डॉ. शकुंतला कालरा की मूल्यपरक बाल कहानी : आप यही मुझे दे दें

Dr. Mulla Adam Ali
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"Aap Yahi Mujhe De Den" is a touching children's story by Dr. Shakuntala Kalra. Through the life of Dinu, an orphan boy, the story highlights the values of compassion, empathy, kindness, and love for animals. Its simple language and inspiring message make it a meaningful contribution to Hindi children's literature.

Dr. Shakuntala Kalra's Inspiring Children's Story "Aap Yahi Mujhe De Den"

बाल मन को छू लेने वाली कहानी आप यही मुझे दे दें

डॉ. शकुन्तला कालरा की यह बाल कहानी मानवीय संवेदना, करुणा और पशु-प्रेम का अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। कहानी का बाल पात्र दीनू अपने जीवन के संघर्षों के बीच यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम बाहरी रूप या शारीरिक क्षमता नहीं, बल्कि अपनत्व और सहानुभूति में निहित होता है। सरल भाषा, प्रभावशाली कथानक और प्रेरणादायक संदेश के कारण यह कहानी बाल पाठकों के साथ-साथ वयस्कों के लिए भी समान रूप से प्रेरक बन जाती है।

बाल मन को छू लेने वाली कहानी

आप यही मुझे दे दें

दीनू बारह वर्श का एक अनाथ बालक है जो माता-पिता की मृत्यु के बाद अकेला ही अपनी झोपड़ी में रहता है। उसकी पढ़ाई छूट गई। छठी कक्षा में ही उसने स्कूल छोड़ दिया। कचरा बीनकर फिर उसे बेचकर अपना गुज़ारा करता है। थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर उसने 500 रुपये इकट्ठे किए हैं। उसे कुत्ता रखने का बहुत शौक है। एक दिन वह कुत्तों की दुकान पर जाता है। जहां खुली खाली जगह में कई कुत्ते बंधे हुए हैं। उनकी रस्सी इतनी बड़ी है कि वे अपने खूंटे से बंधे होने पर भी घूम सकते हैं। बहुत सुंदर, बलिश्ठ, बड़े-बड़े और महंगे-महंगे कुत्ते हैं। हर कुत्ते के खूंटे के उपर उसके साथ एक स्लिप टंगी है 20,000, 10,000, 5,000। वह बड़ी देर तक कुत्तों को देखता रहता और फिर अपने पोटली में रखे 500 रुपये देखता । वह कई दिनों तक लगातार रोज़ दुकान पर आता पर बिना खरीदे लौट जाता। पांच हजार से कम कोई कुत्ता ही नहीं था। इतने पैसे कबाड़ के धंधे में इकट्ठा करने में तो उसे पूरा जन्म लग जाएगा। यह सोचकर वह दुःखी मन से लौट आता। एक दिन वह बहुत देर तक खड़ा रहा। कुत्तों को देखकर ही वह खुश हो जाता। उन्हें दौड़ता देखता देखता, खेलता देखता। एक दूसरे के पीछे जाते हर कुत्ते को देर-देर तक निहारता रहता। किसी-किसी की काली-भूरी आंखों में खो जाता तो किसी की बालों से भी घनी पूंछ को देखता रहता। तो किसी की छोटी-छोटी पूंछ को। कोई चितकबरा उसे भा जाता तो कोई मोती की तरह सफेद। किसी-किसी का काला रंग तो इतना चमकीला होता कि वही सबसे सुंदर दिखता। वहां अलसेशियन, लैकरेडार, जर्मन शैफर्ड, पॉमेरिन कई किस्म के कुत्ते थे। दुकान के बाहर टंगे बोर्ड पर सबके नाम के साथ उनकी कीमत भी लिखी रहती। कोई भी खरीददार आता। दुकानदार उसकी नस्ल और कीमत बताता। बेचारा दीनू अपनी औकात सोचकर चुप रह जाता। उसने तो कभी यह जाना ही न था कि इनकी तरह-तरह की नस्लें होती हैं। न इनके अंग्रेजी नामों से परिचित था और न ही यह जानता था कि ये इतने महंगे होते हैं। अमीर लोग ले जाकर बड़े-बड़े या छोटे खूबसूरत कुत्तों को अपने घरों में शान-शौकत से रखते हैं। हां इतना वह जानता था कि इनके लिए अलग कमरा होता है। वे लोग इन्हें पलंग पर सुलाते हैं और गाड़ियों में घुमाते हैं। अचानक उसकी निगाह एक ऐसे कुत्ते पर पड़ी जो अपनी जगह चुपचाप बैठा था। वह दौड़ नहीं रहा था। हिलडुल भी नहीं रहा था। दीनू बड़ी देर तक उसके पास खड़ा रहा पर वह दौड़ने के लिए तो क्या खड़ा होने के लिए भी नहीं उठा। ‘अंकल मैंने एक कुत्ता देखा। वह दौड नहीं़ रहा। बाकी सब दौड़ रहे हैं। अंकल वह कुत्ता हिलता-डुलता नहीं। मैं कई दिनों से आता हूं। इसे ऐसे ही उदास और गुमसुम बैठे हुए देखता हूं। यह किसी के काम नहीं आएगा। मेरे पास कुल 500 रुपये हैं। इसे आप मुझे 500 रुपये में दे दीजिए।’ ‘बेटा मेरी दुकान में कोई कुत्ता पांच सौ का नहीं है। इनकी कीमत हज़ारों में है। थोड़े पैसे और इकट्ठे कर बेटा। फिर ले जाना’। दुकानदार ने उसे उपर से नीचे तक देखते हुए कहा।

‘पर इतने पैसे तो मेरे पास कभी भी इकट्ठे नहीं होंगे अंकल।’ उसने बड़ी मासूमियत से कहा और हसरत भरी निगाहों से उसी कुत्ते की ओर देखने लगा। ‘अच्छा बेटा यह तो बताओ! इसे तुम क्यों लेना चाहते हो? यह तो दौड़ नहीं सकता। और बेटा इसकी तीन टांगे हैं। यह तो ठीक से चल भी नहीं सकता। ज़्यादा समय यह ऐसे ही बैठा रहता है।’ ‘अंकल आप मुझे इसे 500 रुपये में दे दीजिए। यह किसी और के काम नहीं आएगा। पर मुझे इसकी जरूरत है। जब यह तीन टांगों से सरकेगा। धीरे-धीरे सरकता मेरे पास आएगा। मेरे पैर सूंघेगा-चाटेगा। इसका प्यार मुझे खुशी देगा। फिर मैं इसके बदन पर हाथ फिराउंगा। पुचकारूंगा तो यह पूंछ हिला-हिलाकर अपनी खुशी ज़ाहिर करेगा। इस तरह यह मुझे और मैं इसको देख-देखकर खुश होंगे।’ ‘अंकल मैं सच कह रहा हूं। यह मुझे और मैं इसको देख-देखकर बहुत खुश होंगे। हम दोनों को एक दोस्त की ज़रूरत है अंकल। हम दोनों अकेले हैं। जब ये अपनी तीन टांगों से मेरी ओर चलकर आएगा तो मैं इसी में खुश हो जाऊँगा।’ ‘तुम जानते हो इसकी चौथी टांग काफी कमज़ोर हो चुकी है।’ ‘मैं इसकी रोज़ मालिश करूंगा। ईश्वर ने चाहा तो शायद एक दिन कमज़ोर टांग में ताकत आ जाए और वह चलने लगे।’ ‘पर तुम्हारी क्या मज़बूरी है? तुम इसे क्यों खरीदना चाहते हो? मैं तो सोचता हूं इसे कहीं सड़क पर छोड़ आऊँ क्यांकि इससे मेरी दुकान की शोभा घटती है कि यहां पर इस तरह के कुत्ते मिलते हैं। इसे कौन खरीदेगा?’ ‘इसे मैं खरीदूंगा अंकल। जिसे कोई लेने वाला नहीं होता उसे भी कोई अपनाने वाला होता है।’ यह कहते हुए बच्चे ने अपनी पेंट उपर की। दुकानदार की आंखें खुली की खुली रह गई। उसे हैरान देखकर दीनू ने कहा - ‘मैं भी एक टांग वाला हूं। कचरा बीनते समय एक जंग लगे लोहे से मेरा पैर कट गया था। तब मां-बापू थे। समय पर ईलाज न होने के कारण मेरा दायां पैर घुटनों के नीचे तक काट दिया गया। अंकल अब तो आप समझ गए होंगे कि इसको मैं क्यों लेना चाहता हूं। इसके दर्द को मैं समझता हूं। हम दोनों का दर्द एक है। मैं इसको पार्क में घुमाने ले जाऊैँगा। हम दोनों धीरे-धीरे चलेंगे। हम पार्क में बाकी लोगों की तरह भागकर खुश नहीं होंगे वरन् एक-दूसरे के साथ चलकर खुश होंगे।’ दुकानदार ने मन ही मन सोचा कि लोग ठीक ही कहते हैं कि सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है। वस्तु या व्यक्ति में नहीं। आज यह सूक्ति पूरी तरह से चरितार्थ होती देखी। ‘ ‘अंकल मां कहती थी किसी का दर्द खरीद लोगे तो तुम्हारा दर्द कम हो जाएगा। हम दोनों एक-दूसरे का दर्द समझेंगे। मैं खुश हूंगा। मां यह भी कहती थी जिसका कोई सहारा नहीं उसका सहारा बनना। तब जो तसल्ली मिलेगी उसका कोई मुकाबला नहीं।’ दीनू बोलता जा रहा था और दुकानदार उसे प्यार से देखता जा रहा था।

‘अंकल मैं एक अनाथ बालक हूं। उम्र में मैं बहुत छोटा हूं। ज़्यादा बातें नहीं जानता। पर जो मां-बाप ने समझाया वे बातें समझ आ गई हैं। मेरे पिता कहते थे जब हम किसी को थोड़ी मुस्कुराहट देकर खुश होते हैं तो उपर वाला इतना बड़ा आशीर्वाद देता है। अंकल आप मुझे इस कुत्ते को दे दोगे तो हम दोनां के ही जीवन में खुशियां आ जाएंगी।’ दीनू ने बड़ी सरलता से सब कह दिया। उसकी बातों में सच्चाई थी। मूक प्राणियों के प्रति प्यार और सहानुभूति थी। दुकानदार को उसकी बात जंच गई। दीनू की बातें सुनकर दुकानदार दीनू का चेहरा देखता रह गया। उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्हें लगा उनके सामने कोई बच्चा नहीं, किसी दूसरे लोक का फरिश्ता खड़ा है। लोग अपनी खुशी के लिए कुत्तों को पालते हैं। फैशन के लिए कुत्ते पालते हैं। अपने स्टेटस के लिए पालते हैं। एक से बढ़कर एक बढ़िया नस्ल का कुत्ता खरीदते हैं। चाहे उसके लिए उन्हें कितनी भी कीमत क्यों न देनी पड़े। कीमत देकर उसे जंजीरों में बांध लेते हैं। उसकी आज़ादी छीन लेते हैं। और एक यह बच्चा सबसे कमज़ोर बीमार कुत्ते को इसलिए खरीदना चाहता है कि वह उसको थोड़ी खुशी दे सके। ‘ले जा बेटा तू इसे ले जा। खुशी-खुशी ले जा बेटा।’ ‘लो अंकल 500 रुपये।’ दीनू ने पैसे देते हुए कहा। ‘अरे बेटा, पैसे भी तू रख और इसे भी ले जा। तूने जो इस छोटी उम्र में मुझे इतनी बड़ी समझ दी है, वही इसका मूल्य है।’ ‘नहीं अंकल मैं इसे खरीदकर लूंगा अपनी मेहनत की कमाई से। हां मेरी औकात इतनी है। मेरे पास बस इतने ही पैसे हैं। वैसे यह बहुत कीमती है। मेरे लिए तो अनमोल है।’

‘जाओ शीबू’। दुकानदार ने लड़के से कहा - उस कुत्ते को खूंटे से खोलकर ले आओ।’ लड़का गया और उसे ले आया। दीनू ने देखा वह धीरे-धीरे सरककर आया है। दुकानदार ने उसके गले में एक अच्छा से पट्टा भी डाल दिया और एक अच्छी सी रस्सी भी बांध दी। इसका नाम रखा है शीबू। अब तुम इसे जो चाहो नया नाम दे सकते हो। दुकानदार ने दीनू से कहा। ‘अभी तो शीबू नाम ही ठीक है अंकल! अपने घर जाकर इसका नाम भी रख दूंगा। ’ ‘ क्यों शीबू हमारे साथ चलोगो? हमारे पास कोई बड़ा घर नहीं है। एक ईंट गारे की माता-पिता की दी हुई झोपड़ी है। तुम्हें उसमें ही मेरे साथ रहना होगा। क्यों दोस्त चलोगे ना हमारे साथ ?’’ कहते हुए दीनू ने उसकी पीठ पर जैसे ही हाथ फेरा उसने ज़ोर-ज़ोर से पूंछ हिला-हिलाकर मानो अपनी सहर्श स्वीकृति दे दी। अपने छोटे नए मालिक को पाकर टॉमी कितना खुश था। हां टॉमी ही। अब दीनू का दिया हुआ नया नाम था। वह बहुत खुश था। जिसे कोई नहीं पूछता था उसका भी कोई खरीददार आएगा। उसके गले में उसके मालिक का पट्टा डालेगा। यह सोच-सोचकर उसकी पूंछ अपने आप ही तेज़ी से हिलने लगी। जब वह दीनू के साथ बाहर जाता तो अपनी तीन टांगों से भी तेज़-तेज़ भागने की कोशिश कर रहा था अपने नए घर की ओर। उसे भी आज किसी ने कीमत देकर खरीद लिया था। जो केवल उसका घर होगा। अब दुकान पर उसकी नुमाइश नहीं लगेगी। लोग उसे देखकर मुंह दूसरी तरफ नहीं फेर लेंगे। यहां आकर उसमें नई फुर्ती आ गई थी। दीनू रोज़ उसकी टांग की मालिश करता। वह चुपचाप अपनी कमज़ोर टांग ऊपर करके लेट जाता था। धीरे-धीरे शरीर के साथ-साथ उसका मन फुर्तीला हो गया था। अब अपनी झुग्गी के बाहर थोड़ी सी खुली जगह में चलता रहता था। अब उसे अंदर बैठना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। सारा दिन अपनी झुग्गी के आसपास बैठा हर आने-जाने वाले को देखता रहता। बच्चे आते-जाते उसका नाम लेकर उसे पुचकारते और वह पूंछ हिलाकर सबको उनके प्यार का जवाब देता। दीनू बहुत खुश था। उसे साथ खेलने वाला साथी ही नहीं सुख-दुःख बांटने वाला साथी मिल गया था। उसके मन में खुशियों के कई मोर नाचने लगे।

- शकुन्तला कालरा

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निष्कर्ष; यह बाल कहानी करुणा, सहानुभूति, आत्मसम्मान और पशु-प्रेम जैसे मानवीय मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। दीनू और टॉमी के माध्यम से लेखिका यह संदेश देती हैं कि सच्ची सुंदरता और अपनापन बाहरी रूप में नहीं, बल्कि संवेदनशील हृदय में बसते हैं। यही प्रेरक संदेश इस कहानी को एक उत्कृष्ट मूल्यपरक बाल कहानी बनाता है।

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