“Rana Ke Vachan” by Dr. Shakuntala Kalra is an inspiring historical story that highlights Rana Sanga’s bravery, honour, and commitment to his principles. The story gives children a valuable lesson in courage, loyalty, and standing firm in difficult times.
Rana Ke Vachan (Rana's Promise) | A Motivational Historical Story
डॉ. शकुंतला कालरा की कहानी ‘राणा के वचन’ वीरता, स्वाभिमान, वचनबद्धता और राजपूत धर्म की गौरवपूर्ण परंपरा को सामने लाती है। राणा सांगा के चरित्र के माध्यम से कहानी बताती है कि सच्चा वीर संकट में भी अपने सिद्धांतों और मानवीय मूल्यों से समझौता नहीं करता। बच्चों के लिए लिखी गई यह कहानी इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना से परिचित कराने के साथ-साथ विश्वास, देशभक्ति और चरित्र की दृढ़ता का संदेश भी देती है।
प्रेरक ऐतिहासिक हिंदी बाल कहानी
राणा के वचन
दिल्ली में इब्राहिम लोदी का शासन था, जिस पर बाबर की नज़र थी। उसने एक तरकीब सोची। उसने मेवाड़ के राजा संग्रामसिंह (राणा सांगा) को पत्र लिखा, "मैं चाहता हूँ, हम दोनों मिलकर लोदी को दिल्ली से खदेड़ दें। मगर यह काम आपकी मदद के बिना नहीं हो सकता। लोदी ने यहाँ की जनता को बहुत सताया है।"
बाबर का पत्र पढ़कर राणा सांगा सोच में पड़ गए। अपने साथियों से सलाह ली। आखिर उन्होंने यह तय किया कि बाबर की मदद करेंगे। फिर योजना के अनुसार उत्तर से बाबर और दक्षिण से राणा ने दिल्ली को घेर लिया। उनकी मिली-जुली सेना और इब्राहिम लोदी में जमकर लड़ाई हुई। राणा सांगा दिलेरी के साथ लड़े। पर उनका एक हाथ कट गया। गोले की चोट से एक पैर भी टूट गया। लेकिन इब्राहिम लोदी की हार हुई। दिल्ली पर बाबर ने अधिकार कर लिया।
अब बाबर की नज़र मेवाड़ पर थी। उसने आगरा के पास फतेहपुर सीकरी में छावनी डाल ली। राणा सांगा को सारी खबर मिल गई। उन्होंने बाबर को मजा चखाने की सोची। वह सिपाहियों के साथ वहीं आ डटे । फतेहपुर सीकरी के नज़दीक कनुआ (खानवा) में दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। राणा ने बाबर की सेना के डेढ़ सौ सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया।
इस समाचार से बाबर बहुत दुखी हुआ। अब उसके सिपाही भी डर गए। वे छावनी के पास खोदी खाई में रहने लगे।
इस बीच बाबर ने और फौज बुला ली। राणा सांगा ने उसे भी हरा दिया। उसके सैनिकों को मार डाला और बहुत से बन्दी बना लिए।
यही उचित समय था, जब राणा सांगा बाबर पर हमला कर देते तो उसकी सारी सेना समाप्त हो जाती, पर उन्होंने संकट में पड़े शत्रु पर धावा बोलना उचित नहीं समझा।
इस बीच बाबर को सेना तैयार करने का पूरा समय मिल गया। एक दिन वह विशाल सेना के साथ राणा सांगा की छावनी में घुस गया।
दोनों में घमासान युद्ध हुआ। बाबर की सेना को आगे बढ़ने नहीं दिया। राणा सांगा ने बाबर को एक तंग मार्ग में रोक लिया। वहाँ से अपनी सेना के साथ उसका सम्पर्क टूट गया। राणा चाहते तो बाबर का वध कर सकते थे, पर यह उनके क्षत्रिय-धर्म के विरुद्ध था।
राणा की सेना तथा सेनापति को यह अच्छा नहीं लगा। सेनापति ने कहा 'राणाजी, यही उचित समय है, आप बाबर का वध कर दें। शत्रु को यूं ही छोड़ देना राजनीति के विरुद्ध है।"
"नहीं। संकट में घिरे शत्रु पर वार करना ठीक नहीं है।" राणा ने तर्क दिया।
कहा। "दूसरे की सीमा में घुसकर उसे हथिया लेना भी तो उचित नहीं है।" सेनापति ने राणा सांगा चुप थे। सेनापति ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, "राजन, इस समय आपका सबसे बड़ा कर्त्तव्य है, शत्रु से अपने राज्य को बचाना।"
"संकट में घिरे शत्रु पर वार करना हमारी राजपूत-परम्परा के विरुद्ध है।" राणा सांगा ने कहा।
राणा धर्म-संकट में फँस गए। फैसला लेने में उन्हें देरी हो गई। यह देरी राणा को बहुत महँगी पड़ी। मौके का लाभ उठाते हुए बाबर ने राणा के एक सेनापति शिलादित्य को अपनी तरफ मिला लिया।
राणा सांगा अपने छोटे भाई विक्रम और अपनी विशाल सेना की शूरवीरता के भरोसे बैठे थे। उन्हे शिलादित्य की वफादारी पर पूरा भरोसा था।
समय को देखते हुए बाबर ने संधि के लिए अपना एक दूत राणा सांगा के पास भेजा।
राणा सांगा संधि की शर्तों पर राजी हो गए, पर शिलादित्य की साजिश के कारण यह संधि नहीं हो सकी। अतः दोनों में युद्ध छिड़ गया।
इसी बीच शिलादित्य अपने दल-बल सहित बाबर से जा मिला। यह देख राणासांगा ने कहा "विश्वासघाती, दूर हट जाओ मेरी नज़रों से। तुम राजपूत कहलाने के अधिकारी ही नहीं हो।"
शिलादित्य चुपचाप सुनता रहा। राणा सांगा ने कहा "शिलादित्य, तुम अभागे हो। देश के लिए हँसते-हँसते बलिदान होने का मौका तुमने खो दिया है। शत्रु से मिलकर तुमने देश को गुलामी की ओर बढ़ा दिया है। देश के इतिहास में तुम्हारा नाम एक विश्वासघातक के रूप में काले अक्षरों में लिखा जाएगा, पर मैं राजपूत का धर्म निभाऊँगा" कहते हुए वह अपनी सेना के साथ शत्रुओं पर टूट पड़े। वे वीरता से लड़े, पर हार गए। सेना तितर-बितर हो गई। राणा को इस हार से काफी निराशा हुई। वह फिर राजधानी लौटकर नहीं गए। हार के एक वर्ष के भीतर ही राणा सांगा ने प्राण त्याग दिए। किन्तु उनकी वीरता की कहानी युग-युग तक पढ़ी और सुनी जाती रहेगी।
- डॉ. शकुंतला कालरा
निष्कर्ष: ‘राणा के वचन’ राणा सांगा की वीरता, वचनबद्धता और राजपूत धर्म के प्रति उनकी निष्ठा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी बच्चों को सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों और सिद्धांतों पर अडिग रहना ही सच्ची वीरता है।
ये भी पढ़ें; घमंडी पहाड़ – घमंड का परिणाम बताने वाली शिक्षाप्रद हिंदी बाल कहानी


