प्रेमचंद के 'गोदान' उपन्यास में दलित विमर्श

Dr. Mulla Adam Ali
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Dalit discourse in Premchand's novel 'Godaan'

दलित विमर्श के परिप्रेक्ष्य में गोदान

गोदान और दलित विमर्श : प्रेमचंद दलित विमर्श के परिप्रेक्ष्य में गोदान के बारे में इस आर्टिकल में बताया गया है, उपेक्षित एवं शोषित किसान का जीता जागता उदाहरण है गोदान उपन्यास। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने होरी के माध्यम से संपूर्ण भारत के किसान और दलित जीवन को उजागर किया है दलित विमर्श के परिप्रेक्ष्य में गोदान महत्वपूर्ण उपन्यास है, चलिए पढ़ते हैं गोदान और प्रेमचंद के बारे में।

मुंशी प्रेमचन्द के 'गोदान' उपन्यास में दलित विमर्श

प्रेमचन्द हिन्दी के विश्व विख्यात प्रगतिशील साहित्यकार रहे हैं। उनके समय के कथा- साहित्य को प्रेमचन्द युग नाम से जाना जाता है। उन्हें उपन्यास सम्राट की उपाधि भी मिली। अभी हाल ही में उनकी 144वीं जयन्ती बड़ी धूमधाम से मनायी गई। प्रेमचन्द हिन्दी के ऐसे साहित्यकार हैं जिनपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। अब तक प्रेमचन्द पर इतना लिखा जाने के बावजूद भी उनके साहित्य का कोई-न-कोई पक्ष पुनर्मूल्यांकन की अपेक्षा रखता है। प्रेमचन्द ने न केवल अपने युग के हिन्दी कथा साहित्य का प्रतिनिधित्व किया अपितु. परवर्ती हिन्दी साहित्य को दिशा-निर्देशित एवं प्रभावित भी किया। मूलतः आम आदमी को केन्द्र में रखकर उन्होंने अपने साहित्य की रचना की। भारतीय समाज के किसान, मजदूर, दलित आदि वर्ग के यथार्थ जीवन तथा उनके शोषण चक्र का प्रेमचन्द ने अपने कथा-साहित्य में जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया है।

आलोचकों ने प्रेमचन्द कथा-साहित्य के प्रमुख पात्रों को प्रायः अपनी आलोचना के केन्द्र बिन्दु में रखा है परन्तु उन्होंने प्रेमचन्द के गौण पात्रों की सम्यक् आलोचना प्रस्तुत नहीं की है। विशेष रूप से उनके साहित्य से दलित पात्रों की सम्यक् आलोचना होना अभी शेष है। यहाँ 'गोदान' उपन्यास के दलित पात्रों की सम्यक् आलोचना करना लक्ष्य है।

प्रेमचन्द का 'गोदान' उपन्यास 1936 ई. में प्रकाशित हुआ। यह उनके साहित्यिक- विकास की चरम कृति है। आलोचकों ने इसे आदर्शोन्मुख यथार्थवादी उपन्यास कहा है। प्रेमचन्द के प्रारम्भिक साहित्य पर गाँधीवाद का गहरा प्रभाव रहा है। 1930-31 के आसपास प्रेमचन्द का गाँधीवाद से मोहभंग शुरू हो गया था। वे साम्यवाद की ओर झुकने लगे थे। 'गोदान' में उन्होंने भारतीय किसान वर्ग के यथार्थ जीवन का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया है। भारतीय समाज के जमींदार, महाजन, पूंजीपति, धर्म के ठेकेदार तथा कथित ब्राह्मण वर्ग आदि किस प्रकार से किसानों का शोषण करते हैं; इसका जीवंत दस्तावेज है-गोदान । एक साधारण किसान 'होरी' को नायक बनाकर निस्सन्देह प्रेमचन्द ने नायक के परम्परागत मानदण्डों को खंडित कर एक आम आदमी को नायक का दर्जा दिया है। उन्होंने प्रसंगवश दलितों को भी अपने इस उपन्यास में स्थान दिया है। उनके दलित पात्र तथाकथित चमार जाति के हैं।

'गोदान' में प्रेमचन्द की दलित चेतना 'सिलिया-मातादीन' के प्रेम-प्रसंग के माध्यम से प्रकट हुई है। 'सिलिया' और 'मातादीन' क्रमशः तथाकथित चमार तथा ब्राह्मण जाति से संबंधित हैं। प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में दलितों की मूल समस्या अछूतपन को जीते-जागते रूप में प्रकट किया है। जाति-प्रथा की ऊँच- नीच की भावना यहाँ कलात्मक ढंग से चित्रित हुई है। प्रेमचन्द की दलित चेतना गाँधीवाद से प्रभावित है, उससे आगे नहीं बढ़ी जबकि गाँधी से बहुत पहले ज्योति राव फूले ने दलित चिंतन को बहुत आगे बढ़ा दिया था। वास्तव में भारतीय नवजागरण के जनक सही मायने में ज्योतिराव फूले ही हैं, न कि राजाराम मोहन राय।

ज्योतिराव फूले के बाद डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दलित विमर्श को और आगे बढ़ाया तथा उसे तार्किक बौद्धिक, वैज्ञानिक व प्रामाणिक आधार देकर अकाट्य बनाया। डॉ. अम्बेडकर ने अपना पूरा जीवन दलितों को मानवीय अधिकार दिलाने में संघर्ष करते हुए अर्पित कर दिया। उन्होंने अनेक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन चलाये और अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। डॉ. अम्बेडकर प्रेमचन्द के समकालीन थे। दलितों में जागृति लाने के उद्देश्य से उन्होंने 1920 ई. में ही एक पाक्षिक पत्र 'मूकनायक' प्रारम्भ किया था। 1927 ई. में उन्होंने दलितों की सामाजिक आर्थिक तथा धार्मिक गुलामी की जड़-'मनु स्मृति' ग्रंथ को जलाया। इस अवसर पर उन्होंने प्रस्ताव पास कर मांग की कि "वर्तमान पुजारीवादी और पुरोहित व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाया जाये जिससे उस प्रत्येक व्यक्ति को वह धंधा अपनाने की छूट हो जिसमें उसे रुचि है।" डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रयत्नों से ब्रिटिश सरकार ने 20 अगस्त 1932 को "दलितों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व और चुनावों में उनके द्वारा उनके अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार दे दिया।" परन्तु गाँधी ने डॉ. अम्बेडकर के विचारों का विरोध किया और ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालने के लिए आमरण अनशन का सहारा लिया। इसी वजह से 24 सितम्बर 1932 को गाँधी और अम्बेडकर के बीच एक समझौता हुआ जो 'पूना पैक्ट' के नाम से जाना जाता है।

गाँधी दलितों की समस्याओं का समाधान वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत ही रखकर करना चाहते थे। वे चाहते थे कि समाज से अस्पृश्यता तो मिट जाये परन्तु, जाति-व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रहे। डॉ. अम्बेडकर दलितों को पूर्ण रूप से मानवीय अधिकार दिलाना चाहते थे। वे दलितों की गुलामी के मूल कारण 'वर्ण-व्यवस्था' को ही पूर्ण रूप से ध्वस्त करना चाहते थे। उन्होंने 1933 में ही हिन्दू धर्म के बारे में कहा कि "आज का अस्पृश्य ऐसे धर्म को नहीं मानना चाहता जिसमें सामाजिक असमानता की वकालत की जाती हो। यदि हिन्दू धर्म उन अस्पृश्यों का भी धर्म है तो धर्म में सामाजिक समानता की कमी को पूरा करना होगा। ऐसे में केवल मन्दिर प्रवेश का एक कानून पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए जाति व्यवस्था की जड़ चातुर्वर्णीय व्यवस्था को जो कि स्वयं भी असमानता की द्योतक है, को समाप्त करना होगा।" सवों के विचारों में बदलाव न आने के कारण ही डॉ. अम्बेडकर ने 1935 म हिन्दू धर्म छोड़ने की महाघोषणा कर दी की। उस समय प्रेमचन्द जीवित थे। प्रेमचन्द की मृत्यु ४ अक्तूबर 1936 को हुई थी। बाद में 14 अक्तूबर 1956 को डॉ. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया और साथ में लाखों दलितों को भी बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रेमचन्द ने डॉ. अम्बेडकर के विचारों को नहीं समझा और दलितों की समस्या का हल गाँधी के विचारों में ही मनाते रहे। पूना पैक्ट के समय पर भी प्रेमचन्द ने गाँधी का ही समर्थन किया था। यद्यपि 1930-31 के आसपास से गाँधी के विचारों से प्रेमचन्द का मोहभंग शुरू हो गया था परन्तु दलितों के मामले में वे अन्त तक गांधीवादी ही बने रहे। उन्होंने 'गोदान' उपन्यास में (जो 1936 में प्रकाशित हुआ था) भी दलितों की समस्याओं का समाधान गाँधीवाद से ही किया है, न कि अम्बेडकर वादी विचारधारा से; जो उस समय मौजूद थी। 'सिलिया' के मन में स्वयं नीच तथा 'मातादीन' को श्रेष्ठ मानने की जो धारणा है; वह परम्परागत जाति-व्यवस्था को ही दृढ़ करती है। सिलिया सोचती है-"वह तो चमारिन है, जात की हेटी, उसका क्या बिगड़ा। आज दस-बीस लगाकर बिरादरी को रोटी दे दे, फिर बिरादरी में ले ली जायेगी। उस बिचारे का तो सदा के लिए धरम नास हो गया। वह मरजाद अब उन्हें फिर नहीं मिल सकती।" सिलिया को अन्त में मातादीन इसलिए स्वीकार कर लेता है कि अब वह ब्राह्मण बनकर नहीं जी सकता क्योंकि समाज में अब उसकी वो पहले जैसी इज्जत नहीं रही। जब सिलिया मातादीन से पूछती है कि अब मेरे साथ रहोगे तो तुम ब्राह्मण कैसे रहोगे तो मातादीन उत्तर देता है- "मैं ब्राह्मण नहीं, चमार ही रहना चाहता हूँ। जो अपना घरम पाले, वही ब्राह्मण है, जो धरम में मुँह मोड़े, वही चमार है।"

प्रेमचन्द ने मातादीन के इस कथन द्वारा भी वर्ण-व्यवस्था का समर्थन किया है। मातादीन जो ब्राह्मण था, पतित होकर चमार बनकर सिलिया के साथ रहना चाहता है परन्तु वह वर्ण- व्यवस्था को तोड़ने की बात नहीं करता। यदि प्रेमचन्द अम्बेडकर वाद को समझते और वर्ग-व्यवस्था को तोड़ने का संकेत 'गोदान' में देते तो उनका दलित चिंतन सही दिशा की और अग्रसर होता। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और यही प्रेमचन्द के दलित विमर्श की सीमा है। प्रेमचन्द का दलित विमर्श गाँधीवाद से आगे नहीं बढ़ सका।

- प्रो. धर्मपाल पीहल

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