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तुलसी साहित्य में प्रकृति सौंदर्य: पूनम सिंह

तुलसी साहित्य में प्रकृति सौंदर्य

पूनम सिंह

तुलसी का साहित्य ही नहीं वरन्, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य प्रकृति चित्रण से परिपूर्ण है। हमारे धार्मिक ग्रंथ, ऋषी- मुनियों की वाणी, कवियों की रचनाएं, संत - महात्माओं के अनमोल वचन सभी प्रकृति की महत्ता से भरी पड़ी हैं।हमारे जीवन में प्रकृति की महत्वपूर्ण भूमिका है।प्रकृति और मनुष्य का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध प्राचीनकाल से रहा है।प्रकृति और मानव का संबंध उतना ही पुराना है, जितना सृष्टि के उद्भव और विकास के इतिहास का। सर्वप्रथम मानव शिशु ने जब आंख खोली तब प्रकृति की गोद में ही और आंख बंद की तब भी प्रकृति की गोद में। मनुष्य सदियों से ही प्रकृति की गोद में फलता-फूलता रहा है। इसी प्रकार से संपूर्ण मानव असीम ज्ञान हासिल करता आ रहा है।

मनुष्य भी प्रकृति लोग का ही प्राणी है। मानव और प्रकृति के इस संबंध में अभिव्यक्त धर्म, दर्शन, साहित्य और कला में चिरकाल से होती रही है। यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो इस प्रतिबिंब में मानव की सहचरी प्रकृति है। मानव और प्रकृति एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति की अखंड अविरल महिमा का वर्णन डॉ.किरण कुमारी गुप्ता जी की पंक्तियों में देखा जा सकता है- "वास्तव में प्रकृति यदि मानव की माता नहीं तो धात्री अवश्य है।आरम्भ से प्रकृति अपनी ममतामयी- क्रोड़ में मानव को धारण करती है और उसका पोषण करती है। वायु-व्यंजन करता, निर्झरों का कल -कल शब्द संगीत सुनाता, नक्षत्र गण गुपचुप कहानियां कहते, कलियाँ चुटकी बजा- बजाकर उसे पास बुलाती। प्रकृति की गोद मे मानव सुख का अनुभव करता है और सहचर्यजन्य मोह का स्वाभाविक रूप से उसके हृदय में प्रादुर्भाव हो जाता है।इस भांति आलम्बन रूप से प्रकृति मानव को प्रभावित करती और उसे आकर्षित करती है।"१

प्रकृति ही मनुष्य की उत्प्रेरिका शक्ति है। प्रकृति ही मनुष्य को संस्कारवान बनाती है। प्रकृति के माध्यम से ही मानव समाज जितना ज्ञान और जितनी शिक्षाएं अर्जित करता आ रहा है उसकी कोई गणना नहीं है। छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने तो यहां तक की रचना की प्रेरणा प्रकृति से ही ग्रहण की। यही कारण है कि इन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि भी कहा जाता है। प्रकृति की शिक्षा के सम्बंध में विजयदान देथा ने लिखा है कि-"प्रकृति मनुष्य की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है।इस यूनिवर्सिटी से मनुष्य ने कितना सीखा है कितना सीखता चला जा रहा है और कितना सीखेगा इसका न तो कोई पार है और न इसकी कोई सीमांत रेखा ही।"२

सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, तारे, नभ, नक्षत्र, वन, जंगल, झरना, वायु, वर्षा, बादल, बिजली, धूप-छाँव, हरियाली, वनस्पतियां, समुद्र, झरनें, कल-कल करती नदियाँ, वनों में उछलते कूदते पशुओं के झुंड, धरती और आकाश में संदेशों को पहुंचाने वाले कलरव करते पक्षियों के समूह सभी प्रकृति के ही अंग हैं और इन सभी ने मनुष्य को जो भी शिक्षा दी है अथवा दे रहें हैं, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। जीवन संघर्ष की कटु विभीषिका से थक जाने ,मन के उदास होने पर मनुष्य वहीं लौट जाना चाहता है जहाँ प्रकृति का ऐश्वर्य बिखरा पड़ा है, जहां मनोरम दृश्यों की छटा देखते ही हृदय के बंधन खुल जाते हैं और असीम आनन्द की फुहारें शीतलता प्रदान करती हैं।

रामकाव्य के सर्वश्रेष्ठ कवि तुलसीदास हिंदी साहित्याकाश के दैदीप्यमान सूर्य हैं। जिसकी चमक निरन्तर बढ़ रही है।तुलसी ने प्रकृति -चित्रण के क्षेत्र में चेतन और अवचेतन दोनों ही प्रकार के उपादानों को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया है। प्रत्येक सफल कवि की कविता में प्रकृति चित्रण किसी न किसी रूप में अवश्य रहता है यही कारण है कि तुलसीदास के साहित्य में प्रकृति चित्रण विद्यमान है। तुलसीदास राम के अनन्य भक्त हैं। तुलसी का उद्देश्य प्रकृति चित्रण करना नहीं है बल्कि प्रकृति के माध्यम से अपने भावों एवं विचारों को उद्घाटित करना है।

तुलसीदास को जगत के नाना पदार्थ प्रिय एवं पूज्य हैं।तुलसी प्रकृति के नाना रूपों का चित्रण करते हैं। कवि के काव्य में आलंबन एवं उद्दीपन दोनों ही रूपों का चित्रण मिलता है। जहां तुलसी ने सीता हरण हो जाने पर मानस में राम के दु:खी होने पर प्रकृति दु:खी होती है। राम सीता के वियोग में दु:खी होकर लता, खग, मृग आदि से सीता का पता पूछते हैं जिसको कवि ने बड़े मार्मिक ढंग से चित्रित किया है- हे खग, हे मृग, हे मधुकर श्रेनी।

                          तुम देखी सीता मृग नैनी। ३

        श्रीरामजी के वियोगरूपी बुरे रोग से सताए हुए पशु, पक्षी, हाथी, घोड़े ऐसे दु:खी हो रहे हैं कि देखे नहीं जाते। नगर के स्त्री-पुरुष सभी अत्यंत राम के दु:ख से दु:खी है।मानो सभी अपनी सारी संपत्ति गवा बैठे हैं-

                      खग मृग हय गय जाहिं न जोए।

                        राम वियोग कुरोग वियोगे ।।

                      नगर नारि नर निपट दुखारी।

                     मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ।। ४

  तुलसीदास तीर्थराज प्रयाग की सौंदर्य का जिक्र करते हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती तीन नदियों का संगम तीर्थराज प्रयाग का अत्यंत सुशोभित सिंहासन है। अक्षय वट प्रयाग का क्षत्र है।जो मुनियों के मन को भी मोहित कर देता है। यमुना जी और गंगा जी की तरंगे उसके श्याम और श्वेत चंवर है, जिसको देखकर ही दु:ख दरिद्रता नष्ट हो जाती है। ऐसे सुहावने पवित्र तीर्थ राज का दर्शन कर श्रीराम ने भी सुख को प्राप्त किया--

                                      संगम सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अक्षयबट मुनि मनु मोहा ।।

                                   चँवर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होंहि दुख दारिद भंगा।।

                                   अस तीरथपति देखि सुहावा।सुख सागर रघुबर सुखु पावा ।। ५

इस प्रकार तुलसीदास ने प्रयाग के सौंदर्य को उद्घाटित किया है।

'मानस' में प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है। जिन तालाबों और नदियों में श्रीराम स्नान करते हैं, वह देवसरोवर और देवनदियां भी उनकी प्रशंसा करती हैं। जिस कल्पवृक्ष के नीचे बैठते हैं ।वह भी श्रीराम की बढ़ाई करते हैं।पृथ्वी भी उनके चरण कमल का धूल स्पर्श कर अपना सौभाग्य मानती है। रास्ते में बादल छाया करते हैं देवता गण फूलों की वर्षा करते हैं और सिहाते हैं।पर्वत,वन और पशु पक्षियों को देखते हुए राम रास्ते में चले जा रहे हैं।वह सौंदर्य अद्वितीय है-

                               छांह करहिं घन बिबुधगन बरसहिं सुमन सिहाहिं।

                                देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं ।।६

तुलसी के साहित्य में प्रकृति पर्यवेक्षण की परिगणना भी प्रचुर मात्रा में दिखाई देती है।पथिक वेश में सीता एवं लक्ष्मण के साथ वन पथ पर चलते हुए राम का वाल्मीकि आश्रम के निकट परिलक्षित होने वाला यह प्राकृतिक सौंदर्य अनुरंजन की भावना से युक्त है। सुंदर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्री रामचंद्र वाल्मीकि आश्रम में पधारते हैं।राम जी देखते हैं कि उनका निवास स्थान बहुत खूबसूरत है, जहां सुंदर पर्वत, वन और निर्मल जल है ।तालाबों में कमल और वनों में वृक्ष फल फूल रहे हैं तथा मकरंद रस में मस्त होकर भंवरे सुंदर गुंजार कर रहे हैं। बहुत से पशु-पक्षी कोलाहल कर रहे हैं और बैर से रहित होकर प्रमुदित मन से विचरण कर रहे हैं। इस पवित्र और सुंदर मनोहर आश्रम को देखकर कमलनयन श्री राम जी प्रसन्न होते हैं-

                         देखत बन सर सैल सुहाए । वाल्मीकि आश्रम प्रभु आये ।।

                        राम दीख मुनि वासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।

                        सरनि सरोज बिपट बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले।।

                  खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।

                             सूचि सुंदर आश्रम निरखि हरसे राजीव नयन।

                             सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगे आयउ लेन।। ७

स्पष्ट है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने यहां प्रकृति चित्रण के पार्श्वभूमि ने प्रतिकूल जीव जंतुओं को बैर विहीन होकर संचरण करते हुए निश्चय ही दिखाया है परंतु, यह प्रभाव प्रकृति की अपनी निजी सत्ता का नहीं बल्कि, उसके पीछे महर्षि वाल्मीकि जी की अपनी तपो साधना का भी विशाल परन्तु अप्रत्यक्ष योग है।

तुलसीदास ने चित्रकूट के प्रकृति सौंदर्य की छटा जो मानस में दर्शाई है वह अद्वितीय है। सुहावना पर्वत है और सुंदरवन। हाथी, सिंह, हिरण तथा पशु- पक्षियों का विहार स्थल है। वहां पवित्र नदी है जिसकी पुराणों में भी उल्लेख है। जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया जी ने अपने तपोबल से पृथ्वी पर लायी थीं।वह गंगा जी की अविरल धारा है जिसका नाम मंदाकिनी है--

                               सैलु सुहावन कानन चारु। कहि केहरि मृग बिहग बिहारु।।

                            नदी पुनीत पुरान बखानी ।अत्रिप्रिया निज तप बल आनी।।

                                      सुरसरि धार नाउ मंदाकिनि।। ८

आगे तुलसीदास जी चित्रकूट के ही अनुपम प्रकृति सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि-जब से श्री रामजी चित्रकूट में आकर रहे तब से वन में नाना प्रकार के वृक्ष फल-फूलों से लद गए। उन पर लिपटी हुई सुंदर बेलों में आभा आ गई। नीलकंठ, कोयल ,तोते, पपीहे, चकवे तथा चकोर आदि पक्षी कानों को मधुर लगने वाली और मन को मोहने वाली तरह-तरह की बोलियां बोलने लगे -

                                       फूलहिं फलहिं बिपट बिधि नाना।

                                          मन्जु बलित बार बेलि बिताना।।

                                 नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।

                           भांति भांति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ।। ९

चित्रकूट के सुंदर प्रकृति चित्रण की छवि तुलसीदास जी अंकित करते हैं-हाथी, बंदर, सुअर तथा हिरण यह सभी बैर छोड़कर साथ-साथ रहने लगते हैं।शिकार के लिए घूमते हुए पशुओं के समूह राम को देखकर विशेष प्रफुल्लित होते हैं।जगत में जितने देवताओं के वन है सभी से राम के वन को देखकर सिहाते हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि पुण्यमयी नदियां धन्य हैं-

                       करि केहरि कपि कोल कुरंगा । बिगत बैर बिचरहिं सब संगा।।

                         फिरत अहेर राम छवि देखी। होंहि मुदित मृग बृंद बिसेसी।।

                     बिबुध बिपिन जहं लगि जग मोही। देखि राम बनु सकल सिहाहीं ।।

                          सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या । मेकलसुता गोदावरी धन्या ।।१०

हिमालय आदि कितने पर्वत हैं। सभी चित्रकूट का गुणगान करते हैं। चित्रकूट के पशु-पक्षी, बेल, वृक्ष, तृण, अंकुरादि सभी धन्य हैं।

तुलसीदास ने प्रकृति का चित्रण आलंबन में कम उद्दीपन रूप में अधिक किया है। उद्दीपन रूप सांकेतिक होते हुए भी पूर्ण समर्थ है। जो वर्षा ऋतु संयोगावस्था में प्रिया के साथ रहने से उल्लासित होती थी अब वही वर्षा ऋतु वियोगावस्था में दुखी करती है ।प्रिया से वियुक्त राम को आकाश में गरजते हुए बादल क्षुब्ध कर देते हैं। इस बेला में प्रणेश्वरी सीता की क्या दशा होगी इसे सोचते ही उनका मन कांप उठता है- घन घमंड नभ गरजत घोरा ।प्रियाहीन डरपत मन मोरा ।। १ इन पंक्तियों में हृदय की रागात्मक दशा का कितना मार्मिक चित्रण है।

 मानस के किष्किंधाकांड में वर्षा एवं शरद ऋतु के चित्रण की झलक में दिखाई देती है।शुभ्रस्फटिक शिला पर बैठे हुए राम ने जब वर्षाकालीन मेघों पर अपना पहला दृष्टि प्रक्षेप किया,तब उनके हृदय से प्राकृतिक आह्लाद की स्फूर्ति अनुप्राणित होती है। वर्षा ऋतु बीत गई निर्मल शरद ऋतु आ गई, परंतु सीता की कोई खबर नहीं मिली--

बरषा गत निर्मल ऋतु आयी। सुधि न तात सीता कै पाई ।। १२

प्रकृति चित्रण विशेष रूप से हमें रामचरितमानस के किष्किंधाकांड एवं अरण्यकांड में देखनेको मिलता है।इसके अतिरिक्त प्रकृति उपदेशिका का रूप लेकर हमारे सामने उपस्थित होती है। प्रकृति के हरितांचल में कल्लोल करते हुए गोदावरी एवं पंपा सरोवर के तट पर पहुंच कर ही कवि उनके स्वतंत्र सौंदर्य का दर्शन करता है।तुलसी के शिव पंपासरोवर को एक उपदेशक के रूप में देखते हैं-

                               बांधे घाट मनोहर चारी। संत हृदय जस निर्मल बारी ।।

                    जँह जँह पियन्हि विविध मृग नीरा । जनु उदार गृह जाचक भीरा ।।१३

संत कवि की दार्शनिक दृष्टि है जो सरोवर के पवित्र जल को संत के पवित्र हृदय के समान बतलाती है।

 पम्पासरोवर के वर्णन में तुलसी को हम कमल पत्रों की सघनता से सरोवर के स्वच्छ जल को ढका हुआ और वर्षा प्रसंग में मार्गों को हरित तृण से आच्छादित बताकर अपने प्रेम का परिचय देते पाते हैं और साथ ही जब हम उन्हें गुलाबों की चटकाहट, पुष्पित पलाशादिकों के उल्लासमय करुण राग चपला की चमक,चंद्रिका चन्चितयामिनी की शीतलता तथा चकोर चक्का -चकवाओं की प्रेमचर्या के मध्य जीवन विहीन आक और जवास तथा जलाशयों में अनन्यमनस्कता के साथ चुपचाप पड़े रहने वाले काई का उल्लेख करते हुए देखते हैं, तो हमें प्रकृति के सूक्ष्म से सूक्ष्म उपादानों के प्रति उनके अनुराग की सूक्ष्मता एवं सघनता का भी अनुभव किए बिना नहीं रह पाता। तुलसी ने प्रकृति का नवीन चित्रण किया है,फिर भी उनकी केंद्रीय भावना उपदेश परक रही है।तब पर भी इस चित्रण में तुलसी का प्रकृति के प्रति अनुराग व स्नेह प्रकट होता है।उन्होंने जहां वर्षा ऋतु के आगमन में नवीन पल्लव और हरे-भरे भूमि का चित्रण किया है वहीं आक और जवास के सूखे वृक्षों का वर्णन करना नहीं भूलते हैं। तुलसीदास के उपदेश बहुल एवं परंपरा युक्त प्रकृति चित्रण को स्वीकार करते हुए हम इस तथ्य से पराङ्गमुख नहीं रह सकते कि समग्र रूप में हिंदी के समूचे भक्ति युग का प्रथम उपदेश बहुल होकर हमारे सामने उपस्थित होता है।

श्यामसुंदर दास ने प्रकृति के प्रति तुलसीदास के विस्तृत सहज एवं निश्छल अनुराग को लक्ष्य करते हुए लिखा है कि- "प्रकृति प्रेम के लिए उनके ह्रदय में जो कोमल स्थान या उसी का प्रसाद है कि हिंदी में स्वीकृत विवरण मात्र दे देने की परंपरा से ऊपर उठकर कहीं कहीं उनकी प्रतिभा ने प्रकृति के पूर्ण चित्रों का निर्माण किया है। प्राकृतिक दृश्यों के यथातथ्य चित्रण की जो क्षमता यत्र- तत्र गोसाईं जी में दिखाई देती है वह हिंदी के और किसी कवि में देखने को नहीं मिलती।"१४

तुलसी ने अपने भाव को प्रकृति के माध्यम से प्रकट किया है।मानव के विभिन्न भाव स्तरों का चित्रण वाणी तथा विचार के द्वारा प्राणियों की भावानुभूति की अभिव्यक्ति मूक किंतु जीवंत अभिनय के द्वारा प्रकृति भावना का चित्रण मानवीकरण की अपूर्व दृश्य छटा से वर्णित किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने मानवलोक जीवलोक एवं प्रकृतिलोक के द्वारा अपने भावों को व्यक्त किया है।व्यापक गहन और वैविध्यपूर्ण भाव दशाओं के चित्रण से तुलसी की महाकवित्व शक्ति परिलक्षित होती है।

  गोस्वामी जी अपनी शील संरक्षिका एवं धार्मिक प्रकृति का, जिसे उन्होंने अपने जीवन एवं समाज दर्शन का अभिन्न अंग बना लिया, परिचय देना प्राकृतिक चित्रण के प्रसंग में भी नहीं भूले हैं। एक शब्द में उनकी प्रकृति समाज और जीवन से निरपेक्ष नहीं थी।उन्होंने सापेक्ष प्रकृति के भव्य स्वरूप का ही हमें निदर्शन कराया है और इस संबंध में तो हमारा यह कथन भी आयुक्त ना होगा कि प्रकृति की प्रयोगशाला में बैठकर सबसे पहली बार हिंदी कवियों की श्रेणी में गोस्वामी जी ने ही मानवीय मूल्यों का इतनी सूक्ष्मता के साथ विश्लेषण किया है।मनुष्य की महानता पर उनका अखंड विश्वास था। वे स्वयं भी एक महान मानवतावादी ,समन्वय वादी लोकमंगल के कवि थे। यही कारण है कि उन्होंने अपनी प्रकृति को मनुष्य के मंगल विधान की क्रिया में ही नियोजित होते दिखाया है।यह उनकी हृदयहीनता का ही नहीं प्रयुत अप्रमेय एवं संवेदनशीलता का ही ज्वलंत प्रमाण है। मनुष्य के सुख- दुःख,राग -विराग,आकर्षक एवं विकर्षण के लिए, उसके संपूर्ण सद एवं असद व्यापारों के लिए तुलसी जी की प्रकृति एक स्वछ एवं निर्मल दर्पण का काम करती दिखाई पड़ती है। उसकी प्रतिक्रिया से प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकती। हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रकृति चित्रण में देखने को मिलता है।

तुलसीदास ने रामचरितमानस में प्रकृति का अद्वितीय सौंदर्य रूप प्रस्तुत किया है। प्राचीन काल से लेकर अब तक के लेखकों के धुरी में प्रकृति का सौंदर्य विद्यमान है। प्राचीन काल में शिक्षण केंद्र प्रकृति की गोद में विराजमान होकर हमारी संस्कृति एवं सभ्यता का प्रचार प्रसार करती थी। मानसिक,आत्मिक शांति यहीं प्रकृति से मिलती है। मानव के संस्कार का निर्माण इसी प्रकृति के अंतर्गत होता था। पेड़ पौधों एवं जंगली जानवरों के प्रति प्यार यहां स्वत: ही जागृत हो जाता था। ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों के कार्यों से प्रकृति के प्रति प्रेम का संदेश गूंजता था। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस में अनेक स्थलों पर वनों का सजीव चित्रण किया है। बंदरों से राम की मित्रता तो जगत प्रसिद्ध है।वनराज सुग्रीव,निषादराज केवट, गिद्धराज जटायु जगत में उदाहरण स्वरूप प्रसिद्ध हैं। बंदर-भालू ने तो राम की सहायता की लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए। वन में रहते हुए राम को जीवन निर्वहन के प्राकृतिक वनस्पतियों ने फल- फूल आदि दिए। रामचरितमानस के अनुसार उस समय कोई प्राकृतिक समस्या नहीं थी। बहुत बड़े भाग में जंगल पहाड़ वनस्पति जीव जंतुओं के क्षेत्र थी।वन क्षेत्रों में ही ऋषि मुनियों का आश्रम था जो उस समय शिक्षा, शिक्षण का बहुत बड़ा केंद्र था। सभी मिलजुल कर सुख पूर्वक रहते थे।

 

सन्दर्भ सूची --

1 हिंदी काव्य में प्रकृति चित्रण- डॉ. किरण कुमारी गुप्ता प्रु. 11

2 साहित्य और समाज -- विजयदान देथा पृ.39

3 रामचरितमानस -तुलसीदास अयोध्याकाण्ड पृ.221

4 रामचरित मानस -तुलसीदास - डॉ. विजयपाल सिंह अयोध्याकाण्ड पृ 148

5 वही अयोध्याकाण्ड पृ.106

6 वही अयोध्याकाण्ड पृ. 112

7 वही अयोध्याकाण्ड पृ. 121

8 वही अयोध्याकाण्ड पृ. 127

9 वही अयोध्याकाण्ड पृ. 131,132

10 वही अयोध्याकाण्ड पृ.132

11 रामचरितमानस बालकाण्ड पृ .107

12 रामचरितमानस किष्किंधाकांड पृ.643

13  वही अरण्यकाण्ड पृ.386

14 कल्याण पत्रिका गोरखपुर (गोस्वामी का काव्य सौंदर्य) अंक 2 सितम्बर 1938 पृ.222


पूनम सिंह

शोधछात्रा (हिंदी)
सरदार पटेल विश्वविद्यालय वल्लभ विद्यानगर गुजरात
पता- जमुआ, देवघाट, कोरांव, प्रयागराज, उ. प्र. 212306

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