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Vision of Pakistan: पाकिस्तान की परिकल्पना

पाकिस्तान की परिकल्पना (vision of pakistan)

        पाकिस्तान के पिता की संज्ञा से यद्यपि जिन्ना को विभूषित किया जाता है लेकिन इस शब्द की संरचना और इसकी परिकल्पना को जन्म देने का श्रेय ‘रहमत अली’ को जाता है। सन् 1931 में आयोजित ‘गोलमेज परिषद’ में भाग लेने आए मुस्लिम सदस्यों के सामने स्वतंत्र पाकिस्तान की योजना लंदन में रहनेवाले तथा कैंब्रिज में शिक्षित एक वकील ‘रहमत अली’ ने प्रस्तुत की थी। अपनी पाकिस्तान योजना का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उसने कहा था –“इकबाल सभी प्रांतों का एक प्रांत में विलीनीकरण करते स्वायत्त प्रांत बनाने की बात कहते है; म प्रांतों को संघ प्रदेश से ही अलग रखने की बात कर रहा हूं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश में हम हिंदूओं के हाथों सौंपा न जाए। वहां हम अपनी नियति के मालिक अथवा अपनी आत्मा के अधिकारी नहीं होंगे।“1 इसके बाद रहमत अली ने मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की माँग करते हुए पाकिस्तान के रूप में स्वतंत्र राष्ट्र का नाम लिया और ‘पाकिस्तान’ शब्द की व्याख्या इस प्रकार की, रोमन लिपि में लिखित ‘पाकिस्तान’ (PAKISTAN) P, A, K और I वर्ण क्रमशः पंजाब (Punjab), अफगान प्रांत (Afghan) सीमा प्रांत के पश्तो भाषी प्रदेश, कश्मीर (Kashmir) और सिंध (Sindh) प्रान्तों का घोतक है। पंजाब, अफगान प्रोविंस और कश्मीर शब्दों के आद्याक्षरों में तथा सिंध के द्वितियाक्षर को लिया गया है। ‘पाकिस्तान’ शब्द का स्थान अंश ‘बलूचिस्तान’ के अंतिम अंश से लिया गया है। ‘पाकिस्तान’ अर्थात् पाक (पवित्र) देश के रूप में पाकिस्तान शब्द की व्याख्या रहमत अली ने नहीं सोची थी।

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      रहमत अली के अनुसार उपर्युक्त प्रांत भारतीय प्रदेश के हिस्सों के रूप में कभी भी नहीं थे। अनेक ऐतिहासिक प्रमाण देते हुए उसने सिद्ध करने का यत्न करते हुए कहा, सन् 712 से इन प्रदेशों में हिंदू अल्पसंख्यक ही थे, और इस कारण भारत का इन प्रदेशों पर कोई अधिकार नहीं है। स्वयं रहमत अली ने सन् 1933 में इंग्लैंड में पाकिस्तान के निर्मित का आंदोलन शुरू किया। सन् 1935 से 1937 के बीच उसने इस आंदोलन का खूब प्रचार किया। इसके फलस्वरूप सभी मुस्लिम नेताओं के मन में स्वतंत्र पाकिस्तान की योजना ने घर करना शुरू किया। अलग मुस्लिम स्वायत्त प्रांत की मांग मुस्लिम मानसिकता के अधिक अनुकूल थी। इस कल्पना की ओर आकृष्ट होने का एक बड़ा कारण यह था कि उस समय हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता का वातावरण बढ़ रहा था। 1935-39 के काल में सावरकर द्वारा प्रचारित हिंदू राष्ट्र की कल्पना ने मुस्लिम राष्ट्र की कल्पना के प्रसार की गति और तीव्र कर दिया।

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       अंग्रेजों ने भी द्वीराष्ट्र सिद्धांत का समर्थन करने लगे। थोयोडर मौरिसन ने अलग राष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन करते हुए लिखा –“हिंदू-मुस्लिम अलगाव के कारणों अथवा आधारभूमि को खोजना ही निरर्थक है, क्योंकि इस सिलसिले में एकमात्र बात यह है कि दोनों धर्मों के लोग खुद एक दूसरे को भिन्न और अलग मानते हैं। राष्ट्रीयता के सभी मानदंडों में सबसे महत्वपूर्ण और एकमात्र मानदंड यही होता है कि उस राष्ट्र के लोग सारे मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे को ‘एक’ मानते हैं और ‘एक’ रहने के लिए वह किसी भी प्रकार का भौतिक नुकसान सहने को तैयार है -तो वह सब एक है- ऐसा कह सकते हैं कि अगर नहीं तो फिर वह ‘एक राष्ट्र’ नहीं है। अगर इस कसौटी के आधार पर हिंदू मुस्लिमों की परीक्षा करें तो स्पष्ट हो जाता है कि -भारत के मुस्लिम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में है।“2  इस प्रकार अंग्रेजों ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन करके विभाजन की खाई को और भी गहरा कर दिया।

       मुस्लिम लीग अलग मुस्लिम स्वायत्त प्रांत की मांग का दबाव डाला, कांग्रेस इसका जवाब नहीं दे सका फलतः मुस्लिम धीरे-धीरे कांग्रेस से दूर हटते गए।

संदर्भ;

1. मजूमदार.R.C. – स्ट्रगल फ़ॉर फ्रीडम- पृ-528

2. पी. वाटर वाल बैंक (सं) – द पार्टिशन ऑफ इंडिया कॉज़ेज़ एण्ड रिस्पांसिबिलिटी- पृ-92

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