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भारत विभाजन की मानवीय त्रासदी पर केंद्रित उपन्यास : तमस

Tamas by Bhisham Sahni भारत विभाजन की मानवीय त्रासदी पर केंद्रित उपन्यास : तमस

भीष्म साहनी का ‘तमस’ भारत-विभाजन की मानवीय त्रासदी पर केंद्रित उपन्यास है। ‘तमस’ का अर्थ ‘अंधकार’ होता है। भारत विभाजन के समय की सांप्रदायिक विभीषिका, रक्तपात, हिंसा और उन्माद के साथ ब्रिटिश उपनिवेशवादी षड्यंत्रों और साम्राज्यवादी नीतियों के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में ‘तमस’ को देखा जा सकता है। यह उपन्यास 1973 में 260 पृष्ठों में प्रकाशित हुआ है। इसकी कथा का आधार भारत पाक विभाजन है। इसे 1970 में ‘साहित्य अकादमी’ द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

    उपन्यास का आरंभ नथ्यू चमार द्वारा सूअर मारने की घटना से होता है। अंग्रेजों का अनुयाई मुरदा अली नत्थू चमार को पाँच रुपये देकर सुअर मरवाकर मस्जिद के सामने फिंकवा देता है।

   फलतः शहर में सांप्रदायिक तनाव बढ़ जाता है। अंग्रेजी शासक रिचर्ड हिंदू-मुसलमान एकता बनने में भय से दोनों वर्गों में फूट डालकर राज करने की नियति बनाता है। इस तनावपूर्ण वातावरण के कारण दोनों ही समुदाय परस्पर लड़ने ही तैयारी करते परिलक्षित होते हैं।

   कांग्रेस दल इस सांप्रदायिक तनाव को कम करने का बड़ा प्रयत्न करती है। सांप्रदायिकता के कारण अनेक निरपराध बच्चों की जाने, असहाय अबलाओं पर अत्याचार, अनेक अमानवीय घटनाएं, खून-खराबा, लाशों के ढेर आदि कुकृत्य उपन्यास में उभर कर आते हैं।

   सांप्रदायिक दंगे कितने अमानवीय और कितने क्रूर होते हैं, असुरक्षा और धार्मिक जुनून के चलते किस प्रकार बलिदानी भावनाएं जुड़ती है। इसका विवरण भीष्म जी ने बड़े संयम और बड़ी तटस्थता से सांप्रदायिक दंगों के विनाशकारी परिणामों को उपन्यास में चित्रित किया है।

   ‘तमस’ उपन्यास के बारे में राजेंद्र यादव कहते हैं –“भीष्म का उद्देश्य तमस में उस समय के लोगों की कहानी कहना नहीं आतंक के माहौल को पुनर्जीवित करना है। जो सारी जिंदगी को छिन्न-भिन्न किए दे रहा है। सारे मानवीय मूल्यों के परखचे उड़ाए दे रहा था।“ इस प्रकार विभाजन पूर्व जन जीवन में सांप्रदायिकता, तनाव, अलगाव, घृणा की भूमिका, सांप्रदायिक संकीर्णता के कारण यह दंगों में मानवीय मूल्यों का टूटना, अंग्रेजों की कूटनीति और धार्मिक कट्टरता के परिवेश में राजनीतिक पार्टियों का दृष्टिकोण ‘तमस’ में उभारा है।

   ‘तमस’ उपन्यास का रचनात्मक संगठन कलात्मक साधन की दृष्टि से प्रशंसनीय है। इस उपन्यास में प्रयुक्त संवाद और नाटकीय तत्व प्रभावकारी है। भाषा हिंदी, उर्दू, पंजाबी एवं अंग्रेजी के मिश्रित रूप वाली है। यह उपन्यास भाषाई अनुशासन कथ्य के प्रभावों को गहराता है। कथ्य के अनुरूप वर्णनात्मक, मनोविश्लेषणात्मक एवं विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग सर्जन के शिल्पी कौशल को यह उपन्यास उजागर करता है।

डॉ. मुल्ला आदम अली

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