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बाल दिवस पर विशेष : बाल कहानी और बाल कविता


बाल दिवस पर विशेष (children's day special)

  १४ नवम्बर बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हमारे देश के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिवस होता है। उन्हें बच्चे बहुत पसंद थे और प्यार से बच्चे उन्हें चाचा नेहरु पुकारते थे। उन्हीं की याद में हम बाल दिवस मनाते हैं।
सही बात तो यह है कि बच्चे सचमुच बहुत प्यारे होते हैं। उनके व्यवहार में कोई छल-कपट नहीं होता है। बस ऐसे ही प्यारे बच्चों की एक कहानी लेकर मैं आज आप सभी के समक्ष उपस्थित हूँ। साथ में बाल दिवस विशेष एक चटपटी, चुलबुली सी बाल कविता भी।
बाल दिवस पर विशेष : बच्चे मन के सच्चे (कहानी) ट्री हाउस के नए पड़ौसी (बाल कविता)

बाल कहानी - बच्चे मन के सच्चे

खेल का पीरियड था ...कुछ बच्चे पकड़म -पकड़ाई खेल रहे थे तो दूसरे लुका-छिपी। सब तरफ से बच्चों की आवाजों का शोर था। तभी खेल का पीरियड समाप्त होने की घंटी सुनायी दी। बच्चे दौड़ भाग कर अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गए।
स्कूल में आयी नयी प्रधानाध्यापिका ने देखा ऑफिस के बाहर लगे गमलों के फूल एवं पत्ते तोड़ कर बच्चों ने यहाँ-वहाँ फेंक दिए हैं।
वे बहुत नाराज़ हुई और सभी अध्यापिकाओं को निर्देश दिए “जिन बच्चों ने ये खूबसूरत फूल तोड़ कर फेंके है उन्हें मेरे ऑफिस में भेजो”
“किस ने तोड़े वे फूल, सच-सच बताओ वरना तुम्हारी सबकी डायरी में नोट लिख कर भेजना होगा और तुम्हारे माता-पिता को विद्यालय में आना होगा” कक्षा अध्यापिका नाराज हो कर बोलीं।
सभी बच्चे मुंह लटका कर खड़े थे।
फूल तोड़ने वाले बच्चों का कुछ पता न चला।
अगले दिन प्रधानाध्यापिका ने प्रार्थना सभा में निर्देश दिया “कक्षा पाँच के सभी बच्चों को आज कक्षा में नहीं जाना है जब तक कि फूल तोड़ने वाले बच्चे पकड़े न जाएँ”
बच्चे फिर मुंह लटका कर खड़े हो गए।
शरारत तो सभी बच्चों ने मिल कर की थी अब शिकायत करें भी तो किसकी ?
करीब एक घंटे तक सभी बच्चे मैदान में खड़े रहे। वे धीरे-धीरे फुसफुसा रहे थे “क्या करें जब खेलने लगते है तो होश ही नहीं रहता क्या सही क्या गलत, बस एक ने फूल तोड़ा और सब उसके साथ शामिल हो गए, अब किसकी गलती बताएं ? ”
जब प्रधानाध्यापिका अपने ऑफिस से राउंड पर आयी तो मैदान में सजा दिए गए बच्चे नहीं थे। उन्होंने सोचा कि शरारती बच्चे फिर कहीं शरारत कर रहे होंगे।
गुस्से में उन्होंने पूरे स्कूल का राउंड लिया।
अपने ऑफिस के बाहर पहुँची तो देख कर दंग रह गयी।
जहाँ गमले रखे थे वहाँ तो बच्चे रंग-बिरंगे फूलों के मुखौटे पहने खड़े हैं।
उन्होंने एक बच्चे का मुखौटा उतारा “सॉरी मैम” वह बोला।
दूसरे का उतारा तो वह भी पहले की तरह ही बोला “सॉरी मैम”
एक-एक कर प्रधानाध्यापिका ने सभी बच्चों के चेहरों पर लगे मुखौटे उतार दिए।
जैसे ही प्रधानाध्यापिका बच्चे के चेहरे से मुखौटा उतारती, वह बोल देता “सॉरी मैम”
  प्रधानाध्यापिका का गुस्सा छू हो गया था। सभी बच्चों के चेहरे देखने के बाद जैसे ही वे ऑफिस की तरफ मुडीं पीछे से मधुर धुन में आवाज़ आयी “बच्चे मन के सच्चे”
उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा “सभी बच्चे डाली पर लगे फूलों की तरह झूमते हुए फूलों के मुखौटे लगा झूम रहे थे, उन्होंने अपने कान पकड़े हुए थे”
तभी एक बच्चे ने कहा “मैम हम इसी तरह रोज आपके ऑफिस के बाहर मुखौटे लगा कर सजा काटेंगे जब तक कि इन गमलों में नए फूल नहीं आ जाते”
दूसरे ने कहा “जी मैम हमें मालूम है आपको फूल बहुत पसंद हैं और हमने आपके गमलों की शोभा ख़राब की है, हम यहीं रोज खड़े रहेंगे और फूल बन कर मुस्कुराते रहेंगे, हमने आपका दिल दुखाया है”
प्रधानाध्यापिका ने सभी बच्चों को एक-एक कर गले से लगा लिया, वे स्वयं उनके साथ गाने लगी थी “बच्चे मन के सच्चे”
उन्होंने सभी बच्चों को उनके अच्छे व्यवहार के लिए माफ़ कर दिया था और वे अब अपनी कक्षा में पढ़ रहे थे।

बच्चों को अक्सर ट्री हाउस के बारे में बातें करते देखा है। उनकी कल्पना होती है कि जैसे पुराने जमाने में मनुष्य सर छुपाने के लिए पेड़ों एवं गुफाओं में रहता था। ऐसा ही उनका भी एक घर किसी पेड़ पर हो। ऐसी ही कविता है।
बाल कहानी एवं कवितायें कुछ बारीकियाँ : रोचिका अरुण शर्मा

बाल कविता - ट्री हाउस के नए पड़ौसी

घर होता लकड़ी का मेरा, बना पेड़ पर होता ।
बंदर कूदे डाल-डाल ज्यों, पंछी जैसे सोता ।।
चिड़ियों के गीतों से जागूँ, लगती भोर सुहानी ।
चीं-चीं वाली भाषा सीखूँ, कर लूँ गीत जुबानी ।।
डाली बाँधूँ मोटी रस्सी, लटकूँ उतरूँ नीचे ।
साथ बंधे टायर पर बैठूँ , झूलूँ आँखें मीचे ।।
रंग-बिरंगे घर चिड़ियों के , देखूँ खिड़की खोले ।
बर्ड-हाउस के गोल होल में, बैठ पड़ोसन बोले ।।
क्या तुम ध्यान रखोगे मेरे, बच्चे यहाँ अकेले ।
बाल दिवस आया है देखो, लगे हुए हैं मेले ।।
खेल-खिलौने लेकर आऊँ, लाऊँगी मैं खाना ।
ट्री हाउस के नए पड़ौसी, दूँगी फिर नजराना ।।
मिल जुल साथ रहेंगे जैसे,परिवार का हिस्सा ।
खायें पिज़्ज़ा बैठ शाख पर, हुआ रोज का किस्सा ।।

रोचिका अरुण शर्मा , चेन्नई
Phone – 9597172444
Mail Id- sgtarochika@gmail.com

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