सुगंधित व पवित्र हो जाती है। वहां रहने वाले समस्त जीव शुद्ध व पवित्र रहते हैं, जैसा कि श्लोक मे वर्णित है -

तुलसी गन्ध मादाय यत्र गच्छत्ति मारुतः । दिशो दशश्च इतास्तुर्भुत ग्रामश्चतुर्विधमः ॥¹⁷

हमारे धर्मग्रन्थों में वृक्ष लगाना पुनीत कार्य माना जाता रहा है। वृक्ष लगाने से पर्यावरण के साथ ही हमें फल की भी प्राप्ति होती है।यहाँ तक कि दूसरों के द्वारा लगाए गए वृक्षों का सिंचन करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। वृक्षों की सेवा करने से प्राणियों को सुख-शान्ति मिलती है व पर्यावरण की रक्षा होती है। ऋषियों- मुनियों का मानना था कि जो लोग दुर्गम स्थानो पर वृक्षारोपण करते हैं वह अपना भूत -भविष्य व आने वाली पीढ़ियों का उद्धार करते हैं। जब हम इस दुनिया से विदा होते है तो अन्त्येष्टि में यही वृक्ष की लकड़ी काम आती है।इसलिए भी वृक्षारोपण करना आवश्यक है। साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा भी जरूरी है। वृक्ष के संदर्भ में शिव पुराण में कहा गया है कि -अतीतानागतान् सर्वान् पितृवंशास्तु तारयेत्। कान्तारे वृक्षरोपी यस्तस्माद् वृक्षांस्तु रोपयेत् ॥¹⁸

हर व्यक्ति को अपने जीवन काल में पेड़ अवश्य लगाना चाहिए। जिससे पर्यावरण संतुलन बना रहे और फल भी प्राप्त हो। जैसे आज के समय को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए, वन महोत्सव, वृक्षारोपण, एक पेड़ माँ के नाम, बुजुर्गों के नाम, शहीदों के नाम आदि कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। जो कि वेदोंसे प्रभावित है। इसी प्रकार वेदों में भी पर्यावरण को सुखद शान्तिपूर्ण, स्वच्छ बनाए रखने के लिए ऋषियों ने प्रयत्न किया है तथा सभी ओर शान्ति बनी रहे ऐसी स्तुति की है-

ओ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्ति : पृथिवी शान्तिरापः । शांतिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः ॥

शान्तिब्रह्म शात्तिः सर्वग शान्ति:। शान्तिरेव शांतिः सा मा शान्तिरेधि ॥¹⁹

पशु-पक्षी तथा मानव का सम्बध प्राचीन काल से ही घनिष्ठ रहा है। पशु-पक्षी भी पर्यावरण के संघटक हैं। प्राचीन धर्मग्रन्थों वेद, पुराण, उपनिषद्, आरण्यको आदि में इनके संरक्षण की बात कही गयी है। प्राचीन काल में पशु-पक्षी मानव के सह‌योगी रहे हैं जैसा कि ज्ञात होता है। पर्यावरण के सन्तुलन में हमेशा पशु पक्षी साथी रहे हैं किन्तु आज का मनुष्य क्षुद्र लिप्सा के कारण उन्हें मारकर पर्यावरण को चुनौती दे रहा है। जो कि गलत है । पशु-पक्षियों के विलुप्त होने पर पर्यावरण संकट हो सकता है। इसलिए पशु-पक्षियों का संरक्षण बहुत जरूरी है। प्राचीन काल में पर्यावरण की समस्या न होने पर भी ऋषिगण पशु-पक्षियों के संरक्षण के प्रति बहुत सचेत थे। उनका वध करना निषेध माना गया है । उन्हें ग्रामवासियों का साथी माना गया है -

गोश्वोष्द्रगर्दभश्वानः सारिका गृहगोधिका । चटका भास कूर्मा घाः कथिता ग्रामवासिनः ॥ "²⁰

प्राचीन काल मे पर्यावरण की समस्या न होते हुए भी ऋषि-मुनि कितना सचेष्ट दिखाई पड़ते हैं। आज पर्यावरण संकट चारो तरफ से बेतहाशा छा रहा है। यदि हम सभी सचेष्ट न हुए तो भविष्य में इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। पर्यावरण संरक्षण हेतु हमे वन, जल, जंगल, औषधि --पहाड - पशु-पक्षी, झरने, नदी, तालाब आदि की महत्ता के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। वर्तमान समय में पर्यावरण अत्यधिक दूषित हो गया है। नदियों मे कूड़े कचरे प्रवाहित किए जा रहे हैं जो कि गलत है इससे वातावरण प्रदूषित हो रहा है और जनजीवन पर प्रभाव पड़ रहा है। अगर वातावरण-स्वच्छ रहेगा तो हमारा मन मस्तिष्क भी स्वस्थ्य, शान्त और प्रसन्न चित्त रहेगा तथा अच्छे विचार आएंगे। हमे एक स्वच्छ पर्यावरण का निर्माण करना चाहिए।

संदर्भ सूची;

  1. अथर्ववेद (8/2/25)
  2. अथर्ववेद (9/15/14)
  3. यजुर्वेद (23/62)
  4. यजुर्वेद (19/9)
  5. पद्मपुराण (सृष्टि खण्ड 3/124)
  6. भविष्य पुराण (1/48/2)
  7. ऋग्वेद (1/115/1)
  8.  ऋग्वेद (1/1/1)
  9. ऋग्वेद (10/186/3)
  10. अथर्ववेद ( पृथ्वी सूक्त 12/1/12)
  11. " (" 12/1/45)
  12. ऋग्वेद 10/9/4)
  13. ऋग्वेद (5/83/9)
  14. ब्रह्मपुराण (1/1/51- 52)
  15. ऋग्वेद (10/97/4)
  16. शतपथ ब्राह्मण (2/2/2/5)
  17. पद्मपुराण (उत्तरखंड अध्याय 23)
  18. शिवपुराण (उत्तरसंहिता 11/7)
  19. यजुर्वेद (36/17)
  20. अग्निपुराण (231 /11)

- डॉ पूनम सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर ,हिंदी विभाग
हिंदू कन्या महाविद्यालय, सीतापुर

निष्कर्ष; वेदों और पुराणों में पर्यावरण संरक्षण को केवल प्राकृतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन और धर्म से जुड़ा दायित्व माना गया है। पृथ्वी, जल, वायु, वनस्पति, वृक्ष और पशु-पक्षियों के संरक्षण के प्रति प्राचीन ऋषियों की दृष्टि आज भी प्रासंगिक है। वर्तमान पर्यावरण संकट के दौर में इन शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर प्रकृति के संरक्षण और संतुलन के लिए सामूहिक प्रयास करना आवश्यक है।

ये भी पढ़ें; संस्कृत साहित्य में पर्यावरण चेतना : एक अध्ययन

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