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Types of Alienation: अलगाव के प्रकार

अलगाव के प्रकार: (Types of Alienation)

आध्यात्मिक अलगाव :

        कालगत संदर्भों में मानवीय इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि मनुष्य किस प्रकार आदिम अवस्था से लेकर वर्तमान युग तक की यात्रा पार कर सका है। अति प्रारंभ में उसके जीवन की सूत्रधार शक्ति दैवी शक्ति ही रही जिसे उसने ईश्वर कहा तथा उसके सगुण एवं निर्गुण रूप निर्धारित किये। मध्यकाल में यही शक्ति उसके जीवन की नियंता बना और इसी शक्ति को केंद्र में रखकर अनेक दर्शनों का उदय हुआ। ये सभी दर्शन आध्यात्मवादी दर्शन कहलाये। इन दर्शनों में आत्मा को ईश्वर अथवा ब्रह्मा का अंश बताया गया जो ईश्वर में विलय अथवा उससे पुनर्मिलन दर्शाया गया जिसके लिए अनेक साधन कार्यों का निर्धारण भी किया गया।

      स्पष्ट है कि मनुष्य आत्मा के स्तर पर स्वयं को ईश्वर से अलगाव ग्रस्त मानता रहा है। भारतीय और ईसाई धर्म ग्रंथों में मनुष्य को संसार में ईश्वर ग्रस्त देखा गया है। इस अलगाव को पाटने के लिए आत्मा को कभी साधक रूप में तो कभी विरहिणी रूप में अलगाव पीड़ित बताया गया है।

     आत्मा एवं ईश्वर के मिलन में माया की कल्पना की गई है। धर्म ने मनुष्य को सदाचारी, विवेकी, मर्यादाशील तथा भक्ति की ओर उन्मुख किया। इसने मनुष्य को भक्ति के माध्यम से इश्वरोपलब्धि के लिए प्रेरित किया। धार्मिक मार्ग से निरस्त होने वाले को ही अधिक अलगाव ग्रस्त बताया गया है। हीगेल ने अलगाव को आध्यात्मिक संदर्भ में देखा है। उन्होंने सामंजस्यपरक दृष्टिकोण अपनाते हुए अलगाव को अनिवार्य माना। उनकी यह मान्यता रही कि विकास हेतु आत्मा को अलगाव ग्रस्त होना ही होगा। उनके शब्दों में –“संस्कृति जितनी प्रगति करती है और जीवन की अभिव्यक्ति एवं विकास की दृष्टि से जितनी अधिक विविध होती जाती है, अलगाव की शक्ति उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है..। इस प्रक्रिया में अलगाव की पहचान ही भावी सामंजस्य की दिशा में महत्वपूर्ण होती है।“ इस प्रकार हीगेल ईश्वर से आत्मा के अलगाव को सांस्कृतिक विकास, धर्म और कला को अलगाव पर विजय का प्रयास बताते हैं।

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        इस तरह आध्यात्मिक चिंतकों ने ईश्वर से आत्मा के अलगाव को ही आध्यात्मिक अलगाव की संज्ञा दी है। तदोपरांत मनुष्य के सांसारिक जीवन की अनिवार्यता को देखते हुए उन्होंने धर्मनिष्ठ आचरण से मनुष्य के पतन को आध्यात्मिक अलगाव माना है। आधुनिक युग में आस्तिक, अस्तित्व वादियों ने भी मनुष्य के अस्तित्व के प्रश्न को अध्यात्म से जोड़ा है। दूसरी ओर आज के भौतिक, औद्योगिक युग में ईश्वर के नकार के कारण इस अलगाव को प्रायः अलगाव नहीं मन जाता।

सांस्कृतिक अलगाव :

        मनुष्य सभ्यता और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में जीवन जीता है। संस्कृति सभ्य समाज के सभी मूल्यों, चिंतन और विवेक का पूंजी है। संस्कृति के अभाव में मनुष्य की सोच और सभ्यता की कोई पहचान नहीं हो सकती। यह जीवन को सुचारुता प्रदान करने वाली दृष्टि है जो कालगत संदर्भ में यथा अपेक्षा अपना नवीनीकरण करती चलती है।

        सांस्कृतिक अलगाव दो प्रकार का हो सकता है, प्रथम स्तर पर नई अपेक्षायें पारंपरिक संस्कृति में विघटन उत्पन्न करती है। इस दौर में नये मूल्यों एवं नयी दृष्टि संस्थित नहीं होती। कुछ काल तक मनुष्य विघटन के कारण संस्कृति के अंग विशेष से अलगाव ग्रस्त हो जाता है। दूसरे प्रकार का सांस्कृतिक अलगाव वह अलगाव है जब मनुष्य भीतरी दबाव की अपेक्षा बाहरी दबाव महसूस करता है। ऐसे में कोई बाहरी आक्रांत शक्ति संस्कृति के अस्तित्व को खतरे में डाल देती है जैसा मध्यकाल में मुस्लिम संस्कृति ने भारतीय संस्कृति को खतरे में डाल दिया था। ऐसी स्थिति में संस्कृति विदेशी संस्कृति से टक्कर लेने वाले युग-पुरुषों, धर्मावतारों और ईश्वर की अवतारण के माध्यम से अपने अस्तित्व की रक्षा करती है। पहले प्रकार का सांस्कृतिक अलगाव इस अर्थ में मंगलकारी होता हैं क्योंकि मनुष्य नये विकास की ओर अग्रसर होता है। दूसरे प्रकार का अलगाव अवसादपरक होता है।

        सांस्कृतिक अलगाव के लिए एनोमी (Anomie) शब्द का प्रयोग किया गया है। जे.हर्टन (J.Hartan) के अनुसार एनोमी सिद्धांतहीनता एवं अराजकता युक्त सामाजिक स्थिति का सूचक है। यह अवधारणा सदैव व्यक्तियों और सामाजिक नियंत्रण की बाध्यकारी शक्तियों के बीच तनाव पर ही अवस्थित है।“ मनुष्य समाज में रहते हुए किन्हीं निश्चित मूल्यों के सहारे ही जीवन यापन करता है। उनमें विघटन के कारण ही समाज में सिद्धांत हीनता व अराजकता की स्थिति आती है। यह स्थिति ही अलगाव की स्थिति है। रोजनर का यह कथन सही है कि एनोमी मूल्यों और सिद्धांतों की टूटन की सूचक अवस्था है।“ इससे स्पष्ट है कि सांस्कृतिक अलगाव गहन उथल-पुथल का परिचायक है।

       नैटलर के शब्दों में –“अलगाव ग्रस्त व्यक्ति वह है जो अपने समाज और समाजवादी संस्कृति के प्रति अजनबी अथवा मित्र भाव शून्य बना दिया जाता है।“ नैटलर की इस निष्पत्ति में संस्कृति पर सीधे विचार न करके उन जानी-अनजानी शक्तियों के ओर संकेत किया गया है जो सांस्कृतिक परिवेश को तोड़ती है।

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      आधुनिक युग में तो राजनीति ने सांस्कृतिक मूल्यों को तोड़ा है। जनप्रिय संस्कृति के नाम पर कृत्रिम संस्कृति उदित हुई है। इनके अंतर्गत नयी कारों, टी.वी., फ्रीज, कैबरे, फिल्मी फैशनो और जनप्रिय खेलों पर बल दिया गया है। सभ्यता के आरामदेह पक्ष को संस्कृति के नाम पर प्रचारित करने अंततः उदात्त संस्कृति से अलगाव का सूचक है।

समाजार्थिक अलगाव :

       मनुष्य समाज में एक-दूसरे पर निर्भर करके ही जीवन जीता है। अति प्रारंभिक अवस्था में वह सीधे ही वस्तुओं के आदान प्रदान से जुड़ा था। धीरे-धीरे वस्तुओं की गुणवत्ता मूल्यों के रूप में निर्धारित हुई व समाज में आर्थिक व्यवस्था का उदय हुआ। सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य दया, प्रेम, मैत्री, करुणा, सद्भाव आदि मानवीय गुणों के आधार पर भी एक दूसरे से जुड़ा है। इस प्रकार समाज एक ओर इन मूल्यों से चलता है तो दूसरी ओर आर्थिक स्तर पर वह उत्पादन के दान-प्रतिदान द्वारा चलता है लेकिन ज्यों-ज्यों सामाजिक स्तर पर परस्पर निर्भरता बढ़ती चली गई त्यों-त्यों सामाजिक जीवन जटिलतर होता चला गया तथा उसमें श्रम का विभाजन होने लगा। अधिक सुखमय जीवन जीने की लालसा ने दूसरे के श्रम पर अधिकार की सोच को जन्म दिया। इससे वर्ग-भेद उत्पन्न हुआ। शोषक एवं शोषित रूप सामने आये। फलतः मनुष्य स्वार्थी, लालची, अहंवादी और बुरा होता चला गया। रूसो के अनुसार –“ये वही बुराइयाँ है जो सामाजिक संस्थाओं के दुरुपयोग का अपरिहार्य का कारण बनती है।“ हीगेल ने बहुत पहले इस भेद एवं अलगाव से बचने के लिए श्रम एवं उत्पादन के संदर्भ में संपत्ति को व्यक्ति स्वतंत्रता का मूलभूत आधार कहा था। उनके शब्दों में –“आत्मा रूप में मानवीय प्रकृति की सामाजिक तत्त्व (सामाजिक संस्थाओं) के प्रति संगति अनिवार्य है। अतः मानवीय प्रकृति के लिये यह अनिवार्य है कि वह नैतिक (सामाजिक) व्यवस्था के रूप में अपने सत्व या अपनी भीतरी वैश्विकता को बनाये रखे।“ मार्क्स ने भौतिक जगत को आत्मा की वस्तु न मानकर श्रमज माना और श्रम को मनुष्य की अनिवार्य प्रकृति। मार्क्स की दृष्टि में समाज-आर्थिक अलगाव श्रमिकों के श्रमगत उत्पादन पर दूसरे व्यक्ति के अधिकार से उत्पन्न होता है। उनके शब्दों में –“वह (श्रमिक) अपने काम में आत्मतृप्ति का अनुभव नहीं करता बल्कि स्वयं की उपेक्षा करता है। शुभ की उपेक्षा मुसीबत की भावना से भरा रहा है, अपनी शारीरिक व आत्मिक शक्ति का स्वच्छ विकास नहीं कर पाता है बल्कि शारीरिक रूप में शक्तिशून्य और आत्मिक रूप में दूषित हो जाता है।“ इस प्रकार मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था को भी समाजार्थिक अलगाव का मूल कारण माना है।

       समाज शास्त्रीय चिंतकों ने सामाजिक अलगाव को व्यक्ति के एकाकीपन तथा अंतर वैयक्तिक स्तर पर अलगावग्रस्त होने के रूप में भी देखा है। ऐसा व्यक्ति समाज में रहते हुए भी सामाजिक भागीदारी से कटा रहता है। सामाजिक अलगाव ही कर्मगत अलगाव भी बन जाता है। हीगेल के अनुसार –“कर्मगत अलगाव का मुख्य कारण अपनी कर्मगत स्थिति में कर्म से उत्पन्न असंतोष ही है। यह कर्मगत अलगाव अंततः आर्थिक अलगाव ही सिद्ध होता है।“ इस प्रकार सामाजिक व आर्थिक अलगाव परस्पर संबद्ध रहते है। हीगेल के ही शब्दों में –“यदि व्यक्ति अपने से वरिष्ठ एवं सहयोगी व्यक्तियों के साथ अपने कर्म क्षेत्र के समाज में असन्तुष्ट है तो वह अलगाव ग्रस्त भी है।“

       अतः समाजार्थिक अलगाव व्यक्ति की सामाजिक स्थिति तथा व्यक्ति की सामाजिक दशा से जुड़े असंतोष का सूचक है।

पारिवारिक अलगाव :

        मनुष्य समाज में रहते हुए मूलतः परिवार में ही रहता है। वह पतवार में ही जन्म लेकर पोषित होते हुए स्वयं परिवार बसाकर समाज से जुड़ता है लेकिन परिवार में उनकी स्थिति सर्वत्र एक समान नहीं हो सकती। परिवार में रहते हुए वह स्थूल और सूक्ष्म स्तरों पर अनेक दायित्वों और रिश्तों में बांधा रहता है। दायित्वों के स्तर पर वह घर का भरण-पोषण करनेवाला व्यक्ति भी होता है एवं दूसरों पर किन्हीं कारणों से स्वयं भी निर्भर कर सकता है।

     मनुष्य दो प्रकार के परिवारों में रहता है। इनमें से पहले प्रकार के परिवार संयुक्त परिवार कहलाते है एवं दूसरे प्रकार के परिवार एकल परिवार। आधुनिक महानगरीय जीवन में वह पेइंग गेस्ट के रूप में भी किसी परिवार का अंग बनकर रहता है। परिवार किसी भी प्रकार का हो स्थितियाँ, आवश्यकताओं इत्यादि के आधार पर उसकी स्थिति सदैव सुखमय नहीं होती। वह बाहरी-भीतरी स्तर पर कभी-कभी बहुत अधिक तनाव को झेलने के कारण अलगाव ग्रस्त होता है, यदि वह संयुक्त परिवार को छोड़कर कहीं दूर नौकरी या व्यवसाय को करने जाता है तो वह परिवार के सभी सदस्यों से कट जाता है। माता पिता एवं घर के अन्य बड़े बुजुर्गों में भी ऐसे व्यक्ति से स्नेह और आकांक्षा के स्तर पर अलगाव का बोध उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति यदि पीछे घर पर ही अपनी पत्नी या बच्चों को छोड़कर जाता है तो उसके दाम्पत्य तथा वात्सल्य जीवन में भी दरार उत्पन्न होती है। इस स्थिति का दूसरा रूप यह भी होता है कि कहीं दूर बसे बेटे-बेटी के पास आवश्यकता पड़ने पर वृद्ध अथवा रोगी माता-पिता जाकर उचित सम्मान नहीं पाते तो वे मनसा अलगाव को झेलते हैं।

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        आधुनिक समाज में यदि दोनों पति-पत्नी ही नौकरी पेशा हैं तो उनमें कई स्थितियां अलगावजनक हो सकती हैं। यदि वे दोनों दो अलग स्थानों एवं दूसरे शहरों में काम करते है तो अलगाव स्पष्ट ही है। यह अलगाव केवल उन दोनों को ही नहीं झेलना पड़ता है बल्कि उनके बच्चों पर तो उसका और भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। यदि पति-पत्नी दोनों एक ही शहर में नौकरी करते है और उन दोनों के बीच दूसरा पुरूष या स्त्री आ जाते हैं तो स्थिति और भी विडम्बनामयी बन जाती है। कभी-कभी तो एक ही छत के नीचे वे दोनों अजनबी बने लोकजाज के भय से वर्षों गुजारा देते हैं तो कभी-कभी तलाक की स्थिति आ जाती है। पारिवारिक स्तरीय अलगाव में विधवा स्त्रियों और माता-पिता विहीन बच्चों की स्थिति तो और भी अधिक दुःखदायी बन जाती है। निकम्मे एवं अपराधी युवाओं को लेकर पूरा परिवार ही पूरे समाज से कट जाता है। इसी प्रकार आर्थिक दबाव भी परिवार के एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति को परिवार से जोड़े रखकर भी भीतर से अलगावग्रस्त बना देते है। पति-पत्नी में से किसी एक पर दूसरे का हावी होना भी एक ऐसी ही विद्रूप स्थिति है जिसमें दूसरा अपने व्यक्तित्व के श्रेष्ठ पक्ष से अलगावग्रस्त हो जाता है तथा अंतर्मुखी बन जाता है। इस प्रकार पारिवारिक अलगाव रिश्ते के स्तर से लेकर व्यक्ति से व्यक्ति तक की स्थिति के अनुसार अनेकपक्षीय होता है।

राजनीतिक अलगाव :

        राजनीतिक अलगाव से अभिप्राय राजनीतिक व्यवस्था में व्यक्ति का किसी न किसी स्तर पर स्वयं को पीड़ित अनुभव करना। तंत्र कोई भी हो, वैधानिक स्तर पर राष्ट्र के सभी नागरिकों के समान स्वतंत्रता, सुरक्षा एवं अधिकार प्रदान किये जाते हैं परंतु यथार्थ स्तर पर सत्ताधारी और उनके निकट के लोग इसमें व्याघात उत्पन्न करते हैं। आदि मानव ने कभी ऐसी ही बर्बर शक्तियों से पीड़ित होकर अपनी प्रभुसत्ता को किसी दूसरे के हाथ सौंपा था। लोक का कथन है –“वही और केवल वही एक राजनीतिक समाज हो सकता है जहाँ लोग स्वेच्छा से अपनी प्राकृतिक सत्ता को किसी समुदाय के हाथों सौंप देते है।“ रूसो ने इसी समर्पण के संबंध में लिखा है –“प्रत्येक व्यक्ति सबके प्रति समर्पित होता है और यह समर्पण निःसंकोच होता है।“

       इससे स्पष्ट होता है कि राजनीतिक व्यवस्था सुरक्षा की दृष्टि से अपनायी गयी एक व्यवस्था थी परंतु कालांतर में इसमें प्रारंभिक कल्याण राज्य वाली बात नहीं रही। तानाशाही में तो व्यक्ति के पास कोई अधिकार होता ही नहीं है परंतु प्रजातंत्र में भी नौकरशाही के बोलबाले के कारण लोगों के पास वोट देने के बाद पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ बचा ही नहीं रहता। कोई भी व्यक्ति अपनी शक्ति के आधार पर नेता बन जाता है एवं यथार्थ में सत्ता नौकरशाही के हाथ में आ गयी है। समाजशास्त्रियों ने इस अलगाव को सत्ता शून्यता (Powerlessness) के रूप में रूपायित किया है। “जब राज्य नौकरशाही से आक्रांत हो जाता है “तो वह राज्य, व्यक्ति के प्रति उदासीन एवं अलगावमुखी होता है। ऐसा राज्य समाज में व्यक्ति के अस्तित्व ओर ध्यान नहीं देता। इस प्रकार की विभाजन ग्रस्त दुनिया में व्यक्ति का भीतरी जीवन भी विभाजित हो जाता है।“ राजनीतिक अलगाव से नागरिकों के अधिकारों कुंठित होने लगते है, राजनीति जब पूरे जीवन और मूल्यों पर हावी हो जाती है तो उससे उत्पन्न अलगाव अन्य सभी प्रकार के अलगावों की पीड़ा को और अधिक बढ़ा देता है।

मनोवैज्ञानिक अलगाव :

        मनोवैज्ञानिक अलगाव से तात्पर्य है की बाह्य स्थितियों के संदर्भों की अपेक्षा मन के स्तर पर अलगाव के अनुभव से है। मानसिक स्तर पर अलगाव अनुभव का कोई एक निश्चित कारण नहीं हो सकता। इसलिए मनोवैज्ञानिक अलगाव का कोई एक निश्चित पृथक रूप भी नहीं है। मन का संबंध अध्यात्म, संस्कृति, समाज, परिवार, राजनीति, अस्तित्व तथा निजी व्यक्तित्व होता है। इसलिए इन सभी क्षेत्रों में उत्पन्न अलगाव का प्रभाव व्यक्ति के मन पर पड़े बिना नहीं रहता। फिर भी मनोवैज्ञानिक अलगाव किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की अनुरूपता में उसके मन को अधिक दूर तक प्रभावित करता है। इस समान स्थिति का दो व्यक्तियों के मन पर एक जैसा प्रभाव नहीं पड़ता। अपितु मनोवैज्ञानिक अलगाव व्यक्ति के व्यक्तित्व की सापेक्षिकता में उदित होता है। उस अलगाव में मनुष्य अनास्थावादी विकृति मन व्यक्तित्व मनोरोगी तक भी हो सकता है। इस संबंध में यह कहा गया है –“मानसिक स्वास्थ्य प्रेम एक सर्जन के गुणों, कबीले और मिट्टी के साथ कौटुम्बिक रिश्ते, अपनी शक्तियों की पहचान द्वारा आत्मबोध की चेतना के उदय, अपने बाहर एवं भीतर के यथार्थ की पकड़ एवं विवेक के विकास पर निर्भर करता है।“

        मन के इसी स्वरूप से विचलन को ही मनोवैज्ञानिक अलगाव कहा जाता है। कारेन हार्नी ने इसे अन्तर्चेतनात्मक आधार पर देखा है। उनकी मान्यता है कि व्यक्ति कभी-कभी अपने यथार्थ स्व से भिन्न अपना कोई आदर्श रूप अपने मन में निर्मित कर लेता है। जब व्यक्ति के यथार्थ स्वर और कल्पनागत आदर्श स्व में खाई उत्पन्न होती है तो व्यक्ति रुग्ण मानसिक जड़ता का शिकार हो जाता है। यह रुग्ण मानसिक जड़ता व्यक्ति के स्व से गहन अलगाव का परिणाम है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की शक्ति तथा सक्रियता नष्ट हो जाते हैं, उसकी भावनाएं, इच्छाएँ तथा विचार बाधित होने लगते हैं। मनोवैज्ञानिक अलगाव एक ओर समाज और राजनीति से उत्पन्न अलगाव का परिणाम है तो दूसरी ओर यह व्यक्ति के व्यक्तित्व के स्रोतों का क्षयकारी रूप है।

स्व-अलगाव :

         स्व अलगाव को आत्मा निर्वासन भी कहा जाता है, स्व अलगाव से तात्पर्य व्यक्ति के अपने भीतर अपने व्यक्तित्व के किसी अंश या पूर्ण व्यक्तित्व से कट जाने से है। हीगेल ने आत्मा को ईश्वरीय सत्ता का अंश मानते हुए वस्तु जगत को आत्मा का ही पुनर्पादन कहा है। उन्होंने स्व अलगाव की अपेक्षा अलगाव ग्रस्त आत्मा का प्रयोग किया है। यह अलगाव आत्मा पर छाए अहं के कारण होता है। शिलर का मानना है कि विचारों के पीछे भोगी गयी चिन्तनात्मक आत्मा भौतिक संसार में आकर अलगाव ग्रस्त हो जाती है। इससे मुक्ति हेतु वे बताते हैं कि “ तर्क और विवेक में समान महत्व की स्थिति में रहने पर ही उसका कालगत अस्तित्व उसके चिह्नमय अस्तित्व से जुड़ पाएगा। इन दोनों के तत्वों में एक के दूसरे पर प्रभुत्व की दशा में यह संभव नहीं हो सकता।

      भौतिकवादी चिंतकों ने भौतिक स्तर पर मनुष्य के अस्तित्व और परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में स्व अलगाव पर सोचा है। मार्क्स ने श्रम और उत्पादन से अलगाव तथा श्रमजन्य उत्पादन से अधिकार छीनने पर अलगाव को स्व-अलगाव की संज्ञा दी। स्व-अलगाव, व्यक्तिवादिता तथा आत्मबोध को खो देता है। ऐरिस फ्रॉम्स के शब्दों में अलगाव से अभिप्राय अनुभूति की उस प्रक्रिया से हैं जिसमें व्यक्ति स्व से अलगाव का अनुभव करता है। अनुभूति की प्रक्रिया के लिए आत्म बोध का होना अनिवार्य है। कार्न हार्नी लिखते है कि -स्व अलगाव ग्रस्त मनुष्य वही है –“जिसके वैयक्तिक स्व का प्रतिक्रियात्मक रूप, बाधित, आच्छादित अथवा अभिव्यक्तिविमुख कर दिया जाता है अथवा हो जाता है।“ स्व अलगाव के वास्तविक स्व एवं यथार्थ स्व दो भेद है। “ वास्तविक स्व से अलगाव में व्यक्ति अपनी इच्छाओं के अस्तित्व से अपने स्वामित्व को भूले रखता है एवं अपनी सच्ची भावनाओं, इच्छाओं एवं विचारों का इस सीमा तक अतिक्रमण करता है कि वे प्रायः पहचान खो बैठती है।“

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      मनोरोगी रूप में स्व अलगावग्रस्त व्यक्ति “अपने वास्तविक रूप, अपनी भावनाओं, कार्य स्रोतों पर लज्जित होते हुए आत्मा घृणा का शिकार हो जाता है” यथार्थ स्व से अलगाव से हार्नी का अभिप्राय है “यह वह स्व अलगाव है जिसमें व्यक्ति का भीतरी शक्ति स्रोत सूख जाता है और यही शक्ति स्रोत उसके विकास का केंद्र होता है।“

     समाजशास्त्रीय चिंतकों ने स्व अलगाव को अंतर वैयक्तिक संबंधों में उत्पन्न अवसाद ही माना है। अकेलापन के संदर्भ में कहा जा सकता है कि जिसमें व्यक्ति दूसरों के साथ संबंध स्थापित नहीं कर पाता लेकिन उसका अकेलापन “उस व्यक्ति के अकेलेपन से भिन्न होता है जो किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वेच्छा से अलग रहना चाहता है।“ कुल मिलाकर कह सकते हैं कि स्व अलगाव मानसिक स्तर पर एक पीड़ाजनक स्थिति का ही नाम है।

अस्तित्व अलगाव :

       अस्तित्ववादी चिंतकों ने अस्तित्व पर विचार करते हुए अस्तित्व को ही अलगाव ग्रस्त माना है। वे यह मानते हैं कि विश्व में कहीं भी राजनीतिक, व्यवस्थापरक तथा सामाजिक कारणों में से कोई भी कारण हो, मनुष्य को वरण की स्वतंत्रता (Choice Of morality) कहीं भी नहीं है। इसलिए मनुष्य अस्तित्व के स्तर पर अलगाव ग्रस्त जीने को बाध्य है। हीडेगर ने मनुष्य के अस्तित्व को प्रामाणिक एवं अप्रामाणिक दो वर्गों में बांटा है। पहले प्रकार का अस्तित्व है जिसे मनुष्य अपने निर्णयों एवं चयन विकल्पों द्वारा दिशा देता है। अप्रामाणिक अस्तित्व वह है जो निर्वैयक्तिक सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार चलता है। इन दोनों के बीच के अंतराल को उन्होंने अलगाव की संज्ञा दी है। उनके अनुसार विशिष्ट उदासीनता के परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने अस्तित्व की अंतः शक्ति के अन्यगत संबंध निरपेक्ष स्व से अलग हो जाता है।

     पालटीलिक के अनुसार “अस्तित्व का सार तत्व से कट जाना अपनी मूल प्रकृति के प्रति मनुष्य का अजनबीपन ही अलगाव है।“ अन्यत्र वे कहते हैं “अस्तित्व का होना ही अलगाव का होना है। मनुष्य का जो अस्तित्व है, वह निश्चित ही वैसा ही नहीं है जो वह मूलतः और उसे कहना चाहिए। वह अपने वास्तविक रूप के प्रति अजनबी रहता ही है।“

      सार्त्र के अनुसार –“वस्तु रूप में देखते हुए यह दूसरा व्यक्ति, व्यक्ति के आत्म रूप पर एक दूसरे ही व्यक्तित्व का आरोप कर देता है। इन दोनों व्यक्तियों के बीच का अंतराल ही अलगाव है। अन्यत्र वे लिखते हैं “मनुष्य को अपने ही कर्म से जहां वे उससे भिन्न जा पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है। अलगाव का यह रूप ही अलगाव के अनेक अन्य रूपों में लक्षित होता है लेकिन यही रूप सब रूपों का आधार है।“

 निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि अस्तित्व अलगाव प्राकृतिक अस्तित्व में उत्पन्न विघटन का ही दूसरा नाम है। अलगाव के ये सभी प्रमुख प्रकार है, शेष इन्हीं की निष्पत्तियां अत्यंत सूक्ष्मता में जाने पर स्थितियात्मक अलगावों में प्रकट होती है।

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