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कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर न आये


     नमस्कार दोस्तों आज इस ख़ास विषय पर कुछ ख़ास बातें लेकर मैं आप सभी के समक्ष हाजिर हूँ। जी हाँ, आज का विषय है।
 शहीदों की शहादत की बदौलत ...जब शब्द “शहीद” जेहन में आता है तो सबसे पहले स्वतन्त्रता संग्राम में शहीद हुए हमारे देश के युवा क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह आजाद, चन्द्र शेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल के नाम याद आ जाते हैं। नाम सिर्फ इतने ही नहीं हैं और भी न जाने कितने सेनानियों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। इतना ही कहना काफी नहीं कि हम उनके नाम याद आते हैं अपितु उन्हें याद कर आँखें भी भर आती हैं लेकिन शहीदों के लिए कभी आँसू बहाया नहीं करते इसलिए हम उन्हें फख्र से याद करते हैंं। उन्हें सैल्यूट करतेे हैं।  उन्हें स्मरण कर उनका सम्मान करते हैं।

देश को अंग्रेजों से आजादी मिलना निश्चित रूप से बड़ी सफलता थी। किन्तु उसके बाद इस देश को संभालना, दुश्मनों से रक्षा करना उससे भी अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। मुझे याद आता है वह गीत ......हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के ...इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। कितना दर्द छिपा है इस गीत में ....कितनी उम्मीदें हैं गीतकार को हमारे देश के युवाओं से।

शहीदों की शहादत सिर्फ स्वतन्त्रता संग्राम तक ही सीमित नहीं है। यह जारी है आज भी, अभी भी, हरेक पल, हरेक क्षण हमारे देश के सैनिक हमारे फ़ौजी भाई सीना ताने सरहद पर हाथ में बंदूकें लिए अपनी जान की बाजी लगाए चौबीसों घंटे तैनात हैं देश की रक्षा के लिए।

अभी हाल ही में असम राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर विप्लव त्रिपाठी मणिपुर में अपने काफिले के साथ जा रहे थे। साथ में उनकी पत्नी और छह वर्षीय बेटा अबीर त्रिपाठी भी थे। आतंकवादियों ने काफिले पर हमला किया और वे सपरिवार मारे गए। मैं यहाँ उनके लिए मारे गए शब्द की जगह शहीद हुए कहना उचित समझती हूँ क्योंकि वे देश की रक्षा के लिए मणिपुर में पोस्टेड थे और यह हमला उन पर घात लगा कर किया गया था। इस लाइव कार्यक्रम के माध्यम से मैं उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।

इससे पहले भी पुलवामा अटैक में हमारे देश के कई सैनिक शहीद हुए। कारगिल युद्ध में शहीद सौरभ कालिया, शहीद मेजर मनोज तलवार को भी कोई भूला तो नहीं होगा और न ही भूलना चाहिए हमें। कितने ही सैनिक उन बर्फीली चोटियों पर घायल हुए और कितने जंग जीत कर सकुशाल लौटे। जो लौट कर आये उनके घरों में जश्न किन्तु जो लौट कर न आये क्या हम उन्हें भूल जाएँ ?

क्या हालत होती होगी उनके घरों की, परिवारों की, माता-पिता, भाई-बहिन, पत्नी-बेटी की। यदि किसी शहीद के परिवार को उसकी शहादत के उपरान्त करीब से देखें तो शायद हमारी रूह काँप जाए। शहीद की एक नहीं तीन पीढ़ियाँ प्रभावित होती हैं। कितनी समस्याएं हैं उनके जीवन में, कितनी यादें होती हैं उनके पास भी। जाने वाले के साथ यादें तो नहीं चली जातीं न। तो फिर हम क्यों भुला दें उन्हें ?

देश की रक्षा के लिए हमारी सेनाओं की विभिन्न टुकड़ियाँ देश की सरहदों पर तैनात हैं। इसीलिए हमारे देश की सेनायें कुछ विशेष कारणों से ख़ास दिवस मनाती हैं और न सिर्फ सेना बल्कि पूरा देश शहीदों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि भी अर्पित करता है।

१५ जनवरी १९४९ को फील्ड मार्शल के एम् करिअप्पा स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेना प्रमुख बने थे। उसके बाद से ही प्रत्येक वर्ष यह दिवस आर्मी डे के रूप में मनाया जाता है।
८ अक्तूबर को वायुसेना दिवस मनाया जाता है क्योंकि अविभाजित भारत में वर्ष १९३२ को यह दिन आधिकारिक तौर पर यूनाइटेड किंगडम की रॉयल एयरफोर्स के लिए एक सहायक बल के रूप में स्थापित किया गया था।
 १९७१ के भारत- पाकिस्तान युद्ध में भारतीय नौसेना की जीत के जश्न के रूप में ४ दिसंबर को भारतीय नौ सेना दिवस मनाया जाता है।

१ दिसंबर वर्ष १९६५ को सीमा सुरक्षा बल की स्थापना हुई थी। इसीलिए प्रत्येक वर्ष १ दिसंबर को बी एस ऍफ़ डे के रूप में मनाया जाता है।

अमर शहीद की आत्मा करती है सरहद की रखवाली
बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स का सिद्धांत है “ड्यूटी अंटू डेथ”। लेकिन शहीदों का जज्बा तो इससे भी बहुत ऊँचा है। सिक्किम की सीमा से लगी भारत-चीन की सीमा पर नाथुला पास है। वहीं एक शहीद कैप्टन हरभजन सिंह के नाम का मंदिर भी है। जहाँ आज भी उनकी पूजा की जाती है। लगभग तेरह हजार फीट की ऊँचाई पर बने इस मंदिर में आज भी कैप्टन हरभजन सिंह के कपड़े, जूते, आदि रखे हुए हैं। देश-विदेश से आये सैलानी दूर-दूर से इस मंदिर के दर्शन करने आते हैं। इसका कारण है कि वहाँ के लोगों का मानना है कि शहीद हरभजन सिंह मृत्यु उपरान्त भी देश की सरहद की रक्षा कर रहे हैं। वे नाथुला के आस-पास चीन के सैनिकों की गतिविधियों की जानकारी साथ के सैनिकों को सपने में आ कर दे जाते हैं।

तो आइये हम भी याद करें सभी शहीदों को क्योंकि कुछ हमें अंग्रेजों से आजाद करवाने के लिए शहीद हुए तो कुछ आज तक शहादत दे रहे हैं ताकि हम सुरक्षित रह सकें।

 ऐसे ही कुछ शहीदों की शहादत को नमन करते हुए प्रस्तुत करती हूँ स्वयं की लिखी एक कविता _जिसे दिल्ली इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की स्मारिका में स्थान प्राप्त हुआ था।
                            
कविता
शहादत की बदौलत

गा रहा है गाथा आज भी जर्रा-जर्रा हिन्दुस्तान का
कि जहाँ बिखरा था सिंदूर
लहू बन कर शूरवीरों का
बुहार लूँ रास्ता कि आज भी है बसता
चर्चा बहादुरी, हिम्मत, सम्मान अभिमान का
हे शहीद ! किस मिट्टी के इंसान हो तुम ?
बौनी है उँचाई शिखरों की, महान हो तुम
क्या याद करें हम,कि भूले ही नहीं कभी
ओझल न हुई छवि(image), इक पल को भी
गुमान है हमें तुम्हारी वर्दी पर
याद है हर वो सैनिक जो लड़ा उन बर्फ़ीली चोटियों पर
बजा रहा है डंका आज भी बर्फ में लिपटा हिमालय
कि रक्त-रंजित है हृदय उसका भी
देखा है उसने,छलनी होता सीना अपने सपूतों का
सुना रहा है कहानियाँ फर-फर लहराता तिरंगा
किस हिम्मत से खदेड़ा तुमने घुसपैठियों को
कि अंतिम श्वांस लड़ता रहा किस हौसले के साथ
भूल गया डोली, राखी बहिन की
किल्कारी,हँसी ,मुस्कुराहट अपने मासूमों की
जर-जर होती हालत बूढ़े माँ-बाप की
टपकती छत अपने घर की
छोड़ गया दुल्हन बनी सिंदूरी माँग
सहेजे सीने में सिर्फ़ कर्तव्य,
न लगने दिया माँ की चूनर पर दाग
पहचानती है तुम्हें मिट्टी की खुश्बू,जो फैली थी हवाओं में
ढूँढती हैं घटियाँ जो सुनती थी आगाज़, फिजाओं में
तुम कहाँ हो हे योद्धा ?
शायद खिलखिलाहट, किल्कारियों में
याद करते हैं तुम्हें
मेंहदी, महावर, कुमकुम, रोली
बहिनों की राखियाँ और डोली
दे रही है आशीष माँ की ममता
क्योंकि कि सब कुछ है महफूज
तुम्हारी शहादत की बदौलत
व्यर्थ नहीं तुम्हारी आहुति
देखो ज़रा लहराते तिरंगे को
सुनाई देती है हर फर-फर में धड़कन-तुम्हारी
बताती है आज भी गतिमान श्वांस तुम्हारी
हे शूरवीर तुम सदैव अमर हो
नतमस्तक हैं हम तुम ईश्वर हो
अर्पित हैं श्रद्धा-सुमनहर उस देहरी पर
जहाँ रखे थे शहीदों ने कदम
रुख़ करते हुए जंग की ओर...

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यह मात्र एक कविता नहीं बल्कि शहीदों, सैनिकों के प्रति मेरे मन के भाव हैं।

सैनिक पर आधारित ही एक बाल कविता भी प्रस्तुत करती हूँ। इस कविता के साथ जुडी एक यादगार घटना है जो मैं यहाँ साझा करना चाहूँगी। दरअसल मेरी बिटिया के स्कूल में उन्हें बोला गया कि देशभक्ति की थीम पर आधारित ग्रीटिंग कार्ड बना कर लाओ। सभी बच्चों के कार्ड स्कूल द्वारा सरहद पर तैनात सैनिकों तक पहुँचाये जायेंगे। सो मेरी बेटी ने तिरंगा झंडा, और साथ में बन्दूक लिए एक सैनिक का चित्र बना कर रंग भर दिया। तभी मुझे ख़याल आया क्यों न एक कविता सैनिक पर लिख कर इस कार्ड के साथ लगा दी जाए। उसी समय मैं ने कविता तैयार की और कार्ड पर भी लिख दी। उस कार्ड को स्कूल में सबसे ज्यादा पसंद किया गया और बिटिया को १५ अगस्त स्वतन्त्रता दिवस पर वही कविता पढ़ने के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया।

बाल कविता
सैनिक

सैनिक तेरी कुरबानी को याद किया जाएगा ।
भारत का हर बच्चा तेरे नाम का गुण गायेगा ।।
सीमा प्रहरी करें हिफाज़त हों कितनी बाधायें ।
थक कर चूर हुए हों फिर भी रिपु को धूल चटायें ।।
हम फोड़ें जिस रात पटाखे खूब मने दीवाली ।
सरहद पर बमबारी होती तेरी रातें काली ।।
जब-जब तू आगाज़ करे तो दुश्मन हटते पीछे ।
तेरे इक हुंकारे पर ही डर के आँखें मीचे ।।
देख तिरंगा आजादी का फ़र फ़र है लहराता ।
उस की फ़र-फर ने है बाँधा हर शहीद से नाता ।।
जी चाहे मंदिर में तेरी मूरत एक सजा लूँ ।
आज़ाद देश के रखवाले, तुम से आस लगा लूँ ।।

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    अब एक ख़ास बात और आप सभी से साझा करती हूँ। करवा चौथ मनाने की शुरुआत भी सैनिकों के परिवार की महिलाओं द्वारा ही की गयी थी। पुराने समय में जब सैनिक जंग के लिए जाते थे तो उनके सुरक्षित घर लौटने की उम्मीद में परिवार की महिलायें खासकर उसकी पत्नी व्रत किया करती थी। क्योंकि पुराने जमाने में मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल किये जाते थे इसलिए मिट्टी के करवे में पानी भर कर स्त्रियाँ व्रत कर प्रार्थना किया करती थी कि उसका पति या घर का पुरुष युद्ध से सुरक्षित लौटे।

अब एक और लघुकथा शहीद और करवा चौथ पर आधारित प्रस्तुत करती हूँ जिसका पंजाबी में अनुवाद भी हुआ है।

शहीदों की शहादत की बदौलत : रोचिका अरुण शर्मा

लघुकथा – सदा सुहागन

“वह आ रही है जलाराम की औरत ” समूह की सबसे बुजुर्ग महिला ने त्योरियाँ चढ़ा कर कहा।
“पर इसने तो १६ शृंगार कर रखे हैं”
“यहीं तो मैं कह रही हूँ, आजकल रोज लाल बिंदी भी लगाती हैं”
समूह की अन्य महिलायें भी उस के साथ में बातें बनाने लगी थीं।
अरे ! यह तो इधर ही आ रही है, लगता है व्रत की कहानी सुनने हमारे पास ही आ रही है।
“हुम्म्म्म”
उसे पास आते देख सभी ने एक-एक कर नज़रें घुमा ली थीं। फिर भी वह सब के पास आ कर जैसे ही बैठने लगी।
“यह व्रत सुहागनों के लिए होता हैं, दूर बैठ”? बुजुर्ग महिला ने डाँटते हुए कहा।
“जी माफी चाहती हूँ किन्तु मुझे यह पूजा करने का पूरा हक़ है, मैं भी आप सब के साथ कहानी सुनूँगी और व्रत करूँगी। माना कि मेरे पति नहीं रहे, किन्तु वे सीमा पर जंग में शहीद हुए और ...
शहीद अमर हुआ करते हैं, वे कभी मरते नहीं......
तो फिर मैं क्यों न मेरे सुहाग के लिए व्रत रखूँ और पूजा करूँ, क्यों न मैं सोलह शृंगार करूँ ?
वह तो पूरे गाँव का बेटा है ....और मैं आप सब की बेटी.....उस की आँखें छलक आयी थीं।
सभी महिलाओं ने नज़रें झुका ली थीं।

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      वैसे तो स्वतन्त्रता के बाद से ही शहीदों पर आधारित फ़िल्में बनी हैं। कई लेखकों ने कहानियाँ भी लिखी हैं। मैं ने स्वयं भी शहीदों के परिवार और उनकी पत्नी पर आधारित कहानियाँ लिखी हैं जिनके शीर्षक हैं “रंग” और “इन्द्रधनुष”। लेकिन अभी मैं एक विशेष कहानी की चर्चा यहाँ करना चाहूँगी जिसका शीर्षक ही “शहीद” है। इस कहानी के लेखक हैं प्रसिद्ध साहित्यकार श्री संजीव जायसवाल “संजय”। उनकी यह कहानी दिल्ली प्रेस द्वारा पुरस्कृत हुई थी और उन्हीं की प्रसिद्ध पत्रिका सरिता में प्रकाशित भी हुई। बाद में दिल्ली प्रेस द्वारा ही इस कहानी का नाट्य मंचन भी करवाया गया।

यह कहानी हिन्दू-मुस्लिम युवक-युवती की प्रेम कहानी है जो विदेशी धरा पर मिले हैं। हिन्दुस्तानी एवं पाकिस्तानी विभिन्न देश और धर्मों के होने के कारण उनका विवाह करने के लिए माता-पिता राजी नहीं होते हैं तो वे कोर्ट मैरिज कर लेते हैं। लेकिन फिर परिस्थिति वश बिछड़ जाते हैं। माँ के पास बेटा रह जाता है और बड़ा होकर पाकिस्तानी फ़ौज में भरती होता है। पिता पहले से ही भारतीय फ़ौज में है। दोनों का आमना-सामना होता है। दोनों समझ जाते हैं कि वे पिता-पुत्र हैं। अंत में अपने देश की रक्षा के लिए पिता द्वारा अपने बेटे को गोली मार दी जाती हैै। बेटा अपने देश पाकिस्तान के लिए शहीद हो जाता हैै। लेकिन कहानी का अंत बहुत ही सुन्दर है कि भारतीय सैनिक पाकिस्तानी शहीद को एक सौ एक गोलियों की सलामी देते हैं क्योंकि वह हमारे लिए दुशमन है फिर भी अपने स्वयं के देश के लिए तो देशभक्त शहीद ही है।

तो यह है शहादत की महिमा। हम स्वयं भी सम्मान करें और अपने बच्चों को भी सिखायें कि देश के सैनिकों एवं शहीदों की शहादत का सम्मान करें क्योंकि हम महफूज़ हैं उनकी शहादत की बदौलत।
वन्दे मातरम
रोचिका अरुण शर्मा , चेन्नई
Phone – 9597172444
Mail Id- sgtarochika@gmail.com

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